3rd Thursday Online Lampshade Reading
Thursday, July 16 · 8:30 pm
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नमस्कार!
आज मैं राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध रचना "कुटिया
में राजभवन" का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करने जा रही हूँ। यह रचना केवल रामायण
की एक घटना का वर्णन नहीं अपितु त्याग, सादगी, आदर्श जीवन, भारतीय संस्कृति,
पारिवारिक प्रेम और नारी सम्मान जैसे महान मूल्यों का संदेश भी देती है।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त का जन्म 3 अगस्त 1886 को उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले के चिरगाँव में हुआ था। वे आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रमुख कवियों में से एक थे। खड़ी बोली हिन्दी में लिखी उनकी रचनाओं की भाषा अत्यंत सहज और सरल है जिसके चलते उनका साहित्य जन जन में लोकप्रिय हो गया। । महात्मा गांधी ने उन्हें "राष्ट्रकवि" की उपाधि दी थी, क्योंकि उनकी कविताओं में राष्ट्रप्रेम, भारतीय संस्कृति और सामाजिक चेतना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उनकी प्रमुख कृतियों में भारत-भारती, साकेत, यशोधरा, पंचवटी, जयद्रथ वध, द्वापर, विष्णुप्रिया आदि शामिल हैं।
मैथिलीशरण गुप्त का साहित्य केवल राष्ट्रभक्ति तक सीमित नहीं था।
उन्होंने भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं की उन महान महिलाओं को अपनी रचनाओं का केंद्र
बनाया, जिनकी दूसरे साहित्यकारों द्वारा उपेक्षा की गयी थी। उन्होंने विशेष रूप
से यशोधरा, शकुंतला, विष्णुप्रिया, हिडिम्बा और उर्मिला जैसी उपेक्षित नायिकाओं के
जीवन, त्याग, धैर्य, संघर्ष और आत्मबल को अपनी कविताओं में स्थान दिया।
इस प्रकार मैथिलीशरण गुप्त ने अपने साहित्य के माध्यम से नारी सशक्तिकरण को नई दिशा दी और महिलाओं के योगदान को समाज के सामने सम्मानपूर्वक प्रस्तुत किया। यह कविता रामायण के वनवास प्रसंग पर आधारित है। जब भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण चौदह वर्ष के वनवास के लिए अयोध्या छोड़कर वन में पहुँचते हैं, तब वे जंगल में एक छोटी-सी कुटिया बनाकर रहने लगते हैं। पहली दृष्टि में यह कुटिया बहुत साधारण दिखाई देती है। वहाँ न सोने-चाँदी के महल हैं, न शानदार वस्त्र, न सेवक और न ही राजसी सुख-सुविधाएँ। लेकिन कवि कहते हैं कि जहाँ प्रेम, त्याग, संतोष, मर्यादा, धर्म और पारिवारिक एकता हो, वही स्थान वास्तव में किसी राजमहल से कम नहीं होता। इसलिए कवि ने इस साधारण कुटिया को "राजभवन" कहा है।
इसी कविता से ये पंक्तियाँ देखें :
मेरी कुटिया में राजभवन मन भाया
सम्राट स्वयं प्राणेश , सचिव देवर हैं
देते आकर आशीष हमें मुनिवर हैं
धन तुच्छ यहां यद्यपी असंख्य आकर हैं
पानी पीते मृग , सिंह एक तट पर हैं
सीता रानी को यहाँ लाभ ही लाया
मेरी कुटिया में राजभवन मन भाया
कवि बताते हैं कि उस छोटी-सी कुटिया में रहने वाले लोगों के पास
भले ही भौतिक सुख-सुविधाएँ नहीं थीं, लेकिन उनके पास सबसे बड़ा धन था—
•प्रेम
•विश्वास
•त्याग
• मर्यादा
• संतोष
• सेवा
• कर्तव्यनिष्ठा
यही गुण उस साधारण कुटिया को राजमहल से भी अधिक महान बना देते हैं। आज भी यदि किसी घर में प्रेम और सम्मान है, तो वह घर किसी महल से कम नहीं होता।
रानी सीता के वनवास को लेकर कुछ लोगों की ये धारणा थी कि भाग्य ने सीता रानी को छला है लेकिन वास्तव में सीता रानी बहुत प्रसन्न है। उस सुने हुए भय को उन्होंने मार भगाया है। अब वो पहले से भी अधिक आत्मनिर्भर हो गयी हैं। घर - गृहस्थी का सब कार्य अपने हाथों से करती हैं। उनके लिए ये वनवास दुर्भाग्य नहीं अपितु सौभाग्य बन कर आया क्योंकि वन में रहते हुए ही वो माँ बनी। इसी कविता से ये पंक्तियाँ सुनें :
