Saturday, March 5, 2022

पुस्तक परिचय - Immortal LIEDER ( 800 years of German Poetry )

 




पुस्तक परिचय - Immortal LIEDER  ( 800 years of German Poetry  )

कविता क्या है ? विभिन्न साहित्यकारों ने कविता की अलग अलग परिभाषाएँ दी हैं लेकिन इसमें कोई दोराह नहीं कि सभी कलाओं में कविता का स्थान सर्वोच्च है। अनुवाद के ज़रिए हम  विश्व की अनेक भाषओं की कविता से परिचित होते हैं।आज जिस दुर्लभ पुस्तक का परिचय दे रहा हूँ उसका नाम ' Immortal LIEDER ' है।  इस पुस्तक में बाहरवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी तक के जर्मन कवियों की कवितायेँ शामिल है जिनका अँगरेज़ी अनुवाद अमेरिकी कवि एवं उपन्यासकार  E.Louise Mally  ने किया है। जर्मनी के 800 साल  के कवियों की कविताओं के  इस संकलन में लगभग 50 प्रतिष्ठित कवि और लगभग उतने ही गुमनाम कवियों की कविताएँ शामिल हैं।  जर्मन कविताओं के अँगरेज़ी अनुवाद की यह दुर्लभ पुस्तक  पाठकों के लिए किसी कविता कुञ्ज से कम नहीं। 

सभी कविता प्रेमी इस अद्भुत अनुवाद का लुत्फ़ उठा सकते हैं विशेषरूप से जर्मन भाषा और साहित्य के विद्यार्थी।  बानगी के रूप में चंद पंक्तिया प्रस्तुत हैं -


Welcome, moon, oh silver one,

Still, sweet companion of my nights !

You would leave me ? Do not hasten , friend of contemplation 

See, she lingers .Only clouds spurt across her face .

( Page # 48 , From the poem ' The Early Graves ' by Friedrich Gottlieb Klopstock )


 My heart feels each echoing note 

Of days of joy or stress 

I walk between that joy , that pain 

In my loneliness.

( Page # 69 From the poem ' The Moon ' by Johann Wolfgang Goethe )


How poor, those who love and part ,

That we have learnt , we two ;

I shudder , the house is so still.

You wave your handkerchief still ,

I can scarcely see it for tears And yet I look  up the street .

( Page # 93 From the poem ' On the Departure of My Daughter ' by  Josef Von Eichendorff  )



पुस्तक का नाम  - Immortal LIEDER 


लेखक -  विभिन्न जर्मन कवि 

 अनुवादक -  E. LOUISE MALLY

Copyright -   Seven Seas Books 

Language - English

प्रकाशक - Seven Seas Publishers , Berlin 

प्रकाशन वर्ष - 1962

पृष्ठ - 166

मूल्य - Not mentioned in book 

Binding -  Paperback

Size -  4.5" x 7.5"

ISBN - Not Mentioned

Cover Design - Lothar Reher 



Translator : E. LOUISE MALLY


प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 

Thursday, March 3, 2022

पुस्तक परिचय - साहित्य और समीक्षा






                 आजकल साहित्य लेखन प्रचुर मात्रा में हो रहा है और रोज़ नए नये - नये लेखक पैदा हो रहे हैं , विशेषरूप से कवियों की तो भरमार है। अक्सर सभी लेखक और कवि अपना परिचय साहित्कार के रूप में देते हैं लेकिन शायद ऐसे लेखक और कवि उँगलियों पर गिने जा सकते हैं जो साहित्य शास्त्र की समझ रखते हो। गुलाबराय द्वारा रचित पुस्तक साहित्य और समीक्षा एक ऐसी ही दुर्लभ पुस्तक है जो साहित्य के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।  साहित्य के विद्यार्थियों से मेरा तात्पर्य सिर्फ वही विद्यार्थी नहीं है जो हिन्दी विषय में MA कर रहे हैं अपितु वे सभी लेखक और कवि जो रचनाएँ लिख रहे हैं , साहित्य के विद्यार्थी हैं , ये अलग बात है कि अधिकांश कवि अपने को साहित्य का विद्यार्थी नहीं अपितु साहित्यकार ही मानते  हैं। विशेषरूप से एक कवि के लिए साहित्य शास्त्र का ज्ञान होना अनिवार्य है।  इस पुस्तक में काव्य के तत्त्व, काव्य रस , काव्य के विभिन्न रूप , काव्य के गुण और रीतियों , काव्य के दोष , प्रमुख अलंकार , छंद आदि के बारे में संक्षेप में उदहारण सहित बतलाया गया है इसलिए यह दुर्लभ पुस्तक साहित्य के विद्यार्थियों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। 



