Saturday, February 19, 2022

पुस्तक परिचय - धर्म के नाम पर









         हज़ारों वर्षों से मनुष्य धर्म की हाथों कठपुतली बनता आया है। धर्म ने करोड़ों लोगों को प्रभावित  किया है , इसी के कारण बहुत से युद्ध हुए हैं । धर्म ने मानव जाति का नाश किया है या उद्धार किया है , इसके बारे में अनेक लेखकों ने अपने अपने मत दिए है। इसी विषय पर आचार्य श्री चतुरसेन शास्त्री जी द्वारा रचित पुस्तक ' धर्म के नाम पर ' एक दुर्लभ और विचारणीय पुस्तक है। पुस्तक के कवर पेज पर ही एक सीढ़ी बनी हुई है जिसमे लिखा है धर्म के नाम पर क्या क्या होता रहा है। शायद कवर पेज की तस्वीर में इन्हें पढ़ने में असुविधा हो इसलिए उस सीढ़ी पर अंकित विषयों को प्रस्तुत कर रहा हूँ :

बेवकूफ़ी , छल , धूर्तता , ठगी , झूठ ,अनाचार ,पाखण्ड ,पाप ,व्यभिचार , अपराध और हत्या। 


धर्म के नाम पर उपरोक्त सभी कुछ होता आया है और सिर्फ भारत ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों में।  लेकिन अब प्रश्न यह उठता है कि क्या धर्म ने हमारे साहित्य को भी प्रभावित किया है और अगर किया है तो किस हद तक। साहित्य का काम मनुष्यता को बचाए रखने का होता है और  किस हद तक धर्म का काम भी यही होना  चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है। ' धर्म के नाम पर '  पुस्तक में लेखक ने उपरोक्त विषयों पर विस्तार से चर्चा की है।  पिछले कुछ सालों में हमारे देश में भी धर्म के नाम पर बहुत कुछ अटपटा हुआ है। ऐसे में इस पुस्तक की महत्ता  और भी बढ़ जाती है ,  संभव  हो  तो इस दुर्लभ किताब को ज़रूर पढ़ें। 




पुस्तक का नाम - धर्म के नाम पर


लेखक -  आचार्य श्री चतुरसेन शास्त्री

Copyright -   ( Not mentioned in book )


Language - Hindi 


प्रकाशक - हिन्दी साहित्य मंडल , देहली 


प्रकाशन वर्ष -  तृतीय संस्करण , आठवीं आवृति   ,1949

पृष्ठ -152


मूल्य - INR 1/  ( एक रुपया केवल )


Binding -  Paperback


Size -  4" x 6 "


ISBN - Not Mentioned



लेखक -  आचार्य श्री चतुरसेन शास्त्री 

जन्म -   26th August , 1891 

निधन -  2nd February , 1960



NOTE : इस पुस्तक का प्रथम संस्करण सं 1934 में प्रकाशित हुआ था। लेखक के बारे में अधिक जानकारी के लिए उनका विकी पेज देखें। 



प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 




Saturday, February 12, 2022

पुस्तक परिचय - रवींद्र कविता कानन ( Rabindranath Tagore - POET of RIVER )

 


                                       पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला ' की प्रथम गद्य रचना 

                         

