Monday, August 31, 2020

Dr Strelkova Gyuzel Vladimirovna - रूसी - हिन्दी विदुषी



 जिस तरह किताबें  सिर्फ़ उनकी नहीं होती जो उन्हें ख़रीदतें हैं अपितु किताबें  होती हैं उनकी जो उन्हें पढ़तें हैं,  उसी तरह  भाषा भी सिर्फ़ उनकी नहीं होती जो अपनी माँ के पेट से सीख कर आते हैं अपितु होती है उनकी भी जो उस भाषा को पहले सीखते हैं और फिर उसी को ओढ़ते-बिछाते हैं।  हिन्दी भाषा और साहित्य को भारतीय लेखकों और साहित्यकारों ने तो समृद्ध  किया ही हैं  लेकिन इस दिशा में विदेशी लेखकों और साहित्यकारों के अतुलनीय योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता , विशेषरूप से विदेशी भाषाओं से हिन्दी और हिन्दी से विदेशी भाषाओं में किया गया अनुवाद। इन साहित्यिक अनुवादों ने हिन्दी भाषा और साहित्य को अधिक समृद्ध किया है।आज विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों  में हिन्दी भाषा और साहित्य का पठन-पाठन ज़ारी है और कई विश्वविद्यालयों में तो विदेशी विद्वान ही हिन्दी भाषा  पढ़ा रहे हैं , उन्ही विद्वानों में से एक कड़ी है रूसी - हिन्दी  विदुषी  डॉ स्ट्रेलकोवा गुज़ेल व्लदीमीरोवना। 

वर्तमान में Dr Strelkova Gyuzel Vladimirovna  (स्ट्रेलकोवा  गुज़ेल व्लदीमीरोवना ) IAAS  MSU ( Institute of Asian & African Studies ,Moscow State University )  में हिन्दी भाषा और साहित्य की एसोसिएट  प्रोफ़ेसर है।  आप हिन्दी के साथ साथ मराठी भाषा भी पढ़ाती हैं। अनेक रूसी और अन्तरराष्ट्रीय साहित्यिक बैठकों में पेपर पढ़ चुकी हैं। आप ने के हिन्दी के कई प्रतिष्ठित लेखकों के  साहित्य का हिन्दी से रूसी  भाषा  में अनुवाद किया हैं जिनमे कृष्ण बलदेव वैद , कुँवर नारायण , मृदुला गर्ग के नाम उल्लेखनीय  हैं।  महात्मा गाँधी की १५० वी जन्मशती के अवसर पर इनके द्वारा अनूदित,  महात्मा गाँधी द्वारा रचित पुस्तकों  - हिन्द  स्वराज और अनासक्ति योग -गीता का सन्देश ,  का रूसी भाषा में अनुवाद काफी चर्चित रहा। 

आजकल आप कुँवर नारायण के कहानी संग्रह " आकारों के आस पास " एवं चंपा वैद के कविता संग्रह " स्वप्न में घर " के रूसी भाषा के अनुवाद कार्य में संलग्न हैं 