पुस्तक का नाम - साहित्य और समीक्षा 

लेखक -  गुलाबराय 

Copyright -   गुलाबराय ( Not mentioned in book )

Language - Hindi 

प्रकाशक - आत्माराम एन्ड संस  , देहली 

प्रकाशन वर्ष -  द्वितीय  संस्करण , 1956

पृष्ठ -144

मूल्य - INR 20/  ( बीस रुपया केवल )

Binding -  Hardbound

Size -  4" x 6 "

ISBN - Not Mentioned





लेखक -  गुलाबराय 

जन्म -   17th January , 1888 

निधन -  13th April , 1963


NOTE :  लेखक के बारे में अधिक जानकारी के लिए उनका विकी पेज देखें। 


प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 


Saturday, February 19, 2022

पुस्तक परिचय - धर्म के नाम पर









         हज़ारों वर्षों से मनुष्य धर्म की हाथों कठपुतली बनता आया है। धर्म ने करोड़ों लोगों को प्रभावित  किया है , इसी के कारण बहुत से युद्ध हुए हैं । धर्म ने मानव जाति का नाश किया है या उद्धार किया है , इसके बारे में अनेक लेखकों ने अपने अपने मत दिए है। इसी विषय पर आचार्य श्री चतुरसेन शास्त्री जी द्वारा रचित पुस्तक ' धर्म के नाम पर ' एक दुर्लभ और विचारणीय पुस्तक है। पुस्तक के कवर पेज पर ही एक सीढ़ी बनी हुई है जिसमे लिखा है धर्म के नाम पर क्या क्या होता रहा है। शायद कवर पेज की तस्वीर में इन्हें पढ़ने में असुविधा हो इसलिए उस सीढ़ी पर अंकित विषयों को प्रस्तुत कर रहा हूँ :

बेवकूफ़ी , छल , धूर्तता , ठगी , झूठ ,अनाचार ,पाखण्ड ,पाप ,व्यभिचार , अपराध और हत्या। 


धर्म के नाम पर उपरोक्त सभी कुछ होता आया है और सिर्फ भारत ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों में।  लेकिन अब प्रश्न यह उठता है कि क्या धर्म ने हमारे साहित्य को भी प्रभावित किया है और अगर किया है तो किस हद तक। साहित्य का काम मनुष्यता को बचाए रखने का होता है और  किस हद तक धर्म का काम भी यही होना  चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है। ' धर्म के नाम पर '  पुस्तक में लेखक ने उपरोक्त विषयों पर विस्तार से चर्चा की है।  पिछले कुछ सालों में हमारे देश में भी धर्म के नाम पर बहुत कुछ अटपटा हुआ है। ऐसे में इस पुस्तक की महत्ता  और भी बढ़ जाती है ,  संभव  हो  तो इस दुर्लभ किताब को ज़रूर पढ़ें। 




पुस्तक का नाम - धर्म के नाम पर


लेखक -  आचार्य श्री चतुरसेन शास्त्री

Copyright -   ( Not mentioned in book )


Language - Hindi 


प्रकाशक - हिन्दी साहित्य मंडल , देहली 


प्रकाशन वर्ष -  तृतीय संस्करण , आठवीं आवृति   ,1949

पृष्ठ -152


मूल्य - INR 1/  ( एक रुपया केवल )


Binding -  Paperback


Size -  4" x 6 "


ISBN - Not Mentioned



लेखक -  आचार्य श्री चतुरसेन शास्त्री 

जन्म -   26th August , 1891 

निधन -  2nd February , 1960



NOTE : इस पुस्तक का प्रथम संस्करण सं 1934 में प्रकाशित हुआ था। लेखक के बारे में अधिक जानकारी के लिए उनका विकी पेज देखें। 



प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 




Saturday, February 12, 2022

पुस्तक परिचय - रवींद्र कविता कानन ( Rabindranath Tagore - POET of RIVER )

 


                                       पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला ' की प्रथम गद्य रचना 

                         

