Monday, June 30, 2025

शहर और जंगल - जुआ

जुआ 


हमने पहले भी 

बग़िया में उगाये थे गुलाब 

पर कोई न रोक सका 

अपनी उँगलियाँ  

सभी ने तोड़ - तोड़ कर 

सजा लिए 

ख़ूबसूरत गुंचे 

गुलाब पर आने से पहले शबाब 

यक़ीन मानो  

मेरी ज़िंदगी तो 

बस एक जुआ बन कर रह गयी है 

जिसका हर दाँव 

तुमने ही जीता है 

मेरा अंदर - बाहर 

सब रीता है 

ऐ मेरे नाख़ुदा 

तुम मुझे 

लगाओ , न लगाओ उस पार 

तुमसे मैं अक्सर हारा हूँ 

आज फिर जाता हूँ हार। 

Saturday, June 28, 2025

UMRAN Board

 


Rudra Pratap  - rpsk99111@gmail.com


Tushar Kaushik  - harshkaushik74680@gmail.com


Afsana  -  afs28225@gmail.com


Mohammad Kamil  -  razakamil78@gmail.com


Indu Kant Angiras -  angirasik@gmail.com


Zarif Razeen --  razeenzarif22@gmail.com


mahreen --  mahipathan300@gmail.com


Mahak jadaun  -  mahakjadaun002@gmail.com


Rumi perween  -  rumiperweenjnv@gmail.com





शहर और जंगल - अपरिचित

 अपरिचित 


ओ  अपरिचित !

तुमसे परिचय न बढ़ाने का कारण 

सिर्फ़ इतना था कि

मेरा नंगा  स्वार्थ 

कल किसी चौराहे पर 

तुम्हें नंगा  करता 

तुम अपने तन को ढाँपती

कमजोर हाथों से मारती 

मैं फिर भी नहीं मरता 

इन मुक़फ़्फ़ल किवाड़ों को 

तुम कब तक खटखटाओगी  ?

इनकी हक़ीक़त भी इक दिन 

तुम जान जाओगी 

मेरा पाप फिर भी 

तुम्हारी मुट्ठी में बंद नहीं हो पाएगा 

और मैं जानता  हूँ 

तुम्हारी बंद मुट्ठी का गुलाब भी 

कभी पत्थर नहीं हो पाएगा। 

JOBS

 Changel.T


Senior Staffing Specialist


M : 9778705958


E : changelT@affluentgs.com


W : www.affluentgs.com

Sanskrit Lessons

 क्त एवं क्तवतु

ये दो प्रत्यय भूतकाल में प्रयुक्त होते हैं। क्त का त तथा क्तवतु का तवत्  शेष रहता है।

जाना, चलना अर्थ की और अकर्मक  धातुओं से क्त प्रत्यय होने पर कर्ता में प्रथमा व कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है।

उदाहरणार्थ- सः गृहं गतः। सः आगतः। सः सुप्तः। सः मृतः।


सकर्मक धातुओं में क्त प्रत्यय होने पर कर्ता में तृतीया व कर्म में प्रथमा विभक्ति होती है। क्रिया का लिंग, वचन, विभक्ति कर्म के अनुसार होगी न कि कर्ता के अनुसार। 

अकर्मक धातुओं से क्त प्रत्यय होने पर कर्ता में तृतीया व क्रिया में नपुंसक लिंग एकवचन होता है।

क्त प्रत्ययांत शब्द, कर्म के अनुसार पुलिंग हो तो राम के समान, स्त्रीलिंग हो तो रमा के समान और नपुंसक लिंग हो तो धन जैसे रूप चलेंगे।

उदाहरणार्थ- उसने काम किया। 

                  तेन कार्यं कृतम्।

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क्त प्रत्ययान्त शब्द 

   धातु           शब्द    अर्थ

    अद्      ‌जग्ध:     खाया 

   अधि + इ   अधीत:  पढ़ा 

अर्च्    अर्चित:  पूजा किया

आप्     आप्त:    पाया 

  आ+ रभ्   आरब्ध: आरम्भ किया 

आ + ह्वे   आहूत:  पुकारा 

इष्   इष्ट:  चाहा 

ईक्ष्   ईक्षित: देखा हुआ 

कथ्  कथित:  कहा 

कुप्   कुपित:    क्रुद्ध हुआ 

कृ     कृत:     किया 

क्री  क्रीत:    खरीदा 

क्रीड्   क्रीडित:   खेला 

क्रुध्    क्रुद्ध:  क्रुद्ध हुआ 

क्षिप्     क्षिप्त:   फेंका 

खाद्    खादित: खाया 

गण्    गणित:  गिना 

गम्   गत:    गया 

गै     गीत:    गाया 

ग्रह्   गृहीत: ग्रहण किया 

चल्     चलित: चला

चिन्त्  चिन्तित:    सोचा 

चुर्    चोरित: चुराया

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उकारान्त नपुंसकलिंग "मधु" शब्द 

 मधु मधुनी मधूनि

मधु मधुनी मधुनि 

मधुना मधुभ्याम् मधुभि: मधुने मधुभ्याम् मधुभ्य:

मधुन: मधुभ्यम् मधुभ्य:

मधुन: मधुनो: मधूनाम् 

मधुनि मधुनो: मधुषु

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तकारान्त नपुंसकलिंग जगत् शब्द के रूप 

 

  जगत् जगती जगन्ति 

   जगत् जगती जगन्ति 

जगता जगद्भ्याम् जगद्भि: 

जगते जगद्भ्याम् जगद्भ्य:

जगत: जगद्भ्याम् जगद्भ्य:

जगत: जगतो: जगताम् 

जगति जगतो: जगत्सु 

हे जगत् ! हे जगती ! हे जगन्ति

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ईकारान्त स्त्रीलिंग नदी शब्द के रूप 

   नदी नद्यौ नद्य: 

नदीम् नद्यौ नदी:

नद्या नदीभ्याम् नदीभि:

नद्यै नदीभ्याम् नदीभ्य: 

नद्या: नदीभ्याम् नदीभ्य:

नद्या: नद्यो: नदीनाम् 

नद्याम् नद्यो: नदीषु 

 हे नदि ! हे नद्यौ ! हे नद्य:

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लट्

शिक्षते शिक्षेते शिक्षन्ते

शिक्षसे शिक्षेथे शिक्षध्वे

शिक्षे शिक्षावहे शिक्षामहे 

         लोट्

शिक्षताम् शिक्षेताम् शिक्षन्ताम् 

शिक्षस्व शिक्षेथाम् शिक्षध्वम् 

शिक्षै शिक्षावहै शिक्षामहै 

       लङ्

अशिक्षत अशिक्षेताम् अशिक्षन्त 

अशिक्षथा: अशिक्षेथाम् अशिक्षध्वम् 

अशिक्षे अशिक्षावहि अशिक्षामहि 

       विधिलिङ्

 शिक्षेत शिक्षेयाताम् शिक्षेरन् 

शिक्षेथा: शिक्षेयाथाम् शिक्षेध्वम् 

शिक्षेय शिक्षेवहि शिक्षेमहि 

       लृट् 

शिक्षिष्यते शिक्षिष्येते शिक्षिष्यन्ते 

शिक्षिष्यसे शिक्षिष्येथे शिक्षिष्यध्वे 

शिक्षिष्ये शिक्षिष्यावहे शिक्षिष्यामहे

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रेफान्त पुलिंग द्वार् शब्द के रूप 

   द्वा:   द्वारौ  द्वार:

  द्वारम्  द्वारौ द्वार: 

 द्वारा द्वार्भ्याम् द्वार्भि:

 द्वारे द्वार्भ्याम् द्वार्भ्य:

द्वा‌र: द्वार्भ्याम् द्वार्भ्य:

 द्वार: द्वारो: द्वाराम् 

 द्वारि द्वारो: द्वार्षु

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शतृ प्रत्ययान्त पुलिंग पठत् शब्द 

  पठन् पठन्तौ पठन्त:

पठन्तम् पठन्तौ पठत: 

पठता पठद्भ्याम् पठद्भि: 

  पठते पठद्भ्याम् पठद्भ्य:

पठत: पठद्भ्याम् पठद्भ्य:

पठत: पठतो: पठताम् 

पठति पठतो: पठत्सु 

हे पठन्! हे पठन्तौ ! हे पठन्त: 

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[21:49, 24/07/2025] Shrutikirti Acharya: मृङ् प्राणत्यागे  लट् 

   म्रियते म्रियेते म्रियन्ते 

म्रियसे म्रियेथे म्रियध्वे 

म्रिये म्रियावहे म्रियामहे


       लोट् 

म्रियताम् म्रियेताम् म्रियन्ताम्

म्रियस्व म्रियेथाम् म्रियध्वम् 

म्रियै म्रियावहै म्रियामहै 


          लङ् 

अम्रियत अम्रियेताम् अम्रियन्त 

अम्रियथा: अम्रियेथाम् अम्रियध्वम् 

अम्रिये अम्रियावहि अम्रियामहि 


       विधिलिङ्

 म्रियेत म्रियेयाताम् म्रियेरन् 

म्रियेथा : म्रियेयाथाम् म्रियेध्वम् 

म्रियेय म्रियेवहि म्रयेमहि 


           लृट् 

मरिष्यति मरिष्यत: मरिष्यन्ति 

मरिष्यसि मरिष्यथ: मरिष्यथ 

मरिष्यामि मरिष्याव: मरिष्याम:

[22:00, 24/07/2025] Shrutikirti Acharya: छिदिर् द्वैधीकरणे -   लट् 

   ‌ ‌छिनत्ति छिन्त: छिन्दन्ति 

  छिनत्सि छिन्थ: छिन्थ 

छिनद्मि छिन्द्व:  छिन्द्म: 


      लोट् 

छिनत्तु छिन्ताम् छिन्दन्तु 

छिन्धि छिन्तम् छिन्त 

छिनदानि छिनदाव छिनदाम 


          लङ् 

अच्छिनत् अच्छिन्ताम् अच्छिन्दन् 

अच्छिन: अच्छिन्तम् अच्छिन्त 

अच्छिनदम् अच्छिनद्व अच्छिनद्म 

         विधिलिङ् 

छिन्द्यात् छिन्द्याताम् छिन्द्यु: 

छिन्द्या: छिन्द्यातम् छिन्द्यात 

छिन्द्याम्  छिन्द्याव छिन्द्याम 

      लृट् 

 छेत्स्यति छेत्स्यत: छेत्स्यन्ति 

छेत्स्यसि छेत्स्यथ: छेत्स्यथ 

छेत्स्यामि छेत्स्याव: छेत्स्याम:


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Friday, June 27, 2025

शहर और जंगल - अनकहे शब्द

 अनकहे शब्द 


कुछ अनकहे शब्द 

जब बन जाते हैं महाकाव्य 

तब क्या अर्थ रह जाता है 

उन अंतहीन शब्दों का 

जिनका अर्थ तलाशने में 

कई बार 

टूटता , बिखरता है आदमी 

सहता है सब कुछ 

और 

कह नहीं पाता  कुछ भी 

ठीक उस नदी की मानिंद 

जो उम्र के हर मौसम में 

अपना रास्ता 

स्वयं तय करती है 

और अनजानी 

मंज़िलों की  तलाश में 

भटकती रहती है 

सदियों तक 

ठीक अनकहे शब्दों की तरह। 

Thursday, June 26, 2025

शहर और जंगल - गुलाब

 गुलाब 


भला लगता है  मुझे 

अपने आँगन का यह गुलाब 

एक सम्बन्ध जुड़ा है मेरा 

इस गुलाब से ,

पर जाने क्यूँ

इसकी डाली में 

सिर्फ़ बबूल उगते हैं , 

तुम्हीं कहो ! 

तुम्हीं ने बोया था यह गुलाब 

सिर्फ़ एक फूल 

पर उगते रहे बबूल ,

अब न जाने कब तक 

सहलाती रहेंगी 

मेरी उँगलियाँ 

इस बंजर गुलाब को। 

Wednesday, June 25, 2025

शहर और जंगल - अजन्मा

 अजन्मा 


वह जन्म लेने से पहले ही मर गया 

आँख का आँसू

पलक तक आते आते ठहर गया 

सहज हो  सकता है 

खिली हुई धूप में गुलाब - सा महकना

पर मेरे दोस्त !

कितनी वज़नी होती है 

एक गुलाब की मृत देह 

किसी सीने पे ठहरे हुए पहाड़ से पूछो 

मन मन भारी क़दमों से पूछो 

पूछो उस गीली मिटटी से 

जिस पर पैरों के नन्हें नन्हें निशान 

बनने से पहले ही मिट गए 

पूछो उस बदक़िस्मत बाप के 

अरमानों से 

जो वक़्त से पहले ही लुट गए 

पूछो उन फैली हुई बाँहों से 

जिनमें सिमटने को रह गया 

सिर्फ़ धुआँ , सिर्फ़ काला धुआँ

इस दुनिया के जंगल में 

जाने किस हैवान को देख कर 

वह डर गया 

वह जन्म लेने से पहले ही मर गया 

वह अकेला नहीं 

मेरे देश में सैकड़ों बच्चें 

जन्म लेने से पहले ही मरते हैं 

मालूम  नहीं किस हैवान से डरते हैं ?  