                                                  Rabindranath Tagore - POET of RIVER 




              नोबल साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर किसी परिचय के मोहताज नहीं।  " गीतांजलि " काव्य संग्रह के लिए इन्हें नोबल पुरस्कार से सं 1913 में नवाज़ा गया जिसका अँगरेज़ी अनुवाद  स्वयं कवि ने किया था।  बाद में इस पुस्तक का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ।पश्चिमी संसार रवीन्द्रनाथ टैगोर को नदी का कवि ( The Poet of River )  मानता है और यह सत्य भी है।   जैसा कि सर्वविदित है कि ' गीतांजलि ' बांग्ला भाषा में लिखी गयी थी , न सिर्फ़ गीतांजलि अपितु रवीन्द्रनाथ टैगोर का अधिकांश साहित्य बांग्ला भाषा में ही रचित हुआ। रवीन्द्रनाथ को उस युग में हिन्दी के पाठकों को समझाने का प्रथम प्रयास   सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' द्वारा  ' रविंद्र  कविता कानन ' पुस्तक को रच कर किया गया।  इस पुस्तक कि महत्ता इसलिए भी अधिक हो जाती है क्योंकि निराला जी की  यह प्रथम गद्य रचना है। इस पुस्तक में  विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर  की संक्षिप्त जीवनी भी उपलब्ध है और परिशिष्ट में क्रमानुसार रवींद्र ग्रन्थ - सूची भी दी गयी है जोकि  महादेव साहा द्वारा बनाई गयी है और पुस्तक के प्रथम संस्करण में उपलब्ध नहीं थी। इस ग्रन्थ - सूची में  सं 1878 में कवि की कविताओं की पुस्तक - कवि काहिनी से लेकर 1937 में प्रकाशित अंतिम पुस्तक -खाप छाड़ा से ( हास्य रस की कविताएँ एवं कहानियाँ ) का ब्यौरा है। । ' निराला  ' जी ने इस पुस्तक में  रवीन्द्रनाथ टैगोर  के बांग्ला भाषा के पद्यों का हिन्दी सार भी प्रस्तुत किया है। बानगी के तौर पर मूल बांग्ला का एक पद्य और उसका सार देखें -


" आजि ए प्रभाते      सहसा  केरने

  पथहारा   रवि - कर 

आलय न पेय   पड़ेछे आसिये

आमार प्राणेर  पर 

बहु दिन परे   एकटी  किरण 

गुहाये दियेछे   देखा  

पड़ेछे आमार आंधार  सलिले

एकटी  कनक -रेखा। "


हिन्दी सार - ( आज इस प्रभात के समय , सूर्य की एक किरण एकाएक अपनी राह क्यों भूल गयी , यह मेरी समझ में नहीं आता।  वह कही  ठहरने  की जगह न पा, मेरे प्राणों पर आकर गिर रही हैं।  मेरे हृदय की कंदरा में बहुत दिनों के बाद किरण दिखायी दे रही है , हे - मेरी अन्धकार सलिल राशिपर सोने की एक रेखा खिंची हुई है।  )

( पृष्ठ - ३० -३१ )







पुस्तक का नाम - रवींद्र  कविता कानन 

                           

लेखक -  सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' 

Copyright -   ( Not mentioned in book )

Language - Hindi 

प्रकाशक - हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय , बनारस 

प्रकाशन वर्ष - संशोधित तथा परिवर्धित जन - संस्करण  ,1954

पृष्ठ - 176

मूल्य - 15.3 Anna  ( साढ़े पंद्रह आने  )

Binding -  Paperback

Size -  4" x 6 "

ISBN - Not Mentioned



रवीन्द्रनाथ टैगोर


जन्म -  7th May  , 1861 . Kolkota 

निधन -  7th August  ,1941 . Kolkota


सूर्यकांत त्रिपाठी  ' निराला ' 


जन्म - 21st February , 1896 . Midnapore

निधन -  15th October , 1961 . Pryagraj 



प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 


NOTE : रवीन्द्रनाथ टैगोर एवं सूर्यकांत त्रिपाठी  ' निराला ' के बारे में   अधिक जानकारी के लिए उनका विकी पेज देखें। 


Monday, February 7, 2022

कीर्तिशेष गरिमा पाठक - संस्थापक ट्रस्टी - कलश कारवाँ फाउंडेशन

 



                                                                     गरिमा पाठक

                                                         ( 23-7-1970  ---- 07-02-2022 )




                     भूल  जाना मुझे धीरे धीरे 

                     सब कुछ बदल जाऐगा धीरे धीरे 


                    उगते सूरज को सभी नमन करेंगे ही

                    मैं तो  ढलती रात  हूँ

                    सुषुप्त मद्धम  साँसें  भी  नहीं हैं  मेरी

                    भूल जाना सब मुझे ....


- गरिमा पाठक


गरिमा पाठक आप सब से उन्हें  भूल जाने अनुरोध कर रही हैं , पर क्या इतना आसान होता है किसी को भुलाना ?