                                                  Rabindranath Tagore - POET of RIVER 




              नोबल साहित्यिक पुरस्कार से सम्मानित विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर किसी परिचय के मोहताज नहीं।  " गीतांजलि " काव्य संग्रह के लिए इन्हें नोबल पुरस्कार से सं 1913 में नवाज़ा गया जिसका अँगरेज़ी अनुवाद  स्वयं कवि ने किया था।  बाद में इस पुस्तक का अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हुआ।पश्चिमी संसार रवीन्द्रनाथ टैगोर को नदी का कवि ( The Poet of River )  मानता है और यह सत्य भी है।   जैसा कि सर्वविदित है कि ' गीतांजलि ' बांग्ला भाषा में लिखी गयी थी , न सिर्फ़ गीतांजलि अपितु रवीन्द्रनाथ टैगोर का अधिकांश साहित्य बांग्ला भाषा में ही रचित हुआ। रवीन्द्रनाथ को उस युग में हिन्दी के पाठकों को समझाने का प्रथम प्रयास   सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' द्वारा  ' रविंद्र  कविता कानन ' पुस्तक को रच कर किया गया।  इस पुस्तक कि महत्ता इसलिए भी अधिक हो जाती है क्योंकि निराला जी की  यह प्रथम गद्य रचना है। इस पुस्तक में  विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर  की संक्षिप्त जीवनी भी उपलब्ध है और परिशिष्ट में क्रमानुसार रवींद्र ग्रन्थ - सूची भी दी गयी है जोकि  महादेव साहा द्वारा बनाई गयी है और पुस्तक के प्रथम संस्करण में उपलब्ध नहीं थी। इस ग्रन्थ - सूची में  सं 1878 में कवि की कविताओं की पुस्तक - कवि काहिनी से लेकर 1937 में प्रकाशित अंतिम पुस्तक -खाप छाड़ा से ( हास्य रस की कविताएँ एवं कहानियाँ ) का ब्यौरा है। । ' निराला  ' जी ने इस पुस्तक में  रवीन्द्रनाथ टैगोर  के बांग्ला भाषा के पद्यों का हिन्दी सार भी प्रस्तुत किया है। बानगी के तौर पर मूल बांग्ला का एक पद्य और उसका सार देखें -


" आजि ए प्रभाते      सहसा  केरने

  पथहारा   रवि - कर 

आलय न पेय   पड़ेछे आसिये

आमार प्राणेर  पर 

बहु दिन परे   एकटी  किरण 

गुहाये दियेछे   देखा  

पड़ेछे आमार आंधार  सलिले

एकटी  कनक -रेखा। "


हिन्दी सार - ( आज इस प्रभात के समय , सूर्य की एक किरण एकाएक अपनी राह क्यों भूल गयी , यह मेरी समझ में नहीं आता।  वह कही  ठहरने  की जगह न पा, मेरे प्राणों पर आकर गिर रही हैं।  मेरे हृदय की कंदरा में बहुत दिनों के बाद किरण दिखायी दे रही है , हे - मेरी अन्धकार सलिल राशिपर सोने की एक रेखा खिंची हुई है।  )

( पृष्ठ - ३० -३१ )







पुस्तक का नाम - रवींद्र  कविता कानन 

                           

लेखक -  सूर्यकान्त त्रिपाठी ' निराला ' 

Copyright -   ( Not mentioned in book )

Language - Hindi 

प्रकाशक - हिन्दी प्रचारक पुस्तकालय , बनारस 

प्रकाशन वर्ष - संशोधित तथा परिवर्धित जन - संस्करण  ,1954

पृष्ठ - 176

मूल्य - 15.3 Anna  ( साढ़े पंद्रह आने  )

Binding -  Paperback

Size -  4" x 6 "

ISBN - Not Mentioned



रवीन्द्रनाथ टैगोर


जन्म -  7th May  , 1861 . Kolkota 

निधन -  7th August  ,1941 . Kolkota


सूर्यकांत त्रिपाठी  ' निराला ' 


जन्म - 21st February , 1896 . Midnapore

निधन -  15th October , 1961 . Pryagraj 



प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 


NOTE : रवीन्द्रनाथ टैगोर एवं सूर्यकांत त्रिपाठी  ' निराला ' के बारे में   अधिक जानकारी के लिए उनका विकी पेज देखें। 


Monday, February 7, 2022

कीर्तिशेष गरिमा पाठक - संस्थापक ट्रस्टी - कलश कारवाँ फाउंडेशन

 



                                                                     गरिमा पाठक

                                                         ( 23-7-1970  ---- 07-02-2022 )




                     भूल  जाना मुझे धीरे धीरे 

                     सब कुछ बदल जाऐगा धीरे धीरे 


                    उगते सूरज को सभी नमन करेंगे ही

                    मैं तो  ढलती रात  हूँ

                    सुषुप्त मद्धम  साँसें  भी  नहीं हैं  मेरी

                    भूल जाना सब मुझे ....


