Sunday, May 15, 2022

हंगेरियन कविता - Mert Engem Szeretsz का हिन्दी अनुवाद





MERT ENGEM SZERETSZ


Áldott csodáknak

Tükre a szemed

Mert engem nézett .

Te vagy a bölcse,

Mesterasszonya

Az ölelésnek.

Áldott ezerszer

Az asszonyságod,

Mert engem nézett ,

Mert engem látott 

S mert nagyon szeretsz :

Nagyon szeretlek

S mert engem szeretsz :

Te vagy az Asszony 

Te vagy a legszebb .



  Mert Engem Szeretsz  

 क्योंकि तुम मुझसे प्रेम करती हो 



हैरान ,शुक्रगुज़ार  है  आईना 
तुम्हारी इन निगाहों का 
क्योंकि तुमने देखा था मुझे ।  
तुम हो सबसे ज़हीन 
बेगम गणिका *
आलिंगनों के लिए। 
हज़ार बार शुक्रिया 
तुम्हारे लावण्य का 
क्योंकि तुमने मुझे निहारा था 
क्योंकि तुमने मुझे देखा था। 
और क्योंकि तुम बहुत प्रेम करती हो :
मैं तुमसे  अथाह प्रेम करता हूँ 
और क्योंकि तुम मुझसे  प्रेम करती हो :
तुम हो एक गणिका 
तुम हो सुन्दरतम। 




  मूल कवि -  Endre Ady 
  जन्म -    22nd November ' 1877 , Romania 
  निधन -   27th January ' 1919 , Budapest , Hungary 

अनुवादक : इन्दुकांत आंगिरस 

NOTE :

गणिका का अर्थ हिन्दी में वैश्या हो सकता है लेकिन इस शब्द की मूल उत्पत्ति ग्रीक शब्द γυναίκα से है जिसका अर्थ औरत ही होता है और इस कविता में भी गणिका शब्द औरत ही है । बक़ौल  सआदत हसन मंटो   "हर औरत  वैश्या नहीं होती लेकिन हर वैश्या एक औरत  होती है।"   
 

Friday, May 6, 2022

पुस्तक परिचय - बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा







' बना रह ज़ख़्म तू  ताज़ा '  डॉ सुभाष वसिष्ठ की प्रथम प्रकाशित काव्यकृति है।  इस नवगीत संग्रह में  46 चयनित नवगीत शामिल हैं जिनका रचनाकाल   1970 से 1990 तक का है । इस संग्रह को डॉ सुभाष वसिष्ठ ने ' द्विवेदी युग के सिद्ध महाकवि पंडित नाथूराम  शर्मा ' शंकर ' , नवगीत के सूत्र पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी ' निराला ' और शुरुआती दमदार  नवगीतकार  वीरेंद्र मिश्र '' को समर्पित किया है। संग्रह में किसी की भूमिका नहीं है , सिवाय कवि के आत्मकथ्य ' इस संग्रह तक ' शीर्षक से प्रकाशित है जिसमे कवि ने नवगीत की सैद्धांतिक अथवा ऐतिहासिक विवेचना नहीं करी है अपितु अपने लेखन , नवगीत यात्रा एवं अपने साहित्यिक विकास का दिलचस्प वर्णन किया है।  इसमें कोई दो राय  नहीं कि रचनाओं के सूत्रों को बारीक़ी से समझने के लिए कवि का व्यक्तित्व एक हद तक सहयोगी सिद्ध होता है। 

यह मेरा सौभाग्य है कि बरसों पहले इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह में , मैंने शिरकत फ़रमाई थी।  उस कार्यक्रम में  डॉ  सुभाष वसिष्ठ के अनुज और मेरे साहित्यिक मित्र कीर्तिशेष सतीश सागर भी मौजूद थे। 

