Saturday, November 5, 2022

ग़ज़ल - अकसर अपनी राख उड़ा कर बन जाते हैं तारे लोग


अकसर अपनी राख उड़ा कर बन जाते हैं तारे लोग 

फिर अनजान नगर में जा कर छुप जाते हैं सारे लोग 


अपनी अपनी ज़ात बना कर रख लेते हैं प्यारे नाम 

फिर उनमे से बन जाते हैं मीठे , खट्टे , खारे लोग 


हाथ अगर तुम रख दो सर पे बन जाते हैं बिगड़े काम 

सर पर रख दो हाथ हमारे हम हैं ग़म के मारे लोग 


हम है बहते दरिया जैसे अपना रैन बसेरा क्या 

चलते रहना काम हमारा हम ठहरे बंजारे लोग 


आई है फिर याद किसी की आज ' रसिक  ' तड़पाने को 

क्यों इस  दिल में भर जाते हैं   चुपके से    अंगारे लोग  



शाइर - रसिक  देहलवी 

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