               हमारे समाज में अक्सर ऐसा होता है कि जब भी कोई विशिष्ट साहित्यकार / कलाकार  की आत्मा  इस संसार से  विदा लेती है तो अख़बारों और मीडिया में उनके महाप्रस्थान और उनके काम की जानकारी विस्तार से दी जाती है लेकिन  बहुत से गुमनाम साधारण साहित्यकार , कवि और कलाकार अक्सर गुमनामी में खो जाते हैं जिनकी जानकारी हमें न तो अख़बारों में  मिलती है और न ही मीडिया में।  ऐसी ही एक साहित्यकार गरिमा पाठक का कल ( 07-02-2022 ) को गोलोक गमन हो गया। 

  गरिमा जी मेरी पहली मुलाक़ात सितम्बर 2021 में बेंगलुरु में राही राज के निवास स्थान पर हुई। राही राज और गरिमा पाठक के सम्पादन  में प्रकाशित साझा कविता संग्रह - ' उगता सूरज ' का विमोचन 5 सितम्बर' 2021 को बैंगलोर में हुआ और इसी दिन ' कलश कारवाँ फाउंडेशन 'की स्थापना की घोषणा हुई। गरिमा जी ,कलश कारवाँ फाउंडेशन की संस्थापक ट्रस्टी थी।  गरिमा जी अत्यंत सहज , सरल , मिलनसार  और मृदुभाषी थी। 


इन्होने कविता , गीत , मुक्त छंद , लघुकथा आदि विधाओं में अपनी  रचनाओं के ज़रिये  समाज में व्याप्त कुरीतियों और विद्रूपताओं को बख़ूबी उजागर किया है, विशेषरूप से इनकी देश प्रेम की कविताएँ सराहनीय हैं। उनका सपना था कि कलश कारवाँ फाउंडेशन के तहत , भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वतंत्रता सैनानी एवं शहीदों की  याद में सेलुलर जेल , अंडमान निकोबार में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाये।  उनके जीवन में तो उनका सपना पूर्ण नहीं हो सका लेकिन आशा करता हूँ कि ' कलश कारवाँ फाउंडेशन ' उनके इस सपने को ज़रूर पूरा करेगी। 


साहित्य के प्रति उनका अतुल्य समर्पण कभी भुलाया नहीं जा सकता।  वह अपने साहित्यिक मित्रों को भी उत्साहित करती रहती थी।  आकाशवाणी से काव्य पाठ व अनेक साहित्यिक पत्र - पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई। 'साझा संकलन ' सप्त ऋषि ' एवं 'अभुदय काव्यमाला' में भी रचनाएँ प्रकाशित।  ई - बुक के रूप में 'अमृत सुधा ' एवं ' रिश्ते के अनुभव '। उनके एकल काव्य  संग्रह ' अनुभव सुधा ' का साहित्य जगत में भरपूर स्वागत हुआ। उनके और राही राज के सम्पादन में प्रकाशित साझा काव्य संग्रह ' उगता सूरज ' भी साहित्य जगत में काफ़ी चर्चित रहा। कविता के अलावा इन्हें चित्रकारी और हस्त - रेखाओं को पढ़ने का भी शौक़ था। सन 2000 से 2012 तक इन्होने चित्रकला शिक्षण संस्थान , बैतालिक रांची में चित्रकला शिक्षक के रूप में कार्य किया लेकिन कविता का दामन कभी नहीं छोड़ा। 26 दिसंबर 2022 को  बैंगलोर  में , अखिल भारतीय संस्कृति समन्वय समिति द्वारा आयोजित " कर्नाटक साहित्य उत्सव ' के दौरान गरिमा पाठक को पंडित सुरेश नीरव के कर कमलों से ' संस्कृति समन्वय सम्मान ' से सम्मानित किया गया। हाल ही में उन्हें अवध भारती संस्थान, लखनऊ द्वारा  ' तुलसी अवधी सम्मान  से भी नवाज़ा गया था। 

5 नवंबर 2021 को गरिमा पाठक द्वारा रचित ये कविता देखें -


मैं जा रही हूँ फिर से आने के लिए 

अब साथ मीत, गीत हैं गुनगुनाने के लिए 


चाहतें बहुत हैं अभी बाक़ी 

सपनें बहुत हैं अभी बाक़ी 

पूरे करने हैं ख़्वाब बाक़ी 


फिर से आऊँगी मैं 

सारे सपनें साकार करने के लिए 

अब साथ मीत, गीत हैं गुनगुनाने के लिए । 





गरिमा पाठक

जन्म - 23-07-1970 , डाल्टनगंज , पलामू 

निधन -07-02-2022, रांची 



NOTE : राही राज और प्रीति राही को उनके सहयोग के लिए शुक्रिया।



Thursday, January 13, 2022

घरेलू नुस्ख़ें शाइरी में

 

