Tuesday, May 20, 2025

शहर और जंगल - अँजुरी भर स्नेह

 अँजुरी भर स्नेह 


एक उदास शाम का सूनापन 

रात भर डसता  ही रहा 

क़तरा क़तरा दर्द 

आँख के समुन्दर से 

टपकता ही रहा ,

अब जाने कब मुक्त हो 

यह आत्मा , यह देह 

जाने कब मिले मन को 

अँजुरी भर स्नेह 

एक टुकड़ा ख़ुश्बू   की तलाश में ही 

कट जाती है उम्र यहाँ 

सदियों के समर्पण के बाद भी 

मिल जाये अँजुरी भर स्नेह 

नसीब ही है यहाँ। 

Monday, May 19, 2025

शहर और जंगल - पैबंद

 पैबंद 


पैबंद की परिभाषा 

कोई 

उस ग़रीब बाप से पूछे 

जो 

जवान बेटियों की 

उरानियाँ 

छिपाने की कोशिश में 

तब्दील हो चुका है 

अनगिनत पैबन्दों में 

Saturday, May 17, 2025

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 https://www.w3schools.com/html



https://youtu.be/BsDoLVMnmZs?si=qowKsjKhZcQjyciv


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Tuesday, May 13, 2025

शहर और जंगल - भूख

 भूख 


सूखी आँतें कुलबुलाती रहती हैं 

भूख हमें सताती रहती है ,भूख 

हाँ , दौलत , वासना , कुर्सी , रोटी की भूख 

नून, तेल , लकड़ी , लंगोटी की भूख 

भूख लगने पर 

इंसान , इंसान नहीं रहता  

ईमान , ईमान नहीं रहता 

पर मेरे दोस्त ! भूक लगने पर तुम 

अपनी मुट्ठी बंद ही रखना 

मुट्ठी खुलते ही 

हथेली की लकीरें मिट सकती है 

किसी का चेहरा नौचना 

हमारी आदत बन सकती है 

भूख एक जनून 

पर तुम 

मारना नहीं किसी के पेट पर लात 

भूख अपनी मिटाने को 

निचोड़ लेना अपना ही ख़ून 

पर यह सब भी कब तक 

भूख जाती है मरघट तक 

हाँ ,

भूख से निकल भी जाता है दम 

फिर क्या दफ़ना दें 

इस ख़ाली पेट को हम ?


Monday, May 12, 2025

शहर और जंगल - महक

  महक 


गन्दी गलियों में भी 

एक महक होती है 

मैंने अपने आँगन से 

चमेली उखड़वा दी है 

हर जुलूस एक जनाज़ा होता है 

जो कफ़न नहीं ओढ़ता 

जहाँ साँस लिया है जाता 

वहाँ बरसों लोग रह जाते हैं 

मेरे देश में 

लोगों ने मरना बंद कर दिया है 

तारकोल से ढँका हर चेहरा 

हर  सड़क यहाँ आवारा है 

हम कौन ? तुझे क्या ?

यह पाप सिर्फ हमारा है 

यहाँ कौन सी दीवार पर 

लगाएँ  इश्तहार 

मेरे देश में 

हर आदमी एक इश्तहार है 

और मैं इन सब पर 

एक कविता लिख सकता हूँ 

किसी साफ़ सुथरे काग़ज़ पर 

किसी विलायती पैन से 

सिर्फ 

एक कविता लिख सकता हूँ। 

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Sunday, May 11, 2025

शहर और जंगल - सारे जहाँ से अच्छा

 सारे  जहाँ से अच्छा 


कोठरी का एक ही द्वार 

बंद करते ही 

घिर जाता है अन्धकार 

बरसात में 

घर की छत टपकती है 

भीगे कपड़ों में 

पत्नी कुछ और सरकती है 

और बच्चें भी जब 

गठरी बन सिकुड़ जाते हैं 

तब 

' सारे जहाँ से अच्छा 

हिन्दोस्तां हमारा "

हम सपरिवार 

अपना राष्ट्रगीत गाते हैं।