पत्थर से शीशा बन जाना सब के बस की बात नहीं
सीने में ग़म को दफ़नाना सब के बस की बात नहीं
ग़ैरों के रिसते ज़ख़्मों पर कोई भी हँस लेता है
अपने ज़ख़्मों पर मुस्काना सब के बस की बात नहीं
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