Saturday, May 31, 2025

Final Geet _ मैं अधर का गीत बन कर गुनगुनाना चाहता हूँ

 मैं अधर का गीत  बन  कर   गुनगुनाना चाहता हूँ 

हर हृदय का मीत बन मैं खिलखिलाना चाहता हूँ



साज़ मैं मृत्यु का  हूँ पर, ज़िंदगी के   गीत गाता

फूल काँटों का मगर मैं,हर किसी को हूँ लुभाता 

अश्क का दरिया मगर मैं,  मुस्कुराना चाहता हूँ

हर हृदय का.....


ख़ून  दुश्मन का मगर मैं , दोस्ती के काम आता 

अर्क यामा का सही पर , हर नयन में हूँ समाता

दीप धुंधला सा  मगर मैं , जगमगाना चाहता हूँ 

हर हृदय का......


काम  नेकी का मगर मैं , ना बदी को मैं सुहाता  

राज़ हूँ मैं ज़िंदगी का, ना समझना कोई चाहता

राग मैं बिखरा हुआ पर कुछ सुनाना चाहता हूँ

                  या

राग यौवन का नहीं पर, लड़खड़ाना चाहता हूँ

हर हृदय का......

UMRAN Language Module

 https://umrangreenschool.in/ugs-syllabus/    (  Syllabus ) 

Namita Ghazal

 एक गज़ल


 गर्मी थी तेज़ धूप थी रस्ते बबूल थे

चलना था, क्योंकि राह में कुछ आगे फूल थे

   


 चलने से पहले रास्ते लगते थे पुरखतर

जब चल पड़े तो पैरों के कांटे कुबूल थे

 

 आई समझ तो राज़ खुला जा के अब कहीं

छुप छुप के चाहने के वो किस्से फज़ूल थे

  

खुशियाँ बिखेरते हुए आते थे जो नज़र

अन्दर से उनके चेहरे भी कितने मलूल थे


इक वो कि कोई बात भी उनसे न निभ सकी

इक हम वो निभाए जो उनके असूल थे।

  @नमिता राकेश


इज़्ज़त वक़ार चाहे तो खुद को बदल के देख

झूठी अना की क़ैद से बाहर निकल के देख


जिस ग़म ने मेरे दिल को जला के किया है राख

उस ग़म की आग में कभी तू भी तो जल के देख


रस्ते कठिन हैं प्यार के तू हौसला तो रख

मंज़िल की है तलब तो मेरे साथ चल के देख


बच्चों के बाप ने कहा बच्चों की मां से, सुन

खुलने लगे हैं बच्चों के पर,हल्के हल्के , देख


बादल के कान में कहा चुपके हवा ने ,सुन

क़ीमत है तेरी क्या ज़रा सहरा में चल के देख

@ नमिता राकेश

Thursday, May 29, 2025

शहर और जंगल - बासी गंध

 बासी गंध 


महल में क़दम रखते ही 

खिल गया राजकुमार का मन 

पुती हुई दीवारें 

फ़ानूस फ़व्वारे !

महल क्या था !

नई नवेली दुल्हन 

हाँ , राजकुमार की दुल्हन 

ताज़ा महकते फूलों सी सजी 

दुल्हन रह गयी ठगी की ठगी 

मन्द मन्द शर्माती थी 

होंठों में मुस्काती थी 

मैदान को खुलती  खिड़की खोली 

दुल्हन झिझकी , दुल्हन बोली 

" सुनिए प्राणों के दास 

 कैसी है ये बास ? "