गुज़ेल से मेरी पहली मुलाक़ात दिल्ली में  स्थित  साहित्य अकादमी  के पुस्कालय में हुई थी। जब मैंने उन्हें अपना परिचय दिया और बताया कि दिल्ली के रूसी सांस्कृतिक केंद्र में हम लोग " परिचय साहित्य परिषद् " के तत्त्वावधान  में नियमित मासिक साहित्यिक कार्यक्रम करते हैं तो वह मुझसे काफ़ी मुतासिर  हो गयी।  इत्तफ़ाक से दो दिन बाद ही " चौधरी  चरण सिंह विश्वविद्यालय " मेरठ में उन्हें हिन्दी कथा साहित्य पर पेपर पढ़ना था। उन्होंने मुझसे इसरार  किया कि मैं भी उनके साथ मेरठ चलूँ और मैंने स्वीकार कर लिया। विश्वविद्यालय में  पेपर पढ़ने के बाद मैं उन्हें सरधना (मेरठ के नज़दीक एक मशहूर क़स्बा ) ले गया जहाँ एक मशहूर चर्च है जिसमे साल में दो बार  बड़े मेले लगते हैं। सरधना कस्बे से २ किलोमीटर दूर त्यागियों का गाँव जुलेड़ा  है और उस गावँ में मेरा एक परिचित परिवार भी रहता है।  मैंने  गुज़ेल से पूछा कि क्या वो गाँव देखना पसंद करेंगी और इसके लिए वह सहर्ष तैयार हो गयी।  हम लोग जुलेड़ा गाँव गये , गाँव के अधिकाँश निवासी एक फ़िरंगी को देखकर हतप्रभ थे।  हम लोग क़रीब एक घंटा वहां रुके होंगे और फिर रात तक दिल्ली लौट आये थे।  उसके बाद भी दिल्ली में ही उनसे चंद मुलाक़ाते और हुई  लेकिन बैंगलोर आ जाने के कारण  बहुत से साहित्यिक सिलसिले टूट गए ,वज्ह कुछ भी रही हो पर सिलसिले टूट गए।        

ख़ैर और क्या कहूँ , बस फ़िराक़ गोरखपुरी का यह शे'र याद आ गया -


एक मुद्दत से तेरी याद भी आई न हमें

और हम भूल गए हो तुझे ऐसा भी नहीं 


Sunday, August 30, 2020

कीर्तिशेष डॉ श्याम निर्मम - ज़िंदगी का गीतकार




तुम अमर बनो 

हम तो जन्म हैं 

बार- बार बाँहों में मृत्यु को कसेंगे 


 मृत्यु को अपनी बाँहों में बार बार कसने वाला गीतकार श्याम निर्मम के अलावा कौन हो सकता है।  जिसने अपनी तमाम उम्र ही ज़िंदगी से लड़ते लड़ते निकाल  दी हो , मौत को उसकी नहीं तो किसकी बाँहों में  सुकून  मिलेगा ?  

डॉ श्याम निर्मम से मेरी पहली मुलाक़ात शायद डॉ धनंजय सिंह के साथ ग़ाज़ियाबाद से दिल्ली जाने वाली सुबह की रेलगाड़ी मेरठ  शटल में ही हुई थी। मैं भी उन दिनों ग़ाज़ियाबाद से दिल्ली रेलगाड़ी से जाया करता था। हम तीनों का दफ़्तर दिल्ली के कनॉट  प्लेस में ही था। मैं स्टेट्समैन में काम करता था, डॉ धनंजय सिंह, कादम्बिनी में और श्याम निर्मम NDMC की पत्रिका पालिका समाचार में कार्य करते थे , इसीलिए कई बार हमारी मुलाक़ाते कनॉट प्लेस में ही होती थी। 

 पालिका समाचार में अपनी रचनाओं के प्रकाशन हेतु या पारिश्रमिक के सिलसिले में , मैं अक्सर उनके दफ़्तर भी जाया करता था।  श्याम निर्मम अत्यंत सहज,सरल, विनम्र , ख़ुशदिल और ज़िंदादिल इंसान  थे। हमेशा  मेरी जमकर ख़ातिरदारी  करते  और कभी अगर  लंच के समय वहाँ होता तो अपने घर का टिफ़िन मेरे साथ ज़रूर साझा  करते। मेरे प्रति  उनके प्रेम को आज भी हृदयतल की गहराइयों  से महसूस करता हूँ। 

डॉ श्याम निर्मम ने साहित्य की विभिन्न विधाओं में रचनाएँ कही लेकिन गीत उनकी आत्मा थी, उनके अपने शब्दों में - " कविता को सदा अपने पास  पाया और उसे लिखने पर एक परम आनंद जैसा सुख मिला।  यह सुख-क्षण ही शायद मुझे बार-बार गीत लिखने को विवश करता है और प्रेरित भी करता है। यूँ अनेक विधाओं में रचनाकर्म किया है ,पर सबसे अधिक संतुष्टि मुझे गीत लिखने पर ही हुई है।" श्याम निर्मम ने अपने गीतों में ज़िंदगी की त्रासदी को बख़ूबी उकेरा है , बानगी के लिए उनके एक नव गीत की यह पंक्तियाँ देखें -