- गरिमा पाठक


गरिमा पाठक आप सब से उन्हें  भूल जाने अनुरोध कर रही हैं , पर क्या इतना आसान होता है किसी को भुलाना ?


               हमारे समाज में अक्सर ऐसा होता है कि जब भी कोई विशिष्ट साहित्यकार / कलाकार  की आत्मा  इस संसार से  विदा लेती है तो अख़बारों और मीडिया में उनके महाप्रस्थान और उनके काम की जानकारी विस्तार से दी जाती है लेकिन  बहुत से गुमनाम साधारण साहित्यकार , कवि और कलाकार अक्सर गुमनामी में खो जाते हैं जिनकी जानकारी हमें न तो अख़बारों में  मिलती है और न ही मीडिया में।  ऐसी ही एक साहित्यकार गरिमा पाठक का कल ( 07-02-2022 ) को गोलोक गमन हो गया। 

  गरिमा जी मेरी पहली मुलाक़ात सितम्बर 2021 में बेंगलुरु में राही राज के निवास स्थान पर हुई। राही राज और गरिमा पाठक के सम्पादन  में प्रकाशित साझा कविता संग्रह - ' उगता सूरज ' का विमोचन 5 सितम्बर' 2021 को बैंगलोर में हुआ और इसी दिन ' कलश कारवाँ फाउंडेशन 'की स्थापना की घोषणा हुई। गरिमा जी ,कलश कारवाँ फाउंडेशन की संस्थापक ट्रस्टी थी।  गरिमा जी अत्यंत सहज , सरल , मिलनसार  और मृदुभाषी थी। 


इन्होने कविता , गीत , मुक्त छंद , लघुकथा आदि विधाओं में अपनी  रचनाओं के ज़रिये  समाज में व्याप्त कुरीतियों और विद्रूपताओं को बख़ूबी उजागर किया है, विशेषरूप से इनकी देश प्रेम की कविताएँ सराहनीय हैं। उनका सपना था कि कलश कारवाँ फाउंडेशन के तहत , भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वतंत्रता सैनानी एवं शहीदों की  याद में सेलुलर जेल , अंडमान निकोबार में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाये।  उनके जीवन में तो उनका सपना पूर्ण नहीं हो सका लेकिन आशा करता हूँ कि ' कलश कारवाँ फाउंडेशन ' उनके इस सपने को ज़रूर पूरा करेगी। 


साहित्य के प्रति उनका अतुल्य समर्पण कभी भुलाया नहीं जा सकता।  वह अपने साहित्यिक मित्रों को भी उत्साहित करती रहती थी।  आकाशवाणी से काव्य पाठ व अनेक साहित्यिक पत्र - पत्रिकाओं में उनकी रचनाएँ प्रकाशित हुई। 'साझा संकलन ' सप्त ऋषि ' एवं 'अभुदय काव्यमाला' में भी रचनाएँ प्रकाशित।  ई - बुक के रूप में 'अमृत सुधा ' एवं ' रिश्ते के अनुभव '। उनके एकल काव्य  संग्रह ' अनुभव सुधा ' का साहित्य जगत में भरपूर स्वागत हुआ। उनके और राही राज के सम्पादन में प्रकाशित साझा काव्य संग्रह ' उगता सूरज ' भी साहित्य जगत में काफ़ी चर्चित रहा। कविता के अलावा इन्हें चित्रकारी और हस्त - रेखाओं को पढ़ने का भी शौक़ था। सन 2000 से 2012 तक इन्होने चित्रकला शिक्षण संस्थान , बैतालिक रांची में चित्रकला शिक्षक के रूप में कार्य किया लेकिन कविता का दामन कभी नहीं छोड़ा। 26 दिसंबर 2022 को  बैंगलोर  में , अखिल भारतीय संस्कृति समन्वय समिति द्वारा आयोजित " कर्नाटक साहित्य उत्सव ' के दौरान गरिमा पाठक को पंडित सुरेश नीरव के कर कमलों से ' संस्कृति समन्वय सम्मान ' से सम्मानित किया गया। हाल ही में उन्हें अवध भारती संस्थान, लखनऊ द्वारा  ' तुलसी अवधी सम्मान  से भी नवाज़ा गया था। 