और महल के उस पार 

दूर तक फैली झोपड़ पट्टी 

उनसे उठता काला धुआँ 

दूर तक फैला मुर्दा सन्नाटा 

चटकते सूखे बाँस 

खिड़की से घुसता काला धुआं 

राजकुमार ने रोक ली 

अपनी साँस 

और झट से कर दी खिड़की बंद 

लेकिन फिर भी आती रही 

बासी गंध 

धुएं में लिपटी बासी गंध 

मज़दूर की  रोटी की  बासी गंध 

बेटियों के बदन की  बासी गंध 

जलते गोश्त की  बासी गंध 

टूटते जिस्मों की  बासी गंध 


राजकुमार ने जड़वा दिए 

अपारदर्शी शीशे खिड़की में 

लेकिन फिर भी आती ही रही बासी गंध 

गंध कब रुकती है 

आग की तरह , इसके  पैर नहीं होते 

लेकिन फिर भी चलती है 

हवा में घुल जाती है गंध 

और न चाहने पर भी 

घुस जाती है नथनों में 


लेकिन , लोग 

रख लेते हैं मुँह पर रुमाल 

और निकल जाते हैं दबे पाँव 

गंध रह जाती है वहीं की वहीं

कही कोई आवाज़ नहीं उठती 

किसी की भी आत्मा से 

नहीं उठता संगीत 

और बासी गंध रच - बस जाती है 

चंद ज़िंदा लाशों की 

साँसों में। 


कवि - इन्दुकांत आंगिरस 

Wednesday, May 28, 2025

Final Geet - शब्द कोई भी प्रेम भरा

 शब्द  कोई  भी    प्रेम  भरा , 

अब मुझ को ना लिखना तुम।

मेरे    जलते     ज़ख़्मों    पे , 

अब  मरहम  ना  रखना तुम ।


टूटा  दिल   उजड़ी बस्ती हूँ , 

गुज़रा   हुआ    ज़माना   हूँ ।

मुरझाए   फूलों   पे   पसरा ,  

ग़म     का    शामियाना   हूँ ।

मैं   टूटी  हुई   सी   सरगम  ,

गीत   कोई  न   रचना  तुम ।

मेरे जलते जख्मों...... 


अपने ज़िंदा ज़ख़्मों को हँस ,

आज   कफ़न   पहनाया  है । 

बरसों से इस बोझिल मनको,

मुश्किल   से   समझाया   है ।

बन्द  खुली  इन   पलकों  में, 

स्वप्न   कोई  न   बुनना  तुम ।

मेरे जलते जख्मों......


इस सूने  मरघट  दिल में ना , 

कोई    ख़्वाब    मुस्काएगा ।

चन्दन   भी  जहरीले   सर्पों ,

जैसी     अगन     लगाएगा ।

मिले अगर जो किसी मोड़ पे,

मिलकर  भी न  मिलना तुम ।

मेरे जलते जख्मों.....

Sunday, May 25, 2025

Hiroshima Child - Nazim Hikmet ( Turkish Poem )

 

Hiroshima Child

I come and stand at every door
But none can hear my silent tread
I knock and yet remain unseen
For I am dead for I am dead

I'm only seven though I died
In Hiroshima long ago
I'm seven now as I was then
When children die they do not grow

My hair was scorched by swirling flame
My eyes grew dim my eyes grew blind
Death came and turned my bones to dust
And that was scattered by the wind

I need no fruit I need no rice
I need no sweets nor even bread
I ask for nothing for myself
For I am dead for I am dead

All that I need is that for peace
You fight today you fight today
So that the children of this world
Can live and grow and laugh and play


नन्हीं  लड़की 

 हर दरवाज़े पे आकर होती  हूँ खड़ी 
सुनता  नहीं कोई  भी मेरी ख़ामोशी 
देती  हूँ दस्तक लेकिन देखता नहीं कोई 
क्योंकि  मर चुकी  हूँ मैं  , मुर्दा  हूँ भाई 

सिर्फ सात साल  का थी  जब मरी  थी 
बरसों पहले हिरोशिमा में 
हूँ अभी भी सात ही बरस की  मैं
बच्चे मर जाने पर बड़े नहीं होते 

मेरे बाल सब जल गए थे लपटों में 
धुंधला गयी थी  आँखें ,अंधी  हो गयी  थी  मैं 
मौत ने मेरी हड्डियों को बना दिया था राख 
जिसे बिखेर  दिया था हर सम्त हवा ने 
 