फूलों ने वसंत आने पर गुलदस्ते बाँटे

पर जाने क्यों अपने मन में चुभे बहुत काँटे

अम्मा रोगी -

बाबू जी का चश्मा बना नहीं 

बच्चों की पिछली फ़ीसों का क़र्ज़ा चुका नहीं 


डॉ श्याम निर्मम अपने ख़ास तरन्नुम में गीत पढ़ा करते थे।  उन्होंने देश भर के अनेक कवि-सम्मेलनों में अपने गीतों का पाठ किया , कवि-सम्मेलनों के अलावा दिल्ली , लखनऊ , इलाहाबाद ,ग्वालियर , राजकोट , भोपाल , मुंबई आदि अनेक आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्र से अपनी रचनाओं की प्रस्तुति की। देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। देश के अनेक श्रेष्ठ रचनाकारों की पुस्तकों की भूमिका भी लिखी।  गीत विधा में उनकी गहरी पैठ थी जिसके चलते उन्होंने मूर्धन्य गीतकार पंडित वीरेंद्र मिश्र के कई गीत संग्रहों का सम्पादन भी किया। लगभग ३८ वर्षों तक पालिका समाचार से सम्बद्ध रहकर ,वही से कार्यकारी सम्पादक  के पद से सेवानिवृत हुए। 

उनके एक दूसरे नव गीत की चंद पंक्तिया देखें -

ये कैसी अनहोनी 

जीवन विष पीते बीता 

उम्र बढ़े हर रोज़ 

मगर ये अश्रु पात्र रीता


मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि  नित जीवन विष पीने वाले इस गीतकार ने हिन्दी साहित्य को अपने मीठे गीतों से अत्यंत समृद्ध  किया है । अफ़सोस कि मृत्यु को अपनी बाँहों में कसने वाले इस गीतकार को एक दुखद दिन,मृत्यु ने ही अपनी  बाँहों में सदा सदा के लिए समेट लिया,लेकिन मर मर कर भी जीना कोई उनसे सीखे , उन्ही की  ग़ज़ल का यह शे'र देखें -

रोज़  ही   सौ    बहाने   किये 

जिस तरह जी सके हम जिये


उनकी   प्रकाशित पुस्तकें -

हाशिये पर हम - नव गीत संग्रह 

चक्रव्यूह  तोड़ते हुए  - कविता संगह 

लो मैं आ गया तथागत - गौतम बुद्ध पर केंद्रित कविता संग्रह

पंछी गुमसुम पिंजरे में - ग़ज़ल संग्रह  



वास्तविक नाम -  श्याम बिहारी कौशिक 

कवि उपनाम -   श्याम निर्मम 

जन्म - १ अगस्त ' १९५० , सिकंदराबाद ( उत्तर प्रदेश )

