ग़ज़ल काव्य की सबसे लोकप्रिय विधा है । भाषा और भाव के तमाम परिवर्तनों को स्वीकार करते हुए ग़ज़ल ने एक बहुत लंबा सफ़र तय किया । उर्दू के प्राचीन शायरों ने इसे बुलंदी की उस शिखर तक पहुंचाया कि जिसे सर उठा कर देख पाना भी किसी नए शायर के लिए बहुत मुश्किल है , पहुंचना तो शायद बहुत दूर की बात है । बाद में आने वाली पीढ़ियों ने उसे आम ज़ुबान तक लाकर एक बड़े वर्ग तक उसे पहुंचाया और लोकप्रिय बनाया । आली जनाब बशीर बद्र साहब से लेकर मरहूम मेराज़ फैज़ाबादी साहब तक ने इसे आम आवाम तक पहुंचाने में भरपूर और सफल कोशिश की , इसके बावजूद उन्होंने उर्दू ज़ुबान की जो मिठास है उसे ज़रा भी कम न होने दिया ,आम ज़ुबान में भी उन्होंने उर्दू ज़ुबान की लज़्ज़त को जस का तस बनाए रक्खा । आज भाषा के उसी संस्कार को ले कर शायरी में बहुत से नाम उभर कर आए जिसमे बदायूं के मोतबर शाइर मोहतरम आबशार आदम साहब का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है । उनका ग़ज़ल संग्रह "महके हैं वीराने तक " एक बहुत ही बेहतरीन और महत्वपूर्ण ग़ज़ल संग्रह है, जो समकालीन ग़ज़ल के सौंदर्य का जीता जागता उदाहरण है । इस ग़ज़ल संग्रह पर अपना विचार व्यक्त करते हुए देश के प्रख्यात कवि नरेश शांडिल्य जी ने कहा है कि " इनके ज़्यादातर अशआर में शेरियत और तग़ज़्ज़ुल दोनो के दर्शन भी अक्सर होते हैं । बोलचाल वाली ज़ुबान और लहजे में कहना इनकी शाइरी की अहम विशेषता है । इनकी शाइरी की ख़ूबी यह भी है की आम पढ़ने-सुनने वाला भी इनके कहे को आसानी से समझ लेता है, और शाइरी का भरपूर मज़ा लेता है । मुझे यह भी लगा कि जनाब आबशार "आदम" ग़ज़ल के रिवायती हुस्न से बख़ूबी वाक़िफ़ हैं और हिन्दी-उर्दू दोनो भाषाओं की शब्द संपदा से संपन्न हैं । ये ख़ूबियां " आदम" जी को बेहतरीन शाइर बनाती है"। मैं आदरणीय नरेश शांडिल्य जी की बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं । इसके आगे सिर्फ़ इतना ही कहना चाहता हूं कि मोहतरम आदम साहब की शाइरी के प्रति सोच और समझ दोनो क़ाबिले-क़द्र है । मोहतरम आदम साहब के शेर में ज़ुबान की ख़ूबसूरती एक मीठी लज़्ज़त का अहसास दे जाती है..
हमे दिल से पड़ा है हाथ धोना
बहुत महंगा पड़ा उसका तबस्सुम
मोहतरम आदम साहब के शेर बहुत आसानी से दिल को छू कर अहसास को ज़िंदा कर देते हैं..
इतना पड़ा है जागना तेरे फ़िराक़ में
आने लगा है रास बहुत रतजगा मुझे
आदमी के अहसास को पढ़ने का भरपूर हुनर है मोहतरम आदम साहब के पास...
दिले-ए-मुफ़लिस पे उस दम क्या गुज़रती है ख़ुदा जाने
ग़रीबी में जब आकर इम्तिहां मेहमान लेते हैं
मोहतरम आदम साहब की शाइरी को समझने के लिए आदमी का हस्सास दिल होना बहुत ज़रूरी है ...
सहरा कोई मिले तो बुझा दूं मैं उसकी प्यास
आंखों में फिर रहा हूं समंदर लिए हुए
मोहतरम आदम साहब अपनी बात इतनी कलात्मक ढंग से कहते हैं, कि आदमी सोचने पर मजबूर हो जाता है...
दीवाना बनाकर तो कभी होश में लाकर
परखा है बहुत उसने मुझे ठोक-बजाकर
मोहतरम आदम साहब की आशावादी सोच जगह जगह उनकी शायरी में दिखाई देती है..
दामन-ए-सब्र न छोड़ा इसी उम्मीद के साथ
वक़्त के साथ ये तूफ़ाँ भी गुज़र जायेगा
बड़ी से बड़ी बात भी मोहतरम आदम साहब बहुत आसानी से कह जाते हैं..
मेरे एहसास को ज़ुबां देकर
कर गया मेरी तरजुमानी कौन
शायरी में अपने भाव को संप्रेषित करने में भाषा कहीं भी बाधक नहीं बनती है मोहतरम आदम साहब के लिए ..
पक्षधर कैसे बना तू त्याग और बलिदान का
जड़ से सूखा वृक्ष छायादार कैसे हो गया
मोहतरम आदम साहब के शेर आदमी के दिमाग़ को अचानक से झकझोर देते हैं...
बेहिस लोग हमारे शहर में बसते हैं
इससे बढ़कर कोई क़ब्रिस्तान नहीं
आदमी के जीने की जो दुश्वारियां हैं उसपर मोहतरम आदम साहब की पैनी नज़र रहती है..
अना फेंक दी सर को ख़म कर दिया
गुज़ारे की बस इक यही राह थी
कुलमिला कर एक सौ एक बेहतरीन ग़ज़लों का ये संग्रह "महके हैं वीराने तक" अपनेआप में एक अलग रंग और रौनक लिए समकालीन ग़ज़ल के गलियारे में दाख़िल हुआ है, जिसका जिसका बड़े स्नेह और सम्मान के साथ स्वागत किया जाएगा इसका मुझे पूर्ण विश्वास है । इस ग़ज़ल संग्रह की एक एक ग़ज़ल हमारे समय के ग़ज़ल की बुलंदी की सनद है । इस ग़ज़ल संग्रह में तमाम मानवीय संवेदनाओं की अनुभूति और उसकी अभिव्यक्ति बहुत ही कलात्मक ढंग से ग़ज़ल के माध्यम से पाठकों के बीच रख्खी गई है , जो समकालीन ग़ज़ल की अपनी विशेषताओं के प्रति हमे पूरी तरह से आश्वस्त करती है । इस ग़ज़ल संग्रह में मोहतरम आबशार "आदम" साहब का ग़ज़ल के कथ्य और शिल्प दोनो के प्रति एक लंबा और सधा हुआ अनुभव साफ़ दिखाई देता है । पाठकों को ये ग़ज़ल संग्रह पूरी तरह से अपनी ओर आकर्षित करेगा , और शुरू से अंत तक पढ़ने के लिए विवश करेगा । ये ग़ज़ल संग्रह पुस्तकालय की शोभा भी बढ़ाएगा , और नए ग़ज़लकारों को हमारे समय की ग़ज़ल की विशेषताओं से परिचित भी कराएगा । इस ग़ज़ल संग्रह के लिए मोहतरम आबशार "आदम" को मेरी अनंत शुभकामनाएं ।
ग़ज़ल संग्रह... महके हैं वीराने तक
ग़ज़लकार.. आबशार "आदम"
आचमन प्रकाशन
बदायूं
हरीश दरवेश
बस्ती
9450566295
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