1
नाशुक्रे - डॉ सविता चड्ढा
सबसे छोटे बेटे की शादी से निवृत होकर गुरविंदर पहली बार अपने सबसे बड़े बेटे के घर गई । उस दिन वे सब लोग किसी शादी में जाने के लिए तैयार हो रहे थे । माँ को अचानक आया देख बेटे ने न तो माँ को प्रणाम किया न आदर सत्कार , बस ग़ुस्से में चीख़ा ‘’ आने से पहले फोन तो कर लेना था ।घर में कोई नहीं रहने वाला, सब शादी में जा रहे हैं, माँ तुम भी ...." बेटा दाँत पीस रहा था। माँ का गला प्यास से सूखा जा रहा था ,पसीने से तरबतर थी लेकिन बेटे को कोई परवा नहीं थी । गुरविंदर को याद आया, वह तो माँ है, उसे घबराना नहीं है , हिम्मत कर उसने कहा... ‘’आप सब शादी में जाओ, घर तो यही हैं न। मैं अकेली रह...। ‘’
गुरविंदर की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि बेटे ने ऑनलाइन ऑटो बुक कर दिया । चंद मिनटों में ऑटो दरवाज़े पर था। घर से निकलते हुए गुरमिंदर का गला भर आया था और उसने बेटे की आँखों में झांकते हुए कहा था , ‘’ माँ को प्यासा ही भेज देगा घर से, नाशुक्रे ! एक घूँट पानी तो पिला देता ..."
बेटे ने झटपट ख़ामोशी से माँ की कपड़ो वाली टोकरी ऑटो में रखी ,ड्राइवर को 100 रूपये का नोट और पानी की बोतल पकड़ाते हुए कहा ‘’ इन्हें पंचकुइयां रोड छोड़ देना । -‘’
ऑटो में बैठने की देर थी कि गुरविंदर की आँखों से आँसुओं के धाराएँ ऐसे बहने लगी मानो उत्तराखंड में बादल फट गया हो। उसके प्यासे होंठो से बस इतना निकला था , " ऐसी नाशुक्री औलादें भगवान किसी को न दे। "
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2
झुनझुना - - कृष्ण कुमार भगत
कई दिनों बाद गाँव की ठकुराइन से मिसराइन मिली तो बातों-बातों में पूछ बैठी,”सुना है सत्तू नई दुल्हन लाया है, कैसी है?”
- " दुल्हन तो ख़ूबसूरत है, पर किसी ठाकुर के सँग रहती तो बहोत अच्छी लगती !” उसने मन की भड़ास निकाली,”सत्तू के घर झुनझुने के सिवा भला क्या रक्खा है, उमर भर झुनझुना बजाते ई गुज़रेगी !”
- “बहन, झुनझुना भी नसीब वालों के घर होवे है? अब ललाइन को देख लो, घर में सब कुछ है झुनझुने के सिवा, दिल मांगे तो बाहर जाना पड़े है के नईं!”
“ हाँ मिसराइन,ई तो है !” एक ठण्डी आह भर कर ठकुराइन पुनः बोली,”झुनझुने के बग़ैर जिनगी श्मशान लगे है…सत्तू के झुनझुने की आवाज़ तो मंदिर तक आवे है सुबह-शाम और गाय-भैंस भी सुन-सुन के पगुरा जावे हैं!”