मृत्यु - २४ दिसंबर ' २०१२ , नई दिल्ली 


NOTE : उनके सुपुत्र श्री पराग कौशिक को उनके सहयोग के लिए शुक्रिया।


Friday, August 28, 2020

सैर-ए-गुलफरोशां और फूलों वाला पंखा

 मैंने २१ जुलाई २०२० अदबीयात्रा के  इसी ब्लॉग पर सैर-ए-गुलफरोशां या'नी फूल वालों की सैर के बारे में  एक पुरानी नज़्म का उल्लेख किया था। सैर-ए-गुलफरोशां की शरुआत हिन्दुस्तान के सम्राट मुग़ल बादशाह अकबर शाह ll ( द्वितीय )  के समय  में १८१२ में हुई थी। अकबर शाह ll ( द्वितीय) अपने बड़े बेटे सिराजुद्दीन ज़फर से ख़फ़ा थे और अपने छोटे बेटे मिर्ज़ा जहांगीर को अपना वारिस बनाना  चाहते थे लेकिन अँग्रेज़ों को यह बात नापसंद थी।  एक दिन मिर्ज़ा जहांगीर ने ब्रिटिश रेजिडेंट पर गोली चला दी ,क़िस्मत से वह तो बच गए लेकिन इस कारनामे के लिए  मिर्ज़ा जहांगीर को इलाहाबाद भेज दिया गया था।  मिर्ज़ा जहांगीर  की माँ मुमताज़ महल बेगम ने मन्नत मांगी कि जब  उनका  बेटा इलाहाबाद से रिहा कर दिया जायेगा तो वह महरौली में स्तिथ ख़्वाज़ा बख़्तियार' काकी " की दरगाह पर फूलों  की चादर चढ़ायेंगी ।  कुछ सालों बाद मिर्ज़ा जहांगीर, इलाहाबाद से रिहा  कर दिए गए  तो  अपने वायदे के अनुसार मुमताज़ महल बेगम  ने ख़्वाज़ा बख़्तियार ' काकी " की दरगाह पर फूलों की चादर चढ़ाई। मुग़ल बादशाह सभी धर्मों का आदर करते थे इसीलिए इस अवसर पर महरौली में स्थित योगमाया मंदिर में भी फूलों का पंखा चढ़ाया गया। 

१८१२ में शरू हुए इस पहले सैर-ए-गुलफरोशां के पर्व पर युवराज सिराजुद्दीन ज़फ़र ( बहादुर शाह ज़फ़र ) ने  फूलों  का पंखा पेश कर यह  कहा था -


नूर -ए-अलताफ़-ओ - करम की है यह

सब उसके झलक 

कि वो ज़ाहिर है मलिक और बातिन में मलक 

इस तमाशे की न क्यों  धूम हो अफ़लाक तलक 

आफ़ताबी से ख़जिल जिसके हैं खुरशीद मलक 

यह बना उस शह-ए -अकबर की बदौलत पंखा 


शायक  इस सैर के सब आज हैं बादीद-ए -दिल 

वाकई  सैर है ये देखने ही के क़ाबिल 

चश्म-ए -अंजुम  हो न इस सैर पर क्यूँकर  माइल 


सैर ये देखें है वो बेगम वाला मंज़िल 

जिसके दीवा का रखे माह से निस्बत पंखा 


रंग का जोश है माही से जिबस माह तलक 

डूबे हैं अंग में मदहोश से आगाह तलक 

आज रंगीन हैं रैयत से लगा शाह तलक 

ज़ाफरोज़ार हैं इक बाम से दरगाह तलक 


देखने आई है इस रंग से ख़लकत पंखा। 


इस पहली फूल वालों की सैर को देखने पूरी दिल्ली उमड़ पड़ी थी और सात दिनों तक महरौली में जश्न मनाया गया था।  


Thursday, August 27, 2020

कीर्तिशेष देवराज दिनेश - मज़दूरों का मसीहा

 दिल्ली के आई टी ओ के चौराहे और Rouse   Avenue  ( अब दीनदयाल उपाध्याय   मार्ग )  के सिरे पर स्थित " आंध्रा एजुकेशन सोसाइटी हायर सेकेंडरी  स्कूल " से ही मैंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा  ग्रहण करी और इस  स्कूल से मेरी बहुत-सी यादे जुडी हैं।  यह स्कूल आज भी वही स्थित हैं, जब कभी आई टी ओ  चौराहे से गुज़रता हैं तो दूर से ही एक नज़र उसको निहार लेता हूँ।स्कूल से सटा हुआ एक गन्दा नाला  भी बहता था और स्कूल के पिछली तरफ़ के मैदान में एक पुरानी लोहे की तोप भी थी जिस पर अक्सर अपने दोस्तों के साथ बैठ कर गपशप किया करता  था।   

