Sunday, June 15, 2025

Addresses

 Ms Meenakshi Jijivisha 

House No- 892 , Sector - 10

Housing Board

( Near Arzoo Tailors ) 

Faridabad - Haryana - 121006

Mob -  8700857305


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Mr K P Anmol 

Anmol- Pratiksha - 321/4

Solanipuram 

Roorkee , Uttrakhand - 247667

Mob - 8006623499

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Ms Namita Rakesh 

Flat No - 202 , Tower - H

Park Grandeodra 

BPTP , Sector - 82

Greater Faridabad -121007

Mob - 9212483258

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Ms Devika Menon 

Kailash Dham Apartments 

E- 1 , Sector - 50

Noida 

Uttar  Pradesh - 201301

Mob 9818673624

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Saturday, June 14, 2025

लघुकथा - बछिया का लड्डू

लघुकथा  - बछिया का लड्डू 


चौधरी साहिब की गाय ने बछिया को जन्म दिया तो चौधरी  साहिब ख़ुशी से फूले न समाये।  पूरे गाँव में लड्डू बाँटे जा रहे थे  । नुक्कड़ पर चंद लोग फुसफुसा  रहे थे।  

- ' कमाल है यार , अभी पिछले महीने जब चौधरी साहिब की बहु ने लड़की को जन्म दिया था , तब तो चौधरी साहिब का मुँह लटक गया था और अब बछिया के जन्म पर लड्डू  बाँट रहे हैं। ' गोबर ने पूछा था।   

- ' अरे इतना भी नहीं समझते क्या , बछिया बड़ी होकर दूध देगी जबकि लड़की को पढ़ाओ , लिखाओ , खिलाओ , पिलाओ और एक दिन बड़े दहेज के साथ किसी बैल के घर बाँध आओ। यानी नुक्सान ही नुक्सान। ' बुजुर्ग ने समझाया। 

-' सही कह रहे हो भाई , कलयुग है और इस कलयुग में इंसानों की औकात जानवरों से भी कम है। ' कहते हुए गोबर ने चौधरी साहिब के लड्डू से अपना मुँह भर लिया। 


लेखक - इन्दुकांत आंगिरस 

Thursday, June 12, 2025

शहर और जंगल - मज़हबी जुनून

 मज़हबी जुनून 


जब शहर की सड़कों से गुज़रता हुआ 

मुर्दा सन्नाटा 

बंद दरवाज़े की छोटी -सी झिरी से 

घर में आ घुसा 

तो कलेजा मुँह को आ गया 

बस अब नहीं बचेंगे हम 

हे ईश्वर !

बस आज की रात किसी तरह गुज़ार दे 

लेकिन समय कब रुका है 

कब किसी शय के आगे झुका है 

मेरी सदा दहलीज़ भी न लाँघ पाई 

दरवाज़े पे एक जंगली दस्तक आई 

दरवाज़ा खोलो नहीं तो तोड़ डालेंगे 

हे ईश्वर ! 

अपनी डूबती कश्ती को बचने अब किसे बुलाऊँ 

इन जवान बेटियों की   उरानियाँ  कहाँ छुपाऊँ

बस अब थोड़ी ही देर में 

मेरी रगों में बहता ख़ून

फ़र्श   पर बिखर जाएगा 

जो काम मुझसे हो न सका 

वो दोस्त मेरा कर जाएगा 

दरवाज़ा खोलो !

