Saturday, January 17, 2026

Kabir

 एक अचंभा देखा रे भाई 


 Kabir 


एक अचंभा देखा रे भाई, ठाढ़ा सिंह चरावै गाई। 


पहले  पूत  पाछे भई  माई, चेला  के  गुरु लागे पाई। 


जल की मछरी तरवरि ब्याई, पकड़ि बिलाई मुरगै खाई। 


बैलहि डारि गूनि घरि आई, कूता  कूँ लै  गई  बिलाई। 


तलि करि साषा उपरि करि मूल, बहुत भाँति जड़ लागे फूल। 


कहैं  कबीर  या पद को बूझै, ताकू तीनों त्रिभुवन सुझै

No comments:

Post a Comment