शायद १९७१-७२ की बात है , मैं , Rouse   Avenue  के फुटपाथ पर चल रहा था , तभी मैंने दूर से लगभग पाँच फुट वाले उस मोटे व्यक्ति को देखा , जिसकी नज़रे धरती की तरफ थी,बायें कंधे पर झूलता एक बैग था  और वह एक खास अंदाज़ में भारी क़दमों से आगे बढ़ता जा रहा था। राह में बैठा एक  भिखारी भीख की गुहार लगा रहा था , भिखारी के करीब  पहुँचते ही उस व्यक्ति ने अपनी दायी जेब से सौ रुपए का नोट निकाल भिखारी की झोली में डाल दिया था और बिना किसी प्रतिक्रिया के आगे बढ़ गया था। उनके भिखारी को पैसे देने के अंदाज़ से ऐसा लग रहा था जैसे वो अपनी जेब खाली करना चाहते है और माया के बोझ से मुक्त होना चाहते है। उन दिनों  सौ रुपए  एक रक़म होती थी। अचानक मुझे वो चेहरा जाना पहचाना-सा लगा। हाँ , वही थे देवराज दिनेश जिन्हे मैंने शायद कुछ दिन पहले ही गाँधी नगर , ग़ाज़ियाबाद  में आयोजित एक कवि-सम्मेलन में सुना था।  मैंने यही  उन्हें पहली और  आख़िरी  बार सुना था।  यहाँ  उन्होंने जो कविता सुनाई थी वह  तो मुझे अब  याद नहीं लेकिन प्रसंग कुछ इस प्रकार का था कि एक सरकारी ऑफ़िसर अपने बच्चे के जन्मदिन पर अपने मित्रो को आमंत्रित करता  है और इस अवसर पर आमंत्रित अतिथि महँगे महँगे उपहार लाते हैं जैसे कि  टेलीविज़न , फ्रीज , घड़ी   अलमारी आदि लेकिन बच्चे के लिए कोई एक खिलौना   भी नहीं लाता । उनके  एक चर्चित गीत  के कुछ बंद देखें - 


मैं मज़दूर मुझे देवों की बस्ती से क्या ?

अगणित बार धरा पर मैंने स्वर्ग बनाये 


अम्बर  पर जितने तारे ,  उतने वर्षों से 

मेरे  पुरखों  ने धरती    का रूप सँवारा

धरती को सुन्दरतम करने की ममता में 

बिता चुका है कई  पीढ़ियाँ  वंश हमारा 


और  अभी   आगे आने   वाली सदियों में 

मेरे  वंशज     धरती का     उद्धार  करेंगे 

इस प्यासी धरती के   हित में ही लाया था 

हिमगिरि चीर,सुखद गंगा की निर्मल धारा


मैंने     रेगिस्तानों    की रेती धो -धोकर  

वंध्या धरती पर भी स्वर्णिम पुष्प खिलाए


मैं मज़दूर  मुझे देवो की बस्ती से क्या 


धरा पर स्वर्ग बनाने  वाला  यह कवि विभिन्न रसायनों का   एक अद्भुत मिश्रण था।  जिस सहजता से आप प्रेम गीत लिखते थे उतनी ही सहजता से वीर रस की कवितायें भी।  इन्होने कुछ फिल्मों के लिए गीत लिखे और चंद फिल्मों में अभिनय भी किया।  कवि सम्मेलनों में अपनी पुरज़ोर आवाज़ में कविता सुनाते थे और ऐसा लगता था जैसे कोई मदारी तमाशा  दिखा  रहा हो।  श्रोता अक्सर  उनके कविता पाठ  से सम्मोहित हो जाते थे और उनकी कविता का जादू एक लम्बे अरसे तक श्रोताओं के  ज़हन और रूह में बना रहता था। कविता और गीत के अलावा देवराज दिनेश ने एकांकी भी लिखी।  उनका कविता संग्रह - गंध और पराग एवं एकांकी मानव प्रताप  पुस्तकें अत्यंत  लोकप्रिय  हुई।   