न मुझे फल चाहिए न ही चावल 
न मिठाई चाहिए और न रोटी 
मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए 
क्योंकि  मर चुकी  हूँ मैं  , मुर्दा  हूँ भाई 

मुझे तो चाहिए बस  शान्ति और अमन 
मत लड़ो और अब  तुम जंग रात दिन 
जिससे इस दुनिया का   हरेक बच्चा 
खेल सके खिलखिला सके , रहे ज़िंदा 

I Love You - Nazim Hikmet ( Turkish Poem )

 

I Love You

I love you
like dipping bread into salt and eating
Like waking up at night with high fever
and drinking water, with the tap in my mouth
Like unwrapping the heavy box from the postman
with no clue what it is
fluttering, happy, doubtful
I love you
like flying over the sea in a plane for the first time
Like something moves inside me
when it gets dark softly in Istanbul
I love you
Like thanking God that we live.



मैं करता हूँ तुमसे प्रेम 

मैं करता हूँ तुमसे प्रेम 
जैसे नमक में भिगो कर रोटी खाना 
जैसे तेज़ बुखार में रातों को जागना 
और नलके में मुहँ लगा पानी पीना 
जैसे डाकिये द्वारा दिए गए पार्सल को खोलना 
बिना जाने क्या है उसमें  
कुछ ख़ुशी , ग़म या बेसिरपैर की चीज़ 
मैं करता हूँ तुमसे प्रेम 
जैसे समुन्दर के ऊपर हवाई जहाज़ में उड़ना पहली बार 
जैसे कुछ घुमड़ता है मेरे भीतर 
जब इस्तांबुल में धीमे से पसरता  है अँधेरा 
मैं करता हूँ तुमसे प्रेम 
जैसे ख़ुदा का शुक्रिया अदा करना  
कि अभी हम ज़िंदा हैं। 

Thursday, May 22, 2025

शहर और जंगल - बासी गंध

 बासी गंध 


महल में  क़दम रखते ही 

खिल गया राजकुमार का मन 

पुती हुई दीवारें 

फ़ानूस फ़व्वारे !

महल क्या था 

नई नवेली दुल्हन 

ताज़ा महकते फूलों सी सजी 

दुल्हन रह गयी ठगी की ठगी 

मन्द मन्द शर्माती थी 

होंठों में  मुस्काती थी 

पिछवाड़े की खिड़की खोली 

दुल्हन झिझकी  दुल्हन बोली 

" सुनिए प्राणों के दास 

 कैसी है ये बास ? "


Final Geet - मैं सपनो का सौदागर हूँ

 मैं   सपनो  का   सौदागर  हूँ 

सपनो  के  बुनता  मैं  घर  हूँ 


रात - रात   सपने   बुनता  हूँ 

फिर उठ के उनको गिनता हूँ 

जो आँखें हो  आस से ख़ाली 

उन  नयनों में  जा  बसता  हूँ 

टूट जाऊँ  पर   सदा अमर  हूँ

मैं  सपनो  का    सौदागर   हूँ 


बिन  सपनो  के  रात  अधूरी 

बिन  अपनों  के  बात अधूरी 

जीवन  ऐसा  खेल है  जिसमें 

बिन  ख़ुद  हारे   मात  अधूरी 

मैं  नाजुक  शीशे   सा  घर  हूँ

मैं  सपनो  का    सौदागर   हूँ 



गीत  उसी  के    मन  गाएगा 

दर्द  जो  दिल को  दे  जाएगा

गहरी  नींद  सुला मुझको  दे

वो सपना अब कब आएगा

आउँ नित  नए सपनें  लेकर

मैं  सपनो  का    सौदागर  हूँ 


चाहें तो ऐसे भी कर सकते हैं नहीं तो तीसरे अंतरे की पंक्ति मैं --

 "गहरी नींद सुला मुझको दे

वो सपना अब कब आएगा "  ऐसा करने से मात्राभार सही हो जाऐगा

Wednesday, May 21, 2025

Final Geet - आख़िर कब तक

 " आख़िर  कब तक "


मानव नर का रक्त पिएगा ,  आख़िर  कब तक ?