 

Tuesday, June 24, 2025

Rangeen Shairi _ 1

 हँसी है दिल-लगी है क़हक़हे हैं

तुम्हारी अंजुमन का पूछना क्या

इक मिरा सर कि क़दम-बोसी की हसरत इस को
इक तिरी ज़ुल्फ़ कि क़दमों से लगी रहती है


- मुबारक अज़ीमाबादी

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कल वस्ल में भी नींद न आई तमाम शब
एक एक बात पर थी लड़ाई तमाम शब

ख़्वाब में बोसा लिया था रात ब-लब-ए-नाज़की
सुब्ह दम देखा तो उस के होंठ पे बुतख़ाला था

- ममनून निज़ामुद्दीन

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Monday, June 23, 2025

शहर और जंगल - गंध अपनी अपनी

 गंध अपनी अपनी 


हम समझदार हैं

इसीलिए आप मूर्ख हैं 

हमारे बोये फूलों को 

कैक्टस कहते हैं आप 

इनकी ख़ुश्बू से तो 

बड़े बड़े कलेक्टर  गश खा गए 

कहाँ रहते हैं जनाब ?


आपके फूल भी कोई फूल हैं !

न रंग , न सुगंध 

इनकी बू  नथनों तक  जाकर लौट आती है

अपनी व्यथा आप सुनाती है

खिल खिल कर आपके फूल 

मंदिर की देहरी पर मुरझाते रहें 

या किसी की क़ब्र पर आँसू  भाते रहें 


हमारे फूलों को देखिए 

न किसी के आने में 

न किसी के जाने में 

हमारे फूल हर हाल में मुस्कुराते हैं

यूँ ही नहीं हम नेताओं को 

माला इनकी  पहनाते हैं 


यक़ीन मानिए 

हमारे फूल आत्मा तक उतर जाते हैं 

यह और बात है कि

वहाँ भी कैक्टस बो आते हैं। 

Images

 Image by Christian Holm from Pixabay

Sunday, June 22, 2025

Persian

 शुनीदम् आशिक़ाँ रा मी नवाज़ी 

मगर मन ज़ाँ मयाँ बेरूनम् ऐ दोस्त!

~निज़ामी गंजवी (मृत्यु : 1209 ई॰)

Saturday, June 21, 2025

शहर और जंगल - लिखना

 लिखना 


हम क्या जानें 

अनपढ़ , गँवार

राजनीति , समिति 

संसद , राजपथ 

मंत्री , प्रधानमंत्री 

होगी , जिसकी होगी सरकार 

हम को दो रोटी की दरकार 


कौन सुनेगा हमारी आपबीती 

आप या आपकी राजनीति ?

ज़ात हमारी मज़दूरी है 

रोना अपनी मजबूरी है 

दो जून की रोटी गर मिल जाए  

फूल इस बग़िया  के फिर खिल जाएँ 

श्रम ही अपनी पूजा है 

बाक़ी सब बेकार ,

अख़बार 

हम पढ़ नहीं सकते 

स्वप्न हम गढ़ नहीं सकते 

भैया , तुम कवि हो।,

तुम लिखना 

लिखना , हम ग़रीब भी हैं 

ग़रीबी की रेखा में भी हैं 

रहने को अपने पास कोई घर नहीं है

फिर भी हम यारों ! बेघर नहीं हैं 


फुटपॉथ ही अपना बसेरा  है 

दूर बहुत हमसे सवेरा है 


लिखना 

हमारा पेट , पेट नहीं कुआँ  है 

जिसको जितना भरते हैं 

उतना ख़ाली होता है 


लिखना 

मरता है कोई , तो मरे 

भूल से भी कोई 

इस कुएँ  को न भरे 

बन के बम 

न कहीं  कोई फट जाए 

किसी रेल के नीचे 

न कोई कट  जाए 


लिखना 

किसी के बम बनकर 

फटने से पहले लिखना 

किसी के रेल से 

कटने से पहले लिखना। 


Friday, June 20, 2025

Urdu Words

 نقصان

خامُشی
جَہان
اِلْزام
قافلا
نَسِیب
ثَمَر


اُمِّید
طَبِیعَت
آواز
آرْزُو
روزگار
کَشْتی
مُسافِر
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شَوق
فِطْرَت
تَہْذِیب
بَرکَت
دَغا
چَراغ
رَوشْنی

Image by Dirk from Pixabay

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Russian Key Board

й ц у к е н г ш щ з х ъ

ф ы в а п р о л д ж э

я ч с м и т ь б ю .


Image by Burzoom from Pixabay

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сaps

Й Ц У К Е Н Г Ш Щ З Х Ъ

Ф Ы В А П Р О Л Д Ж Э

Я Ч С М И Т Ь Б Ю . 