कुछ आत्मकथ्य इतने दिलचस्प होते हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ करना सहज नहीं होता। इस आत्मकथ्य में कवि ने अपनी साहित्यिक यात्रा के साथ साथ अपने बचपन की यादों को भी कलात्मक रूप से उकेरा है।  कवि सुभाष वसिष्ठ एक शुद्ध गीतकार हैं और गीत उनकी आत्मा में बसा है।इसीलिए उन्होंने अपने एक गीत में लिखा है -

" गीतमय  ज़िंदगी जुटाए मन , पर पीछे पड़े हैं निबंध "

 गीत के अलावा सुभाष वसिष्ठ एक प्रतिष्ठित रंगकर्मी भी है , 1980 में बदायूँ के शौक़िया कलाकारों की नाट्य  संस्था  ' रंगायन ' की स्थापना करी जिसके तहत लगभग दो दशकों तक नाटकों का मंचन किया। 

इसीलिए उनकी भाषा में अजीब -सा fusion  है , उनके आत्मकथ्य से उद्धृत चंद पंक्तियाँ  देखें -


' ऐसी ही एक ढलती  शाम को ....' पृष्ठ १०


' रौशनी की किरन पकड़ने और थामे रखने की ज़िद .....' पृष्ठ १२


' बहरहाल , उतरते 2012 में ' बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा ' आपके समक्ष ....' पृष्ठ १२


' बना रह ज़ख़्म तू ताज़ा ' इस संग्रह का अंतिम गीत है।  बानगी के तौर पर चंद गीतों की चंद पंक्तियाँ देखें -


शुरू हुई 

दिन की हलचल 

गए सभी 

लोहे में ढल। ( पृष्ठ १७ )


लाएँ क्या गीतों में ढूँढकर नया ?

ज़हरीला पूरा परिवेश हो गया  ! 

प्रतिभा के हक़ में क्या सिर्फ़ मर्सिया ? ( पृष्ठ १८)


चमकदार सब असूल स्याह हो गए

   रोटी   के   चक्कर में सूर्य खो गए

गीत ,लो , अगीत हुआ राग से सना 

झुका नहीं , टूट गया , जो रहा तना।  ( पृष्ठ -२३ )


 

सूर्य पश्चिम से उगे इस बार 

सही कोशिश की यही दरकार  ( पृष्ठ -५६ )



      पश्चिम से सूर्य उगाने वाले और रौशनी की किरन पकड़ सही की लड़ाई लड़ने वाले सुभाष वसिष्ठ एक ऐसे जीवट कवि है जो रात को दिन में बदलने की क़ुव्वत रखते हैं।पानी को पानी और रौशनी को रौशनी कहने की हिम्मत रखते हैं। अपने ज़ख़्म को सहलाते नहीं , उस पर मरहम भी नहीं लगाते बल्कि उसे हमेशा ताज़ा रखते हैं क्योंकि ये ज़ख़्म सिर्फ़ उनका नहीं अपितु उन सबका है जो व्यवस्था , हर्राफ़ों और समाज के ठेकेदारों द्वारा प्रताड़ित होते  रहें हैं। 

' बना रह ज़ख्म तू ताज़ा ' के गीत सुर , लय और ताल की डोर पकड़ अनंत आकाश में उड़ते हैं लेकिन ये सहज  गीत अक्सर पैदा करते हैं एक विशिष्ट अचरच। इसीलिए स्वाभाविक है इन गीतों को पढ़कर पाठक का अचकचा जाना। आप भी इन  अचरच भरे गीतों को लुत्फ़ उठायें ......




