Friday, September 25, 2026

English Language Application

 Dear Sir/Madam,

I am writing to express my interest in applying for a position as an English Language Teacher / Spoken English Faculty at your institute.

I have completed my Bachelor of Commerce (B.Com) and Post Graduate Diploma in Business Management (PGDBM). I have studied in an English-medium school in Delhi from Class 1 onwards, which has given me a strong foundation in the English language and communication.

I have excellent English communication skills, both spoken and written, and I am very interested in teaching English, particularly Spoken English, grammar, vocabulary, pronunciation and communication skills.

Although my academic qualifications are in Commerce and Business Management, English has been an integral part of my education from an early age. I am confident in communicating in English and would be enthusiastic about helping students improve their fluency, confidence and overall communication skills.

I would be grateful for an opportunity to work with your institution as an English Language Teacher or Spoken English Trainer. I would also be happy to give a demo class or attend an interview to demonstrate my English communication and teaching abilities.

Please find my CV attached for your consideration. I would appreciate the opportunity to discuss any suitable current or future openings with your institution.

Thank you for your time and consideration. I look forward to hearing from you.

Kind regards,

Indu Kant Sharma
Surat, Gujarat
Mobile: 9900297891
Email: angirasik@gmail.com

JOB LETTER

 Dear Hiring Manager,

I am interested in opportunities with your International Sales / European Markets team in Surat.

I have completed my B.Com and PGDBM and have strong English communication skills. I have also studied in an English-medium school throughout my education.

A key strength I can bring to an international-facing role is my knowledge of three European languages:

• Hungarian
• Greek
• Czech

I am particularly interested in working with European customers and developing a career in international diamond and jewellery sales. I am comfortable communicating in English and would be interested in using my European language skills to support customer communication, lead generation, follow-ups and relationship management.

Although I am looking to develop my experience in the diamond industry, I am highly interested in learning diamond products, the 4Cs, certification, pricing, B2B sales processes and international export procedures.

I would appreciate the opportunity to be considered for a suitable position in International Sales, European Client Relations, Business Development or Sales Coordination.

I have attached my CV for your consideration. I would be happy to attend an interview or language/communication assessment at your convenience.

Thank you for considering my application.

Kind regards,

[Your Full Name]
Surat, Gujarat
Mobile: [Your Phone Number]
Email: [Your Email Address]

Tuesday, September 22, 2026

खोया हुआ पर्स

 खोया हुआ पर्स 


क़िस्सा बहुत पुराना है लेकिन मेरे ज़ेहन में आज भी ताज़ा। शादी को चार साल हो चुके थे और दो बच्चों का बाप बन चुका था लेकिन फितरत में अभी भी आवारगी थी।  नयी नयी जवानी के जोश में लगी - बंधी दूतावास की नौकरी को लात मारकर घर बैठ गया।  जब पत्नी को पता चला कि मेरी नौकरी छूट गयी है तो एक पल को उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वह जहाँ खड़ी थी वही ढेर हो गयी। शायद बेहोश हो गयी थी। मैंने ताज़ा पानी के कुछ छींटे उसके चाँद से मुँह पर मारे , कुछ उसके गाल थपथपाये , प्रेम से उसका नाम लेकर पुकारा तो उसने आँखें खोली। 


 इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता वो बिजली की तरह चमकी और बदरी की तरह दमकी।  बेहोशी टूटते ही वो ज़ोर से चीखी , ' , तुझे ज़रा भी अक्ल नहीं । दो बच्चियों का बाप बन गया पर हरकते बच्चों जैसी है। नौकरी नहीं रही तो ये क्वार्टर भी छूटेगा , तब इन बच्चों को लेकर क्या हम सड़क पर सोएँगे ?अभी जाओ , अँगरेज़ साहिब के पास , उनसे मुआफी मांगो , अपने छोटे बच्चों की दुहाई दो और ज़रूरत लगे तो उनके पैर पकड़ो और उन्हें यक़ीन दिलाओ कि आगे से ऐसी ग़लती नहीं होगी। " 

पत्नी की ऊँची और सख़्त आवाज़ सुनकर मैं  सकते में आ गया और  मुझे  होनी ग़लती का एहसास हुआ। कितनी मुश्किल से मुझे  अँगरेज़ लोगो के दूतावास में काम करने का अवसर मिला था लेकिन मैंने  उसकी कद्र ना जानी। 

अगर डॉ सरिता ने उसकी सिफारिश न करी होती तो मुझे ये नौकरी कभी ना मिलती ,

Monday, September 21, 2026

STS_SURAT_303

 प्रिय मित्रो ! नमस्कार , आशा है आप सानंद होंगे।  स्वयं एक कवि और लेखक होने के नाते मैंने ये अनुभव किया है कि जीवन की भाग - दौड़ से दूर कुछ पल फुर्सत के भी मिलने चाहिए जिससे  हम अपनी ऊर्जा को पुनः recharge कर सकें और कुछ अनूठा सृजन भी कर सकें। इसी परिकल्पना के अंतर्गत     " सूरत " शहर में Furnished  2BHK  flat , Short Term Stay   के लिए कवियों / लेखकों / कलाकारों के लिए उपलब्ध है।  अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें।  सादर - इन्दुकांत आंगिरस - 9900297891   

Friday, September 18, 2026

Hungarian_Nagy _Cynthia

 

Imádlak

Imádlak... neked annyi, mint egy kis cicát
szeretni, vagy egy könyvet kedvelni,
egy filmet megnézni.
Ezt a gyönyörű szót nem lehet így elcsépelni!
Én imádlak, de nem úgy, mint a falevelet,
mely orrod előtt a fáról a magasból lepereg...
Imádlak... ha kimondom, testem lelkem
beleremeg!

Mert már kevés a szó „szeretlek”,
hisz majd szétvetnek az érzelmek!
Ha belélegzed hajam s bőröm finom illatát,
csókjainktól részegülten várjuk a csodát.


S én akarom, hogy Te is megérezd a

szerelem hatalmát, mert csakis akkor
érted meg e két szó titkos varázsát,
s együtt áldozunk vágyaink oltárán!



करती हूँ तुम्हारी  पूजा 


करती हूँ तुम्हारी पूजा  … तुम्हारे लिए, यह एक छोटे बिल्ली के बच्चे को  प्यार करने जैसा है,

या एक किताब का आनंद लेने जैसा,

या एक फ़िल्म  देखने जैसा।

तुम इस ख़ूबसूरत शब्द को यूँ ही हल्के में नहीं ले सकते !

 करती हूँ तुम्हारी  पूजा , लेकिन उस पत्ते की तरह नहीं

जो बहुत ऊँचे पेड़ से,  ठीक तुम्हारी  नाक के  नीचे गिरता है...

 ' करती हूँ तम्हारी पूजा ' . कहते वक़्त ,  मेरी   देह  और आत्मा

काँप उठती है !


 क्योंकि 'आई लव यू' शब्द अब काफी नहीं,

मेरी भावनाएँ फूटने को हैं !

जब तुम मेरे बालों और त्वचा की कोमल खुश्बू में साँस लेते हो,

हमारे चुम्बनों से मदहोश, हम उस अचरच की प्रतीक्षा करते हैं।


और चाहती  हूँ मैं  कि तुम भी महसूस करो

प्रेम की उस शक्ति को , क्योंकि तभी तुम

 इन दो शब्दों के रहस्यमयी जादू को समझ पाओगे, 

और साथ मिलकर हम अपनी इच्छाओं की वेदी पर बलिदान चढ़ाएंगे !

Saturday, September 12, 2026

SANAD_WEB_TESTING

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Kavi_Sammellan

 पत्थर से  शीशा बन जाना सब के बस की बात नहीं 

सीने में ग़म को दफ़नाना सब के बस की बात नहीं 

ग़ैरों के रिसते ज़ख़्मों पर कोई भी हँस लेता है

अपने ज़ख़्मों पर मुस्काना सब के बस की बात नहीं

Friday, September 11, 2026

लघुकथा - सन्यासी

  लघुकथा - सन्यासी 


 लघुकथा - सन्यासी 


               टॉवर के अधिकारी ने अपने चीफ़ से पूछा , " सर , मैं समझ नहीं पा  रहा हूँ कि पालकी में पधारे रहे 92  वर्षीय सन्यासी ने  टॉवर से महिला गार्ड्स को हटाने के लिए क्यों कहा ? सन्यासी तो मोह - माया का त्याग करके ही सन्यासी बनते हैं।" 

चीफ़ ने मुस्कुराते हुए अधिकारी से कहा , " सिर्फ केसरी चोला पहनने से कोई सन्यासी नहीं बनता। इन्होंने सिर्फ चोला बदला है , औरत का बदन इनके दिमाग़ से कभी नहीं निकला। इसीलिए दुनिया के सामने  औरत से  नज़र तक मिलाने से घबराते हैं।  आख़िर है तो पुरुष ही ..... 


इन्दुकांत आंगिरस 

9900297891


Wednesday, September 9, 2026

Misha_Typing

 

मुक्ति की छाया -  13

बात उन दिनों की है जब लोग शहरों में हमेशा के लिए रहने नहीं आते थे। उनका मकसद सिर्फ पैसा कमा कर वापस अपने गांव लौट जाने का हुआ करता था ।कुछ ऐसा ही लगाव था चंद्र सिंह को अपने पहाड़ों से ।दिल्ली में रहते हुए भी उनकी पत्नी बसंती के साथ सदैव पहाड़ों की चर्चा करना यह साबित करता था, की पहाड़ी लोगों का अपनी मिट्टी से जुड़ाव कभी खत्म नहीं होता । उन दिनों उन दोनों पति-पत्नी का शहर की  चकाचौंध और पैसे कमाने के बाद, सुकून की तलाश में वापस पहाड़ों की गोद में लौटने का निर्णय एक बहुत बड़ा बदलाव था । उन्होंने उनकी शुरुआती दिनों में दिल्ली की भीड़ भाड़ में अपनी पहचान बनाई और मेहनत से आर्थिक मजबूती हासिल की ।शहर में रहते हुए भी उनके सपनों में वही ठंडी हवा, देवदार के पेड़ और पहाड़ी रास्ते आते थे । घर की पिछली दीवार पर टंगी पहाड़ी तस्वीर उन्हें हमेशा उनकी जड़ों की याद दिलाती थी। कुमाऊं की वादियों में लौटने के बाद, अब उनकी सुबह दिल्ली शहर के शोर के बदले, चिड़ियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से होने लगी।  चंद्र सिंह और बसंती देवी को लगता था कि उन्होंने स्वर्ग पा लिया है। पुरखों की धरती की मिट्टी की खुशबू उन्हें हर दुख भुला देती थी ।

लेकिन वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता है। शहर में कमाया हुआ पैसा पानी की तरह बहने लगा ।पहाड़ों में सुविधाएं जुटाने और पुराने घर की मरम्मत में काफ़ी खर्च हो गया । जब बैंक बैलेंस कम होने लगा तो डर ने दस्तक दी। चंद्र सिंह जो अब तक सुकून में थे , अब चिंतित रहने लगे।  पैसा खत्म होने का डर इंसान को चिड़चिड़ा बना देता है।  छोटी-छोटी बातें अब बड़े-बड़े झगड़ों का रूप लेने लगी । बसंती देवी , जो पहाड़ों में ही अपना जीवन बिताना चाहती थी उन्हें चंद्रसिंह का यह बदला हुआ रूप दुख देने लगा । दोनों के बीच का संवाद , अब तनाव और शिकायतों में बदल गया । जिन पहाड़ों ने सुकून दिया था आज वही पहाड़ों काटने को दौड़ते थे ।खाली जेब ने घर की शांति को झगड़े की आग में झोंक दिया । वादियों में सुकून तो था मगर रोटी की चिंता ने सुकून का अस्तित्व ही मिटा दिया था।  वह घर जो कभी सुकून की तलाश में बनाया गया था अब एक कुरुक्षेत्र बन चुका था। दिल्ली की कमाई खत्म होने के साथ-साथ दोनों का एक दूसरे के प्रति सम्मान भी खत्म हो चुका था। बसंती देवी के लिए कालितजोरी, सिर्फ पैसे की कमी नहीं थी, बल्कि सुरक्षा का हट जाना भी था। बात-बात पर ताने देना अब पुरानी बात हो गई थी। जो हाथ कभी रसोई में पहाड़ी स्वाद बिखेरते थे, अब वो गुस्से और दरिद्रता की वजह से हिंसा पर उतारू हो गए थे। अब बसंती देवी का गुस्सा इतना प्रचंड हो चुका था कि वो चंद्रसिंह पर शारीरिक प्रहार करने लगी थी। चंद्रसिंह, जो कभी दिल्ली में इज्जतदार नौकरी करते थे, अब अपने ही घर में अपमानित और बेबस महसूस कर रहे थे। उनका अस्तित्व धीरे-धीरे अदृश्य हो रहा था। उस दिन सुबह की शुरुआत चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं बल्कि पुराने कलेश से हुई। सूरज की पहली किरण के साथ रसोई से बर्तनों की गिरने और चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। चंद्रसिंह ने शायद सिर्फ इतना कहा था कि चाय में चीनी कम डालो, खर्च बचाना है। और बसंती देवी का सब्र टूट गया। पहाड़ों की ठंडी हवा अब उन्हें सुकून नहीं देती थी, बल्कि उनके जख्मों पर नमक छिड़कती थी। खाली पेट ने बसंती के भीतर की ममता को एक शेरनी की हिंसा में बदल दिया था। चंद्रसिंह ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस जीवन संगिनी के साथ वो बुढ़ापे का सुकून ढूंढने आए थे, वही उनके शरीर और आत्मा पर चोट करेगी। चंद्रसिंह ने झगड़े के बाद अपनी गायों के लिए एक डंडा पकड़ा और जंगल की ओर निकल गए। चंद्रसिंह का यह फैसला कि वो गायों के साथ जंगल की ओर निकले उनके भीतर के टूटे हुए स्वाभिमान और गुस्से का प्रतीक था। बसंती देवी का पीछे से चिल्लाना 'घर वापस मत आना, निकल जाओ' चंद्रसेन के दिल पर किसी खंजर की तरह लगा।  वो रिश्ता जो सालों पुराना था, आज एक पल में रेत की तरह बिखर रहा था। रास्ते में जाते समय गांव के लोगों ने टोका, 'सुबह सुबह घर से कुछ खाकर जाओ' ,तो उन्होंने जवाब दिया, 'मुझे मत टोको'। ये उनकी उस मानसिक स्थिति को दर्शाता था कि जब इंसान किसी से कोई रिश्ता या हमदर्दी नहीं चाहता ।

चंद्रसिंह अपनी गाय के झुंड को लेकर ऊंचे पहाड़ की तरफ बढ़ने लगा। उनके हाथ में लकड़ी का डंडा सिर्फ उनका सहारा नहीं था, बल्कि उनके गुस्से का भी सहारा था। जैसे-जैसे वो ऊपर चढ़ते जा रहे थे, नीचे गांव का शोर कम होता गया। सिर्फ गायों के गलों में बंधी घंटियों की टुन-टुन और उनके सांस लेने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। उनके दिमाग में दिल्ली की वो नौकरी, वो पैसा, और वो बसंती के साथ बिताए अच्छे दिन किसी चलचित्र की तरह चल रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कब उनका खुशहाल जीवन अदृश्य हो गया और सिर्फ झगड़े बचे। वो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था, लेकिन चंद्रसिंह की रफ्तार कम नहीं हुई। उन्हें अब घर की छत से ज़्यादा सुकून उन सुनसान पहाड़ी रास्तों में मिल रहा था। उनका मन  घाटियों की गहराई में गिरता जा रहा था।  बसंती की वो अंतिम आवाज़ उनके कानों में तेज़ गूंज रही थी "लौटना मत"। अब चंद्रसिंह पहाड़ों से निकलने वाले झरने के उद्गम स्थल तक पहुँच चुके थे। उन्होंने सोचा कि थोड़ा सुस्ता लूं। पहाड़ों से गिरता हुआ वो बर्फीला पानी और उसकी निरंतर कल-कल की आवाज़ चंद्रसिंह को शांत मन के लिए वो एक लोरी की तरह थी। गायें पीछे छूट गई थीं। शाम होने के साथ गायें अपने घर की ओर लौट चुकी थीं। चंद्रसिंह ने जब उस ठंडे झरने के पास अपनी थकी हुई भूखी प्यासी देह रखी, तो प्रकृति ने उन्हें अपनी गोद में समेट लिया। उन्हें पता ही नहीं चला कि कब उनकी बंद आँखों ने दुनिया के सारे दुखों से नाता तोड़ लिया और वो झरने के आगोश में समा गए।

सूरज ढल चुका था, और पहाड़ों पर अंधेरा किसी गहरी चादर की तरह फैल गया था। घर में बसंती देवी ने दीपक जलाया। उन्होंने मन ही मन सोचा, गुस्से में गए हैं। थोड़ी देर में ठंड लगेगी, तो खुद ही पैर पटकते हुए वापस आ जाएंगे। उन्होंने रोज की तरह रसोई संभाली, लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती गई, घर की दीवारों का सन्नाटा उन्हें चूमने लगा। हर बार झगड़े के बाद चंद्रसिंह लौट आते थे, इसलिए बसंती को अभी डर नहीं, बल्कि एक विश्वास था।

लेकिन जब मंदिर की आखिरी घंटी भी बजकर शांत हो गई, तब उनके मन में हल्की घबराहट ने जन्म लिया। पहाड़ी झरने की ठंडक ने चंद्रसिंह के गुस्से को शांत कर दिया था, लेकिन उनके ऐसी नींद में सुला दिया था जहां से वापसी का रास्ता धुंधला था। बसंती ने चौखट पर बैठकर राह देखना शुरू किया। वो गुस्सा जो सुबह ज्वालामुखी बनकर फटा था, अब धीरे-धीरे बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया। चिंता की राख बन रही थी ।बसंती देवी ने अब रात को ही गांव के लोगों को ख़बर दी कि चंद्रसिंह अभी तक नहीं लौटे हैं। तब उनकी आँखों में हमदर्दी तो थी, पर हाथ बंधे हुए थे। पहाड़ों में पुराने बुज़ुर्ग कहते हैं कि रात को पहाड़ जागते हैं और इंसान को घर में होना चाहिए। इसलिए गांव वालों ने कहा कि अब सुबह ही हम लोग ढूंढने जा सकते हैं। सुबह तक का इंतज़ार कर लीजिए। ये वाक्य बसंती के कानों में किसी सजा की तरह गूंजा; वो जानती थी कि उनका पति बिना खाए-पिए सिर्फ गुस्से और दुख की गठरी लेकर गया है। वो रात बसंती के लिए किसी युग से कम नहीं थी। घर की वही दीवारें, जो सुबह तक उन्हें छोटी लग रही थीं, अब विकराल लगने लगीं । उन्हें दिल्ली के वो दिन याद आने लगे, जब चंद्र सिंह थके हारे दफ़्तर से आते थे और वे उनका स्वागत मुस्कुराहट से करती थी। उन्हें एहसास हुआ कि उनके भीतर की ममता और सम्मान का अस्तित्व ही मिट गया था। दीये की लौ धीरे-धीरे कम हो रही थी, बिल्कुल उनकी उम्मीद की तरह। उन्होंने बार-बार अपने उन हाथों को देखा, जिनसे उन्होंने अपने पति पर प्रहार किया था, और वही हाथ आज उन्हें ढूंढने के लिए तड़प रहे थे। पहाड़ों की वो रात इतनी गहरी थी कि बसंती को अपना खुद का गुनाह भी उस अंधेरे में साफ़ दिखाई देने लगा था। सुबह का इंतज़ार किसी मौत के इंतज़ार से कम नहीं था। जब इंसान पास-पास होता है, तो उसकी कीमत अदृश्य रहती है, पर जब वो एक रात के लिए भी खो जाए, तो उसका अस्तित्व पूरे घर को खाली कर देता है। पहाड़ी सुबह की पहली किरण के साथ ही गांव में एक हलचल थी। लाठियां, रस्सी और कुछ खाने का सामान लेकर टोलियां विभिन्न दिशाओं में निकल पड़ी थीं। जो टोली झरने की ओर गई थी, उन्होंने वहां के पत्थरों और ठंडी घास को कुरेद मारा, लेकिन वहां चंद्रसिंह कहीं नहीं मिले। ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ निगल गया हो । झरने का कल-कल, अब खौफनाक सन्नाटा बन गया था । जब आखिरी टोली ने आकर कहा कि चंद्रसिंह का पता नहीं चल सका, तो बसंती देवी के पैरों तले ज़मीन निकल गई। गांव वालों ने दिलासा दिया कि रात हो गई है, जंगल खतरनाक है। कल सुबह फिर देखेंगे।