पिछले दिनों एक पुराना काग़ज़ मिल गया जिसमे चंद बीमारियों के घरेलू नुस्ख़ें   शाइरी में कहे गए हैं।  शाइर का नाम नहीं मालूम लेकिन कोरोना की इस तीसरी लहर के आगमन पर मन हुआ आप सभी से ये साझा कर लूँ।  आयुर्वेद में बहुत से घरेलू  नुस्खे मिल जाते हैं और चंद लोग उनका इस्तेमाल  भी करते हैं लेकिन ज़रूरी नहीं कि इन नुस्ख़ों से सभी को लाभ मिल जाए।  आपका मन हो तो इनको आज़माये अन्यथा बस शाइरी का लुत्फ़  उठायें। लीजिये प्रस्तुत हैं शाइरी में नुस्ख़ें -


जहाँ तक काम चलता हो ग़िज़ा से 

वहाँ तक चाहिए   बचना दवा  से 


अगर ख़ून कम बने बलगम   ज़ियादा 

तो खाये गाजर ,चने , शलगम ज़ियादा 


जिगर के बल   पर है   इंसान जीता 

अगर ज़हफ़ जिगर है तो खा पपीता 


जिगर में हो अगर गर्मी का अहसास 

मुरब्बबा आंवला खा या   अन्नानास


अगर हो जाता ही माएदा में गरानी 

तो पी लें सौंफ़ या अदरक का पानी 


थकन से हो अगर अलजात ढीलें

तो फ़ौरन दूध गरमा - गरम पी लें 


जो दुखता हो गला नज़ले के मारे 

तो कर नमकीन   पानी के गरारे 


अगर हो दर्द से  दाँतों  के   बैकुल

तो ऊँगली से मसूढ़ों पर नमक मल 


जो ताकत में कमी होती हो महसूस 

तो मिश्री की डली  मुल्तान की चूस


शिफ़ा चाहिए अगर खाँसी से जल्दी  

तो पी ले दूध में    थोड़ी सी   हल्दी 


अगर कानो में  तकलीफ़    होए

तो सरसो का तेल फाये से निचोड़ 


अगर आँखों में पड़ जाते हो जाले

तो दक्खनी  मिर्च घी के साथ खा ले 


दमा में ये ग़िज़ा   बेशक   हैं अच्छी 

खटाई  छोड़ , खा दरिया की मछली 


अगर तुझको लगे जाड़े में सर्दी 

तो इस्तेमाल कर अंडे की जर्दी 


जो बदहजमी में तू चाहे अफ़ाफ़ा

तो दो -एक वक़्त कर तू  फ़ाका  




प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 



NOTE : मालूम नहीं उपरोक्त नुस्ख़ें किस शाइर या  हक़ीम ने लिखे हैं।  शाइरी का लुत्फ़ ज़रूर उठायें लेकिन नुस्ख़ें अपनी ज़िम्मेदारी पे आज़माये। 

Sunday, January 2, 2022

पुस्तक परिचय - राम - चर्चा

 