5 नवंबर 2021 को गरिमा पाठक द्वारा रचित ये कविता देखें -


मैं जा रही हूँ फिर से आने के लिए 

अब साथ मीत, गीत हैं गुनगुनाने के लिए 


चाहतें बहुत हैं अभी बाक़ी 

सपनें बहुत हैं अभी बाक़ी 

पूरे करने हैं ख़्वाब बाक़ी 


फिर से आऊँगी मैं 

सारे सपनें साकार करने के लिए 

अब साथ मीत, गीत हैं गुनगुनाने के लिए । 





गरिमा पाठक

जन्म - 23-07-1970 , डाल्टनगंज , पलामू 

निधन -07-02-2022, रांची 



NOTE : राही राज और प्रीति राही को उनके सहयोग के लिए शुक्रिया।



Thursday, January 13, 2022

घरेलू नुस्ख़ें शाइरी में

 

पिछले दिनों एक पुराना काग़ज़ मिल गया जिसमे चंद बीमारियों के घरेलू नुस्ख़ें   शाइरी में कहे गए हैं।  शाइर का नाम नहीं मालूम लेकिन कोरोना की इस तीसरी लहर के आगमन पर मन हुआ आप सभी से ये साझा कर लूँ।  आयुर्वेद में बहुत से घरेलू  नुस्खे मिल जाते हैं और चंद लोग उनका इस्तेमाल  भी करते हैं लेकिन ज़रूरी नहीं कि इन नुस्ख़ों से सभी को लाभ मिल जाए।  आपका मन हो तो इनको आज़माये अन्यथा बस शाइरी का लुत्फ़  उठायें। लीजिये प्रस्तुत हैं शाइरी में नुस्ख़ें -


जहाँ तक काम चलता हो ग़िज़ा से 

वहाँ तक चाहिए   बचना दवा  से 


अगर ख़ून कम बने बलगम   ज़ियादा 

तो खाये गाजर ,चने , शलगम ज़ियादा 


जिगर के बल   पर है   इंसान जीता 

अगर ज़हफ़ जिगर है तो खा पपीता 


जिगर में हो अगर गर्मी का अहसास 

मुरब्बबा आंवला खा या   अन्नानास


अगर हो जाता ही माएदा में गरानी 

तो पी लें सौंफ़ या अदरक का पानी 


थकन से हो अगर अलजात ढीलें

तो फ़ौरन दूध गरमा - गरम पी लें 


जो दुखता हो गला नज़ले के मारे 

तो कर नमकीन   पानी के गरारे 


अगर हो दर्द से  दाँतों  के   बैकुल

तो ऊँगली से मसूढ़ों पर नमक मल 


जो ताकत में कमी होती हो महसूस 

तो मिश्री की डली  मुल्तान की चूस


शिफ़ा चाहिए अगर खाँसी से जल्दी  

तो पी ले दूध में    थोड़ी सी   हल्दी 


अगर कानो में  तकलीफ़    होए

तो सरसो का तेल फाये से निचोड़ 


अगर आँखों में पड़ जाते हो जाले

तो दक्खनी  मिर्च घी के साथ खा ले 


दमा में ये ग़िज़ा   बेशक   हैं अच्छी 

खटाई  छोड़ , खा दरिया की मछली 


अगर तुझको लगे जाड़े में सर्दी 

तो इस्तेमाल कर अंडे की जर्दी 


जो बदहजमी में तू चाहे अफ़ाफ़ा

तो दो -एक वक़्त कर तू  फ़ाका  




प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 



NOTE : मालूम नहीं उपरोक्त नुस्ख़ें किस शाइर या  हक़ीम ने लिखे हैं।  शाइरी का लुत्फ़ ज़रूर उठायें लेकिन नुस्ख़ें अपनी ज़िम्मेदारी पे आज़माये। 

Sunday, January 2, 2022

पुस्तक परिचय - राम - चर्चा

 