दूसरे दिन भी टोलियां खोजी दस्ते के रूप में चंद्रसिंह को पूरे पहाड़ों में छान मारा, हर झरने से पूछा, हर गुफा में झांका। चंद्रसिंह जैसे हवा में गुल हो गए हैं। उनका अस्तित्व एक ठंडी धूंद में कहीं खो गया था। जिन पैसों के लिए वो लड़ती थी। अब उसकी नजरों में वो पैसा कचरे के समान था। उसे सिर्फ़ अपना वो अदृश्य साथी चाहिए था। चार-पांच दिन बीत चुके थे। चंद्रसिंह का कोई पता नहीं चला।

                 गांव में एक सूरदास रहा करते थे। वे गांव के लोगों को अपनी सेवा देते थे, जैसे चावल कूटना, मलाई मथना, घी के लिए मक्खन निकालना इत्यादि। बदले में गांव के लोग उन्हें पैसा और खाने की वस्तुएं दे देते थे। इससे उनका जीवन आराम से कट रहा था। एक दिन सूरदास किसी घर की छत पर बैठे मलाई से मक्खन निकालने का काम कर रहे थे। सूरदास भले ही दुनिया नहीं देख सकते थे, पर उनकी दूसरी इंद्रियां बहुत विकसित थीं, जैसे कानों से सुनना, हाथों की ताकत इत्यादि। लोग बीच-बीच में उनके काम को देख जाते और बता देते कि और कितनी देर काम करना है। उनके लिए दिन और रात एक समान थे। सूरदास हमेशा की तरह अपने काम में मगन थे। अचानक उनके कानों ने कुछ ऐसा पकड़ा जो साधारण नहीं था। पहले उन्हें लगा कि कोई बंदर पेड़ से कूद रहा था, पर उस धम्म की आवाज़ में एक इंसानी भारीपन था। फिर उन्हें किसी बहुत बड़े पक्षी के पंखों के फड़फड़ाने की आवाज़ सुनाई दी। यह फड़फड़ाहट किसी छोटी चिड़िया की नहीं थी, बल्कि किसी गरुड़ या बाज़ पक्षी की तरह थी। जो व्यक्ति देख नहीं सकता, उसकी सुनने की शक्ति इतनी तीव्र होती है कि वो हवा के रुख और पंखों की फड़फड़ाहट से भी सच का पता लगा लेता है। पत्तों का जोर-जोर से किसी के द्वारा हिलाना यह साबित करता था कि उस पेड़ पर कोई है और कुछ कहना चाहता है। फिर सूरदास को किसी के चिल्लाकर बोलने की आवाज़ सुनाई दी–“जाओ, गांव वालों से कहो, झरने से थोड़ा और आगे बढ़ें, तो एक पेड़ के नीचे वो मिलेगा, जिसे वो 4-5 दिनों से ढूंढ रहे हैं “। यह सुनते ही सूरदास ने उस घर के लोगों को सारी सुनी हुई बातों को बताया। बात गांव में आग की तरह फैल गई, कि सूरदास को दिव्य शक्ति मिली है, जो उसे आवाजें सुनाई दी हैं। जब गांव वाले सूरदास के बताए रास्ते पर झरने से आगे बढ़े तो उनका सामना उस कटु सत्य से हुआ, जिसे कोई देखना नहीं चाहता था। चंद्रसिंह का शरीर कभी दिल्ली की सड़कों पर गर्व से चलता था, और पहाड़ों में सुकून ढूंढने आया था। अब उस ठंडे पानी की वजह से फूल चुका था। प्रकृति ने उन्हें अपनी गोद में तो लिया, पर उनका जीवन अदर्श्य हो गया। जब गांव वालों ने उनके शरीर को उठाया तो वहां की हवा में एक भारीपन था। उनकी अंत्येष्ट सिर्फ एक शरीर का दाह संस्कार नहीं था, बल्कि उन सारे झगड़ों का और उस आर्थिक तंगी का भी अंत था, जिसने उस दुखान्त को जन्म दिया। पहाड़ों की मिट्टी से बना शरीर पहाड़ों की आग में विलीन हो गया। तबी मानो उस बड़ी चिड़िया की फड़फड़ाहट शांत हुई, क्योंकि अब चंद्रसिंह की आत्मा को मुक्ति मिल चुकी थी, लेकिन चंद्रसिंह का स्वाभिमान उस झरने की गहराई में कहीं हमेशा के लिए दफ़न हो गया था। बसंती के लिए अब घर की हर दीवार एक सवाल थी, जिसका जवाब कभी नहीं मिलने वाला था। अंत्येष्ट की लपटों में सिर्फ लकड़ियां नहीं जल रही थीं, बल्कि एक अधूरा सपना और एक कूटा हुआ रिश्ता भी राख हो रहा था। आत्मा को मुक्ति मिल गई, पर पीछे रह गया एक अदृश्य दर्द। चंद्रसिंह की अंत्येष्ट के बाद गांव में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। बसंती देवी वो उस घर में अकेली थी, जिसे उन्होंने अपने और उनके पति ने बड़े अरमानों से बनाया था। वो पैसा जिसकी कमी ने उनके भीतर हिंसा और क्रोध को जन्म दिया था, अब उनकी अलमारी में धूल खा रहा था। उन्हें एहसास हुआ कि –”इंसान का असली अस्तित्व, उसके पास मौजूद धन-दौलत में नहीं, बल्कि उसके अपनों के साथ बुने हुए प्रेम और सम्मान में होता है।”

 

सूरदास की वो बातें उनके कानों में आज भी गुंजती हैं। उन्हें समझ आ गया था कि जब रिश्तों में से मिठास खत्म हो जाती है, तो प्रकृति भी अपना रूप बदल देती है। चंद्रसिंह का शरीर पानी में विलीन हो गया, पर उसका अदृश्य अस्तित्व अब उस झरने की कल-कल और उन हवाओं में हमेशा के लिए बस गया था।

 

बसंती देवी ने अपने जीवन का बचा हुआ हिस्सा गांव की अन्य महिलाओं को धैर्य और प्रेम का महत्व सिखाने में बिताने का संकल्प लिया। उन्होंने जान लिया था कि गुस्से में बोले गए शब्द और उठाया गया हाथ कभी-कभी ऐसी दूरी पैदा कर देता है, जिसे मौत भी नहीं भर पाती।

 

यह कहानी हमें सीख देती है कि आर्थिक तंगी तो वक्त के साथ गुज़र जाती है, लेकिन अपनों की प्रती किया गया अपमान, एक ऐसा ‘अदृश्य ज़ख्म’ बन जाता है, जो आत्मा को मुक्ति मिलने तक दर्द देता रहता है।

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लालटेन वाला पानी 14 


1970 का दशक अपने आखिरी पड़ाव पर था। पटना, बिहारशरीफ के पास नेरुत गांव, जो मेरे पति प्रवीण और नंदों के लिए उनके मौसेरे भाइ-बहनों के साथ गर्मी की छुट्टियों में एक अलग ही दुनिया बन जाता था। ननीहाल की वो पुरानी हवेली, जो जमीदारी के समय का प्रमाण थी, जहां मिट्टी की सौंधी खुशबू और आम के बगीचों की सरसराहट आज भी उनके कानों में गूँजती है। रात के समय लालटेन और दिया की रोशनी, सत्तू का शरबत, मिट्टी के चूल्हे पर बनता लिट्टी चोखा, ननिहाल की वो यादें आज भी एक समानांतर जिंदगी की तरह उनके साथ चलती हैं।


आम के बगीचे में झूला डालना और पूरी दोपहरी गांव में टोली बनाकर घूमना, उनके मन को आज भी गुदगुदा जाता है। रात के वक्त जब बिहार की गर्मी थोड़ी नरम पड़ती, तो पूरी पलटन छत पर जमा हो जाती थी। सफेद चादर बिछी होती, और बच्चों का शोर आसमान छूने लगता। तभी एक आवाज़ सुनाई देती- छोटे मामा जी अश्विनी कुमार । मामा जी का आना, मतलब कहानियों का आना। लेकिन उनकी कहानियाँ परियों की नहीं बल्कि ‘अनसुलझे किस्सों’ की होती थीं, जिन्हें सुनकर बच्चे एक-दूसरे से चिपक जाते थे।


जैसे ही मामा जी किसी भूत-प्रेत या अजीब घटना का जिक्र करते, पूरी टोली चिल्लाते हुए नीचे की तरफ भागती। सबसे ज्यादा मुश्किल तो बेचारे राजू भैया को होती थी। वो थोड़े भारी-भरकम जे थे। जब सारे बच्चे फुर्ती से सीढ़ियों से उतरते, तो राजू भैया की सांस फूल जाती और उन्हें उतरने में देर हो जाती। वो पीछे छूट जाते और उन्हें डर लगने लगता कि कहीं पीछे से उन्हें कोई पकड़ ना ले। वही बच्चे जो कल तक ननिहाल की गलियों में दौड़ते थे, आज बड़े पद पर आसीन हैं, मगर नैरूत गांव की वो यादें आज भी समानान्तर जिंदगी की तरह उनके साथ चलती हैं।


उस दिन नैरूत गांव की हवेली में जब रात सन्नाटा गहराया, तो छोटे मामा जी की आवाज़ में एक अजीब सी थरथराहट थी। उस दिन वो कोई सुनी सुनाई कहानी नहीं, बल्कि अपने ही परिवार की एक सिलसिलेवार हकीकत सुनाने जा रहे थे। बच्चों ने उन्हें चारों ओर से घेर लिया था। बात उन दिनों की है जब नाना जी के चचेरे भाई का विवाह हुआ था। चचेरी नानी बड़े जमींदार खानदान की बेटी थी। जब वो दुल्हन बनकर उस हवेली में आई तो अपने साथ सिर्फ गहने और रेशमी लिबास नहीं लाई थी। उस जमाने की रिवायत के अनुसार बड़े घरों की बेटियों के साथ एक नौकरानी भी साथ लाई थी। जो उनके मायके की एक निशानी और ससुराल में उनका हाथ बटाने वाली परछाई थी।


वो नौकरानी शायद उम्र भर के लिए उस हवेली की दीवारों में कैद होने आई थी। वो चचेरी नानी के अस्तित्व का एक हिस्सा बन गई थी। दिन सुकून से बीत रहे थे। जमींदारी खत्म हो गई थी, पर अभी भी रोब-दाब था और हवेली की रौनक देखते ही बनती थी। मगर उस रौनक के पीछे कुछ ऐसा था जो दिखाई नहीं देता था।

 छोटे मामा जी बताते कि उस नौकरानी की मौजूदगी सिर्फ कामकाज तक सीमित नहीं थी। वो हवेली के उन कोनों में भी नजर आती जहाँ कोई काम ना होता। कभी-कभी ऐसा लगता मानो चचेरी नानी और उस नौकरानी के बीच कोई ऐसा मूक संवाद चल रहा हो, जिसे बाकी घर वाले समझ नहीं पाते थे। धीरे-धीरे उस नौकरानी का अस्तित्व हवेली की हवाओं में घुलने लगा। वह एक सहायिका नहीं रही, बल्कि उस खानदान के ऐसे सच का हिस्सा बन गई, जो वक्त के साथ और गहरा होता गया। एक तरफ शानों-शौकत, और दूसरी तरफ उस नौकरानी का बेनाम अस्तित्व। आंगन की धूप में बैठकर वो चचेरी नानी को कुछ-कुछ सिखाती रहती थी, लेकिन क्या यह कोई समझ नहीं पाता? पान लगाकर नानी को खिलाती, पालकी में उन्हें बिठाकर गांव घुमाने, गंगा नदी के किनारे सैर पर ले जाती थी। 

हवेली के बड़े से आंगन में दोपहर की धूप थोड़ी सुस्ताई हुई थी। गांव भर के बच्चे मिट्टी में खेल रहे थे, शोर मचा रहे थे। वहीं एक पुरानी चौखट पर बैठी वो नौकरानी चुपचाप सब देख रही थी। उसके चेहरे पर एक ऐसी मुस्कान थी, जो समझ से परे थी। अचानक उसने धीरे से कहा, “बच्चों, इधर आओ, देखो, मैं क्या कर सकती हूँ? क्या तुमने कभी मिट्टी के पंछी को सांस लेते, उड़ते देखा है?” बच्चे जो अबक अपनी ही धुन में थे, ठिठक कर उसके पास जमा हो गए। उसने अपने हाथों से थोड़ी सी गिली मिट्टी उठाई और बड़ी नज़ाकत के साथ उसे आकार देने लगी। देखते ही देखते, मिट्टी की उसके हाथों के बीच एक नन्ही सी चिड़िया बन गई। बच्चे उसे आश्चर्य भरी निगाहों से देखते रह गए, पर उन्हें क्या पता था कि असली खेल तो अभी शुरू हुआ है। उसने उस मिट्टी की चिड़िया को अपनी हथेली के बीच रखा, अपनी आँखें बंद कीं और कुछ बुदबुदाया। फिर उसने गहरी सांस ली और उस निर्जीव खिलौने पर एक फूंक मारी। अगले ही पल जो हुआ, उसने बच्चों की सांसें रोक दी। वो मिट्टी की चिड़िया फड़फड़ाई, उसके पंखों से धूल झड़ गई, और वो एक असली परिंदे की तरह नीले आसमान की तरफ उड़ गई। बच्चों की आँखें फटी की फटी रह गईं। जो नौकरानी अब तक सिर्फ एक सहायिका थी, अब उनके लिए जादूगर बन चुकी थी। उसकी आँखों में पुरानी रहस्य था। वो अदृश्य अस्तित्व जो शायद इस दुनिया का था ही नहीं। 


इतना सुनते ही सारे बच्चे तेजी से डरकर बाहर की तरफ भागने लगे। लेकिन राजू भैया धड़ाम से गिर पड़े। पूरी टोली जो डरकर भाग रही थी, रुकी और राजू भैया की तरफ लौट आई। राजू भैया चिल्ला रहे थे कि ये मुझे भी चिड़िया बना देगी, मुझे उठाओ और साथ ले चलो, मुझे मत छोड़ो। बच्चों की टोली राजू भैया को उठाई और उन्हें घसीटते हुए घर के सुरक्षित कोने की तरफ ले गए। फिर कहने लगे कि- राजू भैया, भारी शरीर आपकी हिम्मत का साथ बिल्कुल नहीं देता ।मामा जी कि कहानी चल ही रही थी । इनके चक्कर में हम सारे मर जाएंगे, मारे जाएंगे। राजू भैया अभी तक हाफ रहे थे । बच्चों का डर कि कहीं वो सारे भी चिड़िया ना बन जाएं।  इस डर के माहौल में भी हंसी का एक फव्वारा छोड़ गया 

मामा जी कहाने लगे, लेकिन यह बात सिर्फ बच्चों तक ही नहीं थी। संयुक्त परिवार होने के कारण दीवारों के भी कान होते हैं। जब बच्चों ने हाफते हुए सारा किस्सा बड़े बुजुर्गों को सुनाया, तो हवेली का माहौल पल भर में बदल गया। सभी सतर्क हो गए। जो नौकरानी अब तक सिर्फ एक सहायिका समझी जा रही थी, अब वो सबकी नजरों में एक तांत्रिक या किसी गुप्त विद्या की जानकार समझी जाने लगी। घर की महिलाओं ने बच्चों को उस नौकरानी से दूर रहने की हिदायत दी। हर तरफ एक ही चर्चा थी: कहाँ से आई है ये, मायके से ना जाने कैसी विद्या साथ ले आई है । हवेली का वो हिस्सा जहाँ वो नौकरानी रहती थी, अब तक एक अदृश्य लकीर सा बन गया था, जिसे पार करने की हिम्मत किसी में नहीं थी। फिर गर्मी की छुट्टियाँ खत्म हो गई।  

एक साल बीत गया, और नानी का घर फिर से बच्चों की हंसी और शैतानियों से गूंज उठा। मौसम वही पुराना था, गर्म हवाएं और दोपहर की खामोशी, लेकिन बच्चों का उत्साह बिल्कुल नया था। लेकिन सारे बच्चे अभी भी उस नौकरानी को याद कर रहे थे, जिसने पिछली बार कहानी में मिट्टी की चिड़िया को उड़ाया था। वे उसे ढूंढ रहे थे। तभी छोटे मामा जी आए। बच्चों ने घेरा बनाकर मामा जी को पकड़ लिया और एक साल की सारी बातें पूछने लगे। मामा जी थोड़ी देर के लिए गंभीर हो गए। उन्होंने सारे बच्चों को अपने पास बुलाया और एक साल पहले की कहानी की परत-दर-परत सच्चाई खोलने लगे। मामा जी ने बताया कि जो कुछ भी उस नौकरानी ने दिखाया था, वो कोई साधारण खेल नहीं था, बल्कि वो एक तांत्रिक थी टोने टोटके और काला जादू करना भी जानती थी। अब तो चचेरी नानी उसके साथ मिलकर तंत्र विद्या सीखने लगी थी। उसी दौरान गांव में अचानक लोगों की मृत्यु होने लगी। पूरे गांव में डर व्याप्त हो गया। नाना जी अपने चचेरे भाई को लेकर दूर गांव के एक ओझा के पास उपाय पूछने गए। ओझा जो काफी अच्छे व्यक्ति थे, उन्होंने आँखें बंद कीं और सारी बात समझ गए। उन्होंने आँखें खोलकर बताया कि-” गाँव की समस्या की जड़ उन्हीं के घर में है। आप उस नौकरानी को वापस अपने घर भेज दें, और कुछ चावल के दाने देता हूँ, उसे घर के प्रमुख द्वार के पास बिखेर दें” । दोनों भाई वापस आए।

सबसे पहले उस नौकरानी को भगाया गया, फिर चावल के दानों को प्रमुख द्वार पर बिखेर दिया गया। छोटी नानी को पता चल गया कि अब उनकी विद्या काम नहीं आएगी और उनकी गुरु, वो नौकरानी भी चली गई है। तो उन्होंने अपने कमरे में अपने प्राण त्याग दिए। लेकिन अब घर में छोटी नानी की आत्मा दिखाई देने लगी। वो किसी का कुछ नुकसान नहीं करती थी, लेकिन घर के लोग उनसे डरते जरूर थे। उनकी मौजूदगी घर के आंगन से बाहर गांव की गलियों में भी महसूस की जाने लगी थी। मामा जी ने बताया कि सबसे पहले ये सिलसिला गौशाला से शुरू हुआ। छोटी नानी की परछाई सुबह-शाम गायों के दूध निकालने के समय देखी जाने लगी। पहले तो ग्वाला डर के मारे बाल्टी छोड़कर भाग जाता। लेकिन धीरे-धीरे गांव के लोगों ने ये महसूस किया कि उनकी आत्मा किसी का नुक़सान नहीं करती, न ही किसी को डराती थी। जब वो जीवित थी तो नौकरानी के साथ मिलकर गांव के लोगों को नुक़सान पहुंचाती थी और डराती थी। अब उनकी आत्मा चुपचाप दूध निकालने के समय गौशाला में खड़ी दिखाई देती है। उनकी आँखों में एक प्यास भी थी, जैसे वो एक कटोरा दूध माँग रही थी, लेकिन उनके होंट बिल्कुल खामोश रहते। वो दूध लेकर चली जाती और फिर कहीं अदृश्य हो जाती। 

मामा जी ने बच्चों से कहा कि कई बार छोटी नानी की आत्मा आंगन में बनी देवली, जहाँ लालटेन और दीपक रखने की जगह बनाई जाती है। दीवार के मेहराव काटकर ,दीपक या लालटेन लेकर पूरे घर में घुमा करती थी। लेकिन किसी का नुकसान ना डराने जैसा काम नहीं करती थी।

फिर भी घर के लोग उनकी आत्मा से डरते थे, क्योंकि उनकी आत्मा हर कोने में लालटेन लेकर जाती थी। फिर रसोई में जब दूध उबाला जाता था, तो उबलकर गिरते किसी को दिखाई नहीं देता था, लेकिन इधर उबलकर गिर चुका होता था। लोग कहते थे कि छोटी नानी का तरीका था यह बताने का कि उनका हिस्सा अभी भी उन्हें मिलना चाहिए। ऐसा लगता था कि उनकी आत्मा घर के लोगों को यह कहना चाह रही है कि घर की रसोई और आंगन की रोशनी पर आज भी उनका पहरा है।