मुंशी प्रेमचंद हिन्दी साहित्य में ' उपन्यास सम्राट ' के नाम से जाने जाते हैं। उन्होंने 350 से अधिक कहानियाँ लिखी और अनेक उपन्यासों की रचना करी।  उनका अधिकांश साहित्य न सिर्फ़ भारतीय  अपितु विश्व की अनेक  भाषाओं में अनूदित हो चुका हैं। यह तो सर्वविदित है कि उन्होंने सरस्वती प्रेस की स्थापना करी और उसे अपने ख़ून - पसीने से सींचा।  अधिकांश महान साहित्यकारों ने बाल साहित्य की भी रचना करी हैं। आज प्रेमचंद द्वारा रचित  दुर्लभ पुस्तक  ' राम -  चर्चा ' का परिचय प्रस्तुत है। बच्चों के लिए रचित ' राम - चर्चा ' पुस्तक की भाषा अत्यंत सरल और सहज है और इसका फॉण्ट साइज भी बड़ा है जिससे बच्चें इसे सुलभता से पढ़ सकें।  इस पुस्तक की रचना के माध्यम से प्रेमचंद ने रामायण का परिचय बच्चों से कराया है जिससे बच्चें भारतीय संस्कृति से परिचित हो सकें और उन संस्कारों को अपने जीवन में ढाल सकें। पुस्तक सात खण्डों में विभाजित हैं - बाल - काण्ड , अयोध्या - काण्ड , वन - काण्ड , किष्किंधा - काण्ड , सुन्दर - काण्ड , लंका - काण्ड और उत्तर - काण्ड ।  

21 वी सदी में जबकि संसार बहुत सिकुड़ चुका है और भारत पाश्चात्य संस्कृति की धारा में बहता  जा रहा है , यह पुस्तक आज भी भारतीय बच्चों को भारतीय संस्कृति से अवगत कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं। यक़ीनन अगर अभिभावक यह चाहते हो कि उनके बच्चें भी भारतीय संस्कृति से परिचित हो तो इस पुस्तक को अपने बच्चों के लिए उपलब्ध कराएँ।  आज प्रिंटिंग की दुनिया में एक से बढ़ कर एक नवीनतम मशीनें उपलब्ध हैं लेकिन प्रेमचंद  जैसे लेखक अब नहीं। उनके पुत्र श्रीपत राय ने इस पुस्तक का प्रथम संस्करण ,  प्रेमचंद  के निधन के दो वर्ष बाद 1938 में  प्रकाशित किया।  साहित्य के प्रति प्रेमचंद को अमूल्य बलिदान एवं त्याग का ऋण, हिन्दी साहित्य कभी नहीं उतार पायेगा।  हो सकता है आज इस पुस्तक का कोई ओफ़्सेट प्रिंटिंग का संस्करण उपलब्ध हो लेकिन इस संस्करण को पढ़ते हुए पाठक प्रेमचंद की आत्मा को महसूस कर सकता है , इसीलिए ' राम - चर्चा ' पुस्तक का  यह संस्करण  अत्यंत दुर्लभ है। अफ़सोस कि ऐसी पुस्तक बच्चों के पाठ्यक्रम  में शामिल नहीं करी  जाती। भाषा की सरलता एवं सहजता की बानगी के तौर   पुस्तक का  प्रथम पृष्ठ  देखें -






पुस्तक का नाम -    राम - चर्चा 

( श्री रामचंद्र जी की अमर कहानी )


 लेखक - प्रेमचंद 


भाषा - हिन्दी


Copyright - सरस्वती प्रेस , बनारस , 1938 


प्रकाशक / मुद्रक - श्रीपत राय , सरस्वती प्रेस , बनारस कैंट 


प्रकाशन वर्ष - नया सस्ता  संस्करण ,1941


पृष्ठ - 198


मूल्य - 1/ INR  ( एक  रुपया      केवल )


Binding -  पेपरबैक 


Size - 6" x 8"


ISBN - Not Mentioned






लेखक - धनपतराय श्रीवास्तव 


उपनाम - प्रेमचंद 


जन्म -  31st July   , 1880 , Village Lamhai   , Varanasi 


निधन - 8 October  ,1936 . Varanasi 


                                                                                                  


                                                                                             प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 


NOTE :प्रेमचंद और उनके साहित्य के बारे में आधी जानकारी के लिए उनका विकी पेज देखें। 




Friday, December 24, 2021

पुस्तक परिचय - त्सीगानी ( जिप्सी )







 इतिहास ने इस बात को स्वीकारा है जिप्सी लोग हज़ारो साल पहले भारत से पलायन होकर अमेरिका एवं यूरोपियन देशों में बस गए थे। जिप्सियों का जीवन हम सभी के लिए कौतुहल का विषय रहा है। रूसी कवि  Alexander Sergeyevich Pushkin द्वारा रचित जिप्सी कविता में जिप्सियों की जीवन शैली के अनेक पहलुओं को उजागर किया गया हैं। 


