मुक्ति की छाया - 13
बात उन दिनों की है जब लोग शहरों में हमेशा के लिए रहने नहीं आते
थे। उनका मकसद सिर्फ पैसा कमा कर वापस अपने गांव लौट जाने का हुआ करता था ।कुछ ऐसा
ही लगाव था चंद्र सिंह को अपने पहाड़ों से ।दिल्ली में रहते हुए भी उनकी पत्नी बसंती
के साथ सदैव पहाड़ों की चर्चा करना यह साबित करता था, की पहाड़ी लोगों का अपनी मिट्टी
से जुड़ाव कभी खत्म नहीं होता । उन दिनों उन दोनों पति-पत्नी का शहर की चकाचौंध और पैसे कमाने के बाद, सुकून की तलाश में
वापस पहाड़ों की गोद में लौटने का निर्णय एक बहुत बड़ा बदलाव था । उन्होंने उनकी शुरुआती
दिनों में दिल्ली की भीड़ भाड़ में अपनी पहचान बनाई और मेहनत से आर्थिक मजबूती हासिल
की ।शहर में रहते हुए भी उनके सपनों में वही ठंडी हवा, देवदार के पेड़ और पहाड़ी रास्ते
आते थे । घर की पिछली दीवार पर टंगी पहाड़ी तस्वीर उन्हें हमेशा उनकी जड़ों की याद
दिलाती थी। कुमाऊं की वादियों में लौटने के बाद, अब उनकी सुबह दिल्ली शहर के शोर के
बदले, चिड़ियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से होने लगी। चंद्र सिंह और बसंती देवी को लगता था कि उन्होंने
स्वर्ग पा लिया है। पुरखों की धरती की मिट्टी की खुशबू उन्हें हर दुख भुला देती थी
।
लेकिन वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता है। शहर में कमाया हुआ पैसा पानी
की तरह बहने लगा ।पहाड़ों में सुविधाएं जुटाने और पुराने घर की मरम्मत में काफ़ी खर्च
हो गया । जब बैंक बैलेंस कम होने लगा तो डर ने दस्तक दी। चंद्र सिंह जो अब तक सुकून
में थे , अब चिंतित रहने लगे। पैसा खत्म होने
का डर इंसान को चिड़चिड़ा बना देता है। छोटी-छोटी
बातें अब बड़े-बड़े झगड़ों का रूप लेने लगी । बसंती देवी , जो पहाड़ों में ही अपना
जीवन बिताना चाहती थी उन्हें चंद्रसिंह का यह बदला हुआ रूप दुख देने लगा । दोनों के
बीच का संवाद , अब तनाव और शिकायतों में बदल गया । जिन पहाड़ों ने सुकून दिया था आज
वही पहाड़ों काटने को दौड़ते थे ।खाली जेब ने घर की शांति को झगड़े की आग में झोंक
दिया । वादियों में सुकून तो था मगर रोटी की चिंता ने सुकून का अस्तित्व ही मिटा दिया
था। वह घर जो कभी सुकून की तलाश में बनाया
गया था अब एक कुरुक्षेत्र बन चुका था। दिल्ली की कमाई खत्म होने के साथ-साथ दोनों का
एक दूसरे के प्रति सम्मान भी खत्म हो चुका था। बसंती देवी के लिए कालितजोरी, सिर्फ
पैसे की कमी नहीं थी, बल्कि सुरक्षा का हट जाना भी था। बात-बात पर ताने देना अब पुरानी
बात हो गई थी। जो हाथ कभी रसोई में पहाड़ी स्वाद बिखेरते थे, अब वो गुस्से और दरिद्रता
की वजह से हिंसा पर उतारू हो गए थे। अब बसंती देवी का गुस्सा इतना प्रचंड हो चुका था
कि वो चंद्रसिंह पर शारीरिक प्रहार करने लगी थी। चंद्रसिंह, जो कभी दिल्ली में इज्जतदार
नौकरी करते थे, अब अपने ही घर में अपमानित और बेबस महसूस कर रहे थे। उनका अस्तित्व
धीरे-धीरे अदृश्य हो रहा था। उस दिन सुबह की शुरुआत चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं बल्कि
पुराने कलेश से हुई। सूरज की पहली किरण के साथ रसोई से बर्तनों की गिरने और चिल्लाने
की आवाजें आने लगीं। चंद्रसिंह ने शायद सिर्फ इतना कहा था कि चाय में चीनी कम डालो,
खर्च बचाना है। और बसंती देवी का सब्र टूट गया। पहाड़ों की ठंडी हवा अब उन्हें सुकून
नहीं देती थी, बल्कि उनके जख्मों पर नमक छिड़कती थी। खाली पेट ने बसंती के भीतर की
ममता को एक शेरनी की हिंसा में बदल दिया था। चंद्रसिंह ने कभी सपने में भी नहीं सोचा
