Saturday, January 31, 2026

Pran Priy _Geet

 ग़म में डूबा साज़ भी कोई  यहां  गाता नहीं 

आँख में ठहरा  हुआ आंसू कही जाता नहीं 

दिल मिरा वीरान फिर आबाद हो सकता है पर

दिलजला  कोई सनम रहने यहां आता नहीं




इस मन के सूने आँगन में

कब आओगे प्राण प्रिय 


रीत गयी चंदा की किरणें , बुझने लगे सितारे भी 

दरिया की  लहरों से अब , मिलते नहीं किनारे भी 

सावन  भी अब रूठ गया  , रूठी यहाँ बहारें  भी 


बंजर मन में ख़ुश्बू बन   , कब छाओगे प्राण प्रिय 


दिल की उजड़ी नगरी से   रूठी अब तन्हाई भी 

ग़म में डूबे  नग़मों की , रीति अब शहनाई भी 

राख़ हुआ चन्दन मन   ,धू जलती   परछाई भी 


इन दर्दीले गीतों को   , कब  गाओगे प्राण प्रिय 


शाम ढली डूबा सूरज  , नागिन सी डसती  रतियाँ 

पनघट भी अब छूट गया   , छूट गयी सगरी सखियाँ 

गिनते गिनते युग बीते  , बीत गयी कितनी सदियाँ


किरनों का सतरंगी रथ  , कब लाओगे प्राण प्रिय 




कवि - इन्दुकांत आंगिरस      

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