नर ही नर का ज़ुल्म सहेगा, आख़िर  कब तक ? 


भ्रष्टाचारी   सर्प    डसेगा ,  आख़िर  कब तक ?

मज़दूरों का ख़ून  बहेगा  ,  आख़िर  कब तक ?

कब तक होता युहीं रहेगा ,  क़त्ल  यहाँ   पे...?

दशासनी अभिमान हँसेगा , आख़िर कब तक ?

मानव  नर का .........


दहशत का सामान बनेगा ,आख़िर कब तक ?

सिक्कों में ईमान  बिकेगा आख़िर  कब तक ? 

हैवानियत का कब तक युहीं ,  नाच नचेगा...? 

बारुद बन नर युहीं मरेगा आख़िर  कब तक ?

नर ही नर का रक्त ..........


सच का झूठा ढोल बजेगा आख़िर  कब तक ?

चौपट जी का राज चलेगा  आख़िर  कब तक ? 

कब तक होता युहीं रहेगा   पतन    यहाँ   पे  ? 

दिल्ली तेरा ताज बिकेगा आख़िर  कब तक...? 

नर ही नर का रक्त ..........

Tuesday, May 20, 2025

शहर और जंगल - अँजुरी भर स्नेह

 अँजुरी भर स्नेह 


एक उदास शाम का सूनापन 

रात भर डसता  ही रहा 

क़तरा क़तरा दर्द 

आँख के समुन्दर से 

टपकता ही रहा ,

अब जाने कब मुक्त हो 

यह आत्मा , यह देह 

जाने कब मिले मन को 

अँजुरी भर स्नेह 

एक टुकड़ा ख़ुश्बू   की तलाश में ही 

कट जाती है उम्र यहाँ 

सदियों के समर्पण के बाद भी 

मिल जाये अँजुरी भर स्नेह 

नसीब ही है यहाँ। 

Monday, May 19, 2025

शहर और जंगल - पैबंद

 पैबंद 


पैबंद की परिभाषा 

कोई 

उस ग़रीब बाप से पूछे 

जो 

जवान बेटियों की 

उरानियाँ 

छिपाने की कोशिश में 

तब्दील हो चुका है 

अनगिनत पैबन्दों में 

Saturday, May 17, 2025

Web Development - HTML

 https://www.w3schools.com/html



https://youtu.be/BsDoLVMnmZs?si=qowKsjKhZcQjyciv


HTML - Hyper Text Markup language

Tuesday, May 13, 2025

शहर और जंगल - भूख

 भूख 


सूखी आँतें कुलबुलाती रहती हैं 

भूख हमें सताती रहती है ,भूख 

हाँ , दौलत , वासना , कुर्सी , रोटी की भूख 

नून, तेल , लकड़ी , लंगोटी की भूख 

भूख लगने पर 

इंसान , इंसान नहीं रहता  

ईमान , ईमान नहीं रहता 

पर मेरे दोस्त ! भूक लगने पर तुम 

अपनी मुट्ठी बंद ही रखना 

मुट्ठी खुलते ही 

हथेली की लकीरें मिट सकती है 

किसी का चेहरा नौचना 

हमारी आदत बन सकती है 

भूख एक जनून 

पर तुम 

मारना नहीं किसी के पेट पर लात 

भूख अपनी मिटाने को 

निचोड़ लेना अपना ही ख़ून 

पर यह सब भी कब तक 

भूख जाती है मरघट तक 

हाँ ,

भूख से निकल भी जाता है दम 

फिर क्या दफ़ना दें 

इस ख़ाली पेट को हम ?


