कब्रिस्तान
मेडिकल कॉलेज के पुस्तकालय में सन्नाटा पसरा हुआ था। वातावरण में फैलती साम्प्रदायिकता की ज़हरीली हवा में मेडिकल साइंस की क़ीमती पुस्तकों का दम घुट रहा था। कुछ पुस्तकें कराह रही थी तो कुछ बहा रही थी आँसू अपनी क़िस्मत पर। पुस्तकों का मन उन उँगलियों के स्पर्श के लिए आतुर था जो भविष्य में किसी भी मरीज़ की नब्ज़ थाम कर बीमारी को समझने का हुनर सीख जाती , जो मौत की चौखट से ज़िंदगी को वापिस बुलाने का जादू जान जाती । उन्हें रह रह कर इस बात का मलाल हो रहा था कि अब उन्हें पढ़ने कोई नहीं आएगा। कॉलेज के बाहर बजते ढोल और नगाड़ों के शोर में पुस्कालय का सन्नाटा अब मुर्दा बन चुका था।
पुस्तकें अपने ही शरीर पर जमी धूल में दब कर दम तोड़ चुकी थी। पुस्तकें इस बात से हैरान थी कि कैसे किसी अस्पताल की इमारत एक कब्रिस्तान में तब्दील हो चुकी थी ।
इन्दुकांत आंगिरस
No comments:
Post a Comment