बच्चों ने पूछा-मामा जी! क्या छोटी नानी की आत्मा अभी किसी से बात करने की कोशिश की?  मामा जी ने ठंडी सांस भरी और कहा, ‘बात तो नहीं की, पर एक निशानी छोड़ गई’। उन्होंने बताया कि जब कोई आत्मा इस तरह घर और आंगन से जुड़ी रह जाती है, तो परिवार के बड़ों ने तय किया कि अब उन्हें मुक्ति दिलानी होगी। छोटी नानी की भटकती आत्मा की शांति के लिए गांव में एक बड़ा अनुष्ठान रखा गया। घर के आंगन में सारे विधि-विधान से यज्ञ कराया गया। पंडितों ने मंत्रोचार किया और प्रार्थना कि, की छोटी नानी का मोह इस संसार से छूट जाए और उन्हें परम शांति मिले। कई दिनों तक चले इस अनुष्ठान में, घर के हर सदस्य ने आहुति दी। सबने हाथ जोड़कर उनसे माफी मांगी और उन्हें अगली यात्रा पर जाने के लिए विदा किया। अनुष्ठान पूरा होने के कुछ ही दिनों बाद एक ऐसी घटना घटी, जिसने सबको आश्चर्य में डाल दिया। छोटी नानी का वो पुराना कमरा, जहां वो अपना अधिकतम समय बिताती थी और जहां उनकी लालटीन और सामान रखा था, अचानक ढह गया। जब कमरा गिरा तो आसपास कोई नहीं था। किसी को कोई चोट नहीं आई। उस कमरे का ढह जाने के बाद ऐसा लगा मानो छोटी नानी ने अपने साथ अपनी आखिरी निशानी भी मिटा दी हो। अब उस जगह पर सिर्फ मिट्टी और पुरानी ईंटें बची हैं। ना कोई वहां जाता था, ना ही कोई उस मलबे को हटाने की हिम्मत करता था। लोगों ने उस रास्ते को हमेशा के लिए बंद कर दिया। छोटे मामा जी ने बताया कि ‘बच्चों उस दिन के बाद से ना तो गौशाला में कोई परछाई दिखी, न ही आंगन में लालटेन घूमी और घर का दूध उबलना भी सामान्य हो गया’। सबको समझ आ गया कि छोटी नानी को मुक्ति मिल गई है। वो कमरा मोह का आखिरी प्रतीक था, और उसके गिरते ही वो संबंध भी हमेशा के लिए खत्म हो गए। घर में अब वो डर नहीं था, बल्कि एक अजीब सी शांति थी। बच्चों ने उस विराने कमरे की तरफ देखा, जो अब सिर्फ पुरानी कहानी का हिस्सा रह गया था। उन्हें थोड़ा डर तो लगा, पर ये जानकर सुकून भी मिला कि छोटी नानी को अब मुक्ति मिल गई है। छोटे मामा जी ने बताया कि मलबे और मिट्टी के बीच से एक नन्हा सा बबूल का अंकुर फूटा था। सबको लगा था कि शायद यह ऐसे ही कोई जंगली पौधा हो, लेकिन जो हुआ, वो किसी चमत्कार से कम नहीं था। साधारण तौर पर बबूल का पेड़ धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन छोटी नानी के कमरे की मिट्टी पर उगा यह पेड़ जैसे समय को मात दे रहा था। सिर्फ एक साल के भीतर वो नन्हा पौधा एक घना और मजबूत पेड़ में बदल गया। जितना बड़ा पेड़ पांच साल में होता है, उतना बड़ा यह सिर्फ कुछ महीनों में हो गया। उसका तना इतना मजबूत और शाखें इतनी कली हुई थीं कि पूरी मिट्टी का ढेर उसकी छांव में छुप गया। मामा जी ने बच्चों को समझाया कि गांव के लोग और घर के बड़े अब इस पेड़ को एक पेड़ नहीं मानते। उनका मानना है कि छोटी नानी का जन्म लिया है बबूल के पेड़ के रूप में। उनका इस मिट्टी से, उस आंगन से इतना गहरा लगाव था कि वो किसी ना किसी रूप में यहीं रहना चाहती थी। अब सबके दिलों में डर की जगह एक नया रिश्ता पैदा हो गया था। लोग कहते हैं कि छोटी नानी अब उस बबूल के पेड़ के रूप में घर की रक्षा करती है। जैसे पहले वो लालटेन लेकर पूरे घर में रात को घूमती घूमकर रौशनी किया करती थी। अब उनकी शाखें  घर पर छाया करती हैं। जब हवा चलती है और बबूल के पत्ते सरसराते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे छोटी नानी धीरे से कुछ कह रही हो। कोई भी उस पेड़ की टहनी नहीं तोड़ता, बल्कि शाम को उस पेड़ के नीचे एक दिया जरूर जलाया जाता है। छोटे मामा जी ने कहानी खत्म करते हुए कहा, ‘मिट्टी से मिट्टी का रिश्ता कभी खत्म नहीं होता’। वो कमरा गिर गया ताकि पेड़ उग सके। छोटी नानी अब मुक भी है और हमारे साथ भी। बच्चे सुशाल बबूल के पेड़ को देखकर दंग रह गए। उन्हें अब समझ आ गया कि वो पेड़ बाकी पेड़ों से अलग और ज़्यादा हरा-भरा दिखता था।

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विसर्जन - 10


रात के 12 बज चुके थे। चारों तरफ एक भारी ख़ामोशी  थी, जो सिर्फ दूर कहीं कुत्तों के रोने से टूट रही थी। वो औरत अपने घर की छत के मुंडेर पर खड़ी सड़क की ओर देख रही थी। उसके मन में कई सवाल थे। इतनी देर होती नहीं है। मेरे पति आज कहाँ रह गए? अभी तक आए क्यों नहीं?


तभी उसे दूर से किसी के चलने की आहट सुनाई दी। पर वो किसी गाड़ी या मोटरसाइकिल की आवाज़ नहीं थी। वो टप-टप की आवाज़ थी, जैसे कोई घोड़ा चल रहा हो। धीरे धीरे एक सफेद घोड़ा निकलकर आया। चांदनी रात में वो थोड़ा चमक रहा था, पर उसकी चमक में ठंडक थी। उस पर एक आदमी बिल्कुल सीधा, बिना हिले-डुले बैठा था। पर सबसे अजीब बात थी कि उस आदमी के पीछे बैठी औरत, जो सफेद कपड़ों में थी, पूंछ की ओर सिर करके बैठी थी, यानी उल्टी बैठी थी। उनके चेहरे बिल्कुल साफ़ थे। वो बिना किसी हलचल के उस सुनसान रोड से गुज़रते  चले गए। अगली सुबह वो औरत गली में रहने वाले बूढ़े चाचा के पास गई। वो घबराती हुई और डरी हुई थी। उसने बूढ़े चाचा से इस बारे में बात की। चाचा ने हुक्का पीते हुए गहरी सांस ली और कहा, “बेटी, तुमने जो देखा, वो कोई इंसान नहीं थे। वो तो समय की सवारी थी, या शायद कोई पुरानी भटकती हुई आत्मा है। इस सड़क पर बरसों पहले एक दुर्घटना हुई थी, जिसमें कहते हैं कि उन प्रेमी जोड़े की शादी की रात ही मौत हो गई थी। कहते हैं कि हर साल एक बार वो अपनी अधूरी बारात निकालते हैं। पुरानी कहानी है कि वो घोड़ा तभी रुकता है जब उसे कोई तीसरा इंसान देख ले। अब इतनी बात सुनते ही वो औरत बोलने लगी, रात के सन्नाटे में वो दृश्य किसी सपने जैसा लग रहा था। पर अब उसकी सच्चाई सुनने के बाद रौंगटे खड़े हो गए। सबसे डरावनी बात उनकी ख़ामोशी और सपाट चेहरे थे। आदमी का सीधा बैठना और औरत का उल्टा बैठना किसी जिंदा इंसान की तरह नहीं, बल्कि पुतलों जैसा दिख रहा था। चांदनी उन पर पड़ रही थी, पर उनकी कोई परछाई सड़क पर नहीं बन रही थी।” 

बूढ़े चाचा ने पूछा, “क्या उन्होंने तुम्हें देखा?” और मैंने जवाब में नहीं कहा, “बताया कि वे बिल्कुल सिधा देख रहे थे।” मैं तो उन्हें किनारे की मुंडेर से देख रही थी उनका सिर मेरी तरफ नहीं घूमा.


चाचा ने कहा, “यही तो अच्छा हुआ, जो वो रुके नहीं. इसका मतलब है उन्हें तीसरा मिल गया है.” वो आदमी सीधा इसलिए बैठा था क्योंकि उसने तुम्हें देख लिया था उसकी आँखें उल्टी बैठी औरत की आँखों में आँखों से तुम्हें घूर रही थी, लेकिन उन्हें कोई तीसरा दिख गया तो वो आगे बढ़ गए.


औरत सोच में डूबी हुई अपने घर आई। उसने कमरे में जैसे ही प्रवेश किया, उसने देखा कि उसके पलंग पर एक सफेद फूल पड़ा है। ठीक वैसा ही फूल जिसकी माला उन दोनों ने रात को पहन रखा था। उसने फूल हाथ में उठाया।  वो फूल ठंडा ही नहीं, बल्कि बर्फ़  जैसा ही था।  उस पर मिट्टी लगी थी, जैसे उसे किसी ने अभी-अभी मिट्टी से निकाला हो। 


वो दौड़ती हुई फिर बूढ़े चाचा के पास पहुंची। चाचा ने फूल देखते ही अपना सिर झटका और कहा, “बेटी, ये फूल निमंत्रण है। वो जोड़ा तुम्हें अपनी दुनिया में बुलाना चाहता है। इस फूल को घर में रखना मतलब उनकी आत्मा को घर में जगह देना है।”


चाचा ने उसे हिदायत दी कि इस फूल को तुरंत किसी बहती हुई नदी की धार में विसर्जित करना होगा, पर कुछ शर्तों के साथ। चाचा ने कहा, “इस फूल को नदी में फेंकना होगा, पर याद रहे, फेंकने के बाद पलटकर मत देखना, जब तक तुम अपने घर के दरवाज़े और अंदर नहीं पहुंच जाते।” चाहें कोई भी तुम्हारा नाम पुकारे, उन्हें तुम्हें मुड़ना नहीं है। इस काम को सूर्यास्त से पहले करना होगा, क्योंकि अंधेरा होने पर वो घोड़ा फिर निकलेगा।  जब वो औरत नदी के किनारे पहुंची, शाम का धुंधला छा रहा था, पर सूर्य अभी अस्त होना बाक़ी  था। उसने तुरंत ही फूल को नदी की धार में फेंक दिया। नदी की लहरों में उसे एक पल के लिए वही सफेद घोड़ा पानी के अंदर दौड़ता वो दिखाई दिया। वो डरकर भागी और बिना पीछे मुड़े अपने घर पहुंची। उसने चैन की सांस ली और दरवाज़ा  बंद कर दिया।


जैसे ही वो आईने के सामने खड़ी हुई, उसने देखा कि उसके अपने बालों में वही सफेद फूल लगा हुआ था, और आईने में उसके पीछे वही घोड़े पर बैठा आदमी खड़ा था, जो अब धीरे से मुस्कुरा रहा था। जब उस औरत ने आईने में उस आदमी को देखा और अपने बालों में वही फूल पाया, तो वह पहले डर से जम गई। तबी उसे बूढ़े चाचा की एक और बात याद आई, जो उन्होंने जाते जाते कही थी: “बेटी, डर तब तक है जब तक तुम कमजोर हो। अपने अंदर की शक्ति को जगाओ।” 

वो आदमी, जो घोड़े पर बैठा था, वो कोई भटकती आत्मा या शैतान नहीं था। दरअसल, वो उस इलाके का क्षेत्रपाल (रक्षक) था। बूढ़े चाचा ने बाद में समझाया कि वो हर सौ साल में एक बार ये देखने निकलते हैं कि कौन से घर सुरक्षित करना है और किसका मन सच्चा है। जो औरत उनके साथ उल्टी बैठी थी, वो कोई प्रेतनी नहीं थी, बल्कि स्मृति थी। वो दिखा रहे थे कि समय बीत जाता है, पर धर्म और कर्म वहीं रह जाते हैं। फूल उसके बालों में इसलिए नहीं आया कि उसे डराएं, बल्कि इसलिए क्योंकि उसने नदी में फूल पूरे विश्वास से विसर्जित किया। वो फूल अब एक सुरक्षा कवच बन चुका था उस घोड़े वाली औरत की। आत्मा को मुक्ति हो चुकी थी, लेकिन फिर से फूल का आना साबित कर रहा था कि सवार की आत्मा मुक्ति नहीं हुई। सवार का दिखना जैसे ही उसने हिम्मत करके आईने में देखने देखते हुए अपने मन में राम नाम का जाप किया, ईश्वर का नाम लिया, वो आदमी मुस्कुराया। उसका धुंधला  चेहरा धीरे-धीरे तेज़  प्रकाश में बदल गया। उसने देखा कि वो आईना आदमी अब घोड़े पर नहीं बल्कि आशीर्वाद देने वाली मुद्रा में बैठा था। अब उसे मुक्ति मिल चुकी थी। धीरे-धीरे वो आकृति हवा में विलीन हो गई। फूल उसके बालों से गिरकर ज़मीन पर झड़ चुका  था , पर उसमें से ठंडक नहीं गई, मंदिर के चंदन जैसी महक आ रही थी। बूढ़े चाचा ने अगले दिन उससे कहा,– “बेटी, तुमने उस परीक्षा को पार कर लिया। वो तुम्हें डर डराने नहीं बल्कि यह बताने आए थे कि तुम्हारा घर, तुम्हारे परिवार अब हर बुरी नज़र से सुरक्षित है। वह फूल का आशीर्वाद था जो सिर्फ उन्हें मिलता है जो आधे रास्ते से डरकर भागते नहीं बल्कि अपना कर्तव्य विसर्जन पूरा करते हैं।” 

उस रात के बाद उस औरत के मन में मन से पति की देरी से आने का डर और रात का सन्नाटा हमेशा के लिए खत्म हो चुका था। उसे समझ आ गया था कि ब्रह्माण्ड में हर अजीब चीज़ बुरी नहीं होती। कभी-कभी चमत्कार डटकर डर का मुखौटा पहनकर आते हैं।

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हस्तांतरण -9


25 दिसंबर 2018 की ठिठुरती ठंड में जब दिल्ली से उड़ान भरी थी तो सिर्फ जहाज नहीं बल्कि मेरे अरमान और मेरे अस्तित्व का एक हिस्सा मेरा पुत्र नचिकेता और मेरे पति प्रवीण कुमार सात समुंदर पार कर एक नई भविष्य की ओर निकल पड़े थे । मैं नोएडा के अपने घर में लौट आई थी पर मेरा मन उनके साथ ही उड़ रहा था कनाडा के वेंकूवर एयरपोर्ट पर जहाज उतर गया था।  तीन दिनों तक उन दोनों को एक होटल में रहना था।  कुछ जरूरी कामों को निपटने के बाद वे वेंकूवर बस स्टैंड पहुंचे ‘केलोना’ की टिकट खरीद कर बस में बैठ चुके थे।  यह वह मोड था जहां से नचिकेता की नई जिंदगी शुरू होनी थी अब वह ‘वेंकूवर’ से ‘केलोना’ की और पढ़ाई और सपनों को साथ लिए बढ़ रहे थे। सूरज ढल चुका था हल्की बर्फ पड़ रही थी बस धीरे-धीरे कोकिहाला हाईवे , जो दुनिया की सबसे दुर्गम हाईवे में से एक मानी जाती है, में प्रवेश कर चुकी थी इस हाई हाईवे को ‘ट्रू हेला’ भी कहा जाता है । जो अपने खतरनाक मौसम के लिए भी जाना जाता है। जैसे-जैसे बस हाय हाईवे में चलती जा रही थी बर्फीला तूफ़ान  जोर पकड़ रहा था। तूफ़ान  इतना तेज था कि बस की हेडलाइट भी सफेद अंधेरे को चीर नहीं पा रही थी । कोकिहाला पर अक्सर ऐसे तूफ़ान  आते हैं कि रास्ते बंद कर दिए जाते हैं ,पहिए थम जाते हैं और जिंदगी रूक सी जाती हैं। लेकिन उस रात रफ्तार रुकने का नाम नहीं ले रही थी। बाहर बर्फ का शोर एक अजीब सा तांडव कर रहा था। जब सब कुछ धुंधला चुका था तब भी बस धीरे-धीरे ,पर निश्चित कदमों से आगे बढ़ती रही । प्रवीण और नचिकेता अन्य मुसाफिरों के साथ अंदर बैठे बाहर के उसे खौफनाक दृश्य को देख रहे होंगे पर शायद उस समय उन्हें महसूस हो रहा था कि, कोई है, जो बस का मार्गदर्शन कर रहा है, यह वही समांतर ऊर्जा थी ,वह अदृश्य शक्ति,  जो नोएडा में बैठी एक मां की प्रार्थना से जन्मी थी। जब भौतिक संसार के रास्ते बंद होने लगते हैं तब यह अदृश्य अस्तित्व ही हमारा हाथ थाम कर हमें मंजिल तक ले जाता है । बर्फ गिर रही थी हवाएं चीख रही थी लेकिन उस तूफान के बीच भी वह बस एक सुरक्षित कवच की तरह आगे बढ़ती रही। जैसे नियति ने खुद उसके लिए रास्ता साफ कर दिया हो। साढ़े चार घंटे का वह सफर जो बर्फीली हवाओं और ठंड के साथ-साथ में गुजरा था, अब अंत की ओर था।

कोकिला हाईवे की वह दुर्गम र पीछे छूट चुकी थी और खिलौना शहर की धुंधली रोशनी अब नजरों के सामने आने लगी थी तूफान का जोर अब काम था पर रात की खामोशी गहरी थी तभी बस के सन्नाटे को तोड़ते हुए बस ड्राइवर की एक अनाउंसमेंट उद्घोषणा गूंजी उन्होंने बताया कि बस अब दो मुख्य बस स्टैंड पर रुकेगी एक पर सिटी सेंटर और दूसरा एयरपोर्ट ड्राइवर ने साफ़ कहा जो यात्री सिटी सेंटर उतरना चाहते हैं उनके गंतव्य बिल्कुल पास है यह वह जगह है जहां से शहर की शुरुआत होती है और एयरपोर्ट इस जगह से बिल्कुल उल्टी दिशा में ,विपरीत और है जिन्हें एयरपोर्ट उतरना है वह बैठे रहे जिन्हें सिटी सेंटर उतरना है तैयार रहे। प्रवीण का यह पता नहीं था कि जो होटल बुक किया है वह कि बस स्टैंड से पास पड़ेगा । उन्होंने सिटी सेंटर को शहर के पास समझ कर वही उतारने का मन बना लिया।  कोकिहाला हाई वे की उस राह फवह करने के बाद बस केलोना सिटी सेंटर के सुनसान बस स्टैंड पर जा रुकी । बाहर बर्फ का तूफ़ान था , ठिठुरती ठंडी हवाएं थी जो किसी निश्चित तीर की तरह शरीर को चीर रही थी । बस से तीन-चार परिवार और उतरे उन्हें लेने उनके परिवार के लोग कार लेकर आए हुए थे। जो तुरंत ही वहां से अपने घरों की ओर चले गए। उसे वीराने में सिर्फ दो ही लोग रह गए थे प्रवीण और नचिकेता।