पुस्तक का नाम - बना रह ज़ख्म तू ताज़ा     ( नवगीत    संग्रह )


लेखक -  डॉ  सुभाष वसिष्ठ 


प्रकाशक - शब्दालोक , दिल्ली 


प्रकाशन वर्ष - प्रथम संस्करण , 2012


कॉपीराइट - डॉ  सुभाष वसिष्ठ 

 पृष्ठ - 64

मूल्य - ( 120/ INR  (एक सौ  बीस रुपए केवल )

Binding -  Hardbound 

Cover Design - मनीषी वसिष्ठ 

Size - डिमाई 4.8 " x 7.5 "

वितरक - हिंदी बुक सेंटर , नई दिल्ली 

ISBN - Not Mentioned


 


                                                                              प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 



Tuesday, May 3, 2022

लघुकथा - दिल्ली मेट्रो का सफ़र

दिल्ली मेट्रो का सफ़र



 दिल्ली मेट्रो का ऐसा ही एक प्रेम भरा सफ़र मेरे ज़ेहन में ताज़ा हो गया। आप भी लुत्फ़ उठायें इसका। 

मेरे क़रीब बैठी थी एक जवान माँ और उसकी गोद में उसका  शिशु। दोनों ही निढाल लग रहे थें। तभी अगले स्टेशन पर एक युवा प्रेमी युगल हमारी कोच में चढ़े और ठीक हमारे सामने ही खड़े हो कर बतियाने लगे। लड़की के चेहरे  पर मास्क था पर सुंदरता परदों से कब ढकी है ? आपसी गिले-शिकवे , रूठना - मनाना ,इंकार -इकरार ,तकरार - मनुहार ,रह रह कर एक दूसरे को बाँहों में भर लेना।  मैं अभी तक आँखे बंद करके ध्यान लगाने का हुनर  सीख नहीं  पाया था  । मेरे क़रीब बैठी निढाल औरत की आँखें भी चमक उठी थी और उसका चेहरा भी गुलाबी हो उठा था। अचानक उसने तोडा था मौन और पूछा था मुझसे -

- " आप कहाँ जायेंगे ? "

-  " श्याम पार्क  " - मेरा जवाब सपाट-सा था। 

-  "ओह , मैं आपसे पहले वाले स्टेशन पर ही उतर जाऊँगी , गर आँख लग जाए तो जगा दीजियेगा " मुस्कुराते हुए उसने अपनी पलकें मूँदी और कुछ मेरी ओर पसर गयी। 




लेखक - इन्दुकांत आंगिरस 


 


Sunday, May 1, 2022

लघुकथा - ठक..ठक..ठक ..

 

 ठक..ठक..ठक ..


रात देर तक कुछ काग़ज़ काले करके बमुश्किल चंद घंटे ही सो पाया था कि सिरहाने वाली दीवार पर ठक..ठक..ठक .. के प्रहार से आँख खुल गयी। सुबह के 9 बज रहे थे और साथ वाले मकान पर कार्यरत मज़दूरों ने अपना काम शुरू कर दिया था। नींद तो अब दुबारा आनी  मुश्किल ही थी सो बॉलकनी से अख़बार उठा पढ़ने लगा। 1 मई 2022 , यानी अंतर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस जो कुछ राष्ट्रों में Labor Day  अथवा May Day  के नाम से भी मनाया जाता है।  

ठक..ठक..ठक .. अरे आज तो मज़दूर दिवस है , फिर यहाँ मज़दूर काम कैसे कर रहे हैं।  मैं तिलमिला उठा और तत्काल पड़ोस वाले मकान पर जा पहुँचा। 5-6 मज़दूर अपने अपने काम में जुटे थे।  मैंने  ठेकेदार को तलब किया और उससे काम रुकवाने  के लिए कहा तो सभी मज़दूर अपना अपना काम छोड़कर हमारे  क़रीब आ गए। मैं ठेकेदार से ग़ुस्से में कह रहा था -

आज मज़दूर दिवस है तो ये मज़दूर काम कैसे कर रहे हैं यहाँ पर ?

ठेकेदार ने मेरे तेवर देखते हुए तत्काल अपने मालिक को फ़ोन लगाया और चंद मिनटों में ही काम रुकवा दिया। मज़दूरों को एक दिन की छुट्टी दे दी गई। 

 मैं अपनी सफलता पर मुस्कुरा उठा लेकिन ठेकेदार और उन मज़दूरों के इस वार्तालाप को अनसुना न कर सका। 


१ - का हुआ भैया , ठेकेदार ने काम रुकवा दिया और हमारी आज की छुट्टी भी कर दी ?