Needs clarification about dialogue speakers -
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3
बुरका - कुमार शर्मा ’अनिल’
भिखारिन - सी दिखने वाली वह जवान मंदबुद्धि लड़की पिछले दस दिन से कस्बे के बाज़ार में घूम रही थी। ’समझ’ की बात छोड़ दें तो शरीर के मामले में वह अपनी उम्र की तमाम लड़कियों से ज्यादा सम्पन्न थी और यही कारण था कि बाज़ार के सभी दुकानदारों के अलावा अन्य लोगों के लिए भी वह आकर्षण का केन्द्र थी। एक दूसरे की नज़रें बचा कर दुकानदार उसे कुछ न कुछ खाने-पीने का सामान देते ही रहते । इसके पीछे सहानुभूति कम अपने मन और शरीर में उसे देर तक देखे जाने से पैदा होने वाली सुखद अनुभूति ज्यादा थी ।
आज सुबह जब दुकानदार बाज़ार में अपनी दुकानें खोल ही रहे थे कि एक दुकान के खोके के पीछे वह भिखारिन निपट निर्वस्त्र लेटी हुई मिली। उसके कपड़े तह कर उसके सिरहाने रखे हुए थे और पास ही एक खाली बोतल और दो गिलास रखे हुए थे। थोड़ी देर में वहाँ मजमा इकट्ठा हो गया। सभी उसके निर्वस्त्र जिस्म के तमाशबीन बने हुए थे। एक बुजुर्ग दुकानदार ने उसे पास पड़े उसके कपड़े पहनने को कहा तो वह अस्पष्ट भाषा में लड़खड़ाती जुबान में शराब की बोतल हाथ में लहराती बोली - "और चाहिये, मुझे और चाहिए।’’ स्पष्ट था कि वह शराब के नशे में थी ।
इसी बीच किसी ने पुलिस को भी फोन कर दिया। तमाशबीनों को लग रहा था कि उसके साथ बलात्कार भी हुआ है। जिस दुकान के के सामने वह लेटी हुई थी वह दुकान बूढ़े सिराज अहमद की थी परन्तु उस पर ज़्यादातर उनकी जवान बेगम बुरका पहन कर ही बैठती थी। जिसकी दो ख़ूबसूरत आँखों और गुलाबी हाथों के लोग दीवाने थे। आँखों और हाथों के अलावा किसी ने उसके शरीर का कोई अंग नहीं देखा था। तभी वहाँ सिराज अहमद भी अपनी बेगम के साथ दुकान खोलने पहुँच गया। बेगम ने जब उस मंदबुद्धि लड़की को वहाँ निर्वस्त्र बैठे देखा तो बिना एक पल की देरी किये अपना बुरका उतारा और उस लड़की को पहना दिया। उस लड़की ने भी ख़ुशी -ख़ुशी वह बुरका पहन लिया। भीड़ की प्रशंसा भरी आँखें अब सिराज अहमद की बेइंतहा ख़ूबसूरत बेगम को देख रही थीं। परन्तु यह प्रशंसा उस मंदबुद्धि लड़की के जिस्म को ढकने के कारण नहीं थी ।
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4
मदद - शिवनलाल जलाली
मेरी माँ छत की सफ़ाई के बाद झाड़ू मुंडेर पर रख गयी । बाद में एक कौआ आया और झाड़ू की सींकें खींच कर ले गया । मैं बड़े ग़ौर से उस कौए को देखता रहा था। अगले दिन माँ झाड़ू देख कर कुछ हैरान थी क्योंकि झाड़ू आधी रह गयी थी। उन्होंने जिज्ञासे से मुझसे पूछा था , " झाड़ू की सींकें आधी कैसे रह गयी ; तुझे पता है कुछ ? " मैंने सहज भाव से जवाब दिया था , " एक कौआ आया था , एक एक करके ले गया सींकें .."
- " अरे बेवकूफ़ ! तू झाड़ू उठा कर घर के अंदर रख लेता। " माँ ने मुझे डपटते हुए कहा था।
- " माँ , ऐसा करना मैंने उचित न समझा .."
- " क्यों ? "
- " क्योंकि मैं उसकी मदद करना चाहता था। "
माँ ने बढ़कर मुझे अपनी छाती से लगा लिया और मैं उसके स्नेह में देर तलक भीगता रहा था।
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5
सफ़ेद कुत्ते - डॉ सविता चड्ढा
गली में हर रोज़ एक कुत्ते के रोने की आवाज़ से गीता का मन बहुत परेशान था । रात की नींद तो खराब होती ही , अपशकुन का अंदेशा भी रहता। उस रात उसने ठान लिया कि उस कुत्ते को ज़रूर ढूंढेगी जो हर रात रोता है , आख़िर क्या दुःख है उसे ?
