एक मुलाकात साहित्यकार इंदुकांत के साथ - राही राज़, बेंगलुरु। फर्स्ट एडिटर इंदुकांत अंगिरस मस्त मौला इंसान हैं ।
जिंदगी में अब तक बहुत दोस्त मिले, बहुत सारे मुझे साहित्यकारों से मेरी मुलाकात हुई,कुछ छूट गए , कुछ साथ चले। कुछ छूटकर भी नहीं छुटे , बेशक बातें कभी कदाल होती है, मगर उनके साथ यादें बहुत रहती हैं,उन्हीं यादों में से एक हमारे अजीज दोस्त हैं इंदुकांत अंगिरस । जिन्हें हम भूलना भी गर चाहें तो नहीं भूल सकते हैं।
हमें आज भी याद है उनका चेहरा,जब वो मुझे साहित्य साधक मंच की मासिक गोष्ठी में मिले थे , शेरो शायरी के शौकीन और एक अलग व्यक्तित्व के मालिक , बहुत ही खूबसूरत अंदाज और उनके पढ़ने का तौर तरीका पहली ही नजर में मुझे ना जाने क्यूँ अच्छा लगने लगा ।
मस्त मौला इंदुकांत के चेहरे पर हमने कभी भी मायूशी नहीं देखी और ना ही कभी कंजूसी कभी देखी , पैसा रहे ,ना रहे,सदा मग्न में रहते हैं। ओरेकल कंपनी से रिटायरमेंट के बाद, यहीं उन्होंने अपना आशियाना बनाए रखा और अनवरत साहित्य साधक बनकर सेवा आज भी कर रहे हैं।
पहले बंगलोर में ही रहते थे, और इसी दरम्यान इनसे बहुत गहरी दोस्ती हो गई, अगर हम सच कहें तो हमदोनों दो जिस्म एक जान हो गए ।
इनकी पुस्तक की दुकान थी हम प्रायः इनके दुकान पर जाया करते थे और साहित्यिक चर्चा किया करते थे, दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए इंदुकांत का योगदान अभूतपूर्ण है।
हमने इनके साथ मिलकर सबसे पहले कारवाँ को खोला ,बाद में इनके ही मदद से हमने कलश कारवाँ फाऊंडेशन, बेंगलूरु संस्था की स्थापना की ,जिसमें इंदुकांत जी का योगदान अभूतपूर्ण रहा , संस्थापक सदस्य आज भी हैं। बंगलोर से बाहर रहने के कारण, थोड़ा सा दिक्कत हमें हो रहा है,मगर ये आज भी हमारे दिल में हैं। और हम आज भी इन्हें हमारे मार्गदर्शक और संरक्षक मानते हैं।
हमें याद आ रहा है वर्ष 2021 इनके ही पब्लिकेशन से हमने सर्व प्रथम एक पुस्तक भी निकाली, जो साझा संकलन के रूप प्रकाशित हुई थी, पुस्तक का नाम उगता सूरज है,जिसमें पूरे भारत के नामी गिरामी साहित्यकारों की रचना है।
हमें याद आ रहा है इनकी जीप जो पूरे बंगलोर अकेली थी ,जिस पर हमलोग बैठकर अक्सर घूमने निकल जाया करते थे, बंगलोर का शायद ही कोई कोना होगा , जहाँ हमलोग नहीं घूमने गए होगे।
हमसे अगर सच पूछा जाए तो हम स्पष्ट कहते हैं कि आज राही जिस मुकाम को हासिल किया है उसमें इंदुकांत अंगिरस का जबरदस्त हाथ है, चाहे वह किसी प्रकार का हो न तन, मन और धन तीनों से इंदुकांत अंगिरस ने हमें सहायता की है ।
हम इनके पिताजी से भी दिल्ली निवास पर मिल चुके हैं,हम इनके साथ राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित परम आदरणीय स्वर्गीय श्याम सिंह शशि जी भी मिल चुके हैं। जिन्होंने पहली मुलाकात में ही हमें बहुत कुछ सिखा दिया था। आज वो नहीं है फिर उनकी स्मृति हमारे साथ है।
इंदुकांत अंगिरस को गजल में महारथ हासिल है,कविता और कहानी गजब की लिखते हैं, आज उनकी गिनती गजलकार रूप में की जाती है तो लघु कथा के जनक कहे जाते हैं।
इंदुकांत हिंदी अग्रेजी और उर्दू के अलावा भी फ्रेंच भाषा के भी अनुवादक रहें हैं और जानकर रहें हैं।
इंदुकांत की जितनी तारीफ हम करें,कम ही होगा ,क्योंकि सर से पांव तक इनमें तारीफ ही तारीफ हमें दिख रही । ईश्वर इन्हें दीर्घायु रखें,यही कामना करता हूँ।