२ - अरे , सुनत नाही ,आज मज़दूर दिवस है , आज  का दिन मज़दूरों से काम कराना ग़ैर -क़ानूनी है। 

३ - ये मज़दूर दिवस का होत है भैया ?

ठेकेदार  - अरे मज़दूर दिवस नाही जानत , इका यूँ समझिये कि आज मज़दूरों का जन्मदिन है और जन्मदिन मनाने ख़ातिर मालिक ने आज तुम सब को  छुट्टी दे दी है   , जाओ मौज - मस्ती करों और कल सुबह ठीक 9 बजे फिर काम पे लग जाना । 

४ - मज़दूरों का भी जन्मदिन होत है ? हम तो इएह पहली बार सुनिबे। 

१ - मालिक आज की मज़ूरी तो मिलेगी ना ?

ठेकेदार - पगला गए हो , अरे काम नहीं तो मज़ूरी काहे की ? चला ,फूटो यहाँ से .....

सभी मज़दूरों की गर्दनें लटक गयीं और उनके बोझिल क़दम चाय की ढ़परी की ओर बढ़ गए ...

मैं असमंजस की स्थिति में था।   ठक..ठक..ठक .. की आवाज़ बंद  हो चुकी थी लेकिन मेरे दिमाग़ में अभी भी हथौड़े बज रहे थें  । 


लेखक - इन्दुकांत आंगिरस 


Saturday, April 30, 2022

कीर्तिशेष डॉ किशोर काबरा - तन के तट पर


                                                                   डॉ किशोर काबरा


                गुजरात के प्रख्यात कवि  कीर्तिशेष डॉ किशोर काबरा हिन्दी साहित्य की अनुपम निधि है। मैंने कई बरस पहले पहली बार उनका नाम अपने मित्र डॉ वेदप्रकाश के मुँह से सुना था।  उन्होंने उनका ज़िक्र करते हुए कहा  था - ' किशोर काबरा जी हिन्दी छंद शास्त्र के विद्वान है , अगर वो दिल्ली में रहे होते तो उनका नाम बहुत ऊपर पहुँच जाता '।  दिल्ली में न रहते हुए भी  कीर्तिशेष डॉ किशोर काबरा एक बड़े कवि एवं साहित्यकार के रूप में स्थापित हो चुके थे।  देश - विदेश में उनके अनेक शिष्य हैं जो उनके साहित्यिक सफ़र को आगे बढ़ाते रहेंगे। कुछ ऐसा संयोग हुआ कि बैंगलोर की एक संस्था ' श्री जय भारती हिन्दी विद्यालय ' ने 2017 में जैन समय , बैंगलोर के संयुक्त तत्त्वाधान में एक विशेष साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया जिसमे डॉ किशोर काबरा को  मुख्य अतिथि के रूप में बैंगलोर आमंत्रित किया गया।  उन दिनों डॉ किशोर काबरा ,अजमेर के एक आर्य समाज  मंदिर में रहते थे लेकिन क्योंकि आर्यसमाज कविता और कवियों का प्रशंसक नहीं , इसलिए डॉ किशोर काबरा का कवि मन वहाँ एक क़ैदी की तरह रहता था।  बाद में उनके कुछ शिष्यों ने उनके रहने की व्यवस्था अहमदाबाद में कर दी थी, जहाँ उन्होंने अपनी अंतिम साँसें ली। 

 बैंगलोर में आयोजित इस भव्य साहित्यिक कार्यक्रम के लिए उन्हें एक हफ़्ते तक  बैंगलोर में रहना पड़ा और यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे अपने बैंगलोर के निवास स्थान पर उनकी सेवा करने का अवसर मिला।  इस एक हफ़्ते के दौरान उनसे  साहित्यिक  बातचीत के अलावा अंतरंग बाते भी हुई।  उनका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों ही सभी को प्रभावित करते थे। अत्यंत सरल , सहज , मृदुभाषी ,अनुभव से परिपूर्ण , जीवन की रिक्तता का हँसते हुए गरल करना और कवि-सम्मेलनों   में डूब कर कविता पाठ करना , विशेषरूप से  गीत और ग़ज़ल। जिन्होंने उनका कविता पाठ सुना हैं वे वास्तव में  धन्य हैं। 

