Friday, January 2, 2026

Laghukatha_Book_21

 नाशुक्रे  - डॉ सविता चड्ढा 


सबसे छोटे बेटे की शादी से निवृत होकर गुरविंदर पहली बार अपने सबसे बड़े बेटे के घर गई । उस दिन वे सब लोग किसी शादी में जाने के लिए तैयार हो रहे थे । माँ को अचानक आया देख बेटे ने न तो माँ को प्रणाम किया  न आदर सत्कार , बस ग़ुस्से में चीख़ा  ‘’ आने से पहले फोन तो कर लेना था ।घर में कोई नहीं रहने वाला, सब शादी में जा रहे हैं,  माँ  तुम भी ...." बेटा दाँत  पीस रहा था।  माँ का गला प्यास से सूखा जा रहा था ,पसीने से तरबतर थी लेकिन  बेटे को कोई परवा नहीं थी । गुरविंदर को याद आया, वह तो माँ है, उसे घबराना नहीं है , हिम्मत कर उसने कहा... ‘’आप सब शादी में जाओ, घर तो यही हैं न। मैं अकेली रह...।  ‘’ 

गुरविंदर की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि बेटे ने ऑनलाइन ऑटो बुक कर दिया । चंद मिनटों में ऑटो दरवाज़े पर था।   घर से निकलते हुए गुरमिंदर का गला भर आया था और उसने बेटे की आँखों में झांकते हुए कहा था ,   ‘’ माँ को प्यासा ही  भेज देगा घर से,  नाशुक्रे ! एक घूँट पानी  तो पिला देता ..."

बेटे ने झटपट ख़ामोशी से माँ की कपड़ो वाली  टोकरी ऑटो में रखी ,ड्राइवर को 100 रूपये  का नोट  और पानी की बोतल पकड़ाते हुए  कहा ‘’ इन्हें पंचकुइयां रोड छोड़ देना । -‘’

ऑटो  में बैठने की देर थी कि  गुरविंदर की  आँखों से आँसुओं के धाराएँ ऐसे बहने लगी मानो उत्तराखंड में बादल फट गया हो। उसके प्यासे होंठो  से बस इतना निकला  था  , " ऐसी नाशुक्री औलादें भगवान किसी को न दे। "

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  झुनझुना - - कृष्ण कुमार भगत

         कई दिनों बाद गाँव  की ठकुराइन से मिसराइन मिली तो बातों-बातों में पूछ बैठी,”सुना है सत्तू नई दुल्हन लाया है, कैसी है?”
       - "  दुल्हन तो ख़ूबसूरत  है, पर किसी ठाकुर के सँग  रहती तो बहोत अच्छी लगती !” उसने मन की भड़ास निकाली,”सत्तू के घर झुनझुने के सिवा भला क्या रक्खा है, उमर भर झुनझुना बजाते ई गुज़रेगी  !”
        -  “बहन, झुनझुना भी नसीब वालों के घर होवे है? अब ललाइन को देख लो, घर में सब कुछ है झुनझुने के सिवा, दिल मांगे तो बाहर जाना पड़े है के नईं!”
           “ हाँ  मिसराइन,ई तो है !” एक ठण्डी आह भर कर ठकुराइन पुनः बोली,”झुनझुने के बग़ैर  जिनगी श्मशान लगे है…सत्तू के झुनझुने की आवाज़  तो मंदिर तक आवे है सुबह-शाम और गाय-भैंस भी सुन-सुन के पगुरा जावे हैं!”

Needs clarification  about dialogue speakers - 


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सफ़ेद कुत्ते  - डॉ सविता चड्ढा 



गली में हर रोज़  एक कुत्ते के रोने की आवाज़ से गीता का मन बहुत परेशान था । रात की नींद तो खराब होती ही , अपशकुन का अंदेशा भी रहता। उस रात उसने ठान  लिया कि  उस कुत्ते को ज़रूर ढूंढेगी जो हर रात रोता है , आख़िर क्या दुःख है उसे ? 
 उसने बड़ी वाली टॉर्च उठाई और घर के बाहर आ गई। अभी थोड़ी दूर ही गई थी कि  उसने  देखा एक सफ़ेद  रंग का कुत्ता आसमान की तरफ मुँह उठाके रो रहा है, बहुत ही दर्दीली आवाज़  में । वह सोचने लगी यह क्यों रो रहा, उसे कोई तकलीफ तो नहीं।  गीता को अपने पास आता देखकर सफ़ेद कुत्ता  खाने की इच्छा ज़ाहिर करर्ते हुए अपनी पूंछ हिलाने लगा। 
गीता  समझ गई, आजकल हर व्यक्ति,  केवल काले कुत्तों  को ही दूध पिलाता है । गलियों में घूमने वाले सफ़ेद और भूरे रंग के कुत्ते इसी प्रकार आसमान की तरफ मुँह  उठाकर रोते हैं और पूछते हैं भगवान से, "  तूने हमें काला बनाकर क्यों नहीं भेजा ? "  

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