Monday, May 12, 2025

शहर और जंगल - महक

  महक 


गन्दी गलियों में भी 

एक महक होती है 

मैंने अपने आँगन से 

चमेली उखड़वा दी है 

हर जुलूस एक जनाज़ा होता है 

जो कफ़न नहीं ओढ़ता 

जहाँ साँस लिया है जाता 

वहाँ बरसों लोग रह जाते हैं 

मेरे देश में 

लोगों ने मरना बंद कर दिया है 

तारकोल से ढँका हर चेहरा 

हर  सड़क यहाँ आवारा है 

हम कौन ? तुझे क्या ?

यह पाप सिर्फ हमारा है 

यहाँ कौन सी दीवार पर 

लगाएँ  इश्तहार 

मेरे देश में 

हर आदमी एक इश्तहार है 

और मैं इन सब पर 

एक कविता लिख सकता हूँ 

किसी साफ़ सुथरे काग़ज़ पर 

किसी विलायती पैन से 

सिर्फ 

एक कविता लिख सकता हूँ। 

Satyakam Link

 [13:14, 13/03/2025] Satyakam: https://meet.google.com/ipq-ovjy-ctn

[13:14, 13/03/2025] Satyakam: This is permanent link bhai ji...please save / book mark it

Sunday, May 11, 2025

शहर और जंगल - सारे जहाँ से अच्छा

 सारे  जहाँ से अच्छा 


कोठरी का एक ही द्वार 

बंद करते ही 

घिर जाता है अन्धकार 

बरसात में 

घर की छत टपकती है 

भीगे कपड़ों में 

पत्नी कुछ और सरकती है 

और बच्चें भी जब 

गठरी बन सिकुड़ जाते हैं 

तब 

' सारे जहाँ से अच्छा 

हिन्दोस्तां हमारा "

हम सपरिवार 

अपना राष्ट्रगीत गाते हैं। 

 

Thursday, May 8, 2025

शहर और जंगल - प्रार्थना

 प्रार्थना 


एक बार फिर 

निकलता है सूरज 

एक और दिन की

सज़ा देने 

हमसे हमारी ही 

साँसें लेने 

और हम 

सुबह , दोपहर , शाम 

भोग कर

एक बार फिर 

रात में 

प्रार्थना करते हैं 

ईश्वर से 

अगली सुबह के लिए 

और एक दिन की 

सज़ा के लिए। 

शगुन

 शगुन 

 

मनोज  की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। घर में ३० बरस बाद ख़ुशियों  की कलियाँ मुस्कुराई थीं। उसके ज्येष्ठ पुत्र प्रमोद को सरकारी नौकरी मिल गयी थी और आज उसका विवाह एक सुशील कन्या के साथ होने जा रहा था। घर रिश्तेदारों से भरा हुआ था।  हर किस का चेहरा ख़ुशी से चमक रहा था।  घर को फूलों से सजाया जा रहा था। शादी के गीत गाये जा रहे थे।  तभी अचानक घर के बाहर एक टेम्पो आकर रुका और कुछ तालियों की आवाज़ वातावरणमें गूँज उठी। बधाई देते हुए ८ - १० किन्नर  घर के आँगन में प्रवेश कर चुके थे।  मनोज ने उन सभी किन्नरों का हाथ जोड़ कर स्वागत किया। किन्नरों ने दूल्हे को आशीर्वाद दिया और नाच - गा कर अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करी ।  मनोज ने सभी को भोजन करवाया।  भोजन उपरांत किन्नर जाने लगे तो मनोज उनको नज़राना  देने लगा। इस पर किन्नरों के सरदार ने कहा ," बाबू जी , हम यहाँ  नज़राना लेने नहीं आये हैं। जीवन में पहली बार किसी ने हमें अतिथि के रूप में बुलाया है। इसलिए आप अपना नज़राना अपने पास रखिये और हमारा शगुन क़बूल करिये। ईश्वर आपके बेटे को लम्बी आयु दें और एक ख़ुशहाल वैवाहिक जीवन। " यह कह कर सरदार ने शगुन का  लिफाफा मनोज के हाथ में सरका दिया। 