मुंशी प्रेमचंद हिन्दी साहित्य में ' उपन्यास सम्राट ' के नाम से जाने जाते हैं। उन्होंने 350 से अधिक कहानियाँ लिखी और अनेक उपन्यासों की रचना करी।  उनका अधिकांश साहित्य न सिर्फ़ भारतीय  अपितु विश्व की अनेक  भाषाओं में अनूदित हो चुका हैं। यह तो सर्वविदित है कि उन्होंने सरस्वती प्रेस की स्थापना करी और उसे अपने ख़ून - पसीने से सींचा।  अधिकांश महान साहित्यकारों ने बाल साहित्य की भी रचना करी हैं। आज प्रेमचंद द्वारा रचित  दुर्लभ पुस्तक  ' राम -  चर्चा ' का परिचय प्रस्तुत है। बच्चों के लिए रचित ' राम - चर्चा ' पुस्तक की भाषा अत्यंत सरल और सहज है और इसका फॉण्ट साइज भी बड़ा है जिससे बच्चें इसे सुलभता से पढ़ सकें।  इस पुस्तक की रचना के माध्यम से प्रेमचंद ने रामायण का परिचय बच्चों से कराया है जिससे बच्चें भारतीय संस्कृति से परिचित हो सकें और उन संस्कारों को अपने जीवन में ढाल सकें। पुस्तक सात खण्डों में विभाजित हैं - बाल - काण्ड , अयोध्या - काण्ड , वन - काण्ड , किष्किंधा - काण्ड , सुन्दर - काण्ड , लंका - काण्ड और उत्तर - काण्ड ।  

21 वी सदी में जबकि संसार बहुत सिकुड़ चुका है और भारत पाश्चात्य संस्कृति की धारा में बहता  जा रहा है , यह पुस्तक आज भी भारतीय बच्चों को भारतीय संस्कृति से अवगत कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं। यक़ीनन अगर अभिभावक यह चाहते हो कि उनके बच्चें भी भारतीय संस्कृति से परिचित हो तो इस पुस्तक को अपने बच्चों के लिए उपलब्ध कराएँ।  आज प्रिंटिंग की दुनिया में एक से बढ़ कर एक नवीनतम मशीनें उपलब्ध हैं लेकिन प्रेमचंद  जैसे लेखक अब नहीं। उनके पुत्र श्रीपत राय ने इस पुस्तक का प्रथम संस्करण ,  प्रेमचंद  के निधन के दो वर्ष बाद 1938 में  प्रकाशित किया।  साहित्य के प्रति प्रेमचंद को अमूल्य बलिदान एवं त्याग का ऋण, हिन्दी साहित्य कभी नहीं उतार पायेगा।  हो सकता है आज इस पुस्तक का कोई ओफ़्सेट प्रिंटिंग का संस्करण उपलब्ध हो लेकिन इस संस्करण को पढ़ते हुए पाठक प्रेमचंद की आत्मा को महसूस कर सकता है , इसीलिए ' राम - चर्चा ' पुस्तक का  यह संस्करण  अत्यंत दुर्लभ है। अफ़सोस कि ऐसी पुस्तक बच्चों के पाठ्यक्रम  में शामिल नहीं करी  जाती। भाषा की सरलता एवं सहजता की बानगी के तौर   पुस्तक का  प्रथम पृष्ठ  देखें -






पुस्तक का नाम -    राम - चर्चा 

( श्री रामचंद्र जी की अमर कहानी )


 लेखक - प्रेमचंद 


भाषा - हिन्दी


Copyright - सरस्वती प्रेस , बनारस , 1938 


प्रकाशक / मुद्रक - श्रीपत राय , सरस्वती प्रेस , बनारस कैंट 


प्रकाशन वर्ष - नया सस्ता  संस्करण ,1941


पृष्ठ - 198


मूल्य - 1/ INR  ( एक  रुपया      केवल )


Binding -  पेपरबैक 


Size - 6" x 8"


ISBN - Not Mentioned






लेखक - धनपतराय श्रीवास्तव 


उपनाम - प्रेमचंद 


जन्म -  31st July   , 1880 , Village Lamhai   , Varanasi 


निधन - 8 October  ,1936 . Varanasi 


                                                                                                  


                                                                                             प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 


NOTE :प्रेमचंद और उनके साहित्य के बारे में आधी जानकारी के लिए उनका विकी पेज देखें।