कहता है कौन कि भाग्य ठगा है मेरा
वह सुना हुआ भय दूर भगा है मेरा
कुछ करने में अब हाथ लगा है मेरा
वन में ही तो गृहस्थय जगा है मेरा
वह वधू जानकी बानी आज जाया
मेरी कुटिया में राजभवन मन भाया
कहता है कौन कि भाग्य ठगा है मेरा
वह सुना हुआ भय दूर भगा है मेरा
कुछ करने में अब हाथ लगा है मेरा
वन में ही तो गृहस्थय जगा है मेरा
वह वधू जानकी बानी आज जाया
मेरी कुटिया में राजभवन मन भाया
कुटिया में राजभवन' मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित यह एक भावपूर्ण
कविता है। इसमें सीता जी के वनवास के प्रसंग का वर्णन है, जहाँ वे कहती हैं कि श्रीराम
के साथ होने से उन्हें वन की पर्ण-कुटिया में भी राजमहल जैसा सुख और आनंद प्राप्त होता
है। इस कविता में सीता जी के संतोष और प्रेम का चित्रण किया गया है। १४ वर्ष के कठोर
वनवास के दौरान, जब वे कुटिया में रहती हैं, तो उन्हें किसी भी प्रकार का अभाव महसूस
नहीं होता। उनके लिए प्रभु श्रीराम स्वयं उनके साथ रहते हैं, लक्ष्मण उनके सेवक/मंत्री
की भूमिका निभाते हैं, और प्रकृति के सौंदर्य—जैसे हरी-भरी लताएँ, कल-कल करती नदियाँ
और पक्षियों का कलरव—उनके लिए राजमहल की सुख-सुविधाओं और दासी-गणों के समान हैं। इस
प्रकार, सच्चा सुख महलों में नहीं, बल्कि प्रेम और प्रकृति की गोद में मिलता है, यही
इस कविता का मूल भाव है।
कविता का संदेश
यह कविता हमें सिखाती है कि—
• सच्चा वैभव धन नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार हैं।
• परिवार का प्रेम सबसे बड़ी संपत्ति है।
• जीवन में त्याग और कर्तव्य का बहुत महत्व है।
• संतोष सबसे बड़ा सुख है।
• आदर्श जीवन सादगी में भी जिया जा सकता है।
आज के समय में लोग बड़े-बड़े मकान, महंगी गाड़ियाँ और भौतिक सुख-सुविधाएँ
प्राप्त करने की दौड़ में लगे हुए हैं। लेकिन यदि परिवार में प्रेम, विश्वास और सम्मान
नहीं है, तो वह महल भी सुख नहीं दे सकता। दूसरी ओर, यदि एक छोटा-सा घर भी प्रेम, अपनापन
और संस्कारों से भरा हो, तो वही घर सबसे बड़ा राजमहल बन जाता है। यही संदेश मैथिलीशरण
गुप्त अपनी कविता "कुटिया में राजभवन" के माध्यम से देते हैं।
इस कविता की भाषा अत्यंत सरल, प्रभावशाली और भावपूर्ण है। कवि ने
छोटे-छोटे शब्दों में भारतीय संस्कृति, आदर्श परिवार और नैतिक मूल्यों का अत्यंत सुंदर
चित्रण किया है। कविता में प्रकृति का सौंदर्य, पारिवारिक प्रेम और त्याग का भाव पाठकों
को गहराई से प्रभावित करता है।
"कुटिया में राजभवन" केवल एक कविता नहीं, बल्कि भारतीय
जीवन-दर्शन का दर्पण है। यह हमें सिखाती है कि जीवन की वास्तविक समृद्धि धन, महलों
और ऐश्वर्य में नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग, संतोष, कर्तव्य, मर्यादा और पारिवारिक एकता
में होती है। इसी प्रकार राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपने समूचे साहित्य में भारतीय
संस्कृति, राष्ट्रप्रेम और मानवीय मूल्यों को सर्वोच्च स्थान दिया। साथ ही उन्होंने
यशोधरा, उर्मिला, विष्णुप्रिया, शकुंतला और हिडिम्बा जैसी उपेक्षित नारी पात्रों को
अपनी रचनाओं के माध्यम से सम्मान दिलाकर यह सिद्ध किया कि भारतीय नारी त्याग, शक्ति,
धैर्य और आत्मसम्मान की सच्ची प्रतीक है। यही कारण है कि उन्हें हिंदी साहित्य के महानतम
कवियों में गिना जाता है।
अंत में मैं यही कहना चाहूँगी कि यदि हमारे जीवन और परिवार में प्रेम,
संस्कार और त्याग है, तो हमारी छोटी-सी कुटिया भी किसी राजभवन से कम नहीं है।
धन्यवाद!