डॉ किशोर काबरा  ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाते थे और नियमित रूप से प्राणायाम करते थे। मेरे साथ ही नाश्ता और भोजन करते  और अपनी थाली में अन्न का एक कण भी नहीं छोड़ते  , उनका मानना था कि थाली में  जूठन छोड़ना अन्न का अपमान करना है।  मेरे बहुत मना करने पर भी  सदैव अपनी थाली ख़ुद धोते थे। मैं स्वयं को भाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे  एक हफ़्ते तक उनकी सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ और बहुत कुछ उनसे सीखने को भी मिला। 


6th Apr 2017 @ जिनेश्वर सभागार , बैंगलोर में एक भव्य कवि सम्मलेन का आयोजन हुआ। 

 प्रसिद्ध कवि डॉ किशोर काबरा की अध्यक्षता में संपन्न हुए इस कवि - सम्मेलन में  शहर के जाने माने कवि सर्वश्री तैयब अज़ीज़ी , गरिमा सक्सेना , टी. रवीन्द्रन , डॉ सुनील पंवार ,अरसल बनारसी , गुफ़रान अमजद , असजद बनारसी , इन्दुकांत आंगिरस ,सुनीता सैनी , विजेंदर सैनी , प्रेम तन्मय , शिप्रा चतुर्वेदी , सुधा दीक्षित , ज्ञानचंद मर्मज्ञ , उर्मिला, अशोक नागोरी , बसंत कुमार आदि ने कविता पाठ किया।

         तस्वीर में बाए से - डॉ टी रवीन्द्रन , इन्दुकांत आंगिरस , डॉ किशोर काबरा और अशोक नागोरी । 


उस दिन डॉ किशोर काबरा ने   चंद ग़ज़ल और गीत सुनाए जिनमे से एक गीत यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ -


तन के तट पर


तन के तट पर मिले हम कई बार, पर -

द्वार मन का अभी तक खुला ही नहीं।

डूबकर गल गए हैं हिमालय, मगर -

जल के सीने पे इक बुलबुला ही नहीं।



ज़िंदगी  की बिछी सर्प-सी धार पर

अश्रु के साथ ही क़हक़हे बह गए।

ओंठ ऐसे सिये शर्म की डोर से,

बोल दो थे, मगर अनकहे रह गए।

सैर करके चमन की मिला क्या हमें?

रंग कलियों का अब तक घुला ही नहीं।



चंदनी छन्द बो कर निरे काग़ज़ी 

किस को कविता की ख़ुश्बू मिली आज तक?

इस दुनिया की रंगीन गलियों तले

बेवफ़ाई की बदबू मिली आज तक।

लाख तारों के बदले भरी उम्र में

मेरा मन का महाजन तुला ही नहीं।



मर्मरी जिस्म को गर्म साँसें  मिली,

पर धड़कता हुआ दिल कहाँ  खो गया?

चाँद -सा चेहरा झिलमिलाया, मगर-

गाल का ख़ुशनुमा तिल कहाँ  खो गया?