लघुकथा - कलमा

 लघुकथा - कलमा 


घर में क़दम रखते ही पंडित रामदास सकते में आ गए। बरसों पुराना तोता  ' हरे रामा , हरे कृष्णा , कृष्णा कृष्णा हरे हरे '  का जाप छोड़ कर कलमा पढ़ रहा था। पंडित रामदास उबलते हुए चिल्लाये - " पगला गए हो मिट्ठू मियाँ , राम नाम छोड़ कर कलमा पढ़ने में लगे हो ! "

- " हाँ , हाँ , हम पगला गए हैं पंडित जी , अरे , कलमा नहीं  पढ़े तो क्या अपनी जान दे दे , और मेरी मानो  तो पंडित जी आप भी कलमा पढ़ना शुरू कर दो। ये जुमला तो आपने सुना ही होगा - " जान है तो जहान है प्यारे ", तोता एक साँस में बोल गया . । 

अब तोता पंडित जी को कलमा सिखा रहा था और पंडित जी अटक अटक के कलमा पढ़ रहे थे। 


लेखक - इन्दुकांत आंगिरस 

Wednesday, May 7, 2025

शहर और जंगल - आक्रोश

 आक्रोश 


सामने वाली दीवार पर 

एक अरसे से 

उभरती ही जा रही है 

एक घिनौनी तस्वीर 

काले  होंठ , बुझी आँखें , ज़र्द चेहरा 

और 

कितना बेडौल है ये पेट , जिस पर  

जाने कौन खोद गया एक भद्दी गाली ,

धीरे धीरे उस दीवार की 

एक  एक ईंट गिरती रही 

फिर उभरा 

एक साफ़ - सुथरा मकान 

बॉलकनी पर एक इंच मुस्कान 

आज रात 

मैं ज़रूर चिपका दूँगा 

इस साफ़ - सुथरे मकान की 

हर दीवार पर 

जिस पर 

ठीक वैसी ही घिनौनी तस्वीरें 

आज रात 

मैं ज़रूर फाड़ दूँगा 

ये महीन परदे 

पर , मुझे डर है 

मेरी आत्मा मुझे मार न दे 

इसलिए आज रात 

मैं ज़रूर मार दूँगा 

अपनी आत्मा।  



शहर और जंगल 

Tuesday, May 6, 2025

शहर और जंगल - स्वतंत्रता

 स्वतंत्रता 


एक डाल से 

दूसरी डाल पर 

चिड़िया का चहकना 

अर्थहीन हो सकता है 

आपके लिए 

हमारे लिए 

लेकिन 

चिड़िया स्वतंत्र  होती है 

अपनी ज़िंदगी 

अपने ढंग से 

जीने के लिए 

मनचाहे तिनकों को 

चुनने के लिए। 

Monday, May 5, 2025

शहर और जंगल - आवरणहीनता

 आवरणहीनता 


तुम्हारें ही बोये बीजों से 

विघटन , अनास्था , विकृति के 

वृक्ष उग आएँ 

भूमिगत हो गयी 

कोमल आकांक्षाएँ

पहले तो तुमने 

नंगा करा था मुझे 

पर अब मैं  

स्वयं नंगा हो 

दिखाऊँगा अपने घाव 

अब और 

जन्म नहीं ले पाएगा बिखराव 

तुम होंठों पर लगे ख़ून  को लाख छिपाना 

अब नहीं ढँक  पाओगे  

अपनी आवरणहीनता। 

Thursday, May 1, 2025

Ghazal_RAV

 इस मिसरे पर लिखने की कोशिश करें

'आज वो सिर्फ गंदा नाला है'

काफिया आ स्वर का

नाला, जाना, पारा ,सादा, काला, आदि।

रदीफ - है

बह्र 

फाइलातुन मुफाइलुन फैलुन

2122   1212  22