Sunday, June 22, 2025

Persian

सब्ज़:-ओ-गुल कहाँ से आये हैं?

अब्र क्या चीज़ है?  हवा क्या है?

                        ---  ग़ालिब



 शुनीदम् आशिक़ाँ रा मी नवाज़ी 

मगर मन ज़ाँ मयाँ बेरूनम् ऐ दोस्त!

~निज़ामी गंजवी (मृत्यु : 1209 ई॰)


-- ख़ुदा ---

جہاں را ز یک آب و گِل آفریدم

تو ایران و تاتار و زنگ آفریدی

जहाँ रा ज़े यक आब-ओ-गिल आफ़रीदम

तू ईरान-ओ-तातार-ओ-ज़ंग आफ़रीदी

(मैं ने यह जहान एक ही पानी और मिट्टी से पैदा किया था, तू ने इस में ईरान व तूरान व हबश बना लिए।)

من از خاک پولادِ ناب آفریدم

تو شمشیر و تیر و تفنگ آفریدی

मन अज़ ख़ाक-ए-पुलाद-ए-नाब आफ़रीदम

तू शमशीर-ओ-तीर-ओ-तुफ़ंग आफ़रीदी

(मैं ने ख़ाक से ख़ालिस फ़ौलाद पैदा किया था, तू ने इस से शमशीर व तीर व तोप बना लिए।)

تبر آفریدی نہالِ چمن را

قفس ساختی طائرِ نغمہ زن را

तबर आफ़रीदी निहाल-ए-चमन रा

क़फ़स साख़्ती ताइर-ए-नग़्मा ज़न रा

(तू ने इस से चमन के दरख़्त काटने के लिए कुल्हाड़ा बना लिया, नग़्मा गाते हुए परिंदों के लिए क़फ़स बना लिया।)

--- इंसान ---

تو شب آفریدی، چراغ آفریدم

سفال آفریدی، ایاغ آفریدم

तू शब आफ़रीदी, चराग़ आफ़रीदम

सुफ़ाल आफ़रीदी, अयाग़ आफ़रीदम

(तू ने रात बनाई मैं ने चराग़ बना लिया। तू ने मिट्टी बनाई मैं ने उस से प्याला बना लिया।)

بیابان و کہسار و راغ آفریدی

خیابان و گلزار و باغ آفریدم

बयाबान-ओ-कोहसार-ओ-राग़ आफ़रीदी

ख़ियाबान-ओ-गुल्ज़ार-ओ-बाग़ आफ़रीदम

(तू ने बयाबान, पहाड़ और मैदान बनाए। मैं ने इस में ख़ियाबान, गुल्ज़ार और बाग़ बना लिए।)

من آنم کہ از سنگ آئینہ سازم

من آنم کہ از زہر نوشینہ سازم

मन आनम के अज़ संग आईना साज़म

मन आनम के अज़ ज़हर नौशीना साज़म

(मैं वो हूँ कि पत्थर से आईना/शीशा बनाता हूँ, मैं वो हूँ कि ज़हर से शरबत/तरियाक़ बनाता हूँ।)


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क्षणभंगुर जीवन और वर्तमान का सत्य (उमर ख़ैयाम की एक फ़ारसी रुबाई)

✍️अंजनी कुमार सिन्हा

 

این یک دو سه روز نوبت عمر گذشت

چون آب به جویبار و چون باد به دشت

هرگز غم دو روز مرا یاد نگشت

روزی که نیامده‌ست و روزی که گذشت


ईन यक दो से रोज़ नोबते उम्र गुज़श्त

चूँ आब बे जूएबार व चूँ बाद बे दश्त

हर्गिज़ ग़मे दो रोज़ मरा याद नगुश्त

रोज़ी के नयामदस्त व रोज़ी के गुज़श्त


शायर का परिचय:

उमर ख़य्याम (1048-1131) फ़ारस (आधुनिक ईरान) के विश्वप्रसिद्ध कवि, गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे। उनका जन्म निशापुर में हुआ था। साहित्यिक जगत में वे अपनी 'रुबाइयों' (चार पंक्तियों वाली विशेष कविता) के लिए जाने जाते हैं। ख़य्याम का जीवन-दर्शन मुख्य रूप से जीवन की क्षणभंगुरता, वक़्त के बदलने और भविष्य की चिंता छोड़ वर्तमान के हर पल को पूरी शिद्दत से जीने (कार्पे दियम) पर आधारित है। एडवर्ड फिट्जगेराल्ड द्वारा किए गए अंग्रेज़ी अनुवाद के बाद ख़य्याम की रुबाइयों को वैश्विक लोकप्रियता मिली।

हिन्दी व्याख्या:

इस रुबाई में ख़य्याम कहते हैं कि ज़िंदगी के यह जो दो-तीन दिनों की मोहलत मिली थी, वह भी बहुत तेज़ी से बीत गई; ठीक उसी तरह जैसे किसी नदी या चश्मे में पानी बह जाता है और जैसे मैदान में तेज़ हवा का झोंका गुज़र जाता है। इसलिए मैंने अपने जीवन में दो तरह के दिनों का ग़म कभी अपने दिल में नहीं रखा और न ही उनकी चिंता की—एक वह दिन जो अभी आया नहीं है (यानी भविष्य), और एक वह दिन जो गुज़र चुका है (यानी अतीत)। जो हाथ में है, वह केवल 'आज' का क्षण है।

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