आँख की राह सावन बहे उम्र भर,

दाग़  चुनरी का अब तक धुला ही नहीं।



इस कार्यक्रम के बाद डॉ किशोर काबरा वापिस अजमेर लौट गए थे। फ़ोन पर यदा - कदा उनसे कानाबाती  होती थी ,सदैव मुझे प्रोत्साहित करते रहते। कीर्तिशेष डॉ किशोर काबरा  का गोलोक गमन हो गया लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी हमारे बीच ज़िंदा हैं और उनकी यादें भी .. यह अफ़सोस की बात है कि उनकी मृत्यु का समाचार बहुत कम पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुआ और गूगल पर उनका विकी पेज भी नहीं , शायद हिन्दी के अधिकतर कवि - लेखकों को ऐसी ही गति प्राप्त होगी।  जिस देश में कवि और लेखकों का सम्मान नहीं वो देश कितना भी महान हो लेकिन आज भी भारतीय संस्कृति के सबसे नीचे वाले पायदान पर खड़ा है। 


डॉ किशोर काबरा का रचना संसार बहुत विशाल है। कविता , गीत , ग़ज़ल के अलावा अनेक खंड काव्यों की रचना। उनकी बहुत सी  रचनाएँ कई विद्यालयों एवं  विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में पढाई जाती रहीं हैं । भारतीय संस्कृति पर आधारित उनके तीन महाकाव्य - उत्तर रामायण , उत्तर महाभारत और उत्तर भागवत हिन्दी साहित्य की अनमोल धरोहर हैं लेकिन भारतीय संस्कृति के इस संवाहक को हम , हमारा समाज और हमारा देश अब तक क्या दे पाया हैं ?

कहाँ हैं भारतीय संस्कृति का  ढोल पीटने वाले .. कहाँ हैं ..कहाँ हैं  ..कहाँ हैं   ???



कीर्तिशेष डॉ किशोर काबरा

जन्म  - 26th  December  , 1934 , Mandos (M.P.)

निधन - 25th March  , 2022 , Ahemdabaad , Gujrat 


Thursday, March 10, 2022

कीर्तिशेष रोशनलाल गुप्ता ' भावुक ' और उनकी पहली किरण










कीर्तिशेष रोशनलाल गुप्ता ' भावुक ' से मेरी पहली मुलाक़ात बैंगलोर की प्रसिद्ध  कवि श्री ज्ञानचंद मर्मज्ञ की  साहित्यिक संस्था ' साहित्य साधक मंच ' में ही हुई थी।  रोशनलाल जी पेशे से व्यवसायी  थे लेकिन कविता प्रेमी थे और निरंतर काव्य सृजन में संलग्न थे। गोरा रंग , लगभग ५ फुट २ इंच का क़द , मृदु एवं अल्पभाषी , नज़र का चश्मा , पतलून - कमीज़ और हाथ में एक कॉपी ( नोटबुक ) रखते थे , कमीज़ की जेब में कोई भी मामूली क़लम।  काव्य गोष्ठियों में अक्सर बहुत छोटी कविताएँ सुनाते थे और जब दूसरे कवि अपनी रचनाएँ पढ़ते थे तो रोशनलाल जी बड़े मनोयोग से अपनी कॉपी में कुछ लिखते रहते थे।  कई बार मन हुआ कि उनसे पूछूँ कि आख़िर अपनी कॉपी में वो लिखते क्या हैं लेकिन कभी पूछ नहीं सका और यह बात एक रहस्य ही बनी रही।  कई बार तो कार्यक्रम उनकी रचनाओं से ही शुरू होता था।  कई बरस पहले उन्होंने अपने कोरमंगला , बैंगलोर के निवास पर एक निजी काव्यगोष्ठी का आयोजन किया था जिसमे मुझे शामिल होने का अवसर मिला था। 