था कि जिस जीवन संगिनी के साथ वो बुढ़ापे का सुकून ढूंढने आए थे, वही उनके शरीर और
आत्मा पर चोट करेगी। चंद्रसिंह ने झगड़े के बाद अपनी गायों के लिए एक डंडा पकड़ा और
जंगल की ओर निकल गए। चंद्रसिंह का यह फैसला कि वो गायों के साथ जंगल की ओर निकले उनके
भीतर के टूटे हुए स्वाभिमान और गुस्से का प्रतीक था। बसंती देवी का पीछे से चिल्लाना
'घर वापस मत आना, निकल जाओ' चंद्रसेन के दिल पर किसी खंजर की तरह लगा। वो रिश्ता जो सालों पुराना था, आज एक पल में रेत
की तरह बिखर रहा था। रास्ते में जाते समय गांव के लोगों ने टोका, 'सुबह सुबह घर से
कुछ खाकर जाओ' ,तो उन्होंने जवाब दिया, 'मुझे मत टोको'। ये उनकी उस मानसिक स्थिति को
दर्शाता था कि जब इंसान किसी से कोई रिश्ता या हमदर्दी नहीं चाहता ।
चंद्रसिंह अपनी गाय के झुंड को लेकर ऊंचे पहाड़ की तरफ बढ़ने लगा।
उनके हाथ में लकड़ी का डंडा सिर्फ उनका सहारा नहीं था, बल्कि उनके गुस्से का भी सहारा
था। जैसे-जैसे वो ऊपर चढ़ते जा रहे थे, नीचे गांव का शोर कम होता गया। सिर्फ गायों
के गलों में बंधी घंटियों की टुन-टुन और उनके सांस लेने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
उनके दिमाग में दिल्ली की वो नौकरी, वो पैसा, और वो बसंती के साथ बिताए अच्छे दिन किसी
चलचित्र की तरह चल रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कब उनका खुशहाल जीवन अदृश्य
हो गया और सिर्फ झगड़े बचे। वो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा
था, लेकिन चंद्रसिंह की रफ्तार कम नहीं हुई। उन्हें अब घर की छत से ज़्यादा सुकून उन
सुनसान पहाड़ी रास्तों में मिल रहा था। उनका मन
घाटियों की गहराई में गिरता जा रहा था।
बसंती की वो अंतिम आवाज़ उनके कानों में तेज़ गूंज रही थी "लौटना मत"।
अब चंद्रसिंह पहाड़ों से निकलने वाले झरने के उद्गम स्थल तक पहुँच चुके थे। उन्होंने
सोचा कि थोड़ा सुस्ता लूं। पहाड़ों से गिरता हुआ वो बर्फीला पानी और उसकी निरंतर कल-कल
की आवाज़ चंद्रसिंह को शांत मन के लिए वो एक लोरी की तरह थी। गायें पीछे छूट गई थीं।
शाम होने के साथ गायें अपने घर की ओर लौट चुकी थीं। चंद्रसिंह ने जब उस ठंडे झरने के
पास अपनी थकी हुई भूखी प्यासी देह रखी, तो प्रकृति ने उन्हें अपनी गोद में समेट लिया।
उन्हें पता ही नहीं चला कि कब उनकी बंद आँखों ने दुनिया के सारे दुखों से नाता तोड़
लिया और वो झरने के आगोश में समा गए।
सूरज ढल चुका था, और पहाड़ों पर अंधेरा किसी गहरी चादर की तरह फैल
गया था। घर में बसंती देवी ने दीपक जलाया। उन्होंने मन ही मन सोचा, गुस्से में गए हैं।
थोड़ी देर में ठंड लगेगी, तो खुद ही पैर पटकते हुए वापस आ जाएंगे। उन्होंने रोज की
तरह रसोई संभाली, लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती गई, घर की दीवारों का सन्नाटा उन्हें
चूमने लगा। हर बार झगड़े के बाद चंद्रसिंह लौट आते थे, इसलिए बसंती को अभी डर नहीं,
बल्कि एक विश्वास था।
लेकिन जब मंदिर की आखिरी घंटी भी बजकर शांत हो गई, तब उनके मन में
हल्की घबराहट ने जन्म लिया। पहाड़ी झरने की ठंडक ने चंद्रसिंह के गुस्से को शांत कर
दिया था, लेकिन उनके ऐसी नींद में सुला दिया था जहां से वापसी का रास्ता धुंधला था।
बसंती ने चौखट पर बैठकर राह देखना शुरू किया। वो गुस्सा जो सुबह ज्वालामुखी बनकर फटा
था, अब धीरे-धीरे बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया। चिंता की राख बन रही थी ।बसंती देवी ने