ऐ मेरे ख़ुदा ! , कुछ तो बोलो 

अगर तुम मेरी मदद को आ नहीं सकते 

तो फिर 

मुझे अँधा और बहरा बना दो 

क्योंकि ज़बान के होते हुए भी  

गूँगा तो हूँ मैं वैसे ही ,

पर सुनो 

मुझे अँधा और बहरा बनाने से पहले 

एक बार सिर्फ एक बार 

मुझे मोहम्मद , गाँधी , यीशु और नानक के 

बलिदान की कथा सुना दो 

फिर मुझे अँधा और बहरा बना दो। 


दरवाज़ा खोलो 

ऐ मेरे ख़ुदा ! कुछ तो बोलो 

वो दरवाज़े के उस पार जो शख़्स खड़ा है 

यक़ीनन मेरी जान के पीछे जो पड़ा है 

कभी बचपन की गलियों में 

मेरे साथ वो खेला होगा  

इक  दूसरे का  दुःख 

मिलजुल कर हमने झेला होगा 

वो भी मुझको 

देखते ही  पहचान जायेगा 

फिर भी वो ज़ालिम लेकर मेरी जान जाएगा 

फिर खोल ही देता हूँ दरवाज़ा 

भीतर जो वो आता है , आए 

बुझती हो मेरे ख़ून से 

जो प्यास उसकी , तो बुझाए 

बेशक इस क़त्ल को 

हक़ीक़त ही माने आप 

पर फिर भी 

सच कुछ और है जनाब 

वो फ़र्श पर बिखरा 

मेरा ख़ून भी , मेरा नहीं है 

मैं मानता हूँ मेरे दोस्त 

तेरा जुनूँ भी तेरा नहीं है 

क़त्ल तो इक मज़हब ने 

दूसरे मज़हब का किया है 

इस मज़हबी जुनून  ने 

क़त्ल उसका मेरा या तुम्हारा नहीं 

क़त्ल हम सब का किया है। 

ग़ज़ल के दोष - RAV

 ग़ज़ल के दोष


वर्तमान में ग़ज़ल कहने वालों की बाढ़ आ गई है। जिसे देखिये वही ग़ज़ल को सबसे सरल विधा समझकर बिना अरुज जाने बूझे जोर आजमाइस कर रहा है। परिणामस्वरूप ग़ज़लें बहर से ख़ारिज तो होती ही हैं साथ ही उनमें दोष भी होते हैं। ग़ज़ल कहते समय हमें निम्नलिखित दोषों से बचना चाहिये।

 

1. कर्ता,क्रिया,कर्म आदि का अपने स्थान पर न होना।

जैसे - कहा बन्दे से तू संभल जा खुदा ने 

       नहीं तो बुरा हश्र होगा किसी दिन 

इसमें ऊला मिसरा में कर्ता,क्रिया,कर्म कोई भी अपने स्थान पर नहीं है। अतः इस शेर में दोष है। इस दोष को उर्दू में ताक़ीदे - लफ़्जी कहते हैं।

इसे यूँ कहा जा सकता है-

खुदा ने कहा बन्दे से तू संभल जा 

नहीं तो बुरा हश्र होगा किसी दिन 

इस प्रकार कर्ता,क्रिया,कर्म आदि सभी ने अपना स्थान ले लिया है।

2. किसी शेर में किसी शब्द की कमी होना या क्रिया अपूर्ण होना भी शेर के दोष में गिना जाता है। इसे हज़्फे़ लफ़्ज कहा जाता है।

जैसे - ‘‘रात दिन सब एक ही धुन में लगे’’ 

उपरोक्त पंक्ति में ‘‘है’’ की कमी खटक रही है। क्रिया अपूर्ण है अतः इसको इस प्रकार से दुरुस्त कर हज़्फ़े लफ़्जी दोष को दूर किया जा सकता है।

‘‘रात दिन सब एक ही धुन में लगे हैं।’’     

3. दो बेमेल चीजों को या बातों को मिलाना भी शेर के दोष हैं। इसे ऐबे शुतुरगर्बा कहते हैं। शुतुर का अर्थ है ऊँट और गर्बा का अर्थ है बिल्ली अर्थात ऊँट के गले में बिल्ली बाँधना।

जैसे - तू अब बाहर निकल आ अपने घर से

       तुम्हे  भी  जुल्म  से  लड़ना  पड़ेगा 

उपरोक्त शेर में पहली पंक्ति में ‘‘तू’’ आया है और दूसरी पंक्ति में ‘‘तुम्हे’’ आया है। यहाँ ‘‘तू’’ के साथ में ‘‘तुम्हे’’ का प्रयोग न होकर ‘‘तुझे’’ का प्रयोग होना चाहिये।

दूसरा उदाहरण देखिये -

गुनाह हमसे हुये हैं हज़ारहा ‘‘आमिल’’

हरीमे नाज़ में लेकिन मिरी रसाई है।

यहाँ पहली पंक्ति में ‘‘हमसे’’ आया है जबकि दूसरी पंक्ति में ‘‘मिरी’’ का प्रयोग शायर पे किया है। यहाँ ‘‘हमसे’’ के संदर्भ में ‘‘हमारी’’शब्द आयेगा। ‘‘मिरी’’ का प्रयोग करके शायर ने अनजाने में शुतरुगर्बा को दोष शेर मे ला दिया है परन्तु ‘‘मिरी’’ के स्थान पर ‘‘हमारी’’ शब्द का प्रयोग करने से शेर बहर से खारिज़ हो जावेगा। अतः ‘‘मिरी’’ के संदर्भ में ऊपर के मिसरे में ‘‘हमसे’’ की जगह  ‘‘मुझसे’’ को लाना पड़ेगा।