दुःख की बात है कि इतने बड़े कवि के विकी पेज पर बहुत ही कम जानकारी है और उनका कोई वीडियो भी मुझे मिल नहीं पाया। धरती पर स्वर्ग बनाने वाले ऐसे कवि फिर फिर धरती पर आते ही रहेंगे पर क्या हमारा समाज और देश उनका समुचित सम्मान कर पायेगा ?ऐसे बहुत से देश हैं जहाँ शिक्षक और कवि -लेखक  का ओहदा और इज़्ज़त राजनैतिक नेताओं और सरकारी अफ़सरों से अधिक होती है लेकिन हमारे देश में ऐसा यक़ीनन नहीं हैं, लेकिन कब तक ?



जन्म - २२' जनवरी , १९२२ - जलालपुर जट्टा ( अब पकिस्तान में )

निधन - १२' सितम्बर , १९८७ - दिल्ली 

Wednesday, August 26, 2020

एक कविता मेरी प्रेमिका जोंक के नाम - Vers a szerelmes piócáról ( हंगेरियन कविता का हिन्दी अनुवाद )

 

एक कविता मेरी प्रेमिका जोंक के नाम - Vers a szerelmes piócáról 


मेरे पास है एक बड़ी पीली प्लेट 

और प्लेट के बीचोबीच है एक सूराख़ 

सूराख़  के दूसरी ओर मेरी प्रेमिका जोंक

उसी वक़्त लपकता शीत का चाँद मेरी ओर

क्योंकि मेरे पास है एक बड़ी पीली जोंक

और जोंक के बीचोबीच है एक सूराख़ 

जिसमे समा जाते हैं हज़ारों ततैये 

अब मेरी प्लेट में सेब के पेड़ की टहनियाँ हैं

और एक काला सूराख़ 

जिस में समा जाती है बड़ी पीली प्लेट 

बीचोबीच गुनगुनाती जोंक के साथ 

मेरी प्रेमिका जोंक गाती है एक गीत -

'हज़ारों ततैये मेरे गले में 

सेब की टहनियाँ मेरे चूतड़ों में 

जलती बकरियाँ झाड़ियों में '। 


कवि - Ladik Katalin 

अनुवादक - इन्दुकांत आंगिरस 

 

 

Tuesday, August 25, 2020

पेड़ों की छाँव तले रचना पाठ - कविताई पेड़


पेड़-पौधे  हैं  बहुत बौने तुम्हारे 

रास्तों में एक भी बरगद नहीं हैं 


दुष्यंत  कुमार का उपरोक्त शे'र कॉन्क्रीट के जंगलों और मल्टीस्टोरी अपार्टमेंट्स की बालकोनियों में पनपती गमला संस्कृति पर तीखा व्यंग करता हैं। पेड़ अगर हैं तो कम से कम छाया  तो दें।  पेड़ तो आपको  अपने आस -पास भी बहुत मिल जायेंगे लेकिन वैशाली,  ग़ाज़ियाबाद   में पर्यावरण को समर्पित एक ऐसी संस्था हैं जिसका नाम ही  " पेड़ों की छाँव तले फाउंडेशन " है। पर्यावरण के अलावा इस संस्था की दिलचस्पी साहित्य में भी है। अक्टूबर २०१४ से  "पेड़ों की छाँव तले  रचना पाठ "( फाउंडेशन की ही एक कड़ी ) निरंतर मासिक काव्य गोष्ठियों   का आयोजन करती आ रही है जिसमे ग़ाज़ियाबाद  और दूसरे शहरों के कविगण शिरकत फरमाते हैं। इस संस्था के अध्यक्ष प्रतिष्ठित कवि श्री अवधेश सिंह  और प्रधान सचिव ठाकुर प्रसाद चौबे जी हैं। 