उस अनजान विदेशी धरती पर रात के घोर अंधकार भरे बर्फीले तूफान में कोई टैक्सी खड़ी दिखाई नहीं दे रही थी। चारों तरफ सिर्फ बर्फ की चादर और सन्नाटा था ।  बस का 4:30 घंटे का सफर उन्हें मंजिल के मोड तक तो ले आया था , पर अब अधीर तूफान के बीच सवाल खड़ा था अब कहां और कैसे ? केलोना के उस सुनसान बस स्टैंड पर खड़े होकर जब प्रवीण ने फोन निकला तो उनको झटका लगा। कनाडा की सिम जो फोन में थी ,सिग्नल नहीं आ रहा था यानी उनकी धरती पर उनका फोन मौन हो चुका था।  सिग्नल के नाम पर सिर्फ बर्फीली हवाओं का शोर था। ना टैक्सी बुलाने का कोई जरिया, न रास्ता ढूंढने का कोई साधन लेकिन अचानक प्रवीण ने देखा कि इंडिया वाले रोमिंग सिम पर सिग्नल आ रहा था, उन्होंने मुझे फोन मिलाया प्रवीण ने कहा कि -हम खिलौना उतर चुके हैं, रात का डेड बज रहा है, लेकिन टैक्सी बुलाने का सुराग नहीं मिल रहा है ,फोन में सिग्नल नहीं आ रहा है तुमसे बात किसी तरह हो रही, है बेटे को ठंड लग रही है मैं उसे बैग खोलकर ओवरकोट उड़ा दूं फिर बात करूंगा”। अब मेरा मन बेचैन हो उठा कनाडा कि उस बर्फीली रात में प्रवीण और नचिकेता एक वीराने में खड़े थे लेकिन उनसे हजारों मील दूर नोएडा में एक कोने में मैं अपने ईश्वर से लड़ रही थी।  मैंने बिस्तर पर बैठे-बैठे ही पुकार लगाई- “हे भोलेनाथ!  मेरे बच्चे को मैंने आपकी गोद में सौंप दिया है अब यह पुत्र मेरा नहीं आपका है आप रक्षा कीजिए उसे ठंड लग रही है ,मेरे पति को होटल गंतव्य तक पहुंचाने का मार्ग दिखाएं।” मेरे पति के फोन का सिग्नल जा चुका था पर मेरे विश्वास का सिग्नल महादेव तक पहुंच रहा था ।

मैंने फिर विनती की 

‘हे प्रभु! उस अनजान देश में कोई तो रह दिखाइए बर्फीली ठंड उनके शरीर को अब छू रही है, पर उनकी तबीयत पर कोई आंच ना आए इससे पहले उनकी मंजिल तक पहुंचाने का कोई साधन भेजिए भोलेनाथ रक्षा कीजिए ।

उस पल नोएडा की उसे शांत रात में मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मैंने अपना पुत्र भोलेनाथ के चरणों में छोड़ दिया है। जब हम अपना सब कुछ उसे अदृश्य अस्तित्व पर छोड़ देते हैं तो वह शक्ति स्वयं रास्ता बनाने लगती है मैं विश्वास कर लिया था कि उसे बर्फीली तूफान में अब मेरे पति और पुत्र अकेले नहीं है उनके साथ मेरा महाकाल चल रहा है अब दोनों महादेव की गोद में है ।

मैं प्रार्थना में आधे घंटे तक बैठी रही। वह आधा घंटा मेरी प्रार्थना की पुकार और महादेव के प्रसाद का मिलन था । शायद एक फोन की घंटी बजी मैंने फोन उठाया प्रवीण की आवाज आई की टैक्सी मिल गई है, तुम चिंता मत करना हम होटल की ओर जा रहे हैं लेकिन एक अजीब सी बात हुई है । मैंने पूछा क्या?  प्रवीण फोन पर बोल रहे थे मैं सुन रही थी ,हमारे सीधे हाथ की तरफ कुछ पुरानी बिल्डिंग जैसी जगह थी जहां मुझे लगा कि शायद कोई मदद मिल जाए इस उम्मीद से मैंने बेटे को दौड़ कर उसे जगह जाने को कहा । शायद कोई गार्ड बैठा हो जाकर देखो मैं सामान के पास खड़ा हूं मैं बेटे को दौड़ते जाते देख रहा था,  बेटे ने ग्रिल खटखटाया लेकिन कोई मदद नहीं मिला । मैंने उसे पुकार कर वापस आने को कहा वह वापस आ ही रहा था।  मैंने फोन पर पूछा -फिर क्या हुआ ?

प्रवीण टैक्सी में बैठे बता रहे थे, तभी मुझे ऐसा लगा कि मेरी पीठ के पीछे कोई खड़ा है , मैंने बेटे को देखना छोड़ कर पलट कर पीछे देखा वहां मुझे एक व्यक्ति खड़ा मिला। विदेश में जिन्हें लोग होमलेस पुकारते हैं जिन्हें वहां का समाज उन्हें हसीए पर रखता है उनका घर नहीं होता बेपाको  पर मिलकर, इस तरह का कोई व्यक्ति था वह। उसे देखते ही मैंने बोला -”आप कब और कहां से आए यहां तो अभी दूर-दूर तक में और मेरे बेटे के सिवा कोई भी नहीं था क्या आप मुझे मदद करेंगे मुझे टैक्सी बुलानी है ,मेरा फोन काम नहीं कर रहा है।”  उसने प्रवीण की आंखों में देखा उनमें अजीब सी गंभीरता थी उसने एक शब्द नहीं कहा मानो उसकी जुबान की जगह आत्मा बाहर आ रही हो।  उसने बिना कुछ बोले अपना बाया हाथ उठाया और अपनी और अपनी तर्जकी से बाई और दूर चमकते टिमटिमाती रोशनी की और इशारा किया। वह बार-बार अपनी उंगलियों को खोल और बंद कर रहा था , एक ऐसा इशारा जो बिना बोले ही सब कुछ कह रहा था , उसका मतलब साफ था वहां तुम्हें तुम्हारी मंजिल मिलेगी वह होमलेस व्यक्ति वीराने में उम्मीद की किरण बनकर आया था ।

प्रवीण ने फिर पूछा वहां क्या है, उसने दो शब्द कहे ‘गैस स्टेशन’ ।  प्रवीण ने उन्हें धन्यवाद कहा और बेटे नचिकेता को कहा कि हमारे पास चार बैग हैं । दो ट्रॉली तुम उठा चलना, और दो मैं खींचता हूं । इस बर्फ पर कठिन होगा लेकिन हमारे पास कोई उपाय नहीं है। बेटे ने कहा-’ हम खींच कर गैस स्टेशन तक ले जाएंगे पापा आप चिंतित ना हो’। अब उसके इतनी बात करने के बाद, प्रवीण उस होमलेस व्यक्ति की ओर मुड़े लेकिन यह क्या हुआ वहां से वह व्यक्ति अब जा चुका था । प्रवीण ने दूर-दूर तक सफेद बर्फ पर उसे खोजा।  लेकिन वह पलक झपकते ही गायब हो चुका था। उसे मुश्किल रास्ते पर कदम बढ़ाने से पहले एक बार फिर उस होमलेस व्यक्ति के लिए कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इच्छा जागी प्रवीण । वह मुड़े उसे व्यक्ति को आखरी बार धन्यवाद कहने के लिए जिसने उसे बर्फीली रात में उन्हें उम्मीद की किरण दिखाई थी लेकिन वहां सिर्फ सन्नाटा था।  अभी कुछ ही पल पहले जो व्यक्ति वहां खड़ा तर्जरी से इशारा कर रहा था, वह अचानक मनो हवा में गुल हो गया हो।  उसे वीराने में जहां दूर-दूर तक छुपाने की कोई जगह नहीं थी,  और बर्फ की सतह पर नए पैरों के निशान तक नहीं बने थे । वह होमलेस व्यक्ति गायब हो चुका था।  प्रवीण जी हैरान रह गए थे ।प्रवीण समझ गए थे कि वह कोई साधारण इंसान नहीं था। नोएडा में बैठी मां की प्रार्थना ने उसे वीराने में महादेव के उसे अदृश्य अस्तित्व को भेज दिया था,  जो अपना काम पूरा करते ही नियति की गोद में लौट गया । नोएडा की उस तन्हाई में मैंने फोन पर प्रवीण को कुछ नहीं बताया ,मैं उन्हें कैसे समझती, मैं उन्हें कैसे समझती कि उन्हें जो टैक्सी मिली या जो वह होमलेस व्यक्ति मिला वह सिर्फ एक इत्तेफाक नहीं था मैं उन्हें कैसे बताती कि जब वह वहां बर्फ में भटक रहे थे, तब यहां उसकी मां ने उसे हमेशा के लिए अपनी ममता के आंचल से निकलकर भोलेनाथ की गोद में बैठा दिया था। यह एक त्याग नहीं विश्वास की वह पराकाष्ठा थी जहां ‘मैं’ खत्म हो जाता है और सिर्फ परमेश्वर बचे रहते हैं ।


जय भोलेनाथ की

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नया आंगन 15 


यह बात 70 साल पहले की है । उत्तराखंड का एक गांव रानीखेत के पास ,वह संयुक्त पहाड़ी परिवार, बड़ा सा आंगन, सबका साथ खाना , रहना,  बच्चों की ढेर सारी मस्ती , कुछ ऐसा ही तो था जीवन उन दोनों भाइयों का। ताई जी ,ताऊ जी, छोटी चाची और छोटे चाचा , छोटी बहन यही तो था शिव का परिवार। वक्त गुजरता गया शिव ने कब 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली पता ही नहीं चला। शिव के पिता लखनऊ में काम करते थे।  पुत्र के 12वीं पास करते ही, उसे लखनऊ बुलाया की एक नौकरी मिल रही है, तुरंत लखनऊ की ट्रेन पकड़ लो । उसे जमाने में 12वीं पास करना आज की किसी बड़ी डिग्री के बराबर माना जाता था।  शिव की मां ने बेटे को पिता के पास भेजने का मन बनाकर उसे लखनऊ की रेलगाड़ी में बैठा दिया । शिव को गए अभी 2 दिन ही हुए थे की छोटी चाची को सपना आया कि जिसमें शिव कह रहा था कि चाची जी आप मां को बता देना कि अब मैं घर कभी नहीं आ पाऊंगा, लेकिन, मैं जहां हूं वहीं ठीक हूं ।

सपने के टूटते ही चाची घबराई।  सोचा, कोई अनहोनी तो नहीं होने वाली है । उसे ज़माने में लोग सपनों को भविष्यवाणी की तरह लेते थे।  कोई फोन तो था नहीं चिट्ठी और तार का जमाना था।  चार दिनों के बाद एक तार आया जिसमें लिखा था कि हम शिव को लेकर आ रहे हैं वह अब नहीं रहा । सपने में शिव का संदेश रूहानी साबित हो रहा था।

 शिव की अंत्येष्ठि कर दी गई। घर का माहौल शब्दों में नहीं लिखा जा सकता है । जवान बेटे का जाना यह दुख क्या होता है मेरी लेखनी वर्णन करने में असमर्थ है।

 अंत्येष्ठि के बाद चाची को फिर एक सपना आया जिसमें शिव कह रहा था कि - “मैंने अपने गांव से दक्षिण दिशा की ओर बसे एक गांव में जन्म लिया है, यहां मेरा एक बड़ा भाई है । आंगन में एक भैंस बंधी है और मां-बाप जन्मोत्सव मना रहे हैं।”

चाची ने देवर को भेज कर उसे गांव में जाने के लिए पता लगाकर आने कहा । जब वे ढूंढते हुए उस दिशा में गए, तो उस गांव में सब कुछ वैसा ही मिला जैसा सपने में शिव ने बताया था। जब उस बच्चे को देवर ने देखा तो वह नवजात शिशु एकटक उन्हें देख रहा था, मानो पहचान रहा हो। वहां जन्मोत्सव मनाया जा रहा था । गुड़ बांटा जा रहा था। आंगन में भैंस बंधी थी

 यह सत्य घटना पुनर्जन्म और संयोग की बातों पर गहरा विश्वास करने को मजबूर कर देती है। चाची का सपना सिर्फ एक ख्याल नहीं बल्कि एक दिव्य संकेत निकल गया। ऐसी घटनाएं अक्सर परिवार के दुख को कम कर देती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका अपना उनसे दूर होकर भी कहीं ना कहीं आस-पास ही है ।

यह घटना पुनर्जन्म और आत्मा के अमर होने का एक बेहतरीन उदाहरण है । 1960 के दशक में ऐसी कहानी अक्सर सुनने को मिलती थी, जहां सपने और सच के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है।

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धागे का आखिरी छोर -11


1960 के दशक की दिल्ली का नक्शा ही अलग था।  वह खुले मैदान , सन्नाटे भरी सड़के और पुराने ढंग के मकान जिनमें ढेरों कमरे होते थे। ऐसी जगहों पर अक्सर पुरानी कहानियां और शक्तियों का बसेरा माना जाता है। लोधी रोड और सुजान सिंह पार्क का वह इलाका, अपनी खूबसूरत इमारतों और घने पेड़ों के लिए तब भी काफी मशहूर था। बात उन्हीं दिनों की है जब दो भाई उस इलाके में रहने आए थे। बड़ा भाई नौकरी करता था और छोटा भाई दसवीं कक्षा में स्कूल में पढ़ता था। छोटे भाई की चर्चा मोहल्ले में इसलिए भी होती थी, क्योंकि वह एक बहुत ही सुंदर, गोरा, लंबा युवक था, जिससे वह दूर से ही पहचाना जाता था। उसकी बातचीत मोहल्ले के लोगों से ज्यादा होती थी, क्योंकि वह स्कूल के बाद घर पर ही रहता और पढ़ाई करता था।  उसका बड़ा भाई सुबह काम पर निकलता तो शाम को आता, जिसके कारण मोहल्ले में पड़ोसी छोटे भाई को ज्यादा पहचानते थे।  वहां एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति रहते थे जिन्हें पूरा मोहल्ला चाचा जी कहता था, वह युवक भी उन्हें चाचा जी पुकारता था। दोनों भाइयों को वहां रहते हुए 5 महीने गुज़र चुके थे। एक दिन सुजान सिंह पार्क की वह दोपहर और उस युवक से चाचा जी का यह सवाल- बेटा आजकल तुम बहुत कमजोर दिखते हो पहले तो बहुत ही स्वस्थ लगते थे। क्या बात है? कुछ परेशानी हो तो मुझे साझा कर सकते हो।” अक्सर बुजुर्गों की नजर बहुत तेज़ होती है वह चेहरे की रंगत देखकर ही समझ जाते हैं की मन के अंदर या घर के अंदर कुछ सही नहीं चल रहा। तब उस युवक ने कहा- “ घर में सब कुछ अच्छा चल रहा है, लेकिन पिछले 3 महीने से एक बदलाव है मेरे जीवन में।  मैं रोज रात को गर्मी के कारण छत पर पढ़ने जाता हूं । लैंप लेकर जाता हूं।  वहां एक लड़की आती है , वह बहुत सुंदर है हमारी खूब बातें होती हैं। शायद किसी आसपास की बिल्डिंग में रहती होगी।  अब मेरी पढ़ाई कम और उसके साथ बातें ज्यादा होती हैं। मैं उससे मिलने की प्रतीक्षा करता हूं, लेकिन जब मेरे बड़े भाई घर पर होते हैं तब वह मेरे पास बात  करने नहीं आती है। मैं अब बहुत विचलित रहता हूं। शायद, इसलिए मैं कमजोर हो गया हूं ।”

चाचा जी खामोशी से उसकी बातें सुन रहे थे ,अचानक वह बहुत गंभीर हो गए । सुजान सिंह पार्क की वह खामोश छत,रात का समय , वह ठंडी हवा, गर्मी के दिन और लैंप की रोशनी में युवक का बिल्कुल अकेले वहां पढ़ना । दसवीं का सुंदर छात्र और अचानक किसी बहुत ही सुंदर लड़की का वहां आना। 1960 के दशक में जब दिल्ली इतनी खाली थी , तो ऐसी मुलाकातें सिर्फ इत्तेफाक नहीं लगती थी।  चाचा जी ने कहा कि मैं तुम्हें एक धागे की रील देता हूं, तुम उसे उस लड़की के पैरों से बांध देना । जो तुम्हारे लिए कठिन काम होगा । जब वह लड़की जाने लगे तो तुम धागे की रील को ढीली छोड़ते जाना।  सुबह में मैं आकर तुम्हारे साथ उस धागे के पीछे जाऊंगा। मैं देखना चाहता हूं कि वह लड़की कहां जाती है। चाचा जी का यह नुस्खा पुरानी लोक कथाओं और किस्सों में अक्सर सुनने को मिलता है। (ऐसा मुझे हल्का-हल्का याद आया जब मैं यह कहानी लिख रही हूं ) यह जानने का एक तरीका था कि जो सामने दिख रहा है वह इंसान है या कोई शक्ति ।


ढेरों सवालों के घेरे में घिरा वह युवक धागे की रील, हाथ में लिए ,अपने घर आ गया। रात हो चुकी थी उसे अब छत पर उस सुंदर लड़की के आने का इंतजार था। नियत समय पर वह लड़की आ गई । आज युवक के लिए मानो माहौल पहले से ही थमा हुआ था।  लैंप की हल्की पीली रोशनी में वह लड़की छत की मुंडेर पर बैठी थी और उसके पैर नीचे की तरफ लटक रहे थे, ठीक उस युवक के मेज के पास। वह युवक जिसका दिल जोरों से धड़क रहा था, धीरे-धीरे बातों में उसे उलझाए हुए था। चाचा जी का दिया हुआ वह धागा उसकी जेब में भारी महसूस हो रहा था। उसने बड़ी ही होशियारी से बातों-बातों में रील से धागे का एक सिरा निकाला और लड़की के टक्नो (एंकल) में लपेट दिया। लड़की अपनी धुन में बातें कर रही थी ,शायद चांदनी या उस पुराने मोहल्ले की खामोशी के बारे में।  लड़के ने पूरी सफलता से धागे का दूसरा सिरा अपने जेब में रख लिया। वह पैरों में धागा लपेट रहा था तो लड़के के पैरों के पास की हवा अजीब सी ठंडी थी बिल्कुल बर्फ जैसी।  उसने अभी धागा बांधा ही था कि नीचे से बड़े भैया ने आवाज़ लगाई। अब वह लड़की भी अचानक जाने के लिए बेचैन हो गई जैसे परिंदे अपने घोसलों की ओर जाने के लिए होते हैं । युवक ने उसे जाने दिया वह आगे-आगे जा रही थी और युवक जेब में रखा रील से धागा खोलते जा रहा था । रील का एक सिरा लड़की के पांव में और दूसरा सिरा युवक की जेब में। वह लड़की काफ़ी तेज़ कदमों से आगे चलती जा रही थी और युवक उतनी ही तेजी से रील ढीली करता जा रहा था । कुछ समय बाद रील का खुलना अचानक बंद हो गया। युवक ने देखा रील अभी खत्म होने में कुछ धागा बचा हुआ था।  उसने रील को वहीं छत पर छोड़ा और नीचे घर चला गया। 


 अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण सुजान सिंह पार्क की गलियों में बिखरी तो युवक सबसे पहले उस रील को देखने छत पर गया।  वह धागे की रील इस तरह पड़ी थी जैसे उसने छोड़ा था। फिर वह दौड़कर चाचा जी के पास उनको बुलाने गया।  चाचा जी ने उसकी सारी बात सुनी और फिर उसे युवक के साथ धागे के पीछे-पीछे चलने लगे।  चलते-चलते वह धागा एक शमशान घाट पर जाकर खत्म हो गया। उस अंतिम सिरे पर एक इंसानी हड्डी बंधी थी। चाचा जी ने उस हड्डी को धागे से खोला और वही जला दिया। उस हड्डी की राख को शमशान घाट की मिट्टी में मिला दिया। अब सारा राज़ खुल चुका था। रहस्य एक पल में साफ़ हो गया था। वह सुंदर लड़की कोई साधारण साया नहीं बल्कि एक ऐसी भटकती आत्मा थी जो अपनी अधूरी अंतिम क्रिया या किसी बंधन की वजह से भटक रही थी। चाचा जी के धैर्य और समझदारी से मानो उस पूरे इलाके की हवा से एक भारीपन खत्म हो गया।  चाचा जी ने उसे युवक का थरथराता हुआ हाथ पकड़ा, उसकी आंखों में देखा और बड़ी गंभीरता से कहा - “बेटा आज से तुम्हारी बेचैनी खत्म हुई। वह लड़की तुम्हारी ऊर्जा सोख रही थी, लेकिन वह तुम्हारा बुरा नहीं चाहती थी। बस वह मुक्ति का रास्ता ढूंढ रही थी । उसने तुम्हें चुना क्योंकि तुम्हारा मन साफ़ था और तुमने उससे बिना डरे दोस्ती की । अब वह शांति में है और तुम्हारा स्वास्थ्य भी अब धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा। उस दिन के बाद सुजान सिंह पार्क के उसे मोहल्ले की उस छत पर कभी वह लड़की नज़र नहीं आई । वह लैंप की रोशनी में पढ़ने वाला छात्र अब सुकून से अपनी दसवीं की तैयारी में लगा था।

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संजीव स्वप्न 12


 बगवाली उत्तराखंड की धरती और रानीखेत के पास, पोखर  का एक गांव, पहाड़ों की गोद में बसा, खूबसूरत गांव….. जहां की मिट्टी में आज भी पुरानी कथाओं की महक है जो हमें ताज़गी से भर देता है । दादी बताती थी कि ‘बगवाली पोखर’ नाम जुड़ा है प्रकृति से जहां कभी बाग पानी पीने आया करते थे।

 दादी कहती थी कि जब शाम के समय सूरज की लालिमा पहाड़ों की चोटी पर ठहरती थी, तब बगवाली पोखर के खेत सिर्फ अनाज नहीं उगलते थे ,बल्कि पोखरों की आशीर्वाद भरी कहानी सुनाते थे। वहां की ठंडी हवाओं में जब ‘घुघुती पहाड़ी पक्षी’ बोलता था तो ऐसा लगता था जैसे वक्त थम गया हो और हम वापस उस दौर में पहुंच गए हो जहां, हर त्यौहार, हर रीति रिवाज़ एक गहरा अर्थ रखता था। मुझे वह वह घुघुती लोकगीत एक पक्षी के माध्यम से अपनों की याद की मिट्टी से जुड़ाव को दर्शा गया।

 “ओ घुघुटी बासुति बासुति रे…..