4. जब दो समान अक्षर इस प्रकार पास पास आ जावे कि उनका उच्चारण बाधित हो अर्थात प्रवाहपूर्ण उच्चारण न हो तब शेर में एक प्रकार का दोष उत्पन्न हो जाता है। इसे ऐबे तनाफ़ुर कहते हैं।

               जैसे

 ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना

 क्या क़सम है तिरे मिलने की कि खा भी न सकूँ    

उपरोक्त शेर में ‘‘की कि खा’’ वाला भाग प्रवाह के साथ नहीं पढ़ा जा रहा है। अतः यह दोष ऐबे तनाफुर कहलायेगा। 

5. कभी - कभी शेर को बहर मे रखने के लिये अनावश्यक शब्दों को रूई की तरह ठूस-ठूस कर शेर में भरते हैं। इस ऐब को ‘हश्व’ कहते हैं।

जैसे - अक्सर ये मेरा ज़ह्न भी थक जाता है लेकिन 

       रफ्तार ख़्यालों की  कभी  कम  नहीं  होती       

इस शेर में ऊपर की पंक्ति में ‘अक्सर ये मेरा ज़ह्न’ में ‘‘ये ’’ शब्द शेर के वजन  को पूरा करने के लिये जबरदस्ती भर्ती किया गया है। बगैर ‘‘ये’’ शब्द के भी शेर का भाव प्रकट होता है। अतः इसमें हश्व का दोष है। ऐसे शब्द को भर्ती का शब्द कहते हैं।

6. कभी - कभी शायर अपनी बात को शेर में स्पष्ट प्रकट करने में असमर्थ रहता है। शायर क्या कहना चाहता है शायर तो समझता है परन्तु सुनने वाला नहीं समझ पाता और शेर बेमानी होकर रह जाता है। अतःशेर में बात खुल कर आनी चाहिये।

जैसे - कितनी मेहनत से आपकी ख़ातिर 

       तोड़ लाये हैं  आसमान से  हम 

शायर कहना चाहता है कि वह आसमान से आपके लिये तारे तोड़कर लाया है परन्तु यह बात हम और आप नहीं समझ पा रहे हैं यह तो केवल शायर ही जानता है। वह पहेलियाँ बुझा रहा है। अतः ऐसा शेर बेमानी है जिसका अर्थ न निकले।

7. शेर मे जिन शब्दों को बतौर क़ाफ़िया इस्तेमाल करते हैं उन षब्दों की कोई भी मात्रा या अक्षर बहर के मुताबिक भी नहीं गिरना चाहिये। 

जैसे - सफर ये साँस का अब खत्म होने वाला है 

       जो जागता था मुसाफिर वो सोने वाला है

क्योंकि बहर मफाइलुन फइलातुन मफाइलुन फैलुन के अनुसार 

यहाँ ‘‘होने’’ और ‘‘सोने’’ क़ाफ़िया है मगर ‘‘ होने’’ और ‘‘सोने’’ में अंतिम अक्षर ‘‘ने‘‘ का वजन गिराया गया है जो कि गलत है।

8.काफिया दो के होते हैं

शुद्व काफिया और योजित काफिया। शुद्व काफिया कलाम,गुलाम हवा, दवा रहम, करम आदि। योजित काफिया वे होते हैं जिनमें किसी शुद्व काफिये में कुछ अंश जोड़कर नया काफिया बना दिया जावे। जैसे ‘दोस्त’ और ‘दुश्मन’ में ‘ई’ जोड़कर दोस्ती और दुश्मनी कर दिया जावे। इसी प्रकार झुग्गी को झुग्गियाँ और कामगार को कामगारों कर दिया जावे तो ये योजित काफिये कहलाते हैं। बढ़ा हुआ अंश हटा देने पर बचा हुआ अंश हम काफिया नहीं है तो काफिया अशुद्ध हो जायेगा बशर्ते उनमें व्याकरण भेद न हो। जैसे - दफ्तरों से ओं हटा देने पर दफ्तर बचता है और झुग्गियों से यों हटा देने से झुग्गी शेष  बचता है। अब दफ्तर और झुग्गी हम काफिया नहीं हैं तो दफ्तरों और झुग्गियों का काफिया बाँधना गलत होगा। लेकिन किसी क़ाफ़िये के अंतिम अक्षर या मात्रा को हटा देने पर यदि बचा हुआ शब्द निर्रथक हो जाता है तो वह शुद्ध क़ाफ़िया होगा। जैसे ‘ज़िन्दगी’ में ई की मात्रा हटा देने पर शब्द ज़िन्दग बचता है जिसके कोई मायने नही अर्थात शब्द निर्थक हो जाता अतः यह काफिया शुद्ध है और इसे काफिया के रूप में प्रयोग किया जा सकता है परन्तु ‘दोस्ती’ और दुश्मनी में ऐसा नहीं है। दोनो के अन्त के अक्षर अर्थात ई की मात्रा हटा देने पर दोनो के ही शाब्दिक अर्थ निकलते हैं इसलिये इनको काफिये के रूप में प्रयोग करना उर्दू शायरी के अनुसार वर्जित है। इस दोष को ‘‘हर्फे रवी’’ दोष कहते हैं परन्तु आजकल इस नियम के पालन में बहुत ध्यान नहीं दिया जाता।