राही राज़, बेंगलुरु
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नई सुबह की दस्तक
साझा संकलनों का चलन पुराना हैं। साझा संकलनों की महत्ता हमेशा से रही है और हमेशा रहेगी क्योंकि साझा संकलनों के ज़रिये पाठकों को एक ही पुस्तक में अनेक लेखकों की रचनाएँ पढ़ने को मिल जाती हैं। यह हर्ष की बात है कि बैंगलोर की प्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती प्रीती राही के सम्पादन में " सुप्रभात " साझा संग्रह प्रकाशित हो रहा है जिसमें कविताएँ , गीत ,ग़ज़ल , लघुकथाएँ और लघु कहानियाँ संकलित हैं। नारी शक्ति को समर्पित इस संग्रह की सभी रचनाकार बधाई के पात्र हैं। दुनिया की आधी आबादी के नाम दुनिया की दीगर ज़बानों में बहुत कुछ लिखा जा रहा है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि इस कड़ी में " सुप्रभात " साझा संग्रह अपनी अलग पहचान अंकित कर पायेगा। प्रीती राही द्वारा प्रज्वलित नारी शक्ति की ये मशाल निश्चय ही इस संसार के अँधेरे को चीर कर नई रौशनी और नई सुबह को इस धरती पर उतारेगी। अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ..
आपका अपना
इन्दुकांत आंगिरस
दिल्ली
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आदरणीय साहित्यकार, अनुवादक, सम्पादक एवं संस्कृतिसेवी श्री इन्दुकांत आंगिरस ‘रसिक देहलवी’ जी के बारे में कुछ शब्द कहना मेरे लिए अत्यंत हर्ष और सम्मान का विषय है।
मैं नेपाल की निवासी हूँ और साहित्य के माध्यम से अनेक भारतीय साहित्यकारों से परिचित होने का अवसर मिला है। उन्हीं में एक अत्यंत आत्मीय, विनम्र और प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं – श्री इन्दुकांत आंगिरस ‘रसिक देहलवी’ जी।
रसिक जी केवल एक कवि नहीं हैं, बल्कि वे साहित्य, भाषा और संस्कृति को जोड़ने वाले एक सेतु हैं। हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, हंगेरियन, ग्रीक, चेख तथा लिथुआनियन जैसी अनेक भाषाओं का उनका ज्ञान उनके व्यापक अध्ययन और साहित्यिक समर्पण का परिचायक है। कविता, लघुकथा, अनुवाद और संपादन हर क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय है।
उनके कविता-संग्रहों में संवेदना, प्रेम, स्मृति, जीवन-दर्शन और मानवीय अनुभूतियों की सुंदर अभिव्यक्ति दिखाई देती है। वहीं दूसरी ओर, हंगेरियन, अरबी और लिथुआनियन साहित्य के अनुवादों के माध्यम से उन्होंने विभिन्न देशों की सांस्कृतिक धरोहर को हिन्दी पाठकों तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है। यह केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं, बल्कि संस्कृतियों के बीच संवाद स्थापित करने का एक सराहनीय प्रयास है।
मुझे व्यक्तिगत रूप से उनकी एक विशेषता अत्यंत प्रभावित करती है—वे नए और उभरते हुए लेखकों को खोजते हैं, उन्हें मंच प्रदान करते हैं और निरंतर प्रोत्साहित करते हैं। आज के समय में जब साहित्यिक जगत में मार्गदर्शन की आवश्यकता बढ़ती जा रही है, तब रसिक जी जैसे वरिष्ठ साहित्यकारों का स्नेह और सहयोग अनेक नवोदित रचनाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनता है।