अब रात को ही गांव के लोगों को ख़बर दी कि चंद्रसिंह अभी तक नहीं लौटे हैं। तब उनकी
आँखों में हमदर्दी तो थी, पर हाथ बंधे हुए थे। पहाड़ों में पुराने बुज़ुर्ग कहते हैं
कि रात को पहाड़ जागते हैं और इंसान को घर में होना चाहिए। इसलिए गांव वालों ने कहा
कि अब सुबह ही हम लोग ढूंढने जा सकते हैं। सुबह तक का इंतज़ार कर लीजिए। ये वाक्य बसंती
के कानों में किसी सजा की तरह गूंजा; वो जानती थी कि उनका पति बिना खाए-पिए सिर्फ गुस्से
और दुख की गठरी लेकर गया है। वो रात बसंती के लिए किसी युग से कम नहीं थी। घर की वही
दीवारें, जो सुबह तक उन्हें छोटी लग रही थीं, अब विकराल लगने लगीं । उन्हें दिल्ली
के वो दिन याद आने लगे, जब चंद्र सिंह थके हारे दफ़्तर से आते थे और वे उनका स्वागत
मुस्कुराहट से करती थी। उन्हें एहसास हुआ कि उनके भीतर की ममता और सम्मान का अस्तित्व
ही मिट गया था। दीये की लौ धीरे-धीरे कम हो रही थी, बिल्कुल उनकी उम्मीद की तरह। उन्होंने
बार-बार अपने उन हाथों को देखा, जिनसे उन्होंने अपने पति पर प्रहार किया था, और वही
हाथ आज उन्हें ढूंढने के लिए तड़प रहे थे। पहाड़ों की वो रात इतनी गहरी थी कि बसंती
को अपना खुद का गुनाह भी उस अंधेरे में साफ़ दिखाई देने लगा था। सुबह का इंतज़ार किसी
मौत के इंतज़ार से कम नहीं था। जब इंसान पास-पास होता है, तो उसकी कीमत अदृश्य रहती
है, पर जब वो एक रात के लिए भी खो जाए, तो उसका अस्तित्व पूरे घर को खाली कर देता है।
पहाड़ी सुबह की पहली किरण के साथ ही गांव में एक हलचल थी। लाठियां, रस्सी और कुछ खाने
का सामान लेकर टोलियां विभिन्न दिशाओं में निकल पड़ी थीं। जो टोली झरने की ओर गई थी,
उन्होंने वहां के पत्थरों और ठंडी घास को कुरेद मारा, लेकिन वहां चंद्रसिंह कहीं नहीं
मिले। ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ निगल गया हो । झरने का कल-कल, अब खौफनाक सन्नाटा बन
गया था । जब आखिरी टोली ने आकर कहा कि चंद्रसिंह का पता नहीं चल सका, तो बसंती देवी
के पैरों तले ज़मीन निकल गई। गांव वालों ने दिलासा दिया कि रात हो गई है, जंगल खतरनाक
है। कल सुबह फिर देखेंगे।
दूसरे दिन भी टोलियां खोजी दस्ते के रूप में चंद्रसिंह को पूरे
पहाड़ों में छान मारा, हर झरने से पूछा, हर गुफा में झांका। चंद्रसिंह जैसे हवा में
गुल हो गए हैं। उनका अस्तित्व एक ठंडी धूंद में कहीं खो गया था। जिन पैसों के लिए वो
लड़ती थी। अब उसकी नजरों में वो पैसा कचरे के समान था। उसे सिर्फ़ अपना वो अदृश्य साथी
चाहिए था। चार-पांच दिन बीत चुके थे। चंद्रसिंह का कोई पता नहीं चला।
गांव में
एक सूरदास रहा करते थे। वे गांव के लोगों को अपनी सेवा देते थे, जैसे चावल कूटना, मलाई
मथना, घी के लिए मक्खन निकालना इत्यादि। बदले में गांव के लोग उन्हें पैसा और खाने
की वस्तुएं दे देते थे। इससे उनका जीवन आराम से कट रहा था। एक दिन सूरदास किसी घर की
छत पर बैठे मलाई से मक्खन निकालने का काम कर रहे थे। सूरदास भले ही दुनिया नहीं देख
सकते थे, पर उनकी दूसरी इंद्रियां बहुत विकसित थीं, जैसे कानों से सुनना, हाथों की
ताकत इत्यादि। लोग बीच-बीच में उनके काम को देख जाते और बता देते कि और कितनी देर काम
करना है। उनके लिए दिन और रात एक समान थे। सूरदास हमेशा की तरह अपने काम में मगन थे।
अचानक उनके कानों ने कुछ ऐसा पकड़ा जो साधारण नहीं था। पहले उन्हें लगा कि कोई बंदर
पेड़ से कूद रहा था, पर उस धम्म की आवाज़ में एक इंसानी भारीपन था। फिर उन्हें किसी
