Saturday, June 3, 2023

ग़ज़ल - प्यार मुझ को सनम जब हुआ आप से

 ग़ज़ल 


प्यार मुझ को सनम जब हुआ आप से 

हर नफ़स ग़मज़दां दिल लगा आप से 


हो गयी तीरगी,  बुझ  गया चाँद भी 

हो गए हम कभी जब जुदा आप से


आदमी को सुनो ,  आदमी  ही कहो 

रूठ जाये भी गर , इक ख़ुदा आप से   


बस ज़रा प्यार से    चूम लेना उसे 

कोई करने लगे जब बुरा आप से 


दो सितारे बशर   कहकशां रात का 

इक जला आप से , इक बुझा आप से 



कवि - बशर बिंदास 


ग़ज़ल - हर किसी का सनम दिल लुभाता नहीं

 ग़ज़ल 


हर किसी का सनम दिल लुभाता नहीं 

प्यार करना  यहाँ सब को आता नहीं 


हर घडी प्यार की आग में हम जले 

इश्क़ की आग भी वो बुझाता नहीं 


भूल कर भी उसे हम भुला न सके 

याद भी अब सनम हम को आता नहीं 


रात भर जाग कर दिल तड़पता रहा 

गीत ग़म के भी अब वो सुनाता नहीं 


चाँदनी में कही सो गया जब 'बशर '

नींद से फिर उसे वो जगाता नहीं   


कवि - बशर बिंदास 

Friday, June 2, 2023

लघुकथा - धर्म

 लघुकथा -  धर्म


हंटर वाली लेडी ने ऊँची आवाज़ में नौकरी के लिए आये जवान लड़के से पूछा - " तुम्हारी ज़ात क्या है ? " 

- " जी , गोवर्धन गोत्र के  ब्राह्मण है , हमारे पूर्वज ....."

- " ठीक है , ठीक है....हो तो  हिन्दू ना, हमे मुसलमानों से सख़्त नफ़रत है।  "

- " जी , मेमसाहब , सौ बटा सौ हिन्दू है। " 

- " काम समझ गए ना ठीक से "

- " जी , मेमसाहब   कुत्तों की देखभाल  करनी है और  उन्हें खाना खिलाना है  , 

- " सबसे ज़रूरी हैं उन्हें हगाने के लिए पड़ोस के मैदान में घुमाना।  , और कोई सवाल ?"

- " जी मेमसाहब , हम जानना चाह रहे थे कि कुत्ते हिन्दू हैं कि मुसलमान ? "

ग़फ़लत में मेमसाहब का मुँह तो खुला लेकिन अलफ़ाज़ उसके गले में ही अटक गए। 



लघुकथा - पीर की मज़ार

पीर  की   मज़ार 


- " क्या हुआ भाई , मुँह लटकाये क्यों बैठा है ? " 

- आज जुम्मा है , फिर भी पीर साहब की  मज़ार  पर दर्शनार्थी बहुत कम है , और हिन्दू भाई - बहिन तो आज दिखाई ही नहीं पड़ रहे हैं। 

- ऐसा क्या , अरे हाँ , याद आया कल एक नेता जी जनता से अपील कर रहे थे कि पीरों की मज़ारो को पूजना बंद करों। 

- इसका मतलब अब हिन्दू भाई - बहिन मज़ारो पर चढ़ावा नहीं चढ़ाएंगे ? अगर ऐसा हुआ तो हमारा तो धंधा ही चौपट हो जायेगा।  ये तो सीधी सीधी रोज़ी रोटी पर लात है। 

- लगता तो ऐसा ही है भाई , अब अगर घर चलाना है  तो अपनी दुकान मंदिर के आगे लगा लो और हाँ ये ढाढ़ी भी कटवा  लेना, वरना  कोई अगरबत्ती भी नहीं खरीदेगा। 

- समझ गया भाई जी , समझ गया , अब मैं अपनी दुकान का नाम भी   ' श्याम ट्रेडर्स ' रखूँगा। 

उनकी बाते सुन कर मन ही मन सोच रहा था  कि रोज़ी रोटी  के लिए लोगो को ईमान तो  बेचते देखा , अब क्या मज़हब भी बिकेगा ?


लेखक - इन्दुकांत आंगिरस 








Thursday, June 1, 2023

फ़्लैश बैक - चौसर

 चौसर 


महाभारत काल  से चला आ रहा 

चौसर का खेल 

अब विलुप्ति की कगार पर है 

लेकिन मैंने देखा पुरनी दिल्ली  में 

अक्सर लोगो को खेलते चौसर 

फुर्सत में कुछ चौसर - बाज़ 

बिछाते चौसर की बिसात 

फेंकी जाती कौड़ियाँ 

और उन कौड़ियों के हिसाब से ही 

चलते खिलाड़ी अपनी अपनी चाल 

खेल खेला जाता था कौड़ियों से 

पर दांव पर लगती थी बड़ी रकम 

कभी कभी घोड़े वाली पुलिस 

आ जाती थी पकड़ने उन्हें 

हो जाते थे सब तीतर - बितर 

कुछ घंटो बाद फिर 

बिछ जाती थी चौसर की बिसात 

पर अब तो सालो हो गए 

न चौसर रही , न चौसर की बिसात 

और न चौसर - बाज़। 


कवि - इन्दुकांत आंगिरस 













ग़ज़ल - ज़िंदगी जो मिली रौशनी की तरह

 ज़िंदगी जो मिली रौशनी की तरह 

दिल बुझाती रही तीरगी  की तरह 


बस यही इक ख़ता  यार मुझसे हुई 

हर किसी से मिला आदमी की तरह 


प्यास में ख़ुद- ब- ख़ुद वो जला रात दिन 

जो मिला था मुझे  इक नदी की तरह 


भूलने में उसे इक ज़माना   लगा 

याद आता रहा इक सदी की तरह 


आग में सुन ' रसिक  ' इश्क़ जो था जला 

रात में ढल गया चाँदनी की तरह   



कवि - बशर बिंदास 

लघुकथा - सेविंग्स

 लघुकथा - सेविंग्स 


अपने नए पड़ोसी  को चाय की प्याली थमाते हुए मैंने पूछा - " सर्विस करते हैं आप  ? "


- " जी हाँ , बिजली विभाग में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हूँ। " - पडोसी ने  मुस्कुरा कर जवाब दिया। 


- " फिर तो बिजली आपको फ्री मिलती होगी " - मैंने उत्सुकता से पूछा। 


- " जी , फ्री है भी और नहीं भी "।  पडोसी ने तपाक से कहा। 


- " जी मैं समझा नहीं '" - मैंने हिचकते हुए कहा। 


- " मतलब बिल तो आता  है पर बहुत कम " 


- वो कैसे ? - मैंने जिज्ञासा से पूछा। 


- इधर  आइये , बतलाता हूँ , वो मुझे बिजली के मीटर के पास ले जा कर बोले - ये पिन देख रहे हैं आप , बस इसे ज़रा सा नीचे गिरा दें ,फिर चाहे AC चलाये चाहे गीजर। "


अपने पडोसी  की इस बचत योजना के आगे मुझे अपनी सारी बचत योजनाएँ फीकी- सी मालुम पड़ी। 


लेखक - इन्दुकांत आंगिरस