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Спасиба 

Mera Fasaana

 शायद अप्रैल का महीना था।  हवा में वसंत की ख़ुश्बू  अभी तैर रही थी। रात के सन्नाटे में सिर्फ पेड़ो के हिलने की आवाज़ मेरे कानों से गुज़र रही थी।  मैं अस्पताल के बिस्तर पर लेटा हुआ था। पलकें नींद से भारी  थी लेकिन मैं सो नहीं पा रहा था। अस्पताल का पहला दिन आज भी ज़ेहन में ताज़ा है।  मुझे सुबह के वक़्त OPD में दिखाया गया था। सरकारी विशेषज्ञ ने मुझे इस अस्पताल के लिए रेफेर कर दिया था। एक लम्बे गलियारे में , मैं इक स्ट्रेचर पर लेटा हुआ था।  एक बुजुर्ग डॉक्टर मेरी जाँच कर रहा था।  उसका जाँच करने का तरीका काफी अजीबो ग़रीब था।  वह अपनी एक हाथ की उँगलियाँ मेरी पसलियों पर रखता और दूसरे हाथ की ऊँगली से उन उँगलियों पर चोट करता। लगभग ५ मिनट तक ममेरा मुआयना करने के बाद वो डॉक्टर और उसका असिस्टेंट मेरी मेडिकल फाइल पर कुछ लिख कर चला गया।  गलियारे में धूप ढलने लगी थी और लगभग ४ बजे के करीब मुझे एक सेपरेट कमरे में बीएड पर लिटा दिया गया। उस कमरे में सिर्फ एक पलंग था। गलियारे की तरफ खुलती खिड़की और दरवाज़ा। कमरे का दूसरा दरवाज़ा पिछवाड़े की ओर खुलता था जहाँ टॉयलेट था। टॉयलेट यूरोपियन था और यूरोपियन टॉयलेट का इस्तेमाल मेरे लिए नया था। लेकिन अगली सुबह जब मैं शौच गया तो मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई बल्कि सब कुछ बहुत अच्छा लगा।  टॉयलेट के बाद खाली ज़मीन थी जहाँ खर पतवार ऊगा हुआ था जिसमें मुझे कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। हक़ीक़त में मुझे कई महीनों से खांसी हो रही थी और खांसी के लिए मैं सरकारी डिस्पेंसरी मैं डॉक्टर को दिखाया था।  मुझे याद है कि सरकारी डिस्पेंसरियों मैं अक्सर महिला डॉक्टर ही होती थी।  मेरी खांसी कि तकलीफ सुन कर मुझे कुछ गोलियां और खांसी का सिरप दे दिया जाता था।  डिस्पेंसरी के दवाखाने से डॉक्टर का परचा दिखा कर दवाई मिलती थी।  खांसी का सिरप अक्सर बड़ी बोतल मैं रख जाता था और मरीज़ को अपना सिरप लेने के लिए अपनी बोतल घर से ले जानी पड़ती थी। जो लोग घर से बोतल ले जान भूल जाते थे   उनके लिए ये मुश्किल पल  होता कि वापिस घर जा कर बोतल लाये इसीलिए डिस्पेंसरी के गेट के बाहर ही १-२ रूपये कि बोतल खरीद ला जाती।  हिन्दोस्तान मैं लोग खाली बोतलों , डिब्बों और बोरियों से भी पैसा कमाने का हुनर जानते है। मेरे एक दोस्त ने इस हुनर के बारे में मुझे बताया था  किस तरह उनके पिता चीनी  बोरी खरीदते थे और खरीद के भाव ही चीनी लोगो को बेच दी जाती थी यानी बिना किसी नफे के , लेकिन वो खाली बोरी की क़ीमत २ / होती थी।  

Thursday, June 19, 2025

प्रेम आँसू - Szerelmi könnyek

 

प्रेम आँसू

मेरी आँख में  ठहरा 

यह प्रेम आँसू

इस धरती के 

महासागर से भी गहरा हैं 

क्यों कि 

इसमें समाहित हैं 

हमारे अनंत प्रेम का 

अंतहीन सागर  


Szerelmi könnyek


Szemem szerelmi könnye

 mélyebb, mint egy óceán,

Mert

benne van

 örök szerelmünk 

örök tengere .

Business Loan

 Business Loan of 5 K - Start Date - 14-02-2025


 Business Loan of 5 K - Start Date - 19-06-2025

Wednesday, June 18, 2025

Delta Lingua

Presented by I K Angiras : 

शहर और जंगल - मेरे मरने के बाद भी

 मेरे मरने के बाद भी 


मेरे मरने के बाद भी  न कुछ बदलेगा 

फूल तब भी खिलेंगे 

जुलूस तब भी निकलेंगे 

जश्न , हंगामे 

यूँ ही रहेंगे महकाते 

काली स्याह अँधेरी रातें 

सूरज जैसा भी होगा , उगेगा 

चाँद बदरिया की धज पर ही रुकेगा 

बर्फ़  यूँ ही रहेगी पिघलती पहाड़ों से 

ये और बात है 

कुछ नदियाँ फिर भी बहेंगी सूखी 


मेरे मरने के बाद भी  न कुछ बदलेगा 

फिर क्या अर्थ है मेरे मरने का 

क्यों मैं घोंपता हूँ 

अपनी ही आँखों में सलाखें ?

क्यों मैं काटता हूँ 

अपनी मज़बूत टाँगें ?

शायद , हाँ शायद 

किसी बंजर आँख में इक गुलाब खिल जाए

उधड़ा हुआ गिरेबाँ किसी का सिल जाए 

हाँ , शायद इसीलिए 

अर्पित करता हूँ अपने प्राण 

पर आज तक समझ नहीं पाया 

क्या नाम है इस लालसा का ?

कैसे , कहाँ से आती है मन में ऐसी कामना ?

शायद इसीलिए आज तक मर नहीं पाया 

जो भी हो इस कामना का कारण 

जब भी हो मेरी मृत्यु 

लेकिन हे ईश्वर !

मेरी मृत्यु से पहले मुझे न मारना।  

AI _ PRIYA

 1. Sweeping and Mopping the House


Description: A young woman who is maid is  dressed in simple  salwar kameez. The top is a light pink with intricate golden embroidery, paired with matching loose-fitting pants. She is holding a broom in one hand and has a mop in the other. Her hair is tied back in a neat bun, and she has a cheerful expression on her face. The background shows a clean, bright living room with sunlight streaming in through the windows.

2. Babysitting

Description: A beautiful  young maid woman in simple cotton   saree with delicate patterns. The saree is draped elegantly, and she wears a simple yet pretty blouse. She is sitting on the floor and 2 year old  baby is  playing with colorful toys. The baby is laughing, and the  woman has a warm smile, displaying a nurturing vibe. The setting is a living room of a flat showing window and from window another apartment building can be seen at distant . Room is well lit and neat and clean having sofa table and painting on wall and a fan . 
3. Cooking Food

Description: The beautiful young middle aged woman  is shown in a stylish, modern salwar kameez, featuring a bright blue top with intricate mirror work and white pants. She is an experienced cook standing in a kitchen, stirring a pot on the stove. Her hair is knoted tightly and she is wearing a thin , disposable polythene  hair cover , and she is wearing an apron over her outfit. The kitchen is filled with fresh vegetables and spices, emphasizing the theme of cooking. She looks focused and happy as she prepares a meal.

4. Housekeeping Work

Description: A beautiful young  woman of 25 years  is dressed in a smart, formal salwar kameez suitable for housekeeping, featuring a dark green top and beige pants. She is holding a vacuum cleaner and is in the midst of cleaning a well-organized living room. Her hair is tied back in a ponytail, and she has a determined look on her face. In the background, you can see neatly arranged furniture and decorative items, showcasing a homely atmosphere. Living room is well lit .Living room has a window from where another apartment building can be seen . Living room also has a painting on the wall . Cleaning woman is not wearing shoes , she is bare foot .