9.   कलाम सबकी ज़ुबाँ पर है लाकलाम  तेरा।

    सलाम करता है झुक कर तुझे गुलाम तेरा।

इस मतले के शेर में क़ाफ़िया ‘लाकलाम’ के साथ ‘ग़ुलाम’ बाँधा गया है। उर्दू शायरों के अनुसार आगे का क़ाफ़िया ‘सलाम’ अर्थात ऐसे शब्द का क़ाफ़िया होना चाहिये जिनके अंत में ‘लाम’ आये, अगर अन्त में दाम,शाम,काम आदि क़ाफ़िया बाँधा गया तो वह गलत होगा। इसी प्रकार सख़्त,तख़्त,रख़्त के क़ाफ़िये में मस्त,वक्त,जब्त क़ाफ़िये नहीं आ सकते क्योंकि सख़्त,तख़्त,रख़्त के आगे आने वाले वही शब्द क़ाफ़िये हो सकते हैं जिनके अन्त में ‘‘ख़्त’’ हो। अगर गलती से इस प्रकार का काफिया बाँधा गया तो यह हर्फे कैद दोष के अन्तर्गत आयेगा।

10. मत्ला और हुस्नेमत्ला को छोड़कर गजल के अन्य किसी भी शेर के ऊला मिसरा के अन्त में रदीफ या रदीफ के समस्वर शब्द नहीं आना चाहिये यदि ऐसा होता है तो यह दोष है और इसे ‘‘तकाबुले रदीफ’’ दोष कहेंगे। 

जैसे - जो बातें ख़ास हैं साहब उन्हें सब आम कर देंगे

       मेरे बेटे  मुझे  ही  एक दिन  नाक़ाम कर देंगे 

       सड़े गल्ला भले  लेकिन गरीबों  को  नहीं देंगे

       अगर देंगे कभी तो फिर कलेज़ा थाम कर देंगे 

यहाँ पर मत्ला में आम,नाकाम,थाम क़ाफ़िया है और कर देंगे रदीफ है। दूसरे शेर में ऊला मिसरा अर्थात पहली पंक्ति के अन्त में ‘‘ देंगे’’ शब्द आया है जो कि रदीफ के सम स्वर ‘‘देंगे’’ से मिल रहा है अतः यह ‘‘तक़ाबुले रदीफ़’’ दोष है। इसी प्रकार - 

हर दिन एक नये सपने की दे  जाता  है  आस  मुझे 

किस मंजिल पर पहुँचायेगी  मेरे मन  की  प्यास  मुझे

जिनके मन सौ - सौ पापों के दल-दल में हैं लोट रहे

वे  ही  ज्ञानी  ध्यानी  बनकर  देते  हैं  बनवास  मुझे

उपरोक्त मत्ले में रदीफ़ ‘‘मुझे’’ है। दूसरे शेर के ऊला मिसरा के अन्त में ‘‘रहे’’ शब्द आता है और ‘‘रहे’’ शब्द के अन्त का स्वर ‘‘ए’’ ‘‘मुझे’’ रदीफ़ के अन्त के स्वर ’’ए‘‘ मिल रहा है अर्थात दोनों शब्द ‘‘रहे’’ और ‘‘मुझे’’ का अन्त समस्वर से है अतः यह दोष है और यह तक़ाबुले रदीफ़ दोष के अन्तर्गत आता है।   

ग़ज़ल कहना बहुत सरल नहीं है। ग़ज़ल के येे नियम स्थूल नियम हैं। इसके अतिरिक्त भी ग़ज़ल में बहुत बारीकियाँ हैं। अच्छे अच्छे उस्ताद शायरों से भी चूक हो जाती है। ग़ज़ल सजगता के साथ नियमों का पालन करते हुये कहनी चाहिये।  


