शादी “
एक अजब सा रिश्ता
आती जाती सांसों की मानिंद
महसूस करो तो ज़िंदगी
महफूज़ करना चाहो तो आरज़ी
क्या पूछते हो इस रिश्ते की मियाद
हर इक समझ से बाहिर
दो मुख्त़लिफ इंसान
साथ रहते हैं ब-ज़ाहिर
अपना अपना तख़य्युल
अपना अपना जहान
एक जानिब शिद्धते- मोहब्बत
दूसरी तरफ बे -नयाज़ी
एक तरफ कुर्बत की चाहत
दूसरा समझे दख़ल-अंदाज़ी
हवादिसों की आतिशें
फ़रायज़ की रविशें
मोहब्बत का कासा
रिस्ता रिस्ता
ख़ाली बिल्कुल ख़ाली
बदगुमानी क्यों ना आए
रिश्ता ही जब बने सवाली
मुख्त़लिफ तव्वकुवात
तलख़- कलामी
तन्ज़ो- तग़ाफुल
माज़ी की तीखी बातें
कैसे इमरोज़ी सतह पर
तल्ख़ी का मुल्लम्मा ना चढ़े
यही है हसीनो-तरीन तस्वीर
शादी की दास्तां की
कि…
हमनफ़स है सरगरां
ग़र्दो- ग़ुबार और धुआं
ज़िंदगी का तिलिस्मी बाब
आदमी से ख़ुदा का जुदा निसाब
कैसे बने दिलों में निस्बत
आदम और हव्वा की चाहत
यह तो शादी है
मोहब्बत नहीं …मेरे दोस्त
कहां बनते हैं ‘गुल’
शादियों में मोहब्बती रिश्ते
??????
ऐसा ही है शादी का निज़ाम
सब हस्बे-मामूल
…….. गुरदीप 'गुल'
मानिंद— भांति , महफूज़ –सुरक्षित, ख़ला– खालीपन , तख़्युल – विचार व
बे न्याज़ी —लापरवाही , कुर्बत– निकटता,
हवादिस -घटनाएं, आतिशें– चिंगारियां , फरायज़–कर्तव्य, रविशें — गति विधियां, कासा -प्याला, तव्वकुवात —अपेक्षाएं, तल्ख़-कलामी–कटु बातचीत , तन्ज़ो- तग़ाफुल — आलोचनाऐं, माज़ी — अतीत इमरोज़ —वर्तमान, मुल्लम्मा– परत , हम-नफस —सांसों का साथी ,सरगरां— ना ख़ुश , बाब - अध्याय , निसाब — पाठ्यक्रम, निस्बत — संबंध , हस्बे-मामूल – यथावत अर्थात जैसा हो वैसा ही रहन
~~
No comments:
Post a Comment