Saturday, November 19, 2022

ग़ज़ल - साँसों में कुछ जल रहा है


 साँसों में कुछ जल रहा है 

ग़म का पारा गल रहा है 


देख कर उसकी पलकों को 

सूरज   आँखें   मल रहा है 


उनसे बिछड़ने का लम्हा 

धीरे धीरे   टल   रहा है 


मौत  पड़ने   लगी है गले 

सूरज भी अब ढल रहा है 


एक परिंदा प्रीत का कब से 

इस   सीने   में पल रहा है 


क्या सोच रहा है  ' रसिक  '

क्यों करवट बदल रहा है ?





शाइर - बशर देहलवी  


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