कोरोना के चलते २३ अगस्त २०२० का पेड़ों की छाँव तले  रचना पाठ की ६६ वी काव्य ( द्वितीय  ई-गोष्ठी ) वरिष्ठ साहित्यकार कन्हैया लाल खरे की अध्यक्षता में संपन्न हुई।  इस  ई-गोष्ठी में शिरकत फ़रमाने वाले कविगण सर्वश्री कन्हैया लाल खरे , विष्णु सक्सेना , अनिमेष शर्मा , मृत्युंजय साधक , डॉ सुमन साधक , मंजीत कौर मीत , पूनम कुमारी ,मनोज दिववेदी , निधिकांत पाण्डेय एवं अवधेश सिंह के नाम उल्लेखनीय हैं। 

" आज़ादी " विषय पर पढ़ी गयी चंद कविताओं के अंश देखें -


फ़हर -लहर तिरंगा कहता   हमने आज़ादी पाई है 

अब आज़ादी कश्मीर ने पाई  कली-कली हर्षाई  है 

केशर की क्यारी ने फिर से केशरी गंध महकाई है 

-कन्हैया लाल खरे


नहीं ग़ुलामी  चाहिए, दिलों में न अपवाद।

आपस में खुलकर जियें, रहे देश आज़ाद।।


बाँध कफ़न  सर पे चले ,करी जेल आबाद।

मरते दम तक ये कहा - रहे देश आज़ाद।।


जो सूली पे चढ़ गये, कर लो उनको याद।

क़ुर्बानी  मत भूलना ,  रहे देश आज़ाद ।।

-अवधेश सिंह


है शहीदों की शहादत को नमन

ऐसी बलिदानी रवायत  को नमन      

हौसला जिसमें रहे जीता है वो ही       

शौर्य की ऐसी कहावत को नमन     

 -  डॉ. अंजु सुमन साधक 


माँ के दूध के कर्ज़ें को,

सबको हम बतलाएँगे।

आओ,सीमा पर आओ

अब शत्रु मार भगाएँगे।।

फड़क-फड़क उठ जाएँ भुजाएँ,

किट-किट दाँत बजाएँगे।

तड़क-तड़क कर बिजली-सा हम,

खंज़र  को खनकाएँगे।।

डमक-डमक डम डमरू लेकर

तांडव नृत्य रचाएँगे।

तीखी तिरछी करके भौहें,

शेरों-सा गुर्राएँगे ।।

ऐसे ही शेरों की माँ तो, 

भारत माँ कहलाती है।।

 -मृत्युंजय साधक


राष्ट्र पर्व पर है फ़हराता

राष्ट्रशोक पे ये झुक जाता

सैनिक गौरव कर लहराता

शहीद इसे पहन के आता

-मनोज द्विवेदी


माना कि इस रात की सुब्ह नही

पर ज़िंदगी  यूँ बे-वज्ह  नहीं

सच की ये लड़ाई है

गहरी बहुत  खाई है

हो के अब तू निडर

चलती रह अपनी डगर.....

- पूनम कुमारी


अपनी डगर पर चलने वाली संस्था " पेड़ों की छाँव तले फाउंडेशन " का  यह अदबी सफ़र यक़ीनन क़ाबिले तारीफ़ है और इस संस्था का लगाया हुआ पौधा आज एक बरगद की शक्ल ले चुका है।  पेड़ों की छाँव तले - रचना पाठ के ज़रीये  पेड़ों को कवितायें पहनाई जा  रही  हैं और अब कविताओं वाले इन पेड़ों की छाँव और भी घनी हो जाएगी , जिसमें बैठ कर थके-माँदे मुसाफ़िर अपनी थकान मिटा पाएँगे।  कविताओं वाले इन पेड़ों  का  संगीत जंगलों में दूर दूर तक फ़ैल जायेगा लेकिन बक़ौल दुष्यंत कुमार -


