लहू से लिखा अभिषेक→ 6 जून 2009 को वह वैष्णो देवी की यात्रा यात्रा न केवल एक धार्मिक यात्रा थी बल्कि एक माँ के संकल्प और अपने पुत्र के प्रति बहुत गहरे प्रेम का प्रतीक भी थी। मेरे पुत्र नितिनजी के जन्म के साथ ही गई वह मन्नत और फिर सालों बाद उसे पूरा करने के लिए उस कठिन चढ़ाई को चढ़ना मेरे जीवन के आस्तित्व के संघर्ष और उसकी विजय को दर्शाता था।
पहाड़ों की उन ऊँचाइयों में, सिर्फ रास्ता नहीं था, वहाँ पत्थर माँगी हुई एक दुआ का वास्ता था।
नजदीक का साथ था और मन में माँ का विश्वास, वो मन्नत ही तो थी, जिसके जगाया था नसीब का अहसास।
देवी के दरबार में दर्शन कर मन्नत पूरी हुई, पुरानी चुनौतियों
और बीते हुए कठिन समय अब एक खूबसूरत में बदल गए थे
और माता रानी को माथा टेक धन्यवाद कह रहे थे। राह में एक...दर्शन की तृप्ति के बाद शरीर थक चुका था लेकिन मन शांत था। 6 जून की वह मन्नत पूरी हो चुकी थी और अगला दिन केवल विश्राम के लिए था। कटरा की गलियों में धूप खिल रही थी और हम, नितिनकुमार और रोजी मौसी द्वारा समझा कितने के इशारे से बाहर निकल रहे थे। तभी उस गली में एक टैक्सी वाले की आवाज सुनाई — — — वह पुकार सिर्फ एक सवारी की नहीं थी, ऐसा लगा मानो नियति हमें किसी और द्वार पर बुला रही थी।
टैक्सी वाले की आवाज कटरा की हवाओं में गूँज रही थी। शिवखोड़ी — — शिवखोड़ी! दादा के दर्शन के लिए चलिए! कौतूहल वश मैंने वहीं किया, “बताइए, यह शिवखोड़ी में क्या है?” उसने जो बताया, उसने थकान को उत्साह में बदल दिया। उसने कहा — माता जी, यह वही स्थान है जहाँ स्वयं महादेव ने भस्मासुर से बचने के लिए शरण
ली थी। जब नटराज ने शिवजी से वरदान पाकर उन्हीं के पर हाथ रख कर भस्म करने का प्रयास किया तो महादेव माता पार्वती और नंदी के साथ वहाँ से भाग कर इस गुफा में छिप गए थे। माना जाता है कि शिव महादेव मंदिर ने अपने तिलस्म से इस गुफा का (खोड़ी) का निर्माण किया था, जिसे शिवखोड़ी’ (शिव की गुफा) कहा जाता है। उसने
फिर कहा कि मेरी टैक्सी वाली है — चलिए दर्शन कर आइए।
मैंने तुरंत महादेव का बुलावा समझा और तुरंत दर्शन के
लिए जाने को तैयार हो गई।
टैक्सी के पहिए जस - तस कटरा से दूर जा रहे थे.. रास्ता और भी संकरा और पहाड़ी होता जा रहा था। टैक्सी वाले ने जब बताया कि आगे का रास्ता घोड़ो से तय करना होगा और 14 किलोमीटर की खड़ी घाटी चढ़नी होगी तो एक पल के लिए मन में संशय आया। लेकिन नचिकेता के उत्साह और मन में महादेव के दर्शन की प्यास ने हर डर को पीछे छोड़ दिया। वह 3:30 घंटे का सफर केवल पहाड़ों की यात्रा नहीं थी बल्कि वह स्वयं को तैयार करने का संयम था उसे गुफा के लिए जहां साक्षात शिव ने शरण ली थी।
3:30 घंटे का सफर पूरा होते-होते आसपास का मिजाज पूरी तरह बदल चुका था । वह धूप अभी कुछ देर पहले साथ चल रही थी वह अचानक घने काले बादलों के पीछे छुप गई। जैसे ही टैक्सी स्टैंड पर रुकी आसमान से मूसलधार बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें गिरने लगीं।वह बारिश साधारण नहीं थी ऐसा लग रहा था कि मानों पहाड़ स्वयं हमसे कह रहे हो कि महादेव के द्वारा तक पहुंचने का रास्ता इतना सरल नहीं होने वाला।