कई वर्षों बाद लगभग तीन वर्ष पूर्व ( कोरोना से पूर्व ) एक साहित्यिक कार्यक्रम में उनसे मुलाक़ात हुई थी और उस दिन उन्होंने मुझे अपनी कार में बिठाकर ' Dairy Circle ' पर ड्राप किया था , बस यही थी उनसे आख़िरी मुलाक़ात। हाल ही में मित्रों से मालूम  हुआ कि आदरणीय रोशनलाल गुप्ता जी का पिछले दिनों बैंगलोर में ही निधन हो गया।  उनकी पहली काव्य पुस्तक ' पहली किरण ' मेरे पास है जिसका परिचय में आप सभी को देने जा रहा हूँ। इस पुस्तक को उन्होंने अपने माता -पिता को समर्पित किया है। डॉ पुण्यमचंद मानव और श्रीदेवी त्रिपाठी ने भूमिकाएँ लिखी हैं। आत्मकथ्य में कवि ने इस बात को स्वीकारा है कि मनोविज्ञान उनका प्रिय विषय रहा जिसके चलते उन्होंने मानव स्वभाव का शोधात्मक अध्ययन किया जिसका प्रभाव उनकी कविताओं में भी देखा  जा सकता है। सरस्वती वंदना के अलावा पुस्तक में छंदबद्ध 72 कविताएँ हैं जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को उजागर करती हैं। बानगी के तौर पर इसी पुस्तक से चंद उद्धरण प्रस्तुत हैं -


कष्टों की रही , लम्बी कतार 

दुखों का रहा , घना अम्बार।  

विरोधों से  जूझता  ही  रहा

नदारद रहा ,अपनों का प्यार।। 

 



अंग - प्रत्यंग के गुण गाए

उपमा विशेषणों से जोड़े। 

किर्या क्रम  में जुट  जाए

शरीर जब प्राणों को छोड़े।। 


उषा  की   पहली   किरण 

अँधेरे के सीने को चीर कर  

जग   में   उजाला     भरें 

स्फूर्ति   को   लगा दे पर 


बुढ़ापा   खोजे   एक सहारा 

अपनापन भी हो जाए खारा

जिनके लिए सब कुछ त्यागा 

वो ही , करने लगे  किनारा  



     साहित्य का एक तारा बुझ गया और पहली किरण भी छुप गयी लेकिन उनका साहित्य सदा हमारे साथ रहेगा। कवि / लेखक हमसे बिछड़ जाते  हैं लेकिन अपनी रचनाओं में रहते हैं ज़िंदा। मीर तक़ी मीर का शे'र ज़ेहन में आ रहा है-


मर्ग इक मांदगी  का वक़्फ़ा है 

यानी आगे   चलेंगें दम लेकर



 पुस्तक का नाम -  पहली किरण    ( काव्य    संग्रह )

लेखक -  रोशनलाल गुप्ता ' भावुक ' 

प्रकाशक - शब्दायन , बैंगलोर 

प्रकाशन वर्ष -



प्रथम संस्करण , 2011

कॉपीराइट - आशा गुप्ता / विवेक गुप्ता 

पृष्ठ - 118

मूल्य - ( 150/ INR  (एक सौ  पचास  रुपए केवल )

Binding -  Paperback 

Size - डिमाई 4.8 " x 7.5 "

ISBN - Not Mentioned


कीर्तिशेष रोशनलाल गुप्ता ' भावुक ' 

जन्म  -  26th December .1950 - बख्तावरपुर , दिल्ली  

निधन -  बैंगलोर , 2022



 प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस 





Saturday, March 5, 2022

पुस्तक परिचय - युद्ध के स्वर प्रेम की लय





 



                                अनादि काल से इस धरती पर युद्ध होते आये हैं , धरती पर है नहीं अपितु इस ब्रह्माण्ड में। असुरों और देवताओं का युद्ध , महाभारत का युद्ध , राम और रावण का युद्ध , प्रथम विश्व युद्ध , द्वितीय विश्व युद्ध  आदि। वैसे तो कसी भी युद्ध के मूल तीन ही कारण होते हैं , ज़र , जोरू और ज़मीन लेकिन धर्म की रक्षा के लिए भी युद्ध हुए हैं।  यह तो सर्वविदित है कि युद्ध विनाश करता है और मनुष्य की प्रगति को पीछे धकेल देता है लेकिन फिर भी युद्ध होते आये हैं और भविष्य में भी होते रहेंगे।  आजकल रूस और उक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है। 