Brief Bio

 Indu Kant Angiras , a poet and an author.  Languages - Hindi ,English, Hungarian, Greek, Czech, and Urdu. Literary translation from Hungarian to Hindi .  Published 7 solo books and 8 collective books . Founder : Parichay Sahity Parishad and  ΣΑΝΑΔ FOUNΔΑΤΙΟΝ . Active  Youtuber

Tuesday, June 17, 2025

Hindi Urdu Adbi Sangam Sir

From 


To , 


Subject : Avertising and Sponsorship for International Literary and Cultural Program on 12-10-2025

Dear Sir / Madam,

I , Dr Naqvi , am writing to you on behalf of Hindi Urdu Adbi Sangam to request your support in advertising and sponsoring our upcoming Literary and Cultural International Event, which is scheduled to take place on 12th October 2025 in New Delhi.

The purpose of this event is to strengthen world friendship and showcase the unique Ganga Jamuni culture of India. The event will feature Kavi Sammelan, Mushaira, and various cultural programs that highlight the diverse cultures of different countries. Additionally, poets, writers, and intellectuals will be felicitated by the 'Hindi Urdu Adbi Sangam' during the event.

As an advertiser/sponsor, your support will not only help us in promoting this event to a wider audience but also in showcasing the rich literary and cultural heritage of India and other countries. Your contribution will play a vital role in making this event a grand success and creating a platform for cultural exchange and mutual understanding.

On this occasion one Souvenir will also be released . The income from this event will be used to support poor and underpriviliged children .

We would be grateful for your support in the form of advertising space or sponsorship. If you are interested in collaborating with us, please let us know so that we can provide you with more details about the event and discuss how we can work together.

Thank you for considering our request. We look forward to the opportunity to partner with you and make this event a memorable and successful one.

Warm regards,


शहर और जंगल - कौन सी दीवार पर

 कौन सी दीवार पर 


हम दोनों ही 

लहूलुहान हैं 

हम दोनों का ही 

सर ज़ख़्मी है 

पर इक फर्क है 

तुम्हारे और मेरे 

ज़ख़्मों में 

मेरा सर तो 

तुम्हारे फेंके पत्थर से ही 

फूटा था 

पर मेरे दोस्त !

तुम 

कब और कैसे ज़ख़्मी हुए ?

मैंने तो तुम्हें

कोई पत्थर नहीं मारा 

फिर कमरे की 

कौन - सी दीवार पर 

तुमने 

पटका था अपना सर। 

PRIYA HOUSEHOLD SERVICES

                                                          PRIYA  HOUSEHOLD SERVICES

                                                              ( Hulimavu , Bangalore ) 



To 

President 

 

  

                               Subject - Offering Quality Household Services at Affordable Prices

Dear Sir / Madam ,


I, PRIYA  am writing to introduce our services of providing  Housekeeping females ,House Maids,  Female Baby Sitter and Female Cooks for individual houses  and apartments  . Our team of diligent and hardworking local females are well-equipped to handle various household tasks and are proficient in multiple languages.

These household workers have  their own families, which reinforces their commitment to honesty and hard work in order to support their loved ones. They have been extensively trained in general etiquettes and integrity to ensure that they deliver quality services to our clients. They have also been trained extensively on hygiene .

We understand the importance of reliability and accountability, which is why we guarantee that if for any unforeseen reason a worker is unable to continue his/her duties, a replacement will be provided promptly to ensure that the household functions work smoothly.

Our household females are available at affordable costs and are eager to assist you with your daily tasks. Whether you require assistance with cleaning, cooking, or general household work, our team is here to help.

If you are interested in availing of our services or would like to learn more how we can support your household needs, please do not hesitate to contact us at 9535451342 or  priyan911991@gmail.com. We look forward to the opportunity to work with you and provide exceptional service.


Thanking  you in advance  for considering our services.


Sincerely,


PRIYA 

Director -PRIYA  Household Services 

9535451342 , e-mail - priyan911991@gmail.com

Bangalore

Sunday, June 15, 2025

Addresses

 Ms Meenakshi Jijivisha 

House No- 892 , Sector - 10

Housing Board

( Near Arzoo Tailors ) 

Faridabad - Haryana - 121006

Mob -  8700857305


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Mr K P Anmol 

Anmol- Pratiksha - 321/4

Solanipuram 

Roorkee , Uttrakhand - 247667

Mob - 8006623499

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Ms Namita Rakesh 

Flat No - 202 , Tower - H

Park Grandeodra 

BPTP , Sector - 82

Greater Faridabad -121007

Mob - 9212483258

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Ms Devika Menon 

Kailash Dham Apartments 

E- 1 , Sector - 50

Noida 

Uttar  Pradesh - 201301

Mob 9818673624

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Saturday, June 14, 2025

लघुकथा - बछिया का लड्डू

 बछिया का लड्डू 


चौधरी साहिब की गाय ने बछिया को जन्म दिया तो चौधरी  साहिब ख़ुशी से फूले न समाये।  पूरे गाँव में लड्डू बाँटे जा रहे थे  । नुक्कड़ पर चंद लोग फुसफुसा  रहे थे।  

- ' कमाल है यार , अभी पिछले महीने जब चौधरी साहिब की बहु ने लड़की को जन्म दिया था , तब तो चौधरी साहिब का मुँह लटक गया था और अब बछिया के जन्म पर लड्डू  बाँट रहे हैं। ' गोबर ने पूछा था।   

- ' अरे इतना भी नहीं समझते क्या , बछिया बड़ी होकर दूध देगी जबकि लड़की को पढ़ाओ , लिखाओ , खिलाओ , पिलाओ और एक दिन बड़े दहेज के साथ किसी बैल के घर बाँध आओ। यानी नुक्सान ही नुक्सान। ' बुजुर्ग ने समझाया। 

-' सही कह रहे हो भाई , कलयुग है और इस कलयुग में इंसानों की औकात जानवरों से भी कम है। ' कहते हुए गोबर ने चौधरी साहिब के लड्डू से अपना मुँह भर लिया। 


लेखक - इन्दुकांत आंगिरस 

Thursday, June 12, 2025

शहर और जंगल - मज़हबी जुनून

 मज़हबी जुनून 


जब शहर की सड़कों से गुज़रता हुआ 

मुर्दा सन्नाटा 

बंद दरवाज़े की छोटी -सी झिरी से 

घर में आ घुसा 

तो कलेजा मुँह को आ गया 

बस अब नहीं बचेंगे हम 

हे ईश्वर !

बस आज की रात किसी तरह गुज़ार दे 

लेकिन समय कब रुका है 

कब किसी शय के आगे झुका है 

मेरी सदा दहलीज़ भी न लाँघ पाई 

दरवाज़े पे एक जंगली दस्तक आई 

दरवाज़ा खोलो नहीं तो तोड़ डालेंगे 

हे ईश्वर ! 