अचानक घने बादलों का खजाना ऐसा लग रहा था कि प्रकृति हमारी श्रद्धा की परीक्षा ले रही है घनघोर बारिश बिजली का रह-रह कर कड़कना उसे यात्रा की गंभीरता को और बढ़ा रही थी।
टैक्सी रुकी तो थी लेकिन उससे उसे बाहर के निकलने का साहस किसी में ना था। टैक्सी की छत पर गिरती मूसलधार बारिश ऐसा प्रतीत हो रही थी मानो टूटकर बिखर जाएगी खिड़की के बाहर जो दुनिया अभी कुछ पलों पहले साफ थी अब सफेद धुआं और पानी की चादर में लिपटी थी। जो सामने खड़ी दूसरी टैक्सियां दिख रही थी और ना ही वहां खड़े भक्त। साक्षात शिव की नगरी के द्वार पर प्रकृति ने ऐसा पर्दा गिरा दिया था कि दृश्य भी अदृश्य हो गया था।
वहां पहुंचे हुए अन्य भक्त अपनी अपनी टैक्सी से वापस कटरा लौटने लगे क्योंकि अब ऊपर गुफा तक की 14 किलोमीटर की यात्रा जो घुमावदार घाटियों में घोड़े से तय करना था इतनी घनी बारिश में करना असंभव जान पड़ता था। मेरी टैक्सी के ड्राइवर ने भी वापस कटरा लौट जाने का सलाह दिया।
मैंने कहा कि अगर महादेव ने यहां तक बुलाया तो आगे का रास्ता भी वही दिखाएंगे मैंने टैक्सी वाले से कह दिया साफ कह दिया __बिना दर्शन किए हम वापस नहीं जाएंगे उसे समय मेरा संकल्प और दृढ़ निश्चय अटल था जो टैक्सी वाले के लिए अद्भुत मिसाल था। "मैंने पूछा कि हमें तीन घोड़े चाहिए घोड़े वाले को बुलाइए घोड़े वाले की आंखों में खौफ था । उसने हाथ जोड़कर कहा " माता जी यह पहाड़ है पानी की रफ्तार मेरे घोड़े के पैर को सड़क से ऊपर कर उसे सवार सवार समेत तीनके की तरह बहा ले जाएगी अगर पैर फिसला तो मेरा घोड़ा सीधे खाई में गिर जाएगा।। रास्ता 14 किलोमीटर लंबा है जान है तो जहान है मैं नहीं जा सकता ।"
मैंने घोड़े वाले की ओर देखा और फिर उस धुंधले ले पहाड़ की ओर। 9 वर्षीय नचिकेता और 65 वर्षीय रोजी मौसी दोनों का चेहरा मेरी आंखों पर सामने था मैंने दृढ़ शोर में कहा "भाई पैसे की चिंता मत करो तुम जो मांगोगे मैं दूंगी डबल ट्रिपल जो चाहिए ले लो ।
पर मुझे महादेव के पास जाना है..जिस विधाता ने यहां तक बुलाया है क्या हमें खाई में गिरने देगा ?"
मेरी अटूट आस्था श्रद्धा भक्ति दृढ़ विश्वास और संकल्प देखकर घोड़े वाला नि: शब्द रह गया आगे सुनकर कहा "माताजी आपकी श्रद्धा और विश्वास के आगे मैं हार गया आज पैसे नहीं आपकी आस्था और भक्ति पहाड़ चढ़ाएगी।" उसने तीन बरसातियां निकाले पहनने को कहा और तीन घोड़े लेकर आया जैसे ही हम घोड़े पर सवार हुए घोड़े के पैरों के नीचे सड़क नहीं बल्कि पानी का एक उफनता हुआ रेला था । डर का साया हर तरफ था पर मेरे मन में महादेव की छवि थी । मैंने रोजी मौसी और नचिकेता की और देखा और चिल्ला कर कहा"डरना नहीं ! जयकारा लगाओ "और फिर उन वीरान पहाड़ों और मूसलधार बारिश के शोर को चीरती हुई सिर्फ तीन भक्तों की आवाज घाटी में गूंजने लगी "बोल बम !बोल बम !! हर हर महादेव !!!
यहां केवल जयकारा नहीं था महादेव के नाम जाप से महामृत्युंजय मंत्र का प्राकट्य हो रहा था।
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