ήρως - Hero
μύτη - Nose
γιδα - Goat
μάτι - eye
βρύσι - fountain
γάλα - Milk
γλυκύς - sweet
όλος - All
μοιρα - fate
μυια - fly
αυγά - eggs
αυτά - These
ευαγγέλιον - Gospel
εύλογιά - small pox
ευκολος - easy
ηύρα - I found
καύμενος - poor fellow
βάλλω - I throw
άγγελος - Angel
θυγατέρα - daughter
κυρία - Lady
νέος
γερος - η - ο
Το γκαρσόν - Waiter
το μενού - Menu
ξέρω - to know
ότι / πώς - that ( Conj)
φρέσκος , φρέσκια , φρέσκο - Fresh
το ψαρί - Fish
το κοτόπουλο - chicken
νόστιμος , η , ο - Tasty
το κρέας - Meat
το ούζο - Greek alcholic drink
η ρετσίνα - a kind of resinated wine
δηλαδή - That is to say
νά πώ - That I say
νά πήτε - That you say
έθνικός , η , ο - National
το ποτό - Beverage , drink
το αρνάκι - The lamb
το φαι / φαγητό - Food
τα φαγιά / φαγητά - Food Pl.
Βεβαίως / Βέβαια - certainly / of course
το σουβλάκε - Sheeshkebab
τα σουβλάκια - Pl.
ο μουσακάς - Musaka
όπως - as
όπως έπίσης - as well as
και τα λοιπά / κ.τ.λ. - etc.
δοκιμάζω - to taste
άμεσως - Right away
περίφημος , η , ο - famous
η όρεξις / όρεξι - The appetite
καλή όρεξι - Enjoy your meal / Have a good appetite
άμέσως - Right away
Το πιάτο - plate
το μαχαίρι - knife
το κουτάλι - spoon
το πηρούνι - fork
το άλάτι - Salt
το πιπέρι - Pepper
η πετσέτα - Napkin
το γλυκό - sweet
το παγωτό - ice cream
η πάστα - pastry
ο πάγος - ice
η μπριζόλα - steak
οί πατάτες - Potatoes
τα λαχανικά - vegetables
η σούπα - soup
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γιατί - Why
Μου αρέσει το ποδόσφαιρο - I like football
πως και ; How come
Εδώ και πέντε χρόνια είμαι στην Αθήνα
for 5 years now I am in Athens
για ποιο λόγο ; For what reason
δεν τρώω κρέας - I do not eat meat
Για ποιο λόγο δεντρως κρέας . -
For what reason you do not eat meat
कुछ अश'आर
१- घड़ी तो हाथ में सबके है लेकिन
पकड़ में एक भी लम्हा नहीं है
२-
ज़रा सी बात थी और कशमकश ऐसी कि मत पूछो
भिखारी मुड़ गया पर जेब से सिक्का नहीं निकला
३- उनको तो मंदिर- मस्जिद से वोट की खेती करनी थी
हम आपस में लड़ना सीखे, लेना एक न देना दो
४-
भूल जाएगा किसी दिन अपने पाँवों का वजूद
किसने दे रक्खी हैं उसके हाथ में बैसाखियाँ
ओमप्रकाश यती
मैं भी दालान की कुर्सी को हटा कर ख़ुश हूं,
वो भी है चैन से,खिड़की के बदल कर शीशे।
. -----अनुज अब्र