अपनी डूबती कश्ती को बचने अब किसे बुलाऊँ 

इन जवान बेटियों की   उरानियाँ  कहाँ छुपाऊँ

बस अब थोड़ी ही देर में 

मेरी रगों में बहता ख़ून

फ़र्श   पर बिखर जाएगा 

जो काम मुझसे हो न सका 

वो दोस्त मेरा कर जाएगा 

दरवाज़ा खोलो !

ऐ मेरे ख़ुदा ! , कुछ तो बोलो 

अगर तुम मेरी मदद को आ नहीं सकते 

तो फिर 

मुझे अँधा और बहरा बना दो 

क्योंकि ज़बान के होते हुए भी  

गूँगा तो हूँ मैं वैसे ही ,

पर सुनो 

मुझे अँधा और बहरा बनाने से पहले 

एक बार सिर्फ एक बार 

मुझे मोहम्मद , गाँधी , यीशु और नानक के 

बलिदान की कथा सुना दो 

फिर मुझे अँधा और बहरा बना दो। 


दरवाज़ा खोलो 

ऐ मेरे ख़ुदा ! कुछ तो बोलो 

वो दरवाज़े के उस पार जो शख़्स खड़ा है 

यक़ीनन मेरी जान के पीछे जो पड़ा है 

कभी बचपन की गलियों में 

मेरे साथ वो खेला होगा  

इक  दूसरे का  दुःख 

मिलजुल कर हमने झेला होगा 

वो भी मुझको 

देखते ही  पहचान जायेगा 

फिर भी वो ज़ालिम लेकर मेरी जान जाएगा 

फिर खोल ही देता हूँ दरवाज़ा 

भीतर जो वो आता है , आए 

बुझती हो मेरे ख़ून से 

जो प्यास उसकी , तो बुझाए 

बेशक इस क़त्ल को 

हक़ीक़त ही माने आप 

पर फिर भी 

सच कुछ और है जनाब 

वो फ़र्श पर बिखरा 

मेरा ख़ून भी , मेरा नहीं है 

मैं मानता हूँ मेरे दोस्त 

तेरा जुनूँ भी तेरा नहीं है 

क़त्ल तो इक मज़हब ने 

दूसरे मज़हब का किया है 

इस मज़हबी जुनून  ने 

क़त्ल उसका मेरा या तुम्हारा नहीं 

क़त्ल हम सब का किया है। 

ग़ज़ल के दोष - RAV

 ग़ज़ल के दोष


वर्तमान में ग़ज़ल कहने वालों की बाढ़ आ गई है। जिसे देखिये वही ग़ज़ल को सबसे सरल विधा समझकर बिना अरुज जाने बूझे जोर आजमाइस कर रहा है। परिणामस्वरूप ग़ज़लें बहर से ख़ारिज तो होती ही हैं साथ ही उनमें दोष भी होते हैं। ग़ज़ल कहते समय हमें निम्नलिखित दोषों से बचना चाहिये।

 

1. कर्ता,क्रिया,कर्म आदि का अपने स्थान पर न होना।

जैसे - कहा बन्दे से तू संभल जा खुदा ने 

       नहीं तो बुरा हश्र होगा किसी दिन 

इसमें ऊला मिसरा में कर्ता,क्रिया,कर्म कोई भी अपने स्थान पर नहीं है। अतः इस शेर में दोष है। इस दोष को उर्दू में ताक़ीदे - लफ़्जी कहते हैं।

इसे यूँ कहा जा सकता है-

खुदा ने कहा बन्दे से तू संभल जा 

नहीं तो बुरा हश्र होगा किसी दिन 

इस प्रकार कर्ता,क्रिया,कर्म आदि सभी ने अपना स्थान ले लिया है।

2. किसी शेर में किसी शब्द की कमी होना या क्रिया अपूर्ण होना भी शेर के दोष में गिना जाता है। इसे हज़्फे़ लफ़्ज कहा जाता है।

जैसे - ‘‘रात दिन सब एक ही धुन में लगे’’ 

उपरोक्त पंक्ति में ‘‘है’’ की कमी खटक रही है। क्रिया अपूर्ण है अतः इसको इस प्रकार से दुरुस्त कर हज़्फ़े लफ़्जी दोष को दूर किया जा सकता है।

‘‘रात दिन सब एक ही धुन में लगे हैं।’’     

3. दो बेमेल चीजों को या बातों को मिलाना भी शेर के दोष हैं। इसे ऐबे शुतुरगर्बा कहते हैं। शुतुर का अर्थ है ऊँट और गर्बा का अर्थ है बिल्ली अर्थात ऊँट के गले में बिल्ली बाँधना।

जैसे - तू अब बाहर निकल आ अपने घर से

       तुम्हे  भी  जुल्म  से  लड़ना  पड़ेगा 

उपरोक्त शेर में पहली पंक्ति में ‘‘तू’’ आया है और दूसरी पंक्ति में ‘‘तुम्हे’’ आया है। यहाँ ‘‘तू’’ के साथ में ‘‘तुम्हे’’ का प्रयोग न होकर ‘‘तुझे’’ का प्रयोग होना चाहिये।

दूसरा उदाहरण देखिये -

गुनाह हमसे हुये हैं हज़ारहा ‘‘आमिल’’

हरीमे नाज़ में लेकिन मिरी रसाई है।

यहाँ पहली पंक्ति में ‘‘हमसे’’ आया है जबकि दूसरी पंक्ति में ‘‘मिरी’’ का प्रयोग शायर पे किया है। यहाँ ‘‘हमसे’’ के संदर्भ में ‘‘हमारी’’शब्द आयेगा। ‘‘मिरी’’ का प्रयोग करके शायर ने अनजाने में शुतरुगर्बा को दोष शेर मे ला दिया है परन्तु ‘‘मिरी’’ के स्थान पर ‘‘हमारी’’ शब्द का प्रयोग करने से शेर बहर से खारिज़ हो जावेगा। अतः ‘‘मिरी’’ के संदर्भ में ऊपर के मिसरे में ‘‘हमसे’’ की जगह  ‘‘मुझसे’’ को लाना पड़ेगा।

4. जब दो समान अक्षर इस प्रकार पास पास आ जावे कि उनका उच्चारण बाधित हो अर्थात प्रवाहपूर्ण उच्चारण न हो तब शेर में एक प्रकार का दोष उत्पन्न हो जाता है। इसे ऐबे तनाफ़ुर कहते हैं।

               जैसे

 ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर वरना

 क्या क़सम है तिरे मिलने की कि खा भी न सकूँ    

उपरोक्त शेर में ‘‘की कि खा’’ वाला भाग प्रवाह के साथ नहीं पढ़ा जा रहा है। अतः यह दोष ऐबे तनाफुर कहलायेगा। 