 घुघुती भाषी री भाषी री,”

अर्थ: ओ घुघुती पक्षी, तू मत बोल, तेरी आवाज़ सुनकर मुझे मेरे गांव की याद आती है)

 “भैं बाणों की याद में, आंखि मेरी आसुती।

 घर आ जा ओ बोज्यू, हिट हम घर जां।” 

भाई बहनों की याद में मेरी आंखों में आंसू भर आए हैं

 ओ पिता जी, आप आ जाइए ,चलिए हम अपने घर चलते।

( विवाहित बेटी और मायके का प्रेम)

 “आमें कि डाली मां घुघुती ना बाशा 

 घुघुती ना बाशा

 घुघुती ना बाशा

 तेरी घुरु घुरु सुड़ी में लागू उदासा,

 घुघुती ना बाशा , घुघुती ना बाशा”

आज भी जब चैत (बसंत) का महीना आता है और बुरांश के फूल खिलते हैं, तब पहाड़ों में घुघुती पक्षी बोलना शुरू करता है । उसकी सुरीली, पर थोड़ी उदास आवाज़ मुझे मायके की याद दिलाती है। मानो वह पक्षी कह रहा हो की चैत की चैतवाली है, मायके जाने का वक्त हो गया।

 घुघुती की आवाज़ ,मुझे मेरे बचपन , मेरी मां की ममता और भाइयों के साथ बिताए समय की याद दिलाती है। उत्तराखंड का ‘घुघुती पक्षी’ ,केवल एक पक्षी नहीं बल्कि मायके की याद और पहाड़ों की सादगी का प्रतीक है। यह लोक गीत मुझे आज भी मुझे मेरे जड़ों से जोड़ रखे हैं।

          यादों के झरोखों से 1960 के दशक की वह घटना याद आती है, जब समय आज की तरह भागता नहीं था,बल्कि ठहर कर मुस्कुराता था।  उत्तराखंड , रानीखेत के पास का वह शांत गांव ‘बाघवाली पोखर’ जहां न धुआ था ना शोर , वहां मेरी यादों का बसेरा है। मुझे याद है मैं छठी कक्षा में पढ़ती थी और मां उन दिनों मुझे लेकर दादी के घर रहने चली आई थी । जहां पोखर के चारों ओर घने पेड़ों की छाया होती थी और पानी इतना साफ़ की उसमें आसमान का नीलापन साफ झलकता था। वह दृश्य आज के प्रदूषण भरे माहौल से कोसों दूर प्रकृति का शुद्ध उपहार था। सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही मन की दिनचर्या शुरू हो जाती । दादी के घर की जिम्मेदारियां और खेतों का काम मां सब कुछ बड़ी सहजता से संभालती थी । 

जब ओस की बूंदें ,घास पर चमक रही होती , मां सर पर टोकरी रखे पास के जंगलों में निकल जाती थी।  सुखी लड़कियां बिनती, काटती ताकि घर का चूल्हा जल सके। लकड़ियां लाने के बाद, वह दादी के लहलहाते सीढ़ीनुमा खेतों को देखने जाती।  मिट्टी की वह सोंधी खुशबू और बिना रसायन के उगती फसलें, उस दौर की असली संपन्नता थी।

              शाम होते ही जब सूरज पहाड़ी या पेड़ों के पीछे छुप जाता और लालिमा छा जाती, तब हम बिस्तर पर सिमट जाते थे। उस दौर में मनोरंजन के साधन नहीं थे, बस अपनों का साथ था।  मां हमें सुलाने के लिए कोई बनावटी लोरी नहीं गाती थी, बल्कि वह अपनी यादों और कल्पनाओं से बनी कहानी सुनाती थी। उनकी आवाज़ में एक ऐसा जादू था ,कि जंगल पोखर पहाड़ों की उन कहानियों को सुनते-सुनते कब हमारी पलकें भारी हो जाती, हमें पता नहीं चलता था।  वह कहानीयां ही थी, जिन्होंने हमें प्रकृति से प्यार करना सिखाया ।

    गोद में मां की, बाघवाली पोखर,

    जहां सुकून था, ना था कोई डर ।

    बिना धुएं की वह सुबह,

    वह खेतों की क्यारी ।

    याद आती है आज भी,

    वह बचपन की सवारी ।

    लोरी की जगह मां की,

    कहानियों का वह मेला ।

    सो जाते थे हम सुनकर,

    देख यादों का झमेला ।


लेकिन उस रात मां ने मुझे गहरी, मार्मिक और पहाड़ों के पुराने रीति-रिवाज़ से जुड़ी हुई एक दर्दनाक हकीकत को बताया, जो उनकी आप बीती थी, कोई सुनी सुनाई कहानी नहीं । सदियों उन्होंने मुझे अपनी लोरी, लोककथा नहीं बल्कि उनकी जिंदगी का वह सच सुनाया जो उनके दिल में हमेशा के लिए दफ़न था।

                       उस रात जब आसमान में तारे चमक रहे थे और चारों तरफ सन्नाटा था, मां की आवाज़ में अजीब सा भारीपन था और उनकी आंखें दूर कहीं यादों के धुंधलके में खोई हुई थी।  वह एक ऐसा कड़वा सच था जिसे मां ने अपनी जिंदगी में झेला था ,जो आज भी उनके सीने में एक टीस बनकर दबा हुआ था । 

           मां बताने लगी कि मेरे बाद मेरा एक छोटा भाई था । वह बहुत ही प्यारा और मासूम था। उसकी उम्र मुश्किल से दो या तीन साल की रही होगी । वह पूरे घर की जान था, लेकिन शायद किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। अचानक एक रात उसकी तबीयत बहुत खराब हुई और इससे पहले की कोई समझ पाता वह इस दुनिया से चला गया। उस समय मां का जो हाल हुआ उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। 

        हमारे पहाड़ों में एक पुरानी और कड़ी परंपरा थी।  जिन बच्चों का (उपनयन संस्कार) ‘जनेऊ’ नहीं हुआ होता था, उन्हें मृत्यु के बाद जलाया नहीं जाता था ,बल्कि धरती माता की गोद में दफनाया जाता था।  यह माना जाता था कि मासूम बच्चे जो अभी दुनिया की बुराइयों से अनछुए हैं, सीधे धरती माता में समा जाते हैं । क्योंकि परंपराओं के अनुसार,  महिलाएं शमशान घाट या दफन स्थल तक नहीं जाती थी, इसलिए घर के पुरुष सदस्य ही मेरे छोटे भाई को लेकर गए। मां को पता नहीं था उसे कहां दफनाया गया है।  उनके लिए वह बस कहीं दूर चला गया था।  धीरे-धीरे वक्त बीतता गया । समय हर घाव को भर देता है, और मां ने भी खुद को संभाल लिया था।  उनका जीवन फिर से सामान्य पटरी पर लौट आया था । वह घर के कामों में, खेतों में और अपनी जिम्मेदारियां में व्यस्त हो गई थीं ।  उन्हें लगा कि उन्होंने उस हादसे को पीछे छोड़ दिया है। 

 लेकिन, नियति ने एक नया मोड़ ले रखा था । एक सुबह जब , पौ भी नहीं फटी थी, हल्की धुंधलका छाया था, मां लकड़ी काटने और चुनने जंगल की ओर चल पड़ी थी।  वह एक सुनसान पगडंडी पर चली जा रही थी। पगडंडी के काफ़ी नीचे एक सूखा नाला था और उसके किनारे ज़मीन थी । मां ने नीचे नल की ओर देखा क्योंकि उन्हें वहां से बहुत सारे बच्चों के खेलने की आवाज़ सुनाई थी । उन्होंने देखा कि नाले के बगल की खुली जमीन पर कई बच्चे खेल रहे हैं । मन हैरान थी कि उस सुनसान सुखी जगह पर इतने सारे बच्चे कहां से आ गए । और सुबह-सुबह अचानक उन आवाजों में अपने बेटे की हंसी सुनाई दी,  उन्होंने देखा कि उनका बेटा भी वहां खेल रहा है, जो अब दुनिया में नहीं है । मां उसे वहां देखकर समझ गई कि यह उनकी कोई कोरी कल्पना नहीं है ,यह सच्चाई है ,जो दिख रही है।  लेकिन उन्हें यह स्थिति रहस्यमई लग रही थी, क्योंकि वह बेटा जो अब इस दुनिया में नहीं रहा, तो खेल कैसे सकता है। अब उनकी आंखों को भ्रम का आभास हो रहा था।  फिर भी अपने पुत्र को देखकर उसकी खिलखिलाहट सुनकर वह सुद बुद खो बैठी।  ना  उन्हें पहाड़ की ढलान का डर रहा, ना गहरी खाइयों का। वह पहाड़ के उन खतरनाक मोड़ों से उतरते हुए, नीचे ढलान को पार कर, सुखे नाले के उस पर जा रही थी । रास्ता आसान नहीं था।  उबड़-खाबड़ पगडंडियां,  कुंटीली झाड़ियां और वह सुख और वीरान नाला।  मां एक पागलपन की हद तक जाक,र उसे समतल खुली ज़मीन पर जा पहुंची, जहां बच्चे खेल रहे थे।  वह मन ही मां चिल्ला रही थी, मेरा बच्चा वही है वहां खेल रहा है, मैं उसे अभी अपनी गोद में उठा लूंगी।

 लेकिन जैसे ही मां के कदम उस मिट्टी पर पड़े। सब कुछ एकाएक थम गया। एक पल पहले जो जगह बच्चों के शोर से गूंज रही थी । वहां अब केवल हवाओं की सांय -सांय की आवाज थी।  मां ने पागलों की तरह हर झाड़ी के पीछे, हर पत्थर के पास, अपने बच्चों को ढूंढा ,पर वहां कोई नहीं था……सिर्फ कच्ची मिट्टी की ढेरियां थी और उन पर उगी घास।

   मां बदहवास हालात में वापस घर की ओर लौट पड़ी। अपने परिवार में सारी बात बताइ।  यह बात अब गांव में आग की तरह फैल गई।  गांव के लोग आ गए।  कहने लगे  कि , बेटे को खोने के सदमे ने उनके मन पर असर कर दिया है। और यह तो उसी जगह की बात बता रही है , जो बच्चों का शमशान है । कहीं इन्हें बच्चों की आत्मा तो दिखाई नहीं दी ? लेकिन हम गांव वाले उस तरफ़ से जंगल नहीं जाते, तुम भी उस रास्ते को छोड़ दो।

                 अक्सर जिसे दुनिया अंधविश्वास या भ्रम कहती है । वह किसी के गहरे दुख और अटूट प्रेम की अभिव्यक्ति होती है । मां का उस खतरनाक जगह तक पहुंचना ,उनके साहस और ….doubt…. मृत्यु भी नहीं तोड़ पाई।

 संसार की दृष्टि अक्सर वही तक सीमित रह जाती है जहां तक तर्क की सीमाएं समाप्त होती है । विज्ञान के तटस्थ चक्षुओं से देखा जाए तो वह दृश्य मात्र एक ‘मृग तृष्णा’ या मन का भ्रम था, जो गहरे शोक और अपूर्ण ममता की कोख से जन्मा था। एक ऐसी मां जिसने अपने कलेजे के टुकड़े को समय से पूर्व ,नियति के हाथों सौंप दिया उसका मस्तिष्क शायद उसे इस रिक्तता को भरने के लिए उन खिलखिलाहटों का सृजन कर रहा था।

          किंतु क्या ममता कभी केवल तर्क की मोहताज रहती है । मां का वह अनुभव कोई मानसिक विक्षेप नहीं, बल्कि उनके प्रेम का वह ‘अटूट विश्वास’ था जो काल और मृत्यु की सीमाओं को लांग चुका था।  जहां संसार को केवल सूखा नाला और वीरान पड़ी जमीन दिखाई देती थी, वहां मां को अपने उस नन्हें पुत्र का स्पंदन महसूस हुआ। उनके लिए वह सत्य किसी भी वैज्ञानिक प्रमाण से कहीं अधिक जीवंत और प्रखर रहा था।  मैं अपनी मां की उस अनुभूति को सम्मान स्वीकार करती हूं । मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि जब हृदय का प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर होता है तो वह सामान्य नेत्रों से परे देख पाने में सक्षम हो जाता है। मां को उस दिन जो दिखाई दिया, वह कोई माया नहीं थी।  वह उनकी दिव्य दिव्य दृष्टि (दिव्य चक्षु) थे , जिन्होंने उस अदृश्य लोक के द्वार खोल दिए । जहां वह मासूम आत्मा आज भी निष्पाप क्रीडा कर रही थी

           विज्ञान जिसे ‘भ्रम’ कहकर नकार देता है, आध्यात्मिक और प्रेम उसे ‘साक्षात्कार’  कहता है।  मां के लिए अपने बेटे का वह अंतिम और पावन दर्शन था, जिन्हें उन्होंने अपनी आत्मा की गहराई में सहेज लिया था। जहां तर्क की सीढ़ियां थक कर रुक जाती हैं,वहीं से ममता के विश्वास का आकाश आरंभ होता है।

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अंतहीन यात्रा 19 

सामने कांच के गिलास में रखा पानी हिल रहा था और उसके साथ ही हिल रही थी ,75 साल की सुभद्रा देवी की रूह । जो हाथ कभी आशीर्वाद देते नहीं थकते थे, आज वही हाथ में अंधाधुंध लहरा रहे थे।  ‘दूर करो इसे’ यह पानी मुझे निकल जाएगा…. तुम सब मिले हुए हो उसेसे! उनकी चीख में एक ऐसी हिंसक गलियों की बौछार थी, जो इस घर की दीवारों ने पहले कभी नहीं सुनी थी। साफ़ सुथरी रहने वाली, सुभद्रा जी के शरीर को पिछले कुछ दिनों से पानी की एक बूंद नहीं छु पाई थी। सुभद्रा जी के इस रूप के पीछे कोई बीमारी नहीं थी, बल्कि एक अदृश्य अस्तित्व था जो पिछले जन्म के किसी गहरे अनसुलझे रहस्य की गवाही दे रहा था ।

वह पानी को देख भी नहीं सकती थी। गर्मी से राहत के लिए वह स्नान करना चाहती थी, पर जैसे ही वे पानी के सामने आती, वह चिल्लाने लगती। उनकी नींद गायब हो चुकी थी। सारे बड़े डॉक्टर और साइकोलॉजिस्ट टेस्ट परिणाम रहित थे। एम आर आई, सी.टी. स्कैन और काउंसलिंग का कोई असर नहीं हो रहा था । घर वाले टूट चुके थे क्योंकि सुभद्रा जी की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। उनका वह गुस्सा वाला रूप और पानी से वह दहशत सबके लिए एक पहेली बन चुकी थी। 

          तभी परिवार के एक पुराने मित्र ने सुजोक थेरेपी के बारे में सुझाव दिया।  स यानी हाथ, जोक यानी पैर।  सुजोक एक ऐसी विधि है जो शरीर के ऊर्जा केंद्रों पर काम करती है । विशेषज्ञ ने दादी के हाथों और पैरों के पॉइंट को देखकर कहा, यह सिर्फ शारीरिक नहीं है यह कर्म और पूर्व जन्म की ‘कोशिकीय याद’ का हिस्सा है।  उनके मन में पानी का एक गहरा ट्राॅमा बैठा है, जो अब उनकी ऊर्जा को बाधित कर रहा है । थैरेपिस्ट ने सुभद्रा जी के अंगूठे और हथेलियां पर छोटे-छोटे बीज और सूईयों का प्रयोग करना शुरू किया। जैसे-जैसे उन पॉइंट पर दबाव पड़ा उन्हें धीरे-धीरे दृश्य दिखने लगे। दृश्य थे, कि पिछले जन्म की, वह घटना जहां पानी उनके लिए काल बन गया था। सुजोक थेरेपी द्वारा उनकी ऊर्जा प्रवाह को ठीक किया गया, ताकि वह उस पुराने डर से पीछा छुड़ा सके।  थेरेपी के कुछ दिनों के बाद सुभद्रा जी की गलियां कम होने लगी । उनकी आंखों में वह पुराना गुस्सा अब धीरे-धीरे स्वयं आंसुओं में बदल रहा था।  एक दिन उन्होंने स्वयं पानी का एक गिलास उठाया और बिना चिल्लाए सिर्फ़ देखा। यह परिवार के लिए एक चमत्कार जैसा था।  दवा सिर्फ शरीर को ठीक करती है लेकिन सुजोक उस ऊर्जा को छू सकता है जो जन्मों से अटकी हुई है।  सुभद्रा जी का पानी से डर सिर्फ़ एक डर नहीं था बल्कि उनकी आत्मा की एक पुरानी चीख थी।  प्रश्न यह उठता है कि क्या एक छोटा सा बीज और हाथ के पॉइंट्स इतने गहरे पूर्व जन्म के जख्मों को भर सकते हैं।              

           सुजोक थेरेपी के निरंतर प्रयासों से सुभद्रा जी के शरीर और सूक्ष्म मन के वह ब्लॉक्स खुल चुके थे, जो पिछले जन्म के आघात को पकड़े थे।  हथेलियां और उंगलियों पर पड़े वो छोटे-छोटे बीज और दबाव उनके भीतर कि उस दबी हुई चीख को शांत कर चुके थे । अब जब वह सुबह उठती ,तो उनकी आंखों में पानी के प्रति वह भयानक गुस्सा और गालियां नहीं होती थी ,बल्कि चिर-परिचित ममतामयी मुस्कान होती थी। एक दिन सुबह बिना किसी शोर या डर के वह धीरे-धीरे बाथरूम की तरफ बढ़ी ।  पूरा परिवार सहम गया, कि कहीं फिर से वही चीख ना गूंज उठे, लेकिन इस बार इतिहास नहीं एक नया जीवन लिखा जा रहा था। बाल्टी में गिरती पानी की बूंद की आवाज़ ,अब उन्हें डरा नहीं रही थी ,बल्कि संगीतमयी लग रही थी। उन्होंने पानी में हाथ डाले और शीतलता को महसूस किया और फिर पूरे 2 घंटे तक पानी के उस एहसास में डूबी रही।  वह पानी को सिर्फ छू नहीं रही थी ,बल्कि जैसे पिछले जन्म के उस अधूरे दर्द को धो रही थी। जब सुभद्रा जी ने अपने सिर पर पानी डाला, तो वह सिर्फ़ नहाना नहीं था, वह एक शुद्धिकरण था।  पानी की हर बूंद के साथ उनके पिछले जन्म का वह दृश्य और भयानक अस्तित्व बह गया । जब वह बाहर आई तो उनके भीगे बाल और शांत चेहरा देखकर परिवार की आंखों में आंसू आ गए।  वह 2 घंटे सिर्फ़ पानी में बिताना नहीं था ,बल्कि सुभद्रा जी का अपनी आत्मा के एक हिस्से से दोबारा जुड़ना था । जिस पानी को देखकर वह कांप उठती थी, आज उसी पानी की लहरों में उन्हें एक असीम शांति मिल रही थी । जब उन्होंने अपने सिर पर पानी डाला तो लगा जैसे बरसों का कोई भारी बोझ बह गया हो। 