बहुत बड़े पक्षी के पंखों के फड़फड़ाने की आवाज़ सुनाई दी। यह फड़फड़ाहट किसी छोटी
चिड़िया की नहीं थी, बल्कि किसी गरुड़ या बाज़ पक्षी की तरह थी। जो व्यक्ति देख नहीं
सकता, उसकी सुनने की शक्ति इतनी तीव्र होती है कि वो हवा के रुख और पंखों की फड़फड़ाहट
से भी सच का पता लगा लेता है। पत्तों का जोर-जोर से किसी के द्वारा हिलाना यह साबित
करता था कि उस पेड़ पर कोई है और कुछ कहना चाहता है। फिर सूरदास को किसी के चिल्लाकर
बोलने की आवाज़ सुनाई दी–“जाओ, गांव वालों से कहो, झरने से थोड़ा और आगे बढ़ें, तो
एक पेड़ के नीचे वो मिलेगा, जिसे वो 4-5 दिनों से ढूंढ रहे हैं “। यह सुनते ही सूरदास
ने उस घर के लोगों को सारी सुनी हुई बातों को बताया। बात गांव में आग की तरह फैल गई,
कि सूरदास को दिव्य शक्ति मिली है, जो उसे आवाजें सुनाई दी हैं। जब गांव वाले सूरदास
के बताए रास्ते पर झरने से आगे बढ़े तो उनका सामना उस कटु सत्य से हुआ, जिसे कोई देखना
नहीं चाहता था। चंद्रसिंह का शरीर कभी दिल्ली की सड़कों पर गर्व से चलता था, और पहाड़ों
में सुकून ढूंढने आया था। अब उस ठंडे पानी की वजह से फूल चुका था। प्रकृति ने उन्हें
अपनी गोद में तो लिया, पर उनका जीवन अदर्श्य हो गया। जब गांव वालों ने उनके शरीर को
उठाया तो वहां की हवा में एक भारीपन था। उनकी अंत्येष्ट सिर्फ एक शरीर का दाह संस्कार
नहीं था, बल्कि उन सारे झगड़ों का और उस आर्थिक तंगी का भी अंत था, जिसने उस दुखान्त
को जन्म दिया। पहाड़ों की मिट्टी से बना शरीर पहाड़ों की आग में विलीन हो गया। तबी
मानो उस बड़ी चिड़िया की फड़फड़ाहट शांत हुई, क्योंकि अब चंद्रसिंह की आत्मा को मुक्ति
मिल चुकी थी, लेकिन चंद्रसिंह का स्वाभिमान उस झरने की गहराई में कहीं हमेशा के लिए
दफ़न हो गया था। बसंती के लिए अब घर की हर दीवार एक सवाल थी, जिसका जवाब कभी नहीं मिलने
वाला था। अंत्येष्ट की लपटों में सिर्फ लकड़ियां नहीं जल रही थीं, बल्कि एक अधूरा सपना
और एक कूटा हुआ रिश्ता भी राख हो रहा था। आत्मा को मुक्ति मिल गई, पर पीछे रह गया एक
अदृश्य दर्द। चंद्रसिंह की अंत्येष्ट के बाद गांव में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। बसंती
देवी वो उस घर में अकेली थी, जिसे उन्होंने अपने और उनके पति ने बड़े अरमानों से बनाया
था। वो पैसा जिसकी कमी ने उनके भीतर हिंसा और क्रोध को जन्म दिया था, अब उनकी अलमारी
में धूल खा रहा था। उन्हें एहसास हुआ कि –”इंसान का असली अस्तित्व, उसके पास मौजूद
धन-दौलत में नहीं, बल्कि उसके अपनों के साथ बुने हुए प्रेम और सम्मान में होता है।”
सूरदास की वो बातें उनके कानों में आज भी गुंजती हैं। उन्हें समझ
आ गया था कि जब रिश्तों में से मिठास खत्म हो जाती है, तो प्रकृति भी अपना रूप बदल
देती है। चंद्रसिंह का शरीर पानी में विलीन हो गया, पर उसका अदृश्य अस्तित्व अब उस
झरने की कल-कल और उन हवाओं में हमेशा के लिए बस गया था।
बसंती देवी ने अपने जीवन का बचा हुआ हिस्सा गांव की अन्य महिलाओं
को धैर्य और प्रेम का महत्व सिखाने में बिताने का संकल्प लिया। उन्होंने जान लिया था
कि गुस्से में बोले गए शब्द और उठाया गया हाथ कभी-कभी ऐसी दूरी पैदा कर देता है, जिसे
मौत भी नहीं भर पाती।
यह कहानी हमें सीख देती है कि आर्थिक तंगी तो वक्त के साथ गुज़र
जाती है, लेकिन अपनों की प्रती किया गया अपमान, एक ऐसा ‘अदृश्य ज़ख्म’ बन जाता है,
जो आत्मा को मुक्ति मिलने तक दर्द देता रहता है।
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लालटेन वाला पानी 14