5. कभी - कभी शेर को बहर मे रखने के लिये अनावश्यक शब्दों को रूई की तरह ठूस-ठूस कर शेर में भरते हैं। इस ऐब को ‘हश्व’ कहते हैं।

जैसे - अक्सर ये मेरा ज़ह्न भी थक जाता है लेकिन 

       रफ्तार ख़्यालों की  कभी  कम  नहीं  होती       

इस शेर में ऊपर की पंक्ति में ‘अक्सर ये मेरा ज़ह्न’ में ‘‘ये ’’ शब्द शेर के वजन  को पूरा करने के लिये जबरदस्ती भर्ती किया गया है। बगैर ‘‘ये’’ शब्द के भी शेर का भाव प्रकट होता है। अतः इसमें हश्व का दोष है। ऐसे शब्द को भर्ती का शब्द कहते हैं।

6. कभी - कभी शायर अपनी बात को शेर में स्पष्ट प्रकट करने में असमर्थ रहता है। शायर क्या कहना चाहता है शायर तो समझता है परन्तु सुनने वाला नहीं समझ पाता और शेर बेमानी होकर रह जाता है। अतःशेर में बात खुल कर आनी चाहिये।

जैसे - कितनी मेहनत से आपकी ख़ातिर 

       तोड़ लाये हैं  आसमान से  हम 

शायर कहना चाहता है कि वह आसमान से आपके लिये तारे तोड़कर लाया है परन्तु यह बात हम और आप नहीं समझ पा रहे हैं यह तो केवल शायर ही जानता है। वह पहेलियाँ बुझा रहा है। अतः ऐसा शेर बेमानी है जिसका अर्थ न निकले।

7. शेर मे जिन शब्दों को बतौर क़ाफ़िया इस्तेमाल करते हैं उन षब्दों की कोई भी मात्रा या अक्षर बहर के मुताबिक भी नहीं गिरना चाहिये। 

जैसे - सफर ये साँस का अब खत्म होने वाला है 

       जो जागता था मुसाफिर वो सोने वाला है

क्योंकि बहर मफाइलुन फइलातुन मफाइलुन फैलुन के अनुसार 

यहाँ ‘‘होने’’ और ‘‘सोने’’ क़ाफ़िया है मगर ‘‘ होने’’ और ‘‘सोने’’ में अंतिम अक्षर ‘‘ने‘‘ का वजन गिराया गया है जो कि गलत है।

8.काफिया दो के होते हैं

शुद्व काफिया और योजित काफिया। शुद्व काफिया कलाम,गुलाम हवा, दवा रहम, करम आदि। योजित काफिया वे होते हैं जिनमें किसी शुद्व काफिये में कुछ अंश जोड़कर नया काफिया बना दिया जावे। जैसे ‘दोस्त’ और ‘दुश्मन’ में ‘ई’ जोड़कर दोस्ती और दुश्मनी कर दिया जावे। इसी प्रकार झुग्गी को झुग्गियाँ और कामगार को कामगारों कर दिया जावे तो ये योजित काफिये कहलाते हैं। बढ़ा हुआ अंश हटा देने पर बचा हुआ अंश हम काफिया नहीं है तो काफिया अशुद्ध हो जायेगा बशर्ते उनमें व्याकरण भेद न हो। जैसे - दफ्तरों से ओं हटा देने पर दफ्तर बचता है और झुग्गियों से यों हटा देने से झुग्गी शेष  बचता है। अब दफ्तर और झुग्गी हम काफिया नहीं हैं तो दफ्तरों और झुग्गियों का काफिया बाँधना गलत होगा। लेकिन किसी क़ाफ़िये के अंतिम अक्षर या मात्रा को हटा देने पर यदि बचा हुआ शब्द निर्रथक हो जाता है तो वह शुद्ध क़ाफ़िया होगा। जैसे ‘ज़िन्दगी’ में ई की मात्रा हटा देने पर शब्द ज़िन्दग बचता है जिसके कोई मायने नही अर्थात शब्द निर्थक हो जाता अतः यह काफिया शुद्ध है और इसे काफिया के रूप में प्रयोग किया जा सकता है परन्तु ‘दोस्ती’ और दुश्मनी में ऐसा नहीं है। दोनो के अन्त के अक्षर अर्थात ई की मात्रा हटा देने पर दोनो के ही शाब्दिक अर्थ निकलते हैं इसलिये इनको काफिये के रूप में प्रयोग करना उर्दू शायरी के अनुसार वर्जित है। इस दोष को ‘‘हर्फे रवी’’ दोष कहते हैं परन्तु आजकल इस नियम के पालन में बहुत ध्यान नहीं दिया जाता।

9.   कलाम सबकी ज़ुबाँ पर है लाकलाम  तेरा।

    सलाम करता है झुक कर तुझे गुलाम तेरा।

इस मतले के शेर में क़ाफ़िया ‘लाकलाम’ के साथ ‘ग़ुलाम’ बाँधा गया है। उर्दू शायरों के अनुसार आगे का क़ाफ़िया ‘सलाम’ अर्थात ऐसे शब्द का क़ाफ़िया होना चाहिये जिनके अंत में ‘लाम’ आये, अगर अन्त में दाम,शाम,काम आदि क़ाफ़िया बाँधा गया तो वह गलत होगा। इसी प्रकार सख़्त,तख़्त,रख़्त के क़ाफ़िये में मस्त,वक्त,जब्त क़ाफ़िये नहीं आ सकते क्योंकि सख़्त,तख़्त,रख़्त के आगे आने वाले वही शब्द क़ाफ़िये हो सकते हैं जिनके अन्त में ‘‘ख़्त’’ हो। अगर गलती से इस प्रकार का काफिया बाँधा गया तो यह हर्फे कैद दोष के अन्तर्गत आयेगा।

10. मत्ला और हुस्नेमत्ला को छोड़कर गजल के अन्य किसी भी शेर के ऊला मिसरा के अन्त में रदीफ या रदीफ के समस्वर शब्द नहीं आना चाहिये यदि ऐसा होता है तो यह दोष है और इसे ‘‘तकाबुले रदीफ’’ दोष कहेंगे। 

जैसे - जो बातें ख़ास हैं साहब उन्हें सब आम कर देंगे

       मेरे बेटे  मुझे  ही  एक दिन  नाक़ाम कर देंगे 

       सड़े गल्ला भले  लेकिन गरीबों  को  नहीं देंगे

       अगर देंगे कभी तो फिर कलेज़ा थाम कर देंगे 

यहाँ पर मत्ला में आम,नाकाम,थाम क़ाफ़िया है और कर देंगे रदीफ है। दूसरे शेर में ऊला मिसरा अर्थात पहली पंक्ति के अन्त में ‘‘ देंगे’’ शब्द आया है जो कि रदीफ के सम स्वर ‘‘देंगे’’ से मिल रहा है अतः यह ‘‘तक़ाबुले रदीफ़’’ दोष है। इसी प्रकार - 