              पानी से भयानक नफ़रत और डर से लेकर पानी से मित्रता तक का यह सफर, किसी दैवीय कृपा से कम नहीं था।  सुजोक चिकित्सा ने सिर्फ उनके शरीर के बिंदुओं को नहीं छुआ था बल्कि उस अदृश्य डोर को सुलझा दिया था, जो उन्हें अतीत के दर्द से बांधे हुए थी।  आज सुभद्रा जी मुक्त थी और उनके चेहरे की चमक गवाही दे रही थी, की प्रकृति कभी किसी की दुश्मन नहीं होती।  बस हमें उससे जुड़ने का सही मार्ग ढूंढना होता है। 

 पानी की हर गिरती बूंद के साथ अतीत का वह अदृश्य अस्तित्व बह चुका था।  75 वर्ष की उम्र में पानी से उस भयानक डर से लेकर उस अटूट मित्रता तक का सफ़र सिर्फ़ एक इलाज नहीं, बल्कि भटके हुए अस्तित्व को मिली एक दैवीय कृपा थी।  जब सुभद्रा जी ने अपने भीगे बालों को समेटा और पोते के हाथ से पानी का गिलास लिया तो लगा , जैसे प्रकृति में स्वयं मुस्कुरा कर कहा हो -घाव चाहे जितने पुराने या पिछले जन्म के हो अगर सही राह मिल जाए तो प्रेम और सुकून की विदाई कभी नहीं होती। वह दो घंटा पानी के साए में बिताना इस बात का सबूत था की बंदिशें चाहे कितनी भी अदृश्य और गहरी क्यों ना, हो भीतर की चेतना और सही उपचार से हर डर को एक खूबसूरत मित्रता में बदला जा सकता है‌।

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एक अलौकिक भेंट 18 

बात 2011 की है, जब भंडारी, दंपति, जीवंती, अंजू दीदी और उनकी बेटी निशा दीदी, ऑफिस के मदन जी और दीवान सिंह, इन सात लोगों ने मिलकर वैष्णव देवी माता के दर्शन करने जाने के लिए, दिल्ली से बस में टिकट बुक करवा लिया था। 

अक्सर यह कहा जाता है कि जब माता का बुलावा आता है, तभी दर्शन संभव होते हैं । दिल्ली से कटरा तक का वह बस का सफर, जहां रास्ते भर भजन और बातों का सिलसिला चलता रहा। 

      श्रद्धा का धागा, विश्वास की बातें,

      बस में गुजरी,वह सुहानी रातें ,

      सात लोगों का वह एक साथ होना, 

      भक्ति के रंग में खुद को भिगोना,

      जीवंती दीदी और भंडारी, दंपति का साथ,

      मदन जी और दीवान सिंह की मीठी बात। 

      दिल्ली से कटरा का वह लंबा रास्ता,

      माता से जुड़ा था हर किसी का वास्ता।  


कटरा की ठंडक और सुबह की वह पहली किरण, यात्रा के उत्साह को दुगना कर रही थी । धर्मशाला में विश्राम के बाद स्नान करने अब सभी उस लंबी चढ़ाई के लिए तैयार थे। यात्रा की शुरुआत में ही ,टिकट काउंटर की भीड़ और फिर माता के दर्शनों की वह पहले दहलीज़ चरण पादुका का अलग ही महत्व है । माना जाता है, की माता ने यहां रुक कर, पीछे मुड़कर देखा था और उनके चरणों के निशान आज भी उस भक्ति को जीवंत रखते हैं। सबने वहां शीश झुकाए और माता की आशीष और कृपा पाकर आगे की चढ़ाई के लिए सभी प्रस्थान किए। अब अगला पड़ाव बाणगंगा का आया।  बाणगंगा में भक्ति स्नान करके आगे बढ़ते हैं । बाणगंगा ,त्रिकूट पर्वत की तलहटी में स्थित, एक पवित्र नदी है । पौराणिक कथाओं के अनुसार जब माता वैष्णो देवी , अपने गुप्त वास की ओर जा रही थी ,तब उनके साथ जा रहे वीर हनुमान को प्यास लगी । उनकी प्यास बुझाने के लिए माता ने धरती पर बाण तीर चलाया जिससे जल की धारा फूट पड़ी।  इसलिए इसका नाम बाणगंगा पड़ गया। 

चरण पादुका से चले जब आया एक पावन तट,

जहां बहती है कृपा की धारा खुलती मन के पट।

 पहाड़ों की गोद से निकली वह शीतल निर्मल धार 

 बाण से जनमी गंगा ने किया सबका उद्धार ।


बाणगंगा के बाद, सबके कदम अर्धकुमारी की ओर बढ़ रहे थे । पहाड़ों की टेढ़ी-मेढ़ी चढ़ाई पर, हर कोई एक ही धुन में मग्न था -चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है। पूरे रास्ते जयकार की गूंज इतनी प्रबल थी कि पैरों की थकान का एहसास ही नहीं हो रहा था। 

लेकिन असली परीक्षा तो अर्धकुमारी पहुंच कर शुरू हुई। वहां भक्तों का एक समुंदर उमड़ा हुआ था । चहल-पहल ऐसी की पैर रखने की जगह नहीं ।भंडारी जी, मदन जी और  दीवान सिंह जी ने भीड़ का मुआयना किया और दर्शन की लाइन में टिकट लेने लग गए । अंजू दीदी, उनकी देवरानी, बेटी और श्रीमती भंडारी- किनारे बैठ गए और विश्राम करने लगे। तीन-चार घंटे तक उस लंबी कतार में खड़े रहने के बाद,  जब टिकट मिला तो ,अर्धकुमारी के दर्शन का टिकट तीन दिन बाद का था। इन तीनों के होश उड़ गए। दीवान सिंह ने पूछा कि - “तीन दिनों तक हमारा सामान जो साथ है कहां रखेंगे?”  वहां से सपाट सा जवाब आया- “सामान का क्या है, जब तीसरे दिन दर्शन के लिए आना तब ही सामान भी रखेंगे, तब तक अपना सामान स्वयं देखिए और कहीं भी बैठ जाइए।”  यह सुनते ही सभी सात जो ग्रुप में थे- “तीन दिनों तक सामान के साथ वही बसेरा?”  सभी एक दूसरे का मुंह देखने लगे । अब तो सामान की चौकीदारी और प्रतिक्षा दोनों करनी थी ,वह भी तीन दिनों तक।  सभी आपस में कहने लगे की -माता रानी हमारी भक्ति के साथ-साथ हमारे सब्र की भी परीक्षा ले रही हैं । देवरानी अपनी बेटी को अर्धकुमारी कि महत्व को बताने लगी। अर्धकुमारी में माता वैष्णव देवी ने, यहां की गुफा में 9 महीने तक, तपस्या की थी, ठीक वैसे ही जैसे शिशु माता के गर्भ में 9 महीने रहता है। गुफा को गरम गुफा भी कहते हैं। 

अब सभी सात अर्धकुमारी के उस पथरीली किनारे पर अपना बिस्तर जमा चुके थे । तीन दिन का लंबा इंतजार, किसी पहाड़ जैसा सामने खड़ा था। थकान के कारण कुछ की आंख लग गई थी, लेकिन भंडारी, दंपति जगे हुए थे।  तभी भीड़ को चीरते हुए बूढ़ी औरत उनके पास आकर खड़ी हो गई । उसका हुलिया बड़ा अजीब था । मैले-कुचैले गंदे से कपड़े , चेहरे पर झुरीयां का जाल और हैरत की बात, उसके ऊपर मक्खियों भिन्न भिन्ना रही थी । उसने हाथ में एक पुराना सा कमंडल ले रखा था। उस कमंडल में माता रानी की छोटी-छोटी चुनिया फंसी हुई थी। वह जगे हुए भंडारी दंपति के पास आई। उसकी आंखों की चमक, उसके गंदे लिबास से मेल नहीं खा रही थी। उसने पूछा- “क्या मैं यहां बैठ जाऊं ?”  उसने रुक-रुक कर अपनी थरथराती आवाज़ में पूछा -”तुम लोग पहली बार वैष्णव देवी आई हो?” उसकी आंखों में एक ऐसी गहराई थी, जैसे वह उनके जवाब से पहले  उनकी दशा जानती हो।  श्रीमती भंडारी ने कहा-”माता मैं तो कई बार आई हूं,  मेरे पति पहली बार आए हैं । हमने तो सोचा था दर्शन करके निकल जाएंगे, पर यहां तो तीन दिन की लाइन है। नंबर तीन दिन बाद आएगा, अब तीन दिन तक सामान के साथ गुज़ारा करना है।  कैसे होगा?  हमारी वापसी की ट्रेन भी छूट जाएगी!  ये लोग सामान भी जमा नहीं ले रहे हैं!”  श्रीमती भंडारी एक ही सांस में सारी परेशानी उस बुढ़ि माता से साझा कर गई। वह बुढ़ी ,मुस्कुराते हुए, सारी बात सुन रही थी।  सारी बातें सुनने के बाद, उसने कहा - “सुनो तुम लोग एक बार फिर जाओ,  अब वह तुम्हारा सामान जरूर रख लेंगे। ” भंडारी जी ने असहज होते हुए कहा - “माता आप बात नहीं समझ रही है हमने बहुत बार प्रयास किया है, वह साफ़ मना कर रहे हैं । अब फिर जाना अपना मजाक बनाना होगा।”  उस बूढ़ी औरत की आंखों में एक दृढ़ता थी। उसने विश्वास दिलाते हुए कहा - “इस बार मना नहीं करेंगे।” 

भंडारी जी उस बुज़ुर्ग महिला की बातों का सम्मान करते हुए।  फिर काउंटर पर गए।  वही काउंटर,वही व्यक्ति, लेकिन जैसे ही भंडारी जी वहां पहुंचे, उसने बिना एक शब्द बोले , बिना कोई सवाल किए, एक-एक कर सारा सामान रख लिया । यह तो एक चमत्कार था। 

भंडारी जी, बूढ़ी माता को धन्यवाद देते हुए कहने लगे, अब तीन दिनों तक हमें यही प्रतीक्षा करनी होगी।  आपके बोलने से हमारा सामान रख लिया गया है। उनके मन में प्रतिक्षा कि चिंता थी। अचानक भीड़ को चीरता हुआ, एक सरदार जी दौड़ता हुआ भंडारी जी के पास आया।  आते ही, उसने कहा- “हमें किसी कारण से वापस जाना पड़ रहा है, हमारे पास सात टिकटें अर्धकुमारी की हैं ,जिसका नंबर अभी का ही है। आप लेंगे?  अभी-अभी आपके दर्शन हो जाएंगे!”      

              अभी कुछ देर पहले जहांँ तीन दिन का अंधेरा था, वहां अचानक दर्शन की रोशनी दिखाई देने लगी। सभी खुशी से झूम उठे। भंडारी जी के हाथ में जब वह सात टिकट आए, तो उनकी आंखों में कृतज्ञता के आंसू आ गए।  उन्हें लगा कि यह जब से यह  बुढ़ी बुज़ुर्ग आई है, तब से सारे बिगड़े काम बनते जा रहे हैं। उन्होंने पीछे खड़ी उस बुज़ुर्ग की ओर मुड़कर, उन्हें धन्यवाद देना चाहा, लेकिन उनके शब्द अधूरे ही रह गए । जैसे ही, उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो वह मैली-कुचैली औरत वहां थी ही नहीं। वह कहीं भी नजर नहीं आ रही थी।  वह कहीं अदृश्य हो चुकी थी। उस भीड़ के अंदर भंडारी जी, वही ठीकक कर खड़े रह गए। उन्हें लगा मानो वह कोई साधारण बुज़ुर्ग नहीं थी, वह माता रानी का ही रूप था, जो उन्हें परेशानी से निकलने और उनके सब्र की परीक्षा लेने आया था और राह आसान कर चला गया। 

अक्सर जीवन के कड़े इम्तिहानों में ईश्वर किसी आकाशीय चमत्कार के रूप में नहीं आते बल्कि हमारे आसपास के सामान्य मनुष्यों का आवरण ओढ़कर  प्रवेश करते हैं।

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नियति का ऋणानुबंध-16


समय की रेत पर उकेरी गई रेखाएँ कभी पूरी तरह मिटती नहीं। वे बस कुछ समय के लिए स्मृतियों के कोहरे में ओझल हो जाती हैं।


अमलतास के वृक्ष से छनकर आती सुनहरी धूप में उस दिन पाँच वर्ष की बालिका की बाल-सुलभ खिलखिलाहट गूँज रही थी। उद्यान के कोने में लगा वह पुराना झूला केवल लोहे और रस्सियों का ढाँचा नहीं था, बल्कि दो नन्हे हृदयों की निष्कलुष क्रीड़ा का साक्षी था।


बालिका अपने नन्हे हाथों से झूले पर बैठे बालक को आगे-पीछे धकेल रही थी। दोनों की खिलखिलाहट से मानो हवा भी जीवंत हो उठी थी।


“और तेज! मुझे और ऊँचा झुलाओ!” बालक ने अपनी तोतली बोली में हठ किया।


बालिका ने अपनी पूरी नन्ही शक्ति समेटकर झूले को एक जोरदार धक्का दिया। झूला हवा को चीरता हुआ ऊपर उठा, पर अगले ही क्षण उसका संतुलन बिगड़ गया। एक तीखी चीख गूँजी और बालक कठोर धरातल पर जा गिरा।


पलक झपकते ही बालक अचेत पड़ा था। उसकी आँखें मूँद चुकी थीं।


चीख-पुकार सुनकर माता-पिता भागे चले आए। उनके हाथों से मानो संसार ही छूट गया था। बालक को तत्काल चिकित्सालय ले जाया गया। कई दिनों तक वह जीवन और मृत्यु के बीच झूलता हुआ कोमा की नीरव दुनिया में खोया रहा और अंततः एक दिन उसकी साँसों की डोरी सदा के लिए टूट गई।


उस दुर्घटना ने नन्ही बालिका के मन पर एक ऐसा अदृश्य और गहरा घाव छोड़ दिया, जिसे समय की परतें धीरे-धीरे ढकने लगीं।


वर्ष बीत गए। बालिका शैशव से किशोरावस्था और फिर यौवन की देहरी पर पहुँच गई। प्रचलित रीति-रिवाजों के अनुसार उसका विवाह हुआ और वह एक नए संसार का हिस्सा बन गई।


कालचक्र घूमता रहा और एक दिन उसकी गोद में एक नवजात शिशु की किलकारी गूँजी। एक माँ के रूप में उसका जीवन जैसे पूर्ण हो उठा।


जैसे-जैसे बालक बड़ा होने लगा, माँ का हृदय एक अज्ञात आशंका से घिरने लगा। बालक की दृष्टि में वह चंचलता नहीं थी, जो उसकी उम्र के अन्य बच्चों में होती है। वह अपनी ही एक शांत, अलग दुनिया में खोया रहता था।


चिकित्सकीय परीक्षणों के बाद जो सत्य सामने आया, उसने स्त्री के हृदय को झकझोरकर रख दिया। उसकी संतान ऑटिज़्म से ग्रस्त थी और उसका मानसिक विकास भी सामान्य की तुलना में बहुत धीमा था।


नियति का एक अदृश्य चक्र जैसे घूमकर फिर वहीं आ खड़ा हुआ था।


पुत्र की स्थिति ने माँ के अंतर्मन को गहन वेदना से भर दिया। वह दिन-रात विचारों के चक्रव्यूह में उलझी रहती।


“आखिर मुझसे ऐसी कौन-सी भूल हुई? मैंने तो कभी किसी का अहित नहीं किया। फिर नियति ने मेरी गोद में यह दुख क्यों डाल दिया? क्या मनुष्य केवल इसी जन्म के संचित कर्मों का फल होता है? या फिर पूर्वजन्मों के वे अदृश्य धागे भी प्रारब्ध बनकर हमारा पीछा करते हैं, जिन्हें हम समय की धुंध में भूल चुके होते हैं?”


प्रश्नों का यह बवंडर उसके मन को छिन्न-भिन्न करता रहता था।


इसी उथल-पुथल के बीच एक दिन उसे पुनर्जन्म, ध्यान-चिकित्सा और पास्ट-लाइफ़ रिग्रेशन के विषय में जानकारी मिली। उसके बारे में यह बताया गया था कि चेतना के अवचेतन स्तर तक पहुँचकर पूर्वजन्मों की स्मृतियों को टटोला जा सकता है। अपनी व्यथा से मुक्ति और अपने प्रश्नों के उत्तर पाने की व्याकुलता में वह अंततः एक ऐसे केंद्र तक पहुँच गई।


जब वह सम्मोहन और अवचेतन की उस गहन अवस्था में उतरी, तो उसके सामने समय का पर्दा अचानक हटने लगा।


अमलतास का पेड़।


वह पुराना झूला।


और उसका वही बचपन।


उसने देखा—एक अनजाने धक्के से बालक झूले से नीचे गिरा था और फिर सदा के लिए शांत हो गया था।


सत्य का यह उद्घाटन चौंकाने वाला था।


वह ऑटिस्टिक बालक कोई और नहीं, बल्कि वही बचपन का निर्दोष मित्र था।


यद्यपि बालिका ने वह अपराध जान-बूझकर नहीं किया था, किंतु कर्म तो घटित हो चुका था। प्रकृति के विधान में अनजाने में किए गए कर्म भी निष्फल नहीं जाते—ऐसा उसका विश्वास था। कर्मफल देने में प्रकृति अत्यंत निष्ठुर हो सकती है।


उन दोनों के बीच प्रेम, मोह और अधूरे संबंधों का एक गहरा ऋणानुबंध शेष रह गया था। उस अपूर्ण संबंध और कर्मबंधन को पूर्ण करने के लिए वह आत्मा इस जन्म में उसकी संतान बनकर आई थी, ताकि माता और पुत्र के रूप में उनका वह ऋण चुक सके।


श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्म की गति अत्यंत गहन और सूक्ष्म है। मनुष्य के कर्म उसके जीवन पर प्रभाव डालते हैं और उनके परिणाम किसी न किसी रूप में सामने आते हैं। कर्म का यही अदृश्य लेखा-जोखा नियति के उस शाश्वत चक्र का आधार बनता है, जिससे कोई सहज ही मुक्त नहीं हो सकता।


उस गहन अनुभव से बाहर आने के बाद माँ की आँखों से बहते आँसू अब केवल पश्चात्ताप या पीड़ा के नहीं थे। उनमें एक अनकहे सत्य को जान लेने की असीम शांति थी।


घर लौटकर जब उसने अपने शांत और अपनी ही दुनिया में खोए हुए पुत्र को देखा, तो आज उसे उसमें कोई अपूर्णता, व्याधि या मानसिक विकलांगता दिखाई नहीं दी। आज उसे उस नश्वर भौतिक शरीर के भीतर एक अदृश्य अस्तित्व का स्पष्ट बोध हो रहा था—वही सनातन आत्मा, जो जन्म-जन्मांतर से अपनी स्वतंत्र और शाश्वत पहचान के साथ यात्रा करती आई थी।


भौतिक शरीर तो केवल एक आवरण है—समय की धारा में बुना हुआ एक कच्चा धागा, जो हर नए जन्म के साथ बदल जाता है। परंतु आत्मा का अदृश्य अस्तित्व कभी नष्ट नहीं होता।


गीता का वह ज्ञान कि आत्मा न कटती है, न जलती है, न सूखती है—आज उसके जीवन का यथार्थ बन चुका था।


मृत्यु केवल मस्तिष्क की स्मृतियों पर विस्मृति का पर्दा डालती है; आत्मा के मूल स्वरूप और उसकी यात्रा पर नहीं।


वह निर्दोष बालक, जो बचपन में झूले से गिरकर अनंत में विलीन हो गया था, उसने अपनी नन्ही देह अवश्य त्याग दी थी, किंतु उसकी आत्मा का वह सूक्ष्म और ज्योतिर्मय स्वरूप आज भी वही था।


मनुष्य अक्सर यह मान बैठता है कि चिंता की अग्नि के साथ सब कुछ भस्म हो जाता है, परंतु ब्रह्मांड के इस रहस्यमय और न्यायपूर्ण चक्र में कुछ भी पूर्णतः नष्ट नहीं होता—ऐसा उसका विश्वास था।


यह अदृश्य अस्तित्व एक शुद्ध ब्रह्मांडीय ऊर्जा के रूप में सदैव अपनी पहचान बनाए रखता है। चाहे देह एक चंचल बालक की हो या ऑटिज़्म से ग्रस्त एक मासूम शिशु की, उसके भीतर स्पंदित होने वाला वह चैतन्य कभी विकलांग नहीं होता।


वह वही पुराना साथी था, जो अज्ञानतावश हुए उस प्रहार के बाद अधूरे रह गए प्रेम और विश्वास का ऋण चुकाने के लिए इस नए रूप में लौट आया था।