उन्होंने मेरा भी साक्षात्कार लिया, मेरे विचारों को सुना और साहित्यिक संवाद का अवसर प्रदान किया। यह केवल एक औपचारिक बातचीत नहीं थी, बल्कि साहित्य और मानवीय संबंधों को जोड़ने वाला आत्मीय अनुभव था। उनके व्यवहार में जो विनम्रता, अपनापन और सम्मान का भाव है, वही उन्हें विशेष बनाता है।
‘परिचय साहित्य परिषद्’ और ‘सनद फाउंडेशन’ जैसी संस्थाओं के माध्यम से वे साहित्यिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं। संपादक, आयोजक, अनुवादक और साहित्यकार के रूप में उनकी बहुआयामी भूमिका साहित्य-जगत के लिए अत्यंत मूल्यवान है।
मेरा मानना है कि किसी भी साहित्यकार की सबसे बड़ी पहचान केवल उसकी प्रकाशित पुस्तकें नहीं होतीं, बल्कि वे लोग होते हैं जिनके जीवन को उसने प्रेरित किया हो। इस दृष्टि से रसिक देहलवी जी अनेक रचनाकारों के लिए प्रेरणा, मार्गदर्शक और आत्मीय साथी हैं।
नेपाल और भारत के बीच सदियों पुराना सांस्कृतिक और साहित्यिक संबंध रहा है। रसिक जी जैसे साहित्यकार इस संबंध को और अधिक सुदृढ़ बनाते हैं। मैं उनके प्रति अपनी हार्दिक श्रद्धा, सम्मान और शुभकामनाएँ व्यक्त करती हूँ।
उनके स्वस्थ, सक्रिय और सृजनशील जीवन तथा आने वाले वर्षों में भी साहित्य, भाषा और संस्कृति की सेवा इसी समर्पण के साथ करते रहें।
आदरणीय रसिक देहलवी जी को मेरा सादर प्रणाम।
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प्रियवर 1956-57 से बाल-चेष्टा के रूप में कुछ ऐसे वैसे ही लिखने की शुरुआत हुई जो सामान्य रूप से विभिन्न विधाओं में कच्चे-पक्के रूप में उस समय के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में छपीं और पोरबंदर से पोर्टब्लेयर तक के आवास-प्रवास में बिलाती भी गईं । कभी स्मरण करके पुस्तकाकार आईं तो वे भी आपके साथ साझा की जाएंगी । 1990 के उदारीकरण और मुक्त बाजार ने आतंकित किया, जिज्ञासा जगाई और फिर जो कुछ लिखा गया वह पत्र-पत्रिकाओं में छपना शुरू हुआ और कालांतर में पुस्तकाकार आना भी शुरू हुआ । लेकिन इस लेखन में अपने समय की दैनंदिन ज़िंदगी और उसकी जद्दोजहाद ज्यादा थी । लगा जैसे लेखन ने कहीं प्रतिरोधात्मक पत्रकारिता का रूप ले लिया है जो कभी कुण्डलिया छंद में तो कभी पत्र और कभी एक छाया पात्र तोताराम के साथ संवाद में प्रकट होने लगा ।अपने समय से आँख चुराकर शाश्वत की कल्पना का कोई अर्थ मुझे नहीं लगा । इसमें चूँकि सामयिक विडंबनाओं से संघर्ष था तो उसके बरक्स शाश्वत मानवीय मूल्यों को भी प्रकारांतर से आना ही था । इसी तरह चलते-चलते कुण्डलिया छंद, पत्र, तोताराम से संवाद और कुछ फुटकर छंदबद्ध गीतिकाओं के रूप में 25-30 पुस्तकें आ गईं । कुछ पुस्तकें आपको भेज रहा हूँ । मेरे अनुसार आप सकारात्मक विचारों के सुचालक हैं और आपके माध्यम से इन विचारों का किसी न किसी प्रकार समाज में संचरण-संरक्षण भी अवश्य होगा । समय निकालकर पढ़ने का कष्ट करें और उस विचार के साथ जुड़ें जो हमारे समय और समाज की वर्तमान और दीर्घकालिक आवश्यकता है । पढ़ने के बाद अपने सर्किल में साझा करें और अंततः किसी पुस्तकालय में पहुँचा सकते हैं । शायद वहाँ भी कोई पढ़ने वाला बचा हो । जब षड्यन्त्रकारी सहजता से एकजुट हो सकते हैं तो शुभकामी क्यों नहीं । आपका मैं, रमेश जोशी