रूस के महान कवि Alexander Sergeyevich Pushkin की कविताओं का संग्रह जिप्सी  पहली बार मूल रूसी भाषा से हिन्दी में वीर राजेंद्र ऋषि द्वारा अनुदित है , इससे पूर्व रूसी साहित्य का अनुवाद अँगरेज़ी भाषा के माध्यम से ही हुआ है।  इस पुस्तक की प्रस्तावना प्रमथ नाथ बनर्जी , तत्कालीन अध्यक्ष , विदेशी भाषा विद्यालय , रक्षा मंत्रालय , भारत सरकार द्वारा लिखी गयी है। पुस्तक, लेखक द्वारा उनके रूसी गुरु ब्लादिमीर  अनातोलेविच शिबायेव को समर्पित है। यह पुस्तक इसलिए भी विशिष्ट बन पड़ी है क्योंकि इसमें हिन्दी अनुवाद के साथ साथ रूसी  मूलपाठ भी देवनागरी लिपि में दिया गया है। पुस्तक के आरम्भ में पुश्किन और उनके काव्य का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है।ऊपर तस्वीर में दी गए जिप्सी कविता के अनुवाद की क्रमश: चंद और पंक्तियाँ   प्रस्तुत है , ऊपर चित्र में दी गयी पंक्तियों से आगे पढ़ें -


परिवार सब चारो और बैठा खाना पका रहा है 

खुले मैदान में  चर  रहे हैं घोड़े ,

ख़ेमों के पीछे पालतू रीछ स्वछंद लेटा हुआ है ,

कण कण सजीव हो उठा है मैदान का। 

और वे सांसारिक चिंताएँ कुटुम्ब की ,

जो प्रातः ही तैयार होगा अग्रिम लघुयात्रा हित ,

और गीत स्त्रियों के , और चीख़ बच्चों की ,

और शब्द सफ़री निहाई का। 



पुस्तक का नाम -     जिप्सी 

                     ( कविता संग्रह )


मूल लेखक -  Alexander Sergeyevich Pushkin 


अनुवादक -   वीर राजेंद्र ऋषि 

Copyright -  Alexander Sergeyevich Pushkin

( Not mentioned in book )

Language - हिन्दी 

प्रकाशक - आत्माराम & संस 

प्रकाशन वर्ष - प्रथम संस्करण ,1955

पृष्ठ - 78

मूल्य - 2/ INR  (दो    रुपए केवल )

Binding -  हार्डबाउंड 

Size -  4" x 6 "

ISBN - Not Mentioned



Alexander Sergeyevich Pushkin 

जन्म -  6th June  , 1799. Moscow 

निधन - 10th February  ,1837 . Saint Petersburg 




प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 


NOTE : Alexander Sergeyevich Pushkin  के बारे में अधिक जानकारी के लिए उनका विकी पेज देखें। 

Tuesday, December 21, 2021

पुस्तक परिचय - अन्तस ( ग़ज़ल संग्रह )

 





ले    के   मशाल   निकलने   का    वक़्त है 

दुनिया को इक सिरे से बदलने का वक़्त है


मशाल हाथ में लेकर निकलने वाले और इस दुनिया को बदलने वाले शाइर अरविन्द 'असर ' एक मारूफ़ शाइर के साथ साथ बहुत ही नफ़ीस इंसान भी है।  दिल्ली में मेरी चंद मुलाक़ाते उनसे हुई हैं और हर मुलाक़ात हमारी मित्रता को प्रगाढ़ करती रही है।  'अन्तस ' उनका प्रथम ग़ज़ल संग्रह है जिसमे बहुत से  इन्तख़ाबी अशआर  हैं जो समाज और व्यक्ति को एक दिशा दे सकने में सक्षम हैं।  एक शाइर के लिए इससे बड़ी उपलब्धि और सम्मान क्या हो सकता है कि उसके अशआर ज़माने को बदलने की क़ुव्वत  रखते हैं। बड़े से बड़े मफ़हूम  को शाइर इतनी सादगी से एक शे'र में पिरोता है कि पाठक एक पल को अचकचा जाता है , उनके चंद अशआर  देखें  -


दो ही तबके हैं आज दुनिया में 

एक   तबका   लगान   देता है 


पेड़ खुद काटकर ऐ 'असर '