पत्तों से चाहते हो  बजें साज़ की तरह 

पेड़ों से आप पहले उदासी तो लीजिये  



NOTE :"पेड़ों की छाँव तले फाउंडेशन" के अघ्यक्ष श्री अवधेश सिंह का उनके सहयोग के लिए शुक्रिया। 


अधिक जानकारी के लिए देखें -https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3335382766520529&id=100001465165698




 

Monday, August 24, 2020

सारस और लोमड़ी - το λελέκι και η αλεπού ( ग्रीक लोक कथा का हिन्दी अनुवाद )

 το λελέκι και η αλεπού -   सारस और लोमड़ी



प्राचीन समय की बात है एक सुन्दर गावँ में  एक सारस अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था। गावँ के बाहर लाल बालों  और टेढ़ी  पूँछ वाली एक चालाक लोमड़ी रहती थी। एक दिन जंगल में सारस और लोमड़ी की मुलाक़ात हो गयी। 

"नमस्ते सारस जी , आज आप यहाँ कैसे ? " - लोमड़ी ने पूछा। 

"मैं यहाँ जंगल में अपने बच्चों के लिए खाना लेने आया हूँ "- सारस ने जवाब दिया। 

"जब आप  यहाँ आ ही गए  हैं  तो मे्रे घर कुछ खा  कर जाइये "- लोमड़ी ने कहा। 

सारस को उसके निमंत्रण पर हैरानी हुई लेकिन अंततः वह मान गया। वह लोमड़ी के घर गया और लोमड़ी ने उसे एक प्लेट में गरम सूप परोस दिया।  तब सारस को एहसास हुआ कि लोमड़ी उसका मज़ाक बना रही है क्योंकि अपनी लम्बी चोंच से प्लेट में पड़े उस सूप को पीना लगभग असंभव था।  सारस ने सूप पीने का नाटक किया और लोमड़ी जब सारा सूप चट कर गयी तो सारस ने उससे कहा -

"सूप बहुत लज़ीज़ था , मैं चाहता हूँ कल दोपहर का लंच तुम मे्रे साथ मे्रे घर पर करों "। 

लोमड़ी ने उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और सारस अपने घर को लौट गया।  वह सारे रास्ते सोचता रहा कि   लोमड़ी ने उसका मज़ाक उड़ाया है और  इसके लिए उसे सबक सीखाना चाहिए। 

अगले दिन सारस ने अपनी पत्नी को बताया कि  किस तरह लोमड़ी ने उसका मज़ाक उड़ाया था।  उसने अपनी पत्नी से स्वादिष्ट भोजन पकाने के लिए कहा और उस भोजन को कम मुहँ वाले गिलासों  में परोसने के लिए कहा। निर्धारित समय पर लोमड़ी लटकती-मटकती अपनी टेढ़ी पूँछ को घुमाती सारस के घर पहुँच गयी। उसने दरवाज़े पर दस्तक दी और पूरे सारस  परिवार ने उसका स्वागत किया। 

"कितनी बढ़िया ख़ुश्बू आ रही है , मे्रे मुहँ में  पानी आ रहा है"-लोमड़ी चहकी  ।  

डाइनिंग टेबल पर सब लोग बैठ गए तो सारस की पत्नी ने गिलासों  में  खाना परोस दिया।  सारस ने गिलास में  अपनी चोंच डाल कर खाना शुरू कर दिया लेकिन लोमड़ी अपना मुहँ तंग मुहँ वाले गिलासों में  नहीं घुसा  पाई।  भोजन समाप्त होने पर वे लोग डाइनिंग टेबल से उठ गए।  लोमड़ी भूखी  रह गयी थी लेकिन उसने बिना कुछ कहे सारस परिवार से विदा ली ।  

वापिस  जाते समय वह सारे रास्ते सोचती रही कि अगर दूसरे जानवरों को इस बारे में पता चलेगा तो उसकी बेइज़्ज़ती हो जाएगी। लोमड़ी को एहसास हो गया कि सारस ने उसकी चालाकी पकड़ ली थी। 



अनुवादक - इन्दुकांत आंगिरस