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जब से परिचय हुआ है इन्दुकांत आंगिरस जी का साहित्यिक व्यक्तित्व मुझे हमेशा सक्रियता की एक ऐसी मिसाल लगा है जो बहुत ही जीवंत और प्रेरणादायी है। अनेक भाषाओं के ज्ञाता और अनेक विधाओं में अपना निरंतर रचनात्मक सहयोग देने वाले ये हमारे प्रिय और महत्वपूर्ण लेखक हैं। अनुवाद और सम्पादन के क्षेत्र में भी इनका उल्लेखनीय योगदान है। अभिव्यक्ति की नयी तकनीक से जुड़े हुए हैं। मुझे पूरा विश्वास है कि साहित्य के विभिन्न क्षेत्रों में इनका योगदान हमें समृद्ध करता रहेगा।
दिविक रमेश , दिल्ली।
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लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र की अज़ीम शख़्सियत है इन्दुकांत आंगिरस ।
राजधानी नई दिल्ली में पैदा हुए और पले बड़े हुए ; बैंगलोर को अपनी कर्मभूमि बनाने वाले वरिष्ठ साहित्यकार इन्दुकांत अंगिरस आज के वैज्ञानिक युग में लेखन, पत्रकारिता, पुस्तक समीक्षा और प्रकाशन के क्षेत्र में अपनी अमित छाप छोड़ रहे हैं। वह पिछले कई वर्षों से अपने आप को स्थापित करने के लिए कड़े संघर्ष का सामना कर रहे हैं। लेकिन फ़िर भी उन्हें अभी तक अपनी प्रतिभा और अनुभव के अनुसार वह सफलता नहीं मिल पाई है जिसके सही मानों में वह हक़दार है। मैं व्यक्तिगत तौर पर इन्दुकांत आंगिरस जी को पिछले 2-3 साल से जानता हूँ । वह एक अच्छी सूझ - बूझ वाले दूरदर्शी, प्रतिभावान, अनुभवी, परिश्रमी और संघर्षशील व्यक्ति हैं। वह परिचय साहित्य परिषद् , दिल्ली एवं सनद फाउंडेशन के संस्थापक अध्यक्ष और पुस्तकम प्रकाशन के मालिक हैं।
डॉ सैयद अली अख़्तर नक़वी
अध्यक्ष - हिन्दी - उर्दू अदबी संगम , दिल्ली
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एक कवि, एक शायर और बेमिसाल शख्सियत के मालिक हैं "इंदुकांत आंगिरस जी".*मैं व्यक्तिगत रूप से उनसे कभी नहीं मिली हूँ पर हाँ, एक दो बार फोन पर उनसे बात ज़रूर हुई है. इंदुकांत जी कवि, लेखक व साहित्यकारों के नि:शुल्क साक्षात्कार लेते हैं और उनको एक नई पहचान देते हैं.*मैने ऐसे ही एक महिला लेखिका, कवयित्री व साहित्यकार का इंटरव्यू देखा था तब मैं इंदुकांत जी से बहुत प्रभावित हुई थी.*ऐसे ही एक चैनल के माध्यम से मेरी आवाज़ उन तक पहुची थी तब उन्होनें मेरी आवाज़ की न केवल प्रशंसा की थी बल्कि मेरा उत्साह/ हौंसला भी बढाया था.फिर एक दो बार कार्यक्रमों के माध्यम से उनसे बात- चीत का सिलसिला शुरू हुआ जो आज भी कायम है. एक अच्छी सोच रखने वाले इंदुकांत आंगिरस जी के बारे में मैं केवल इतना ही कहना चाहूगीं कि.....
बिना कहे कुछ भी वो सब समझ जाते हैं,
मदद के लिए सभी की हाज़िर वो हो जाते हैं.
एक बार कोई मिल ले उनसे अगर,
चेहरो को याद हमेशा वो रख जाते हैं.
आशाओं से भर देते हैं मिलने वालों/दोस्तों को,
मार्गदर्शन वो फिर सबका कर जाते हैं.
मांगते नहीं कुछ किसी से भी पर,
अपनी दुआएँ वो सबको दे जाते हैं.
शुक्रिया धन्यवाद आभार
शाहाना परवीन 'शान'... ✍️
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इंदु कांत मेरी नज़र में -
पुरानी मुलाक़ात तो नहीं कह सकता लेकिन नई भीं तो नहीं है, ऐसे मस्त मौल साहित्यकार कवि और साहित्य प्रेमी कि साहित्य यात्रा सचमुच काबिले तारीफ़ ही है कि ख़ुद को आरो के लिये समर्पित करना जिनकी सब से बड़ी खासियत है. आज के दौर में इंदु कांत जैसे अदब नवाज़ सरफिरो का अलग ही मुकाम है.
- डॉ विजेंद्र ग़ाफ़िल
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