लोग    जलते  रहे  धूप   में 


पहुँच हम   चाँद पर जाते 

हमें दिल तक पहुँचना था 


अरविन्द 'असर 'ने इस ग़ज़ल संग्रह को कुछ यूँ समर्पित किया है - 

" प्यारे भतीजो , रचित ,ओशो एवं पुत्र 'श्री ' की  मुस्कुराहटों के नाम '। लगता है अरविन्द 'असर ' ओशो की  विचारधार से भी प्रभावित है। 'अपनी बात ' में शाइर ने प्रसिद्ध शाइर कृष्ण बिहारी 'नूर ' से अपनी चंद मुलाक़ातों का ज़िक्र भी किया है। यक़ीनन उनकी ग़ज़लों में लखनवी नफ़ासत भी देखने को मिलती है। बानगी के तौर पर चंद अशआर देखें -


आज को आज कल को कल कहना  

सख़्त मुश्किल है अब ग़ज़ल कहना 


वो आँखों ही आँखों में मुझे  तोल रहा है 

लब उसके हैं ख़ामोश मगर बोल रहा है 


इस तरह लहरा के तेरे रुख़ पे ज़ुल्फ़े आ गयीं 

चाँद   को जैसे   घने बादल   छुपाने   आ गये 


उनके कुछ अशआर में ज़िंदगी का फ़लसफ़ा इतनी सादगी से उजागर हुआ है कि एक समझदार पाठक को उसे  समझने में ज़रा भी वक़्त नहीं लगेगा , बानगी के तौर पर चंद अशआर देखें - 


यूँ तो   ज़िंदा   रहता  हूँ  मैं

लेकिन मुझमे मरता क्या है 


वो न समझेगा मोल धरती का 

वो परिंदा अभी    उड़ान में है



अरविन्द 'असर ' एक सच्चा शाइर है और इसीलिए सच कहने में हिचकिचाता नहीं।  उनकी ग़ज़लों में कोई बनावट या चमत्कार नहीं बल्कि नदी के पानी जैसी रवानी है जो किसी समुन्दर में भी देखने  को नहीं मिलती , यह शे'र देखें -


न जाने   कब से हैं  ठहरे हुए  समुन्दर  सब 

ठहर गयी जो कहीं  पर  नदी तो क्या होगा  


ज़िंदगी की पीड़ा और यथार्थ को उजागर करते उनके चंद अशआर और देखें - 


चाहे    जाना   बाज़ी    हार 

सच को सच ही कहना यार 


बात ये काफ़ी है सबके डूब मरने के लिए 

एक भी इंसान दुनिया में अगर भूखा रहे 


लेकिन इस बेशरम दुनिया में कोई भी डूब कर नहीं मरता और रोज़ दुनिया में लाखों इंसान भूखे सोते हैं। सारी दुनिया किसी उन्माद में सोइ हुई लगती है , जाग रहा है  तो बस एक शाइर।  ग़र इस शाइर को भी नींद आ गयी तो क्या होगा ।  दुनिया बद से बदतर होती जाएगी, दुनिया रसातल में डूब  जाएगी , बस रह जायेगा जागता हुआ शाइर , इसलिए मेरी मुराद दुनिया के उन सब शाइरों से हैं जो अगर सो रहे हैं तो जाग जाए और इस सोती हुई दुनिया को भी जगाये। इस बेशक़ीमती दुर्लभ  किताब को ज़रूर पढ़े और क्रांति के आहवाहन में इस जागते हुए शाइर के साथ जुड़ें। 


नींद में डूबी है ये दुनिया 

एक सितारा जाग रहा है .




 पुस्तक का नाम - अन्तस     ( ग़ज़ल   संग्रह )


लेखक -  अरविन्द 'असर '


प्रकाशक - श्वेता  प्रकाशन , लखनऊ 


प्रकाशन वर्ष - प्रथम संस्करण , 2007


कॉपीराइट - अरविन्द 'असर '  


पृष्ठ - 122


मूल्य - ( 150/ INR  (एक सौ  पचास  रुपए केवल )


Binding -  Hardbound 


Size - डिमाई 4.8 " x 7.5 "


ISBN - Not Mentioned


 


                                                                              प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस