Tuesday, September 17, 2024

लम्ब्रेटा स्कूटर

 

लम्ब्रेटा स्कूटर

 

मेरे ताऊ जी के पास था

लाल रंग का लम्ब्रेटा स्कूटर

जो बिना चाबी के हो जाता था स्टार्ट

जिस पर बैठ मैं बन जाता स्मार्ट

जब भी आते थे हमारे घर

मैं ले उड़ता था उनका स्कूटर

पेट्रोल था उन दिनों

सात रूपये लीटर

घुमाता था खाली सड़कों पर

लगभग आधे घंटे तक

ताऊ जी हो रहे होते घर पे नाराज़

पर मैं जानता था उनकी ख़ुशी का राज़

भूलता नहीं था लाना

१२० नंबर का बनारसी पान का जोड़ा

पान पा कर हो जाते थे ख़ुश ताऊ जी

प्यार करते हुए मुझे डाँटते थे थोड़ा।

चुन्नी लाल पतंग वाला

 

चुन्नी लाल पतंग वाला

 

गली आर्यसमाज के

नुक्कड़ पर

छोटी-सी दुकान थी

चुन्नी लाल पतंग वाले की

जहाँ लगभग हर शाम

जाता था

ख़रीदने पतंग और मांजा

अक्सर लगी रहती थी भीड़

उसकी दुकान पर

रंग-बिरंगे मांजों की

भरी हुई चर्खियाँ

सजी रहती थी

दुकान पर

मांजा नापने के लिए गज़ का नहीं

बल्कि अपने हाथों का इस्तेमाल

 करता था चुन्नी लाल

कानो में गूँजती थी

मिली-जुली आवाजें

चुन्नी... दो आने का लाल मांजा

चुन्नी... चवन्नी का हरा मांजा

चुन्नी... अठन्नी का पीला मांजा

चवन्नी का मांजा

लपेटता था अपने बायें हाथ के

अंगूठे और कनिष्ट ऊँगली में

फुर्ती से घूमता था उसका हाथ

शिव के डमरू की तरह

और तब दो आने

चवन्नी और अठन्नी के हिसाब से

अचानक जाता था थम उसका हाथ,

बहुत मांजाख़रीदा चुन्नी लाल से

लेकिन आज तक समझ नहीं पाया

उसका मांजा नापने का मापदंड।

८४ घंटे वाला मंदिर

 

८४ घंटे वाला मंदिर

 

कटरा गोकुल शाह,

बाज़ार सीता राम के

ठीक सामने

प्राचीन

८४ घंटे वाला मंदिर

आज भी है मौजूद

इसके ८४ घंटों की आवाज़,

आज भी रह रह कर

गूँजती है

मेरे कानों में

८४ लाख योनियों के प्रतीक

ये ८४ घंटे

एक साथ

बजाने का हुनर

हर किसी को नहीं आता

शाम की

आरती के वक़्त

इन ८४ घंटों का

लगातार बजना,

इन घंटों का संगीत सुन कर

शाम आलिंगन

करने लगती हैं

रात का

परत दर परत

खुलती है रात

एक घंटा

और

१ लाख योनि

८४ घंटे

और

८४ लाख योनि

सिर्फ आदमी ही

कर सकता है तय

८४ लाख योनियों का सफर

बजाते हुए

८४ घंटे एक साथ,

खुद को समझाते हुए

आईनों को झुठलाते हुए

मुखौटे ओढ़ कर

८४ घंटे

एक साथ बजाते हुए।

गायत्री मंत्र

 

गायत्री मंत्र

 

मुझे आज भी याद है

आंध्रा स्कूल में

प्रथम कक्षा में

मेरा पहला दिन,

आये थे कक्षा में

प्रिंसिपल महोदय

और पूछा था उन्होंने –

'गायत्री मंत्र किसको आता है?'

पूरी कक्षा चुप थी लेकिन

मैंने अपना हाथ उठा दिया था

फिर खड़े होकर सभी को

गायत्री मंत्र सुना दिया था

सभी ने बजाई थी जो ताली

उसका संगीत आज भी

कानों में ताज़ा है।

मसाला डोसा

 

मसाला डोसा

 

आज से लगभग

६० साल पहले

दिल्ली में आसान नहीं था

मसाला डोसा मिलना,

लेकिन

मेरे आंध्रा स्कूल की

कैंटीन में मिलते थे

दक्षिण भारतीय व्यंजन

मसाला डोसा, इडली-वड़ा

उपमा, चना वड़ा

नारियल की चटनी

और

साम्भर,

शुरू से ही खाता था

जी भर कर

विशेष रूप से चना वड़ा

था बहुत पसंद मुझे

उस समय मालूम नहीं था

कि जीवन में कभी

दक्षिण भारत भी

जा कर रहना पड़ेगा

और अक्सर

मसाला डोसा खाना पड़ेगा

वहीं जाकर देखा

कितना दिलचस्प होता है

मसाला डोसे बनाना

उसी सींको वाली झाड़ू से

किया जाता है साफ़

मसाले डोसे के तवे को

जिस झाड़ू से हम करते हैं

घर का आँगन साफ़।

आर्मी टैंक

 

आर्मी टैंक

 

आंध्रा स्कूल, दिल्ली के

आख़िरी सिरे के पीछे वाले

ग्राउंड में रखा था

लोहे का एक पुराना आर्मी टैंक

जिस पर बैठ कर

मैं खुद को कमांडर समझता

आर्मी स्कूल में दाखिले के लिए

ख़ूब पढ़ता

लिखित परीक्षा भी

कर ली थी उत्तीर्ण

लेकिन साक्षात्कार में

हो गया था फेल

आर्मी स्कूल में दाखिला पाना

नहीं था खेल

कमांडर तो नहीं लेकिन

स्कूल की तरफ से

२६ जनवरी १९७३ की परेड में

लिया था हिस्सा

आज भी भूला नहीं हूँ

वो तवील किस्सा।

मेरे नाना

 

मेरे नाना

 

दिल्ली में

पहली ख़राद मशीन लगाने वाले

लाला जयदयाल यानी मेरे नाना

अजमेरी गेट पर था जिनका कारख़ाना

दिल्ली के रईसों में शुमार था जिनका नाम

सन १९४० में जिनके पास थी

घोड़ों वाली बग्घी और मोटर-कार

इंडिया गेट की सैर को जाता था परिवार

अब हो चुके थे कंगाल

और घर की छत पर बनी दुछत्ती में

कर रहे थे निवास

गली के बरमे से भर कर लाता था

उनके लिए सुराही में ठंडा पानी

बहुत दर्द भरी थी उनकी कहानी

अब भी कभी कभी अपनी बेंतनुमा स्टिक

और टोपी पहन निकलते थे बाज़ार

और लाते थे खजूर

अब कोई नहीं कहता उन्हें हुज़ूर?

बिक गयी थी हौज़काज़ी की दुकानें

बिक गया था कारख़ाना

नाना भूल गए थे मुस्कुराना

मुझे आज भी सोच कर आश्चर्य होता है

कि कैसे दिल्ली का एक रईस

हो गया था गुमनाम

अब किसी को याद नहीं उनका नाम।