1970 का दशक अपने आखिरी पड़ाव पर था। पटना, बिहारशरीफ के पास नेरुत गांव, जो मेरे पति प्रवीण और नंदों के लिए उनके मौसेरे भाइ-बहनों के साथ गर्मी की छुट्टियों में एक अलग ही दुनिया बन जाता था। ननीहाल की वो पुरानी हवेली, जो जमीदारी के समय का प्रमाण थी, जहां मिट्टी की सौंधी खुशबू और आम के बगीचों की सरसराहट आज भी उनके कानों में गूँजती है। रात के समय लालटेन और दिया की रोशनी, सत्तू का शरबत, मिट्टी के चूल्हे पर बनता लिट्टी चोखा, ननिहाल की वो यादें आज भी एक समानांतर जिंदगी की तरह उनके साथ चलती हैं।
आम के बगीचे में झूला डालना और पूरी दोपहरी गांव में टोली बनाकर घूमना, उनके मन को आज भी गुदगुदा जाता है। रात के वक्त जब बिहार की गर्मी थोड़ी नरम पड़ती, तो पूरी पलटन छत पर जमा हो जाती थी। सफेद चादर बिछी होती, और बच्चों का शोर आसमान छूने लगता। तभी एक आवाज़ सुनाई देती- छोटे मामा जी अश्विनी कुमार । मामा जी का आना, मतलब कहानियों का आना। लेकिन उनकी कहानियाँ परियों की नहीं बल्कि ‘अनसुलझे किस्सों’ की होती थीं, जिन्हें सुनकर बच्चे एक-दूसरे से चिपक जाते थे।
जैसे ही मामा जी किसी भूत-प्रेत या अजीब घटना का जिक्र करते, पूरी टोली चिल्लाते हुए नीचे की तरफ भागती। सबसे ज्यादा मुश्किल तो बेचारे राजू भैया को होती थी। वो थोड़े भारी-भरकम जे थे। जब सारे बच्चे फुर्ती से सीढ़ियों से उतरते, तो राजू भैया की सांस फूल जाती और उन्हें उतरने में देर हो जाती। वो पीछे छूट जाते और उन्हें डर लगने लगता कि कहीं पीछे से उन्हें कोई पकड़ ना ले। वही बच्चे जो कल तक ननिहाल की गलियों में दौड़ते थे, आज बड़े पद पर आसीन हैं, मगर नैरूत गांव की वो यादें आज भी समानान्तर जिंदगी की तरह उनके साथ चलती हैं।
उस दिन नैरूत गांव की हवेली में जब रात सन्नाटा गहराया, तो छोटे मामा जी की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी। उस दिन वो कोई सुनी सुनाई कहानी नहीं, बल्कि अपने ही परिवार की एक सिलसिलेवार हकीकत सुनाने जा रहे थे। बच्चों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया था। बात उन दिनों की है जब नाना जी के चचेरे भाई का विवाह हुआ था। चचेरी नानी बड़े जमींदार खानदान की बेटी थी। जब वो दुल्हन बनकर उस हवेली में आई तो अपने साथ सिर्फ गहने और रेशमी लिबास नहीं लाई थी। उस जमाने की रिवायत के अनुसार बड़े घरों की बेटियों के साथ एक नौकरानी भी साथ लाई थी। जो उनके मायके की एक निशानी और ससुराल में उनका हाथ बटाने वाली परछाई थी।
वो नौकरानी शायद उम्र भर के लिए उस हवेली की दीवारों में कैद होने आई थी। वो चचेरी नानी के अस्तित्व का एक हिस्सा बन गई थी। दिन सुकून से बीत रहे थे। जमींदारी खत्म हो गई थी, पर अभी भी रोब-दाब था और हवेली की रौनक देखते ही बनती थी। मगर उस रौनक के पीछे कुछ ऐसा था जो दिखाई नहीं देता था।
छोटे मामा जी बताते कि उस नौकरानी की मौजूदगी सिर्फ कामकाज तक सीमित नहीं थी। वो हवेली के उन कोनों में भी नजर आती जहाँ कोई काम ना होता। कभी-कभी ऐसा लगता मानो चचेरी नानी और उस नौकरानी के बीच कोई ऐसा मूक संवाद चल रहा हो, जिसे बाकी घर वाले समझ नहीं पाते थे। धीरे-धीरे उस नौकरानी का अस्तित्व हवेली की हवाओं में घुलने लगा। वह एक सहायिका नहीं रही, बल्कि उस खानदान के ऐसे सच का हिस्सा बन गई, जो वक्त के साथ और गहरा होता गया। एक तरफ शानों-शौकत, और दूसरी तरफ उस नौकरानी का बेनाम अस्तित्व। आंगन की धूप में बैठकर वो चचेरी नानी को कुछ-कुछ सिखाती रहती थी, लेकिन क्या यह कोई समझ नहीं पाता? पान लगाकर नानी को खिलाती, पालकी में उन्हें बिठाकर गांव घुमाने, गंगा नदी के किनारे सैर पर ले जाती थी।
हवेली के बड़े से आंगन में दोपहर की धूप थोड़ी सुस्ताई हुई थी। गांव भर के बच्चे मिट्टी में खेल रहे थे, शोर मचा रहे थे। वहीं एक पुरानी चौखट पर बैठी वो नौकरानी चुपचाप सब देख रही थी। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी, जो समझ से परे थी। अचानक उसने धीरे से कहा, “बच्चों, इधर आओ, देखो, मैं क्या कर सकती हूँ? क्या तुमने कभी मिट्टी के पंछी को सांस लेते, उड़ते देखा है?” बच्चे जो अबक अपनी ही धुन में थे, ठिठक कर उसके पास जमा हो गए। उसने अपने हाथों से थोड़ी सी गिली मिट्टी उठाई और बड़ी नज़ाकत के साथ उसे आकार देने लगी। देखते ही देखते, मिट्टी की उसके हाथों के बीच एक नन्ही सी चिड़िया बन गई। बच्चे उसे आश्चर्य भरी निगाहों से देखते रह गए, पर उन्हें क्या पता था कि असली खेल तो अभी शुरू हुआ है। उसने उस मिट्टी की चिड़िया को अपनी हथेली के बीच रखा, अपनी आँखें बंद कीं और कुछ बुदबुदाया। फिर उसने गहरी सांस ली और उस निर्जीव खिलौने पर एक फूंक मारी। अगले ही पल जो हुआ, उसने बच्चों की सांसें रोक दी। वो मिट्टी की चिड़िया फड़फड़ाई, उसके पंखों से धूल झड़ गई, और वो एक असली परिंदे की तरह नीले आसमान की तरफ उड़ गई। बच्चों की आँखें फटी की फटी रह गईं। जो नौकरानी अब तक सिर्फ एक सहायिका थी, अब उनके लिए जादूगर बन चुकी थी। उसकी आँखों में पुरानी रहस्य था। वो अदृश्य अस्तित्व जो शायद इस दुनिया का था ही नहीं।
इतना सुनते ही सारे बच्चे तेजी से डरकर बाहर की तरफ भागने लगे। लेकिन राजू भैया धड़ाम से गिर पड़े। पूरी टोली जो डरकर भाग रही थी, रुकी और राजू भैया की तरफ लौट आई। राजू भैया चिल्ला रहे थे कि ये मुझे भी चिड़िया बना देगी, मुझे उठाओ और साथ ले चलो, मुझे मत छोड़ो। बच्चों की टोली राजू भैया को उठाई और उन्हें घसीटते हुए घर के सुरक्षित कोने की तरफ ले गए। फिर कहने लगे कि- राजू भैया, भारी शरीर आपकी हिम्मत का साथ बिल्कुल नहीं देता ।मामा जी कि कहानी चल ही रही थी । इनके चक्कर में हम सारे मर जाएंगे, मारे जाएंगे। राजू भैया अभी तक हाफ रहे थे । बच्चों का डर कि कहीं वो सारे भी चिड़िया ना बन जाएं। इस डर के माहौल में भी हंसी का एक फव्वारा छोड़ गया
मामा जी कहाने लगे, लेकिन यह बात सिर्फ बच्चों तक ही नहीं थी। संयुक्त परिवार होने के कारण दीवारों के भी कान होते हैं। जब बच्चों ने हाफते हुए सारा किस्सा बड़े बुजुर्गों को सुनाया, तो हवेली का माहौल पल भर में बदल गया। सभी सतर्क हो गए। जो नौकरानी अब तक सिर्फ एक सहायिका समझी जा रही थी, अब वो सबकी नजरों में एक तांत्रिक या किसी गुप्त विद्या की जानकार समझी जाने लगी। घर की महिलाओं ने बच्चों को उस नौकरानी से दूर रहने की हिदायत दी। हर तरफ एक ही चर्चा थी: कहाँ से आई है ये, मायके से ना जाने कैसी विद्या साथ ले आई है । हवेली का वो हिस्सा जहाँ वो नौकरानी रहती थी, अब तक एक अदृश्य लकीर सा बन गया था, जिसे पार करने की हिम्मत किसी में नहीं थी। फिर गर्मी की छुट्टियाँ खत्म हो गई।
एक साल बीत गया, और नानी का घर फिर से बच्चों की हंसी और शैतानियों से गूंज उठा। मौसम वही पुराना था, गर्म हवाएं और दोपहर की खामोशी, लेकिन बच्चों का उत्साह बिल्कुल नया था। लेकिन सारे बच्चे अभी भी उस नौकरानी को याद कर रहे थे, जिसने पिछली बार कहानी में मिट्टी की चिड़िया को उड़ाया था। वे उसे ढूंढ रहे थे। तभी छोटे मामा जी आए। बच्चों ने घेरा बनाकर मामा जी को पकड़ लिया और एक साल की सारी बातें पूछने लगे। मामा जी थोड़ी देर के लिए गंभीर हो गए। उन्होंने सारे बच्चों को अपने पास बुलाया और एक साल पहले की कहानी की परत-दर-परत सच्चाई खोलने लगे। मामा जी ने बताया कि जो कुछ भी उस नौकरानी ने दिखाया था, वो कोई साधारण खेल नहीं था, बल्कि वो एक तांत्रिक थी टोने टोटके और काला जादू करना भी जानती थी। अब तो चचेरी नानी उसके साथ मिलकर तंत्र विद्या सीखने लगी थी। उसी दौरान गांव में अचानक लोगों की मृत्यु होने लगी। पूरे गांव में डर व्याप्त हो गया। नाना जी अपने चचेरे भाई को लेकर दूर गांव के एक ओझा के पास उपाय पूछने गए। ओझा जो काफी अच्छे व्यक्ति थे, उन्होंने आँखें बंद कीं और सारी बात समझ गए। उन्होंने आँखें खोलकर बताया कि-” गाँव की समस्या की जड़ उन्हीं के घर में है। आप उस नौकरानी को वापस अपने घर भेज दें, और कुछ चावल के दाने देता हूँ, उसे घर के प्रमुख द्वार के पास बिखेर दें” । दोनों भाई वापस आए।
सबसे पहले उस नौकरानी को भगाया गया, फिर चावल के दानों को प्रमुख द्वार पर बिखेर दिया गया। छोटी नानी को पता चल गया कि अब उनकी विद्या काम नहीं आएगी और उनकी गुरु, वो नौकरानी भी चली गई है। तो उन्होंने अपने कमरे में अपने प्राण त्याग दिए। लेकिन अब घर में छोटी नानी की आत्मा दिखाई देने लगी। वो किसी का कुछ नुकसान नहीं करती थी, लेकिन घर के लोग उनसे डरते जरूर थे। उनकी मौजूदगी घर के आंगन से बाहर गांव की गलियों में भी महसूस की जाने लगी थी। मामा जी ने बताया कि सबसे पहले ये सिलसिला गौशाला से शुरू हुआ। छोटी नानी की परछाई सुबह-शाम गायों के दूध निकालने के समय देखी जाने लगी। पहले तो ग्वाला डर के मारे बाल्टी छोड़कर भाग जाता। लेकिन धीरे-धीरे गांव के लोगों ने ये महसूस किया कि उनकी आत्मा किसी का नुक़सान नहीं करती, न ही किसी को डराती थी। जब वो जीवित थी तो नौकरानी के साथ मिलकर गांव के लोगों को नुक़सान पहुंचाती थी और डराती थी। अब उनकी आत्मा चुपचाप दूध निकालने के समय गौशाला में खड़ी दिखाई देती है। उनकी आँखों में एक प्यास भी थी, जैसे वो एक कटोरा दूध माँग रही थी, लेकिन उनके होंट बिल्कुल खामोश रहते। वो दूध लेकर चली जाती और फिर कहीं अदृश्य हो जाती।
मामा जी ने बच्चों से कहा कि कई बार छोटी नानी की आत्मा आंगन में बनी देवली, जहाँ लालटेन और दीपक रखने की जगह बनाई जाती है। दीवार के मेहराव काटकर ,दीपक या लालटेन लेकर पूरे घर में घुमा करती थी। लेकिन किसी का नुकसान ना डराने जैसा काम नहीं करती थी।
फिर भी घर के लोग उनकी आत्मा से डरते थे, क्योंकि उनकी आत्मा हर कोने में लालटेन लेकर जाती थी। फिर रसोई में जब दूध उबाला जाता था, तो उबलकर गिरते किसी को दिखाई नहीं देता था, लेकिन इधर उबलकर गिर चुका होता था। लोग कहते थे कि छोटी नानी का तरीका था यह बताने का कि उनका हिस्सा अभी भी उन्हें मिलना चाहिए। ऐसा लगता था कि उनकी आत्मा घर के लोगों को यह कहना चाह रही है कि घर की रसोई और आंगन की रोशनी पर आज भी उनका पहरा है।
