Thursday, May 8, 2025

शहर और जंगल - प्रार्थना

 प्रार्थना 


एक बार फिर 

निकलता है सूरज 

एक और दिन की

सज़ा देने 

हमसे हमारी ही 

साँसें लेने 

और हम 

सुबह , दोपहर , शाम 

भोग कर

एक बार फिर 

रात में 

प्रार्थना करते हैं 

ईश्वर से 

अगली सुबह के लिए 

और एक दिन की 

सज़ा के लिए। 

शगुन

 शगुन 

 

मनोज  की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। घर में ३० बरस बाद ख़ुशियों  की कलियाँ मुस्कुराई थीं। उसके ज्येष्ठ पुत्र प्रमोद को सरकारी नौकरी मिल गयी थी और आज उसका विवाह एक सुशील कन्या के साथ होने जा रहा था। घर रिश्तेदारों से भरा हुआ था।  हर किस का चेहरा ख़ुशी से चमक रहा था।  घर को फूलों से सजाया जा रहा था। शादी के गीत गाये जा रहे थे।  तभी अचानक घर के बाहर एक टेम्पो आकर रुका और कुछ तालियों की आवाज़ वातावरणमें गूँज उठी। बधाई देते हुए ८ - १० किन्नर  घर के आँगन में प्रवेश कर चुके थे।  मनोज ने उन सभी किन्नरों का हाथ जोड़ कर स्वागत किया। किन्नरों ने दूल्हे को आशीर्वाद दिया और नाच - गा कर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करी ।  मनोज ने सभी को भोजन करवाया।  भोजन उपरांत किन्नर जाने लगे तो मनोज उनको नज़राना  देने लगा। इस पर किन्नरों के सरदार ने कहा ," बाबू जी , हम यहाँ  नज़राना लेने नहीं आये हैं। जीवन में पहली बार किसी ने हमें अतिथि के रूप में बुलाया है। इसलिए आप अपना नज़राना अपने पास रखिये और हमारा शगुन क़बूल करिये। ईश्वर आपके बेटे को लम्बी आयु दें और एक ख़ुशहाल वैवाहिक जीवन। " यह कह कर सरदार ने शगुन का  लिफाफा मनोज के हाथ में सरका दिया। 


लघुकथा - कलमा

 लघुकथा - कलमा 


घर में क़दम रखते ही पंडित रामदास सकते में आ गए। बरसों पुराना तोता  ' हरे रामा , हरे कृष्णा , कृष्णा कृष्णा हरे हरे '  का जाप छोड़ कर कलमा पढ़ रहा था। पंडित रामदास उबलते हुए चिल्लाये - " पगला गए हो मिट्ठू मियाँ , राम नाम छोड़ कर कलमा पढ़ने में लगे हो ! "

- " हाँ , हाँ , हम पगला गए हैं पंडित जी , अरे , कलमा नहीं  पढ़े तो क्या अपनी जान दे दे , और मेरी मानो  तो पंडित जी आप भी कलमा पढ़ना शुरू कर दो। ये जुमला तो आपने सुना ही होगा - " जान है तो जहान है प्यारे ", तोता एक साँस में बोल गया . । 

अब तोता पंडित जी को कलमा सिखा रहा था और पंडित जी अटक अटक के कलमा पढ़ रहे थे। 


लेखक - इन्दुकांत आंगिरस 

Wednesday, May 7, 2025

शहर और जंगल - आक्रोश

 आक्रोश 


सामने वाली दीवार पर 

एक अरसे से 

उभरती ही जा रही है 

एक घिनौनी तस्वीर 

काले  होंठ , बुझी आँखें , ज़र्द चेहरा 

और 

कितना बेडौल है ये पेट , जिस पर  

जाने कौन खोद गया एक भद्दी गाली ,

धीरे धीरे उस दीवार की 

एक  एक ईंट गिरती रही 

फिर उभरा 

एक साफ़ - सुथरा मकान 

बॉलकनी पर एक इंच मुस्कान 

आज रात 

मैं ज़रूर चिपका दूँगा 

इस साफ़ - सुथरे मकान की 

हर दीवार पर 

जिस पर 

ठीक वैसी ही घिनौनी तस्वीरें 

आज रात 

मैं ज़रूर फाड़ दूँगा 

ये महीन परदे 

पर , मुझे डर है 

मेरी आत्मा मुझे मार न दे 

इसलिए आज रात 

मैं ज़रूर मार दूँगा 

अपनी आत्मा।  



शहर और जंगल 

Tuesday, May 6, 2025

शहर और जंगल - स्वतंत्रता

 स्वतंत्रता 


एक डाल से 

दूसरी डाल पर 

चिड़िया का चहकना 

अर्थहीन हो सकता है 

आपके लिए 

हमारे लिए 

लेकिन 

चिड़िया स्वतंत्र  होती है 

अपनी ज़िंदगी 

अपने ढंग से 

जीने के लिए 

मनचाहे तिनकों को 

चुनने के लिए। 

Monday, May 5, 2025

शहर और जंगल - आवरणहीनता

 आवरणहीनता 


तुम्हारें ही बोये बीजों से 

विघटन , अनास्था , विकृति के 

वृक्ष उग आएँ 

भूमिगत हो गयी 

कोमल आकांक्षाएँ

पहले तो तुमने 

नंगा करा था मुझे 

पर अब मैं  

स्वयं नंगा हो 

दिखाऊँगा अपने घाव 

अब और 

जन्म नहीं ले पाएगा बिखराव 

तुम होंठों पर लगे ख़ून  को लाख छिपाना 

अब नहीं ढँक  पाओगे  

अपनी आवरणहीनता। 

Thursday, May 1, 2025

Ghazal_RAV

 इस मिसरे पर लिखने की कोशिश करें

'आज वो सिर्फ गंदा नाला है'

काफिया आ स्वर का

नाला, जाना, पारा ,सादा, काला, आदि।

रदीफ - है

बह्र 

फाइलातुन मुफाइलुन फैलुन

2122   1212  22