  युद्ध का कारण कुछ भी हो , युद्ध कही भी हो , माल -असबाब के अलावा सबसे अधिक नुकसान इंसानों का होता हैं - निर्दोष जनता मारी जाती है और लाखों सैनिक शहीद हो जाते हैं। अक्सर युद्ध से पूर्व ऐसे नारे या कविताएँ सैनिकों को सुनाई जाती हैं जिनसे उनका आत्मबल बढ़ता है और वे अपनी जान की परवाह किये बिना युद्ध के मैदान में कूद पड़ते हैं। युद्ध और कविता का मेल सदा से रहा है , वीर रस  की कविताएँ सुनने वालों के मन में देश प्रेम की भावना को जाग्रत कर देती है। अनेक बार देखने में आया है कि बहुत से सैनिक भी कविताएँ लिखते हैं। 

रामप्रसाद बिस्मिल की ये पंक्तियाँ आज भी सुनने वालो का ख़ून  गरम कर देती हैं -

सर फ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है 

देखना है ज़ोर कितना  बाजु-ए-क़ातिल में हैं  


डॉ श्यामसिंह  शशि द्वारा सम्पादित पुस्तक  '  युद्ध के स्वर प्रेम की लय '  एक ऐसी ही दुर्लभ पुस्तक है जिसमे 38 भारतीय सैनिको ( थल सेना , वायु सेना , नौसेना ) द्वारा रची गयी युद्ध सम्बंधित कविताएँ शामिल हैं , साथ ही सम्पादक की भी चंद युद्ध  सम्बंधित कविताएँ   हैं। इन कविताओं में से अधिकांश कविताएँ ' सैनिक समाचार '    पत्रिका ( तत्कालीन  सम्पादक - डॉ श्यामसिंह  शशि ) में पूर्व प्रकाशित हो चुकी हैं। यह पुस्तक " साहित्य जगत के अमर पुत्र ' भूतपूर्व सैनिक ' स्वर्गीय रामानंद दोषी की स्मृति में ' प्रकाशित हुई है। बानगी के रूप में पुस्तक से कुछ उद्धरण प्रस्तुत हैं - 


अगन अंगार से खेलो 

अगम अंधियार से खेलो 

तुम्हे कुछ कर दिखाना है , जलन से ज्वार से खेलो 

समय के सारथी हो तुम 

अभय के सारथी हो तुम 

विजय के सारथी हो तुम ! 


( पृष्ठ # 12 ,कविता ' उठो तलवार से खेलो ' से , कवि - रामानंद दोषी )


साँस अंतिम कह रही आगे बढ़ो तुम 

लाश पर मेरी न क्षण भर भी ठहरना 

टूटती आवाज़ में फिर कह रहा  हूँ 

साथियों , अपने वतन से प्यार करना 

काश मेरी माँ यहाँ ये देख पाती 

घाव मैंने पीठ में खाया नहीं है। 


( पृष्ठ -20 ,कविता - 'वतन से प्यार'  से  ,  कवि केदारनाथ शर्मा शास्त्री - नायब सूबेदार )


सीमा पर धधक रही ज्वाला झर झर झरते हैं अंगार 

ओ प्रिय ऐसे में कैसे , मैं  डालूँ    गलबहियों का हार 


( पृष्ठ - 40 ,कविता ' प्रिय तब ही करना श्रृंगार ' से , कवि  - प्रकाश - भूतपूर्व सैनिक )




पुस्तक का नाम - युद्ध के स्वर प्रेम की लय  ( काव्य  संग्रह ) 

लेखक -  विभिन्न भारतीय सैनिक 

सम्पादक - डॉ श्यामसिंह  शशि

Copyright -   डॉ श्यामसिंह  शशि

Language - Hindi 

प्रकाशक - राजकमल प्रकाशन   , देहली 

प्रकाशन वर्ष -  प्रथम   संस्करण , 1974

पृष्ठ - 84

मूल्य - INR 7/  ( सात  रुपया केवल )

Binding -  Hardbound

Size - 4.5" x 7 "

ISBN - Not Mentioned



प्रस्तुति - इन्दुकांत आंगिरस