बच्चों ने पूछा-मामा जी! क्या छोटी नानी की आत्मा अभी किसी से बात करने की कोशिश की? मामा जी ने ठंडी सांस भरी और कहा, ‘बात तो नहीं की, पर एक निशानी छोड़ गई’। उन्होंने बताया कि जब कोई आत्मा इस तरह घर और आंगन से जुड़ी रह जाती है, तो परिवार के बड़ों ने तय किया कि अब उन्हें मुक्ति दिलानी होगी। छोटी नानी की भटकती आत्मा की शांति के लिए गांव में एक बड़ा अनुष्ठान रखा गया। घर के आंगन में सारे विधि-विधान से यज्ञ कराया गया। पंडितों ने मंत्रोचार किया और प्रार्थना कि, की छोटी नानी का मोह इस संसार से छूट जाए और उन्हें परम शांति मिले। कई दिनों तक चले इस अनुष्ठान में, घर के हर सदस्य ने आहुति दी। सबने हाथ जोड़कर उनसे माफी मांगी और उन्हें अगली यात्रा पर जाने के लिए विदा किया। अनुष्ठान पूरा होने के कुछ ही दिनों बाद एक ऐसी घटना घटी, जिसने सबको आश्चर्य में डाल दिया। छोटी नानी का वो पुराना कमरा, जहां वो अपना अधिकतम समय बिताती थी और जहां उनकी लालटीन और सामान रखा था, अचानक ढह गया। जब कमरा गिरा तो आसपास कोई नहीं था। किसी को कोई चोट नहीं आई। उस कमरे का ढह जाने के बाद ऐसा लगा मानो छोटी नानी ने अपने साथ अपनी आखिरी निशानी भी मिटा दी हो। अब उस जगह पर सिर्फ मिट्टी और पुरानी ईंटें बची हैं। ना कोई वहां जाता था, ना ही कोई उस मलबे को हटाने की हिम्मत करता था। लोगों ने उस रास्ते को हमेशा के लिए बंद कर दिया। छोटे मामा जी ने बताया कि ‘बच्चों उस दिन के बाद से ना तो गौशाला में कोई परछाई दिखी, न ही आंगन में लालटेन घूमी और घर का दूध उबलना भी सामान्य हो गया’। सबको समझ आ गया कि छोटी नानी को मुक्ति मिल गई है। वो कमरा मोह का आखिरी प्रतीक था, और उसके गिरते ही वो संबंध भी हमेशा के लिए खत्म हो गए। घर में अब वो डर नहीं था, बल्कि एक अजीब सी शांति थी। बच्चों ने उस विराने कमरे की तरफ देखा, जो अब सिर्फ पुरानी कहानी का हिस्सा रह गया था। उन्हें थोड़ा डर तो लगा, पर ये जानकर सुकून भी मिला कि छोटी नानी को अब मुक्ति मिल गई है। छोटे मामा जी ने बताया कि मलबे और मिट्टी के बीच से एक नन्हा सा बबूल का अंकुर फूटा था। सबको लगा था कि शायद यह ऐसे ही कोई जंगली पौधा हो, लेकिन जो हुआ, वो किसी चमत्कार से कम नहीं था। साधारण तौर पर बबूल का पेड़ धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन छोटी नानी के कमरे की मिट्टी पर उगा यह पेड़ जैसे समय को मात दे रहा था। सिर्फ एक साल के भीतर वो नन्हा पौधा एक घना और मजबूत पेड़ में बदल गया। जितना बड़ा पेड़ पांच साल में होता है, उतना बड़ा यह सिर्फ कुछ महीनों में हो गया। उसका तना इतना मजबूत और शाखें इतनी कली हुई थीं कि पूरी मिट्टी का ढेर उसकी छांव में छुप गया। मामा जी ने बच्चों को समझाया कि गांव के लोग और घर के बड़े अब इस पेड़ को एक पेड़ नहीं मानते। उनका मानना है कि छोटी नानी का जन्म लिया है बबूल के पेड़ के रूप में। उनका इस मिट्टी से, उस आंगन से इतना गहरा लगाव था कि वो किसी ना किसी रूप में यहीं रहना चाहती थी। अब सबके दिलों में डर की जगह एक नया रिश्ता पैदा हो गया था। लोग कहते हैं कि छोटी नानी अब उस बबूल के पेड़ के रूप में घर की रक्षा करती है। जैसे पहले वो लालटेन लेकर पूरे घर में रात को घूमती घूमकर रौशनी किया करती थी। अब उनकी शाखें घर पर छाया करती हैं। जब हवा चलती है और बबूल के पत्ते सरसराते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे छोटी नानी धीरे से कुछ कह रही हो। कोई भी उस पेड़ की टहनी नहीं तोड़ता, बल्कि शाम को उस पेड़ के नीचे एक दिया जरूर जलाया जाता है। छोटे मामा जी ने कहानी खत्म करते हुए कहा, ‘मिट्टी से मिट्टी का रिश्ता कभी खत्म नहीं होता’। वो कमरा गिर गया ताकि पेड़ उग सके। छोटी नानी अब मुक भी है और हमारे साथ भी। बच्चे सुशाल बबूल के पेड़ को देखकर दंग रह गए। उन्हें अब समझ आ गया कि वो पेड़ बाकी पेड़ों से अलग और ज़्यादा हरा-भरा दिखता था।
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