राम अवध विष्वकर्मा

ए-38 सूर्यनगर शब्द प्रताप आश्रम

ग्वालियर - 474012

शहर और जंगल - ज़रूरत

 ज़रूरत 


इस अँधेरे शहर में 

कोई भी नहीं जलाता 

अपना घर ,

तंग सीलन भरी 

बीमार गलियों की साँसें मजबूर हैं 

अपने ही क़दमों के नीचे 

दबी ज़मीन से बहुत दूर हैं 

इन अँधेरी गलियों में 

ज़रूरत , किसी  सूरज की नहीं है 

ज़रूरत सिर्फ 

मिटटी के एक दिए की है 

जो हमारे आस - पास ही 

यही कहीं है 

ज़रूरत है सिर्फ 

उस मासूम मुस्कान की 

जो अपने ही घर में 

आग लगाने से 

बेसाख़्ता  आ ही जाती है 

जो अपना सब कुछ लुटा कर भी 

किसी न किस के 

काम आ ही जाती है 

लेकिन 

इस अँधेरे शहर में 

कोई भी नहीं जलाता 

अपना घर। 


कवि - इन्दुकांत आंगिरस 

Saturday, June 7, 2025

Ghazal - RAV

 दोस्तो बहुत दिन बाद आपसे चर्चा हो रही है। एक तरही मिसरा दे रहा हूँ। यह मेरी ग़ज़ल का मिसरा है। इसे मतले में न लें। बीच में किसी भी शेर में ले सकते हैं लेकिन इस मिसरे को इनवर्टेड कॉमा में लिखना जरूरी होता है जिससे यह पता चलता है कि यह तरही मिसरा है और किसी के शेर का है। 

दूसरी बात किताब प्रकाशित होते समय इस शेर को हटाया जा सकता है लेकिन यह मिसरा अगर मतले में लिया गया तो मतला नहीं हटाया जा सकता है। इसलिए मतले में तरही मिसरा लेने की मनाही होती है।

मिसरा है

'लाल बत्ती काश लग जाये जो मेरी कार में'

बह्र है 

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन

2122   2122  2122   212

रदीफ़ है- में

क़ाफ़िया - कार, बेकार ,दीवार, मझधार, दस्तार, सरकार , मैयार , लाचार, किरदार, मयख़ार , ख़ार, हार, इतवार, प्यार आदि

Tuesday, June 3, 2025

आम की डाली - Mitra

 आम की डाली


बचपन का  एक क़िस्सा ज़ेहन  में आते ही हमेशा   हँसी  आ जाती है। हमारे गाँव में तीन आम के बग़ीचे थे। ये बग़ीचे किसी एक के न होकर पूरे गाँव  के लिए थे । इसलिए जब तूफ़ान  आता , आम के कैरियां गिरते तो हम बच्चे सब बटोरने चले जाते । जब आम पकते तो  बग़ीचे से छोटे - बड़े आम ,सिंदूरी, काली और जामुनी आम आते ,  हर एक पेड़ का   अलग नाम था । बुआ की लड़की और मेरी दीदी पेड़ पे  ऐसे चढ़ती कि बंदर को भी फेल कर दें। 

एक सहेली के खेत में एक आम का पेड़ था जो बहुत मीठा था। कच्ची केरी भी इतना मीठा होती  थी  कि सब की नज़र  उसी पेड़ पर रहती  थी  लेकिन किसी को तोड़ना मना था। उस घर के मालिक बड़े फूफा जी की  नज़र  उस पर जमी रहती थी कही  कोई बच्चे  आम  न चुरा ले ।

एक दिन दीदी और मेरी बुआ की लड़की को आम चुराने की सूझी   लंबी लकड़ी में हंसिया (दराती) बांधकर आम के तने से सटकर तोड़ने लगी ,अभी  तो दो तीन ही तोड़ पाए थे कि  बंधा हुआ रस्सी खुल गया तो हंसिया पेड़ के डाली पर ही अटका रह गया।   यह  वाक़्या   शाम के वक़्त  हुआ  था जिसके चलते  राज़ खुलने की संभावना अधिक थी।  इसी  डर से  दोनों रात भर सोई ही नहीं। बड़े फूफाजी  खूं ख़्वार  टाइप के थे। उनका सामना करने में  किसी की हिम्मत नहीं थी इसीलिए  दोनों  बहुत डरी हुई थी। मैं तो यह सोचकर ही भयभीत  थी कि अब इनका क्या होगा। सुबह दोनों उठकर फिर खेत में पहुँच   गई और उस हंसिया को पेड़ से नीचे गिराया।  तभी  फूफाजी के खाँसने की आवाज़  आई और वो लोग खेत के कोने से अपने आप को छुपाती हुई निकल गयीं । वो क़िस्सा  अभी तक भी भुलाया नहीं जाता और जब उसका ज़िक्र  होता है तो हँसी छूट जाती  है।