इस बोध ने उस स्त्री के जीवन को देखने का दृष्टिकोण ही बदल दिया।


जीवात्मा केवल वस्त्र बदलती है; अपने संस्कार, संबंध और प्रारब्ध साथ लेकर चलती है। इस अदृश्य अस्तित्व की यात्रा अनंत है। यह शरीर की भौतिक सीमाओं, समय की परिधियों और सांसारिक बुद्धि के पैमानों से परे है।


जन्म-मरण के इस निरंतर घूमते चक्र में बँधे हुए हम सभी उस एक अदृश्य अस्तित्व के यात्री हैं, जो देह के मिट जाने के बाद भी अपनी मूल पहचान, अपने गहरे ऋण और अपने निश्छल प्रेम को कभी नहीं भूलता।


ब्रह्मांड का यही सबसे गूढ़ और शाश्वत सत्य है—कर्म और चेतना का सिद्धांत अत्यंत गहन और मार्मिक है।


मृत्यु के अंतिम क्षणों में जीव की चेतना जिस स्थिति में शरीर का त्याग करती है, वही उसके सूक्ष्म संस्कारों के रूप में अगली देह की यात्रा का आधार बनती है—ऐसा आध्यात्मिक चिंतन माना जाता है।


जब वह नन्हा बालक कोमा की नीरव, अचेतन और शांत अवस्था में था, तब उसकी भौतिक चेतना की गति अत्यंत धीमी पड़ चुकी थी। उस समय उसका मस्तिष्क एक ठहराव और अचेतन शून्यता में समाया हुआ था।


शरीर तो अंततः भस्म हो गया, किंतु अतीत की उस अचेतन अवस्था में चेतना का अंतिम अनुभव आत्मा के सूक्ष्म आवरण पर अंकित रह गया—ऐसी उसकी आध्यात्मिक व्याख्या थी।


पुनर्जन्म के समय वही अवचेतन संस्कार उसकी नई देह और मस्तिष्क के विकास के ढाँचे का आधार बने। इसी कारण इस जीवन में उसे ऑटिज़्म और धीमे मानसिक विकास का रूप प्राप्त हुआ—मानो उसकी चेतना का एक हिस्सा आज भी अतीत के उस कोमा की शांत, अचेतन अवस्था में विश्राम कर रहा हो।


यह कथा इस आध्यात्मिक विश्वास को सामने रखती है कि आत्मा केवल कर्मों के फल को ही नहीं, बल्कि अपने पिछले जीवन के अंतिम चरणों की मानसिक स्थिति और संवेदनाओं की छाप भी अपने साथ लेकर चलती है।

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झुका हुआ विज्ञान 17


समय की अपनी चाल होती है, पर कुछ क्षण ऐसे आते हैं जब समय स्वयं ठहर जाता है और नियति अपने गुप्त पन्नों को उघाड़ना लगती है। 3 जून 2026 की वह भोर, शताब्दी विहार अपार्टमेंट, सेक्टर 61, नोएडा, उ॰ प्र॰ , हमारे ग्रह-नीड़ में किसी सामान्य प्रभात की भांति, प्रवेश नहीं कर रही थी। रात्रि का अंतिम प्रहर था। लगभग 3:45 बजे का समय। सृष्टि अभी निद्रा की गोद में थी, परंतु उस निस्तब्धता को चीरती हुई मेरे पति की एक आकुल पुकार ने मुझे झकझोर दिया। “नीता, मुझे चेस्ट पेन हो रहा है। गैस बन रही है। मुझे गैस की दवा दे दो।”


एक पल को मन सिहर उठा। वे कोई असाधारण रूप से अस्वस्थ व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सजग एथलीट, दौड़ने-भागने वाले, ऊर्जा से सराबोर इंसान थे। मैंने उनके चेहरे की चिंता को पढ़ते हुए संयम बाँधा और पूछा, “यह दर्द पेट की ओर झुक रहा है या कंधे से होकर बाजू की ओर उतर रहा है?”

उनका उत्तर स्पष्ट था, “दर्द कंधे और बाजू की ओर बढ़ रहा है। साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है।”

उसी क्षण बिना किसी मेडिकल डिग्री के मेरे अंतर्मन में एक स्पंदन हुआ। मैं पेशे से कोई चिकित्सक नहीं, एक लेखिका हूँ, शब्दों और संवेदनाओं की साधिका और एक योग शिक्षिका हूँ। आसनों से स्वास्थ्य की रखवाली करने वाली योगिनी।  मेरे मुख से अनायास ही निकला, “यह गैस नहीं, इमरजेंसी है। यह हार्ट अटैक का संकेत है।”

यह केवल बुद्धिमत्ता नहीं थी, यह उस अदृश्य अस्तित्व की प्रथम आहट थी, जिसने मुझे उस पल दिशा दिखाई। 

       बगल के कक्ष में मेरा 25 वर्षीय पुत्र नचिकेता गहरी नींद में था। संकट इतना त्वरित था कि उसे जगाने का समय भी काल की गति से पीछे छूट रहा था। मैंने निर्णय लिया- और इंतजार अधिक समस्याओं को निमंत्रण देना होगा। पुत्र को बाद में फोन से सूचित करने का विचार कर मैं तुरंत उन्हें लेकर अपनी गाड़ी निकाली और सेक्टर 62 स्थित फोर्टिस अस्पताल की ओर निकल पड़ी।


अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड की ठंडी, मशीनी हवा में जब मैं पति को लेकर प्रवेश किया तो वहाँ की सिस्टर से कहा, “इन्हें चेस्ट पेन हो रहा है। ईसीजी की आवश्यकता है, शायद।” सिस्टर ने ईसीजी की तैयारी की। जूनियर डॉक्टर ने रिपोर्ट देखी और उनकी घबराहट बता रही थी कि सीनियर डॉक्टर को बुलाना होगा। और वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट का प्रवेश हुआ।


रिपोर्ट पर दृष्टि डालते ही डॉक्टर का चेहरा गंभीर हो गया। उन्होंने मुझे बताया कि ईसीजी की रिपोर्ट अच्छी नहीं है। क्योंकि यह मधुमेह, शुगर के रोगी हैं, इसलिए यह साइलेंट हार्ट अटैक का मामला है—दर्द के बिना, चुपचाप, दबे पाँव आने वाला संकट। मैं एक कार्डियोग्राम करता हूँ, स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी।

जब तक उन्होंने कुछ ब्लड टेस्ट करने के लिए सिस्टर को आदेश दिया। ईको की रिपोर्ट किसी अनाम अनिष्ट का संदेश दे रही थी। उन्होंने कहा, “हार्ट की आर्टरी में ब्लॉकेज स्पष्ट है। हृदय धमनियाँ बाधित हैं।” इन्हें बीपी की दवा और अन्य आपातकालीन दवाइयाँ दे दी गईं। कार्डियोलॉजिस्ट ने 8:00 बजे सुबह एंजियोग्राफी करने का स्पष्ट आदेश दिया।


कालचक्र तेजी से घूम रहा था, पर मेरे भीतर की जीवन-संगिनी शांत नहीं बैठी थी। मैंने तुरंत ईसीजी रिपोर्ट का चित्र हमारे 20 वर्ष पुराने पारिवारिक चिकित्सक को व्हाट्सऐप किया, जो दिल्ली के जसोला स्थित अपोलो इंद्रप्रस्थ अस्पताल में कार्यरत हैं। भोर की उस बेला में संदेश भेजते हुए मन में केवल विश्वास का सहारा था। कुछ ही पलों में अपोलो से संदेश चमका—“जहाँ हैं, वहीं तुरंत एंजियोग्राफी करवाएं। एंजियोग्राफी बेहद आवश्यक है।”


जैसे ही फोर्टिस के चिकित्सकों को आभास हुआ कि हम अपोलो जाने का विचार कर रहे हैं, वातावरण में एक अजीब-सी हड़बड़ी छा गई। 25 मिनट के बाद उन्होंने एक और ईसीजी निकाला। डॉक्टर ने ग्राफ दिखाते हुए कहा, “यह दूसरी ईसीजी रिपोर्ट प्रोग्रेसिव आ रही है।

ग्राफ ऊपर-नीचे भाग रहा है, यानी अटैक की तीव्रता अभी बढ़ रही है। 40 मिनट की दूरी तय करके अपोलो जाना अत्यंत जोखिम भरा है। इन्हें यहीं स्थिर रहने दें।”


संशय और भय के उस झंझावात में मेरे पति ने दृढ़ता से कहा, “नहीं, मैं उपचार करवाऊँगा तो अपने पुराने विश्वसनीय डॉक्टर से ही। आप हमें डिस्चार्ज कीजिए।”

            यह निर्णय विज्ञान की दृष्टि में एक दुस्साहस था, पर मेरे अंतर्मन को उस अदृश्य अस्तित्व का भरोसा था। मैंने डिस्चार्ज के काग़ज़ पर हस्ताक्षर किए, बिल चुकाया और फोर्टिस के डॉक्टर से आग्रह किया, “रास्ते के 40 मिनट के लिए इन्हें इंजेक्शन के रूप में इमरजेंसी दवाएँ दे दीजिए, ताकि हम सकुशल अपोलो पहुँच जाएँ।”

जोखिम मेरा है, पर रक्षा उस परम सत्ता की होगी।


हरे कृष्ण के महामंत्र का जाप करते हुए मैंने अपने पति को पुनः गाड़ी में बैठाया। 5:30 बजे सुबह हम फोर्टिस अस्पताल से चले और 6:05 बजे , मात्र 35 मिनट के अलौकिक वेग से हम अपोलो की इमरजेंसी के सामने थे। वहाँ हमारे पारिवारिक डॉक्टर, डॉक्टर अजय सिंह, ने पहले ही संपूर्ण व्यवस्था कर रखी थी। डॉक्टरों के दल ने मेरे पति को तुरंत अपने घेरे में ले लिया।

1 घंटे के बाद अपोलो की इमरजेंसी में जब पुनः ईसीजी निकल गई तो मशीनों की नीरस रिपोर्ट ने एक बार फिर वही मोहर लगाई—प्रोग्रेसिव हार्ट अटैक।

अपोलो इंद्रप्रस्थ के इमरजेंसी वार्ड की दुनिया पूरी तरह से चिकित्सा उपकरणों, धड़कनों की डिजिटल आवाजों और तनाव से भरी हुई थी। तरह-तरह की दवाइयाँ नसों में उतरते, सलाइन और शरीर-बंदी अनगिनत तारें किसी विशाल प्रयोगशाला का अभ्यास करा रही थी।

          सोमवार की वह प्रभात सामान्य नहीं थी। देश के जाने-माने वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट- डॉक्टर प्रदीप जैन स्वयं अपने पूर्व निर्धारित सभी महत्वपूर्ण ऑपरेशंस और केसेज़ को स्थगित कर सीधे इमरजेंसी वार्ड में दाखिल हुए। उनके चेहरे पर गंभीर स्थिति की संवेदनशीलता प्रकट हो रही थी।

 मैंने भारी मन और आशा की धुंधली-सी किरण के साथ उनसे पूछा, “डॉक्टर साहब, मेरे पति बार-बार कह रहे हैं कि यह गैस का दर्द है, पर आप चिकित्सक हैं। आपका डायग्नोसिस क्या कहता है? वास्तव में इन्हें क्या हुआ है?”

       डॉ. जैन ने मेरी ओर देखा। उनके शब्दों में एक स्पष्ट और वरिष्ठ चिकित्सक का अनुभव झलक रहा था। उन्होंने कहा, “मैडम, मैं कार्डियोलॉजिस्ट हूँ, और सोमवार की इस व्यस्त सुबह अपने सारे महत्वपूर्ण ऑपरेशन छोड़कर इन्हें देखने आया हूँ। मैं यहाँ किसी गैस का इलाज करने नहीं आया हूँ। आपके पति को मैसिव  हार्ट अटैक टल गया है। सही समय पर फोर्टिस में प्रातः ही सही आपातकालीन दवाई मिल गई, जिससे एक बड़ा अनिष्ट टल गया।” यह सुनते ही मुझे लगा जैसे -मुझ साधारण गृहणी के पीछे वह अदृश्य शक्ति खड़ी थी, जो तर्क, विज्ञान और भौतिक विवेक की सीमा जहाँ समाप्त होती है, वहीं से अपना असीम साम्राज्य प्रारंभ करती है। विज्ञान जहाँ साक्ष्य और परीक्षणों का मोहताज होता है, वहाँ आध्यात्मिक चेतना और ईश्वर का अनंत साम्राज्य अपनी सत्ता सिद्ध करता है। 

मानो तो वह ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुकंपा है, न मानो तो एक अलौकिक ऊर्जा–और यदि केवल दृष्टि से देखें तो यह एक ऐसी गाथा है, जहाँ मृत्यु के द्वार से जीवन को छीन लाने की कथा लिखी गई। इमरजेंसी के उन जगमगाते बल्बों के नीचे डॉक्टर के उपचार से भी पहले उस असीम सत्ता का विधान अपना काम आरंभ कर चुका था।

डॉ. प्रदीप जैन ने आगे बताते हुए कहा, “अब आगे की प्रक्रिया हम संभाल लेंगे। आप निश्चिंत रहें। तीन ईसीजी की रिपोर्ट, दो फोर्टिस में की गई और एक अपोलो में हुई। दो ईको कार्डियोग्राम की रिपोर्ट भी स्पष्ट रूप से हृदयाघात की पुष्टि कर रही है। हालाँकि एक विचित्र बात यह है कि जब भी हृदय पर ऐसा आघात होता है ,तो शरीर कार्डियक एंजाइम स्रावित करता है। यह एंजाइम फोर्टिस अस्पताल की रिपोर्ट में भी अनुपस्थित था और अपोलो की रिपोर्ट में भी अभी तक नहीं आया है। कुछ विशेष परिस्थितियों में कुछ रोगियों के रक्त में यह एंजाइम 6 घंटे बाद दिखाई देता है। अभी केवल 4 घंटे बीते हैं। हम 6 घंटे पूरे होने पर पुनः रक्त परीक्षण करेंगे और उसके पश्चात दोपहर 12:00 इन्हें एंजियोग्राफी के लिए ले जाएंगे।”


डॉक्टर की बातें सुनकर, एक ओर जहाँ विज्ञान का कठोर सत्य सामने खड़ा था, वहीं दूसरी ओर मेरे मन में उस अदृश्य अस्तित्व की शक्ति का बोध और गहरा हो रहा था- कि रक्त में उस एंजाइम का न मिलना मानो उस परम शक्ति का कोई गुप्त संकेत था, जो नियति के विधान और विज्ञान की कसौटियों के बीच अपना एक अलौकिक खेल रच रहा था। 

      अस्पताल के समय-चक्र के अनुसार दोपहर के ठीक 12:00 जूनियर डॉक्टरों और सहायकों की पूरी टीम मेरे पति को एंजियोग्राफी कैथ लैब में ले जाने के लिए आ पहुँची। स्ट्रेचर के पहिए अब लिफ्ट की ओर बढ़ रहे थे तो उनके साथ-साथ मेरे बढ़ते कदम केवल एक देह की गति नहीं, वह आस्था और भय के बीच झूलती एक आत्मा की यात्रा थी।

मेरी जिह्वा पर निरंतर हरे कृष्ण महामंत्र का जाप प्रवाहित हो रहा था। उँगलियाँ मणकों की भाँति नाम-जप की गिनती कर रही थीं और हृदय की प्रत्येक धड़कन कृष्ण नाम के उस असीम स्पंदन से स्पंदित हो रही थी। कैथ लैब के उस भारी मशीनी दरवाजे के पास पहुँचकर स्ट्रेचर अंदर की ओर सरकने लगा। भौतिक रूप से मैं उनसे दूर होती जा रही थी। स्ट्रेचर के पैरों की तरफ खड़ी, एक बेबस जीवन-संगिनी ने उद्वेलित होकर पुकारा, “प्रवीण, मेरी ओर देखिए। हरे कृष्ण बोलिए।”

परंतु प्रवीण की आँखें तो डॉक्टर से, स्टाफ और सहायकों की टीम पर टिकी थीं। वह मुझे नहीं देख पा रहे थे। दूर खड़ी मेरी सूक्ष्म पुकार उन तक नहीं पहुँच रही थी।

इस निःप्राण निश्चित क्षण में मेरे भीतर अलौकिक भक्ति का विस्फोट हुआ। मैंने नयनों को मूँदकर अपने श्रीहरि से सूक्ष्म संवाद रचा— “हरे कृष्णा, मेरे पति न तो प्रतिदिन आपका नाम लेते हैं, ना ही कोई विशेष पूजा-पाठ करते हैं। शायद इस विकट क्षण में उनके मुख से आपका नाम न निकले। परंतु प्रभु, मैं उनकी अर्धांगिनी हूँ। आज मैं अपने पति के हिस्से का नाम-स्मरण आपको अर्पित करती हूँ। हे राधा गोविंद देव जी, आप ही इस स्ट्रेचर के साथ लैब के भीतर चले जाइए। अंदर की संपूर्ण व्यवस्था आप अपने हाथों में ले लीजिए। फिर आपकी जो भी योजना होगी, वह मुझे सहर्ष स्वीकार होगी। हे परमात्मा, आप भीतर चले जाइए।”

मेरी इस आकुल प्रार्थना के साथ ही कैथ लैब का भारी दरवाजा बंद हो गया। 

 समय मानो थम-सा गया था। ठीक 1 घंटे के बाद, दोपहर 1:00 बजे, कैथ लैब का द्वार खुला। एक सिस्टर ने बाहर जाकर आवाज दी, “प्रवीण कुमार के अटेंडेंट अंदर चले।”

मैं धड़कते हृदय से भीतर प्रविष्ट हुई। सामने एक विशाल टीवी स्क्रीन थी, जिस पर हृदय की धमनियों का सजीव चित्र चल रहा था। पीठ किए बैठे थे डॉक्टर प्रदीप जैन। मैं उनके ठीक पीछे जाकर खड़ी हो गई।

वह क्षण ऐसा था, मानो जीवन की सबसे कठिन प्रतीक्षा-परीक्षा का परिणाम घोषित होने वाला हो। मन का 99% हिस्सा यह मान चुका था कि या तो एंजियोप्लास्टी द्वारा स्टंट लगाया जाएगा या फिर बाईपास सर्जरी होगी, जैसा डॉक्टर ने पहले ही बता दिया था। सिर्फ यह देखना था कि कितना प्रतिशत आर्टरी ब्लॉकेज है।

परिणाम निराशाजनक होता ही, मैं हार जाऊँगी। पर 1 प्रतिशत कोना उस अलौकिक विश्वास से दमक रहा था कि जब साक्षात श्रीकृष्ण भीतर चले गए हैं स्वयं, तो फिर वह कैसा भय?

तभी डॉक्टर प्रदीप जैन अपनी कुर्सी से पीछे मुड़े। उन्होंने मुझे देखा और उनके चेहरे के भाव उस घने अंधकार में एक अभूतपूर्व प्रकाश की भाँति कौंध गए……

डॉक्टर प्रदीप जैन ने मुड़कर मुझे देखा और मुस्कुराते हुए कहा, “आप इतनी चिंतित क्यों खड़ी हैं? इधर आइए, मेरे बगल में। गुड न्यूज़ टू यू।”

मेरी साँसें मानो थम-सी गईं। मैं काँपती आवाज़ से पूछकर, “सर,कैसी गुड न्यूज़ ?”

     उन्होंने टीवी स्क्रीन की ओर इशारा करते हुए अयंमित स्वर में कहा, “मैं पिछले 20 मिनट से आपके पति के हृदय की धमनियों में उस ब्लॉकेज को ढूँढ़ रहा हूँ, जो सुबह 4:00 बजे से लेकर अभी तक की सभी ईसीजी रिपोर्ट और इकोकार्डियोग्राम में स्पष्ट दिखाई दे रहा था। पर मैं स्तब्ध हूँ- उनकी किसी भी आर्टरी में कोई ब्लॉकेज है ही नहीं। धमनियाँ पूरी तरह से खुली और साफ हैं।”

“ऐसा प्रतीत होता है कि रक्त का कोई धक्का, क्लॉट आया था, जो सुबह फोर्टिस में और फिर बाद में अपोलो में सही समय पर दी गई ब्लड थिनर और एंटीकोगुलेंट दवाओं के प्रभाव से पूरी तरह से फ्लश आउट होकर बह गया।”

             उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए आगे कहा, “यू आर द लकीएस्ट। आप एक हार्ट अटैक पेशेंट को लेकर अस्पताल आई थीं और एक पूर्णतः स्वस्थ, सामान्य पति को लेकर वापस लौट रही हैं। सामान्यतः ऐसा नहीं होता। लोग हार्ट अटैक लेकर आते हैं और जीवन भर के लिए हार्ट पेशेंट बनकर लौटते हैं। परंतु आपके पति का हृदय एक नवयुवक की भाँति धड़क रहा है। धमनियाँ बिल्कुल साफ-सुथरी हैं।”

डॉक्टर ने आगे कहा, “एक क्षण के लिए मुझे स्वयं संदेह हुआ कि कहीं मेरी टीम से किसी और मरीज की रिपोर्ट तो नहीं आ गई या पेशेंट बदल तो नहीं गया।”


डॉक्टर के ये शब्द केवल एक चिकित्सक की व्याख्या नहीं थे। वह विज्ञान के घमंड पर पारलौकिक सत्य की एक ऐसी विजयगाथा थे, जहाँ तर्क की सीमा समाप्त होती है। विज्ञान अपने सारे रिपोर्ट, मशीनों और परीक्षणों के साथ स्तब्ध खड़ा था और ठीक वहीं से उस अदृश्य अस्तित्व की असीम करुणामयी और अनंत साम्राज्य का आरंभ हो रहा था।

मैंने कमर से नीचे तक झुककर सिर्फ यह कहा—“हरे कृष्णा।”

उस पावन क्षण में मेरा मन पौराणिक कथाओं की अलौकिक शक्तियों की ओर लौट गया। मुझे स्मरण हो आया कि कैसे भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान विष्णु पाषाण के खंभे को चीरकर नरसिंह रूप में प्रकट हो गए थे। कैसे भरी सभा में द्रौपदी की एक आकुल पुकार- है कृष्ण! पर उनके वस्त्र का विस्तार अनंत हो गया था।

क्या इस कलि काल में भी वही चमत्कार नहीं दोहराया गया था?

मैंने केवल अश्रुपूर्ण नयनों से हरे कृष्ण महामंत्र का आश्रय लिया था और उस परम सत्ता ने मेरे पति के हृदय-रोग को हरकर उनकी धमनियों में नवजीवन के प्रवाह से भर दिया।

         डॉ. जैन ने मुस्कुराते हुए बात समाप्त की, “इन्हें दवा दी गई है, इसलिए आज रात भर निगरानी में रखेंगे।  

     कल सुबह बैंडेज हटाकर इन्हें डिस्चार्ज कर दिया जाएगा। अब वह बिल्कुल स्वस्थ हैं।”

    यह घटना केवल एक चिकित्सीय चमत्कार नहीं, बल्कि मेरी पुस्तक ‘अदृश्य अस्तित्व’ का वह जीवंत दर्शन है, जो संजयवादीयों के सामने यह उद्घोष करता है—विज्ञान जहाँ अपनी अंतिम साँस लेता है, वहीं से उस परमात्मा के साम्राज्य की प्रथम भोर प्रारंभ होती है।

मानो तो वह ईश्वर है, न मानो तो एक रहस्यमयी अलौकिक शक्ति, और यदि केवल पन्नों पर उतारें तो कलयुग में घटित भक्ति और विश्वास की अमर गाथा।

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हरि बोल 20 


सितंबर 2024 का वह महीना मेरी जीवन यात्रा का एक ऐसा अध्याय बन गया जहां भक्ति ने विज्ञान की सीमाओं और शरीर की दुर्बलता को चुनौती दे दी थी।  इस्कॉन से जुड़ी होने के कारण ‘श्री कृष्ण’ का नाम ही मेरी हर विश्वास का आधार था।  एक दिन मंदिर के संदेश पट पर एक सूचना चमकी –गोवर्धन धाम की परिक्रमा यात्रा का आयोजन हो रहा था। वरिष्ठ गुरुजनों के सानिध्य में भक्तों का एक समूह इस पावन धाम यात्रा के लिए प्रस्थान करने वाला था संदेश में निर्देश था कि जो भी इस अध्यात्म गंगा में डुबकी लगाना चाहता है वह अपने आने जाने का प्रबंध सुनिश्चित कर लें।  यह संदेश पढ़ते ही मेरे हृदय में एक पुरानी तड़प जाग उठी।  वर्षों से मैं अन्य भक्तों को इस अलौकिक यात्रा पर जाते देखती थी। इस बार तो मैं जाऊंगी ही, मेरी भीतर से एक दृढ़ संकल्प उभरा‌। 

लेकिन यह संकल्प इतना सरल नहीं था। मैं हाल ही में लीवर की एक अत्यंत गंभीर बीमारी से उभर रही थी इस बीमारी के दुष्प्रभावों ने मेरे शरीर को जर्जर कर दिया था। सबसे बड़ी चिंता मेरे पैरों को लेकर थी।  बीमारी के कारण मेरे तलवों में बड़ी-बड़ी दरारें पड़ गई थी, जो दर्द करती थी। तलवों की त्वचा इतनी अधिक पतली और संवेदनशील हो चुकी थी कि सामान्य धरातल पर नंगे पांव दो कदम चप्पल के साथ चलना भी असहनीय पीड़ा से भर देता था। एड़ियों में दरारों से खून निकल जाता था, जो दर्द देता था। इस अवस्था में गोवर्धन परिक्रमा, वह तो पूरे 21-22 किलोमीटर की साधना थी।  मैं यह परिक्रमा नंगे पांव करना चाहती थी। कंकड़ पत्थर और तप्ती मिट्टी के बीच मेरी यह काया इतने मील कैसे तय करेगी?  क्या मेरा शरीर साथ देगा? 

शंकाओं का बवंडर था, पर दूसरी ओर कृष्ण का मुझ पर अटूट विश्वास। मैंने अपनी शंकाओं को प्रभु के चरणों में समर्पित कर दिया और यात्रा का प्रबंध आरंभ कर दिया।  यात्रा और आवास से संबंधित आवश्यक शुल्क का भुगतान कर, मैं भक्तों की उस टोली में सम्मिलित हो गई। 

               जब हम गोवर्धन धाम पहुंचे तो वहां हमारे विश्राम के लिए अत्यंत सुंदर और सुखद व्यवस्था की गई थी।  हमें यह बताया गया कि अगली सुबह 4:00 बजे ब्रह्म मुहूर्त में हम सभी गोवर्धन परिक्रमा के लिए प्रस्थान करेंगे।  बाहर रात का सन्नाटा था पर मेरे मनु के भीतर एक दिव्य हलचल। पतले संवेदनशील दरारों से भरे तलवा और दुर्बल शरीर के साथ कृष्ण नाम के सहारे मैं उसे 22 किलोमीटर की अज्ञात परीक्षा में अपना पहला कदम रखने जा रही थी ।

       भोर के 4 बजे जब पूरा धाम ब्रह्म मुहूर्त की अलौकिक निरवता में लिपटा हुआ था, मंगला आरती के मधु शंखनाद और घटिया की ध्वनि से गोवर्धन की पावन धरा गूंज उठी। भगवान श्री कृष्ण के चरणों में नतमस्तक होकर हमने अपनी इस महान साधना का श्री गणेश किया । 

       प्रस्थान से पूर्व जब सभी श्रद्धालुओं की गिनती हुई तो ज्ञात हुआ कि हम कुल 70 भक्तों का जत्था है, जो वेदांत चैतन्य प्रभु जी के नेतृत्व में परिक्रमा करने वाले थे।  टोली सज चुकी थी । सबसे आगे तेज और दृढ़ कदमों से चलते प्रभु जी और उनके पीछे अनुशासित भाव से चलती हम भक्तों की मंडली । प्रभु जी की गति बहुत तीव्र थी।  उनका स्पष्ट संदेश था- हमें प्राप्त 10:30 से 11:00 के बीच कड़क धूप खिलने से पहले, यह परिक्रमा पूर्ण करनी है। जो तेज ना चल सके तो धीमी गति से आ सकते हैं। 

मेरे मन में एक पल के लिए संकोच उमरा और अगले ही क्षण मैंने ,स्वयं को प्रभु के चरणों में सौंप दिया ।

        परिक्रमा के पथ पर आगे बढ़ते हुए हमारी टोली ने सर्वप्रथम भगवान श्री कृष्णा और भगवान शिव की आराधना कर, मंदिर में दर्शन किया।  हमारे मंडली के कंठ से फूटता महामंत्र 

“हरे कृष्णा, हरे कृष्णा ,कृष्णा -कृष्णा हरे-हरे

हरे राम, हरे राम ,राम ,राम हरे-हरे”

संपूर्ण वातावरण को वैकुंठमय बना रहा था।  हाथ में जप माला और जीव्हा पर, हरि नाम, लिए हमारी मंडली आगे बढ़ रही थी । मंडली दर्शनीय स्थलों पर रूक कर विश्राम करती और कीर्तन करती। मार्ग में दानघाटी, जो परिक्रमा का अत्यंत महत्वपूर्ण केन्द्र है, पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यहां बालकृष्ण गोपियों से दान- माखन और दही के रूप में शुल्क लिया करते थे । संकर्षण कुंड व दाऊजी का मंदिर- इन पावन स्थल पर कुंड के किनारे बैठकर कीर्तन का आनंद ही कुछ और था। पूंछरी के लौटा जहां दर्शन किए बिना परिक्रमा पूर्ण नहीं मानी जाती । हम वहां कुछ देर रुके।  जती पुरा व श्रीनाथ जी मंदिर, जहां गिरिराज जी को भोग लगाया जाता है ,और भक्तों को एक असीम ऊर्जा की अनुभूति होती है।  फिर उद्धव कुंड पर जो अत्यंत शांत और ध्यान योग्य स्थल है, हम पीछे से आने वाले भक्तों के लिए रूक कर प्रतीक्षा करने लगे ।

इन दिव्य कुंडों और स्थलों के शीतल किनारे, वर्षों की छांव और हरी नाम कीर्तन के बीच मेरे पैरों का दर्द और दुर्बलता कहीं विलीन हो रही थी।  प्रभु जी की तीव्र गति और हरी नाम की तरंगे हमें बिना थके आगे खींचती ले जा रही थी….

         प्रभात कि वह शीतल पवन जिसने आरंभिक यात्रा को सुखद और सुहावना बनाए रखा था, अब धीरे-धीरे ओझल होने लगी थी । सूर्य देव गगन की ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहे थे और उनकी किरणें अब तपन में बदलने लगी थी। मुख्य मार्ग पर वाहनों की आवाजाही और तेज ट्रैफिक बढ़ने के कारण , हमारी मंडली को पक्की सड़क छोड़कर बगल की रेतीली पगडंडी पर उतरना पड़ा।  

असली परीक्षा तो अब आरंभ होनी थी। उसे रेतीली जमीन के भीतर छिपे अदृश्य नुकीले कंकड़ और पत्थर अब सीधे मेरे जर्जर पतले तलवों की दरारें भालों की तरह चुभने लगे।  यद्यपि पीड़ा तो पक्की सड़क पर भी हो रही थी , किंतु उस उबड़-खाबड़ और रेतीली जगह ने उस कष्ट को शत-गुणित कर दिया था। ऐसा प्रतीत होता था मानो, अब काया त्राहि-त्राहि कर उठेगी।  हर एक कदम के साथ जब कंकर पैरों को भेदते ,तो मेरे मुख से अत्यंत करुणा और कातर भाव से गूंज उठता-”हरे कृष्णा !”

मेरी पुकार में इतनी वेदना थी कि एक क्षण के लिए आगे-आगे चल रहे प्रभु जी ने भी पीछे मुड़कर देखा, कि कौन इतनी गहरी पीड़ा में श्याम सुंदर को पुकार रहा है।  हाथों में जप माला लिए, मैं अपनी पूरी शक्ति समेट कर प्रभु जी के तीव्र गति से कदम मिलाने का प्रयास कर रही थी।  


कष्ट का यह तो सिर्फ श्री गणेश था । अग्नि परीक्षा अभी शेष थी। 

 अचानक मेरा बाया पैर रेतीली राह में निकले एक बड़े कठोर चट्टान पत्थर से जोर से टकराया।  बीमारी के कारण मेरी हड्डियों में पहले से ही प्राण नहीं थे।  वह टक्कर इतनी भीषण थी ,कि लगा जैसे किसी ने मेरा अंगूठा धर से अलग कर दिया हो। एक क्षण को लगा कि अंगूठा टूट चुका है। असद चीर देने वाली पीड़ा की लहर पूरे शरीर में दौड़ गई। और आंखें छलक आई। 

          यह दृश्य देखकर आसपास चल रहे भक्तों का हृदय पसीज गया।  वे तुरंत मेरे निकट आए और बोले माताजी आपकी स्थिति ठीक नहीं है आप ऑटो में बैठकर शेष परिक्रमा पूरी कर लीजिए । अब इस अवस्था में पैदल चलना उचित नहीं है। 

किंतु मैंने मेरे भीतर की संपूर्ण जीजीविषा  को समेटा। दाहिने पैर के तलवे को जमीन पर पूरा टिकाया और बाएं पैर की एड़ी के सहारे लंगड़ाते हुए पुनः आगे बढ़ने लगी। मुख पर केवल श्री कृष्ण का पवन नाम था, और मन में एक अलौकिक बोध।  मैं सोचने लगी शायद यह मेरा पुनर्जन्म का या इसी जन्म के पाप कर्मों का फल है ,जो गिरिराज जी की इस पवन रज में कट रहा है।  यदि , आज रुक गई तो अपने पापों को भस्म करने और प्रभु को पाने का ऐसा अवसर पुनः कब मिलेगा इन्हें काट लो…….

इस विचार के आते ही , जैसे कोई दिव्य शक्ति मेरे भीतर प्रविष्ट हो गई।  मैं दौड़-दौड़ कर प्रभु जी की गति के साथ कदम ताल करने लगी । शरीर हार चुका था, किंतु आत्मा गोवर्धन धारी के प्रेम अमृत में नाच रही थी । इसी तरह पैदल चलते हुए हम राधा कुंड और श्याम कुंड पर पहुंचे।  यहां युगल कुंड, भक्तों के हृदय को असीम शांति से भर देता है। फिर हम कुसुम सरोवर पहुंचे अपनी अद्भुत वास्तुकला , विशाल सिढियों और शांत जल के लिए प्रसिद्ध यह सरोवर विश्राम के लिए अत्यंत सुंदर स्थान है। यहां पर बैठकर मैंने अंगूठे पर रुमाल से पट्टी की। 

जब हम मानसी गंगा पहुंचे, जो गोवर्धन के मध्य स्थित है, जहां स्नान और दर्शन से परिक्रमा का फल अक्षय हो जाता है । मैंने स्वयं के ऊपर जल का छिटा  डाला और ईश्वर से प्रार्थना की- सूरज अब और ऊपर चढ़ चुका था, पक्की सड़क और गर्म हो चुकी थी।  भक्तों को रेतीली राह,शायद हल्की गुनगुनी लग रही होगी, पर मेरे लिए तो वह जलते हुए कुएं के समान थी।  बीमारी के कारण फटी एड़ियां ,कटे तलवे, चोटिल अंगूठा और असहनीय पीड़ा । जब वह तप्त रेत  तलवों की दरारों में भरती, तो ऐसा प्रतीत होता, मानो घाव पर कोई अंगारे छिड़क रहा हो । किंतु,  मन केवल प्रभु जी की गति से कम मिलने का प्रयास कर, शरीर को एड़ियों के बल पर घिसटता जा रहा था। 

जब पीड़ा सहने की अंतिम सीमा भी पार  होने लगी, तो मैंने  कांतर भाव से एक भक्त से पूछ लिया-  अभी और कितनी दूरी शेष है?

उन्होंने सांत्वना देते हुए कहा- “माताजी बस 5 किलोमीटर और!” 

यह सुनते ही एक क्षण को मेरा हृदय बैठ गया।  जो स्त्री इस समय पांच कदम चलने में असमर्थ थी, वह 5 किलोमीटर का विकट मार्ग कैसे तय करेगी, किंतु, वह मेरी शक्ति नहीं गोवर्धन धारी का अदृश्य हाथ था, जो मुझे खींच रहा था। गिरते-संभलते , कृष्णा-कृष्णा का रट लगाते, अंततः वह पावन परिक्रमा पूर्ण हुई। 

यात्रा का नेतृत्व कर रहे , प्रभु जी ने मुड़कर पीछे देखा जो यात्रा 70 भक्तों के विशाल जत्थे के साथ आरंभ हुई थी। उसके अंत में केवल सात भक्त ही उनके साथ टिक पाए थे।  प्रभु जी ने आश्चर्य से देखा, उन सात भक्तों में -एक वे स्वयं थे ,22- 25 वर्ष की नवयुवती माताजी, तीन युवा प्रभु जी….और उनके बीच 53 वर्षीय मैं ,जर्जर और बीमार काया के साथ खड़ी थी।  प्रभु जी के मुख से सहसा निकल पड़ा -हरि बोल!

 और अश्रुपूरित नेत्रों से मैंने उत्तर दिया-” हरि हरि बोल” 

           किंतु इस अलौकिक गाथा का सबसे बड़ा चमत्कार तो अगली सुबह प्रकट होना था। 

अगले दिन जब मैं धाम यात्रा से वापस आ चुकी थी, तो मैंने सोचा कि अपने आहत पैरों को डॉक्टर को दिखा लूं, लेकिन ,जो मैंने पाया उसने मुझे स्तब्ध कर दिया। मेरे तलवे की वो दरारें ,जिसका डॉक्टर 2 वर्षों से इलाज कर रहे थे। वह पूर्णता भर चुकी थी । फटी एड़ियां, जिसे रक्त स्राव होता था, वह अब जुड़कर सामान्य सी दिख रही थी।  चोटिल अंगूठे में कोई सूजन या दर्द व्याप्त नहीं था।  ऐसा प्रतीत हो रहा था कि किसी ने रातों-रात मेरे पैरों को नवजीवन दे दिया हो।  वह सुबह सिर्फ एक नया दिन नहीं बल्कि मेरे ईश्वर पर अटूट विश्वास की एक अलौकिक भोर थी। मैंने कुछ नहीं मांगा था कृष्ण से, लेकिन उन्होंने मुझे सर्वस्व स्वास्थ्य दे दिया था

                डॉक्टरों ने जब पर देखा तो वह भी चकित थे। चिकित्सा विज्ञान की कसौटी पर इस घटना का विश्लेषण करते हुए उन्होंने तर्क दिया- नंगे पांव उपड़ -खाबड़ पत्थरों और कंकड़ों पर लगातार चलने से आपके तलवों की स्वतः ही एक प्राकृतिक एक्यूप्रेशर चिकित्सा हो गई, इस दबाव के कारण पैरों की जो बंद पड़ी रक्त धमनियां निष्क्रिय हो चुकी थी, उनमें अचानक तीव्र रक्त संचार प्रारंभ हो गया।  

तकनीकि रूप से यह व्याख्या भले ही तर्कसंगत लगती, किंतु उनके पास, इस प्रश्न का कोई उत्तर न था ,कि वर्षों पुराने हुए गहरे घाव और फटी दरारे, रातों-रात बिना किसी औषधि के कैसे भर गए।  इस बात का समाधान ना तो उनकी पुस्तकों में था और ना ही उनके अनुभव में।   

              वास्तव में, जहां विज्ञान की सीमा समाप्त होती है,  ठीक वहीं से ईश्वर की असीम अनुकंपा का अलौकिक क्षेत्र आरंभ होता है । जहां भौतिक तर्क और चिकित्सा विज्ञान हाथ खड़े कर देते हैं, वही अदृश्य अस्तित्व की कृपा से आध्यात्मिक कि उस दिव्य भोर का उदय होता है। जो असंभव को संभव बना देती है।  

गोवर्धन की उस पवन रज में, गिरिराज जी, की पावन परिक्रमा- 22 किलोमीटर की पैदल यात्रा नहीं थी, बल्कि प्रभु चरणों में सर्वस्व समर्पण की एक अनकही पुकार थी। मेरी उस अटल निष्ठा, अव्यक्त पीड़ा और अटूट विश्वास के बदले बिना कुछ मांगे गिरिराज धरण ने मुझे, न केवल एक नया आरोग्यता भरा जीवन वरदान में दिया, बल्कि अपने साक्षात अदृश्य अस्तित्व का एक ऐसा दिव्य प्रमाण भी सौंप दिया, जो मेरी आत्मा में सदा सदा के लिए अंकित हो गया। 

 

                         हरि-हरि बोलूं मैं ।

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