रेल की खिड़की
सफ़र के दौरान अक्सर खिड़की के पास ही बैठता फिर चाहे वो बस हो , रेलगाड़ी हो या हवाईजहाज का सफ़र हो। खिड़की के पास बैठने का लुत्फ़ अलग ही होता है। सफ़र के दौरान सैकड़ों मंज़र नज़र से गुज़रते हैं , विशेषरूप से किसी नदी के पुल पर से गुज़रते हुए नदी को क़रीब से देखना और उस खिड़की से पुराने सिक्के , मुंडन के बाल , पुराने प्रेम ख़त कोई और ऐसी चीज़ जो हम घर में नहीं रख सकते , जिसे हम जला नहीं सकते , उन चीज़ों को नदी की लहरों में प्रवाहित कर देते हैं। ऐसे ही एक सफ़र का मंज़र ज़ेहन में ताज़ा हो गया। गर्मियों के दिन थे और मैं ट्रेन में सफ़र कर रह था। रेल की खिड़की पर कुहनी टिकाये पुरानी यादों में खोया हुआ था।
खुली खिड़की से आती तेज़ हवा में मेरे बाल उड़ उड़ जाते
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