हर दिन एक नये सपने की दे  जाता  है  आस  मुझे 

किस मंजिल पर पहुँचायेगी  मेरे मन  की  प्यास  मुझे

जिनके मन सौ - सौ पापों के दल-दल में हैं लोट रहे

वे  ही  ज्ञानी  ध्यानी  बनकर  देते  हैं  बनवास  मुझे

उपरोक्त मत्ले में रदीफ़ ‘‘मुझे’’ है। दूसरे शेर के ऊला मिसरा के अन्त में ‘‘रहे’’ शब्द आता है और ‘‘रहे’’ शब्द के अन्त का स्वर ‘‘ए’’ ‘‘मुझे’’ रदीफ़ के अन्त के स्वर ’’ए‘‘ मिल रहा है अर्थात दोनों शब्द ‘‘रहे’’ और ‘‘मुझे’’ का अन्त समस्वर से है अतः यह दोष है और यह तक़ाबुले रदीफ़ दोष के अन्तर्गत आता है।   

ग़ज़ल कहना बहुत सरल नहीं है। ग़ज़ल के येे नियम स्थूल नियम हैं। इसके अतिरिक्त भी ग़ज़ल में बहुत बारीकियाँ हैं। अच्छे अच्छे उस्ताद शायरों से भी चूक हो जाती है। ग़ज़ल सजगता के साथ नियमों का पालन करते हुये कहनी चाहिये।  


राम अवध विष्वकर्मा

ए-38 सूर्यनगर शब्द प्रताप आश्रम

ग्वालियर - 474012

शहर और जंगल - ज़रूरत

 ज़रूरत 


इस अँधेरे शहर में 

कोई भी नहीं जलाता 

अपना घर ,

तंग सीलन भरी 

बीमार गलियों की साँसें मजबूर हैं 

अपने ही क़दमों के नीचे 

दबी ज़मीन से बहुत दूर हैं 

इन अँधेरी गलियों में 

ज़रूरत , किसी  सूरज की नहीं है 

ज़रूरत सिर्फ 

मिटटी के एक दिए की है 

जो हमारे आस - पास ही 

यही कहीं है 

ज़रूरत है सिर्फ 

उस मासूम मुस्कान की 

जो अपने ही घर में 

आग लगाने से 

बेसाख़्ता  आ ही जाती है 

जो अपना सब कुछ लुटा कर भी 

किसी न किस के 

काम आ ही जाती है 

लेकिन 

इस अँधेरे शहर में 

कोई भी नहीं जलाता 

अपना घर। 


कवि - इन्दुकांत आंगिरस 

Saturday, June 7, 2025

Ghazal - RAV

 दोस्तो बहुत दिन बाद आपसे चर्चा हो रही है। एक तरही मिसरा दे रहा हूँ। यह मेरी ग़ज़ल का मिसरा है। इसे मतले में न लें। बीच में किसी भी शेर में ले सकते हैं लेकिन इस मिसरे को इनवर्टेड कॉमा में लिखना जरूरी होता है जिससे यह पता चलता है कि यह तरही मिसरा है और किसी के शेर का है। 

दूसरी बात किताब प्रकाशित होते समय इस शेर को हटाया जा सकता है लेकिन यह मिसरा अगर मतले में लिया गया तो मतला नहीं हटाया जा सकता है। इसलिए मतले में तरही मिसरा लेने की मनाही होती है।

मिसरा है

'लाल बत्ती काश लग जाये जो मेरी कार में'

बह्र है 

फाइलातुन फाइलातुन फाइलातुन फाइलुन

2122   2122  2122   212

रदीफ़ है- में

क़ाफ़िया - कार, बेकार ,दीवार, मझधार, दस्तार, सरकार , मैयार , लाचार, किरदार, मयख़ार , ख़ार, हार, इतवार, प्यार आदि

Tuesday, June 3, 2025

आम की डाली - Mitra

 आम की डाली


बचपन का  एक क़िस्सा ज़ेहन  में आते ही हमेशा   हँसी  आ जाती है। हमारे गाँव में तीन आम के बग़ीचे थे। ये बग़ीचे किसी एक के न होकर पूरे गाँव  के लिए थे । इसलिए जब तूफ़ान  आता , आम के कैरियां गिरते तो हम बच्चे सब बटोरने चले जाते । जब आम पकते तो  बग़ीचे से छोटे - बड़े आम ,सिंदूरी, काली और जामुनी आम आते ,  हर एक पेड़ का   अलग नाम था । बुआ की लड़की और मेरी दीदी पेड़ पे  ऐसे चढ़ती कि बंदर को भी फेल कर दें। 

एक सहेली के खेत में एक आम का पेड़ था जो बहुत मीठा था। कच्ची केरी भी इतना मीठा होती  थी  कि सब की नज़र  उसी पेड़ पर रहती  थी  लेकिन किसी को तोड़ना मना था। उस घर के मालिक बड़े फूफा जी की  नज़र  उस पर जमी रहती थी कही  कोई बच्चे  आम  न चुरा ले ।

एक दिन दीदी और मेरी बुआ की लड़की को आम चुराने की सूझी   लंबी लकड़ी में हंसिया (दराती) बांधकर आम के तने से सटकर तोड़ने लगी ,अभी  तो दो तीन ही तोड़ पाए थे कि  बंधा हुआ रस्सी खुल गया तो हंसिया पेड़ के डाली पर ही अटका रह गया।   यह  वाक़्या   शाम के वक़्त  हुआ  था जिसके चलते  राज़ खुलने की संभावना अधिक थी।  इसी  डर से  दोनों रात भर सोई ही नहीं। बड़े फूफाजी  खूं ख़्वार  टाइप के थे। उनका सामना करने में  किसी की हिम्मत नहीं थी इसीलिए  दोनों  बहुत डरी हुई थी। मैं तो यह सोचकर ही भयभीत  थी कि अब इनका क्या होगा। सुबह दोनों उठकर फिर खेत में पहुँच   गई और उस हंसिया को पेड़ से नीचे गिराया।  तभी  फूफाजी के खाँसने की आवाज़  आई और वो लोग खेत के कोने से अपने आप को छुपाती हुई निकल गयीं । वो क़िस्सा  अभी तक भी भुलाया नहीं जाता और जब उसका ज़िक्र  होता है तो हँसी छूट जाती  है।