उसने बड़ी वाली टॉर्च उठाई और घर के बाहर आ गई। अभी थोड़ी दूर ही गई थी कि उसने देखा एक सफ़ेद रंग का कुत्ता आसमान की तरफ मुँह उठाके रो रहा है, बहुत ही दर्दीली आवाज़ में । वह सोचने लगी यह क्यों रो रहा, उसे कोई तकलीफ तो नहीं। गीता को अपने पास आता देखकर सफ़ेद कुत्ता खाने की इच्छा ज़ाहिर करर्ते हुए अपनी पूंछ हिलाने लगा।
गीता समझ गई, आजकल हर व्यक्ति, केवल काले कुत्तों को ही दूध पिलाता है । गलियों में घूमने वाले सफ़ेद और भूरे रंग के कुत्ते इसी प्रकार आसमान की तरफ मुँह उठाकर रोते हैं और पूछते हैं भगवान से, " तूने हमें काला बनाकर क्यों नहीं भेजा ? "
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6
आइसक्रीम - कुमार शर्मा ’अनिल’
जून की गर्मी आग बरसा रही थी। अपने बारह वर्षीय बेटे को स्कूल की पुस्तक दिलाने मैं बाज़ार गया था। कार का ए.सी. चलता छोडकर मैंने बेटे को कार में ही बैठे रहने की सलाह दी क्योंकि बाहर मानो आग बरस रही थी। वहीं लगभग बारह बरस का एक बच्चा इतनी धूप में साइकिल रिक्शा पर आइसक्रीम बेच रहा था। पास के पेड के नीचे छाँव में अपने चार वर्ष के भाई के साथ एक आठ वर्षीय बच्ची खेल रही थी। लौटकर आया तो सोचा बेटे को आइसक्रीम दिला दूँ। मुझे पता था वह आइसक्रीम खाने का बहुत शौकीन है। मैं आइसक्रीम ख़रीद ही रहा था कि मज़दूर की वह बच्ची अपने छोटे भाई को अकेला छोड़कर आइसक्रीम के साइकिल रिक्शा के पास आकर मेरे द्वारा ख़रीदी गई दो आइसक्रीमों की कैण्डी को बड़ी हसरत से देखने लगी। मेरा शुरू से सिद्धांत रहा है कि मैं कभी किसी को भीख नहीं देता। उसे घूरते देख मैंने उससे कुछ ग़ुस्से से पूछा -"क्या है ? चल भाग।’’ वह डर कर दो क़दम पीछे हट गई पर गई नहीं।
बेटा कार में बैठा यह सब देख रहा था। कार में बैठते हुए मैंने एक कैण्डी बेटे को दी तो वह ख़ुश हो गया। अभी मैं कार स्टार्ट कर ही रहा था कि मैंने देखा बेटे ने कार की खिड़की का शीशा नीचे किया और अपनी आइसक्रीम उस लड़की को पकडा दी। लड़की ख़ुश होकर अपने भाई के पास पहुँची और उसे आइसक्रीम खिलाने लगी। थोड़ी देर तक मैं उस लड़की को देखता रहा। मैंने अपनी आइसक्रीम बेटे को दी तो उसने सहज भाव से 'ना' में सिर हिला दिया’- "आप खाओ , पापा ’।
मैंने देखा वह कुछ पाने की ख़ुशी से ज़्यादा देने के सुख से सराबोर था। मुझे लगा ए.सी. के बावजूद कार में बहुत गर्मी है। थोड़ी ही देर में हाथ में पकड़ी आइसक्रीम पिघल कर मेरे कपडों पर फैल गई।
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7
अपशकुनी - डॉ मीना कुमारी परिहार'मान्या'
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अंशुमन के जन्मदिन की तैयारियाँ जोरों से चल रही थी। दादी बहुत ख़ुश थीं। और ख़ुश क्यों ना हों..? इकलौता पोते का जन्मदिन जो था। अंशुमन के मम्मी -पापा मेहमानों की लिस्ट और दावत का मीनू बनाने में व्यस्त थे । अंशुमन अपने दोस्तों के साथ नए कपड़े पहन ख़ूब मस्ती कर रहा था। केक कट जाने के बाद सभी मेहमान खाना खाने लगे । तभी कमरे से दादी माँ लंगड़ाते हुए कमरे से बाहर आईं। घर आये कुछ मेहमान दादी को देख कर हँसने लगे। एक मेहमान शिकायती लहज़े में बोला , " क्यों महेश जी, आप जन्मदिन की पार्टी पर हमें बुलाकर अपमानित, क्यों कर रहे हैं। "
- " अरे यार क्या हुआ..? , खाना सही नहीं है क्या ? " अंशुमन के पापा ने घबरा कर पूछा।
- " खाना तो ठीक है लेकिन ख़ुशी के मौके पर तुम्हारी बीमार और लंगड़ी माँ को देखना अपशकुन नहीं तो क्या है ? ऐसे शुभ घड़ी में इन्हें कमरे से बाहर नहीं आना चाहिए था ।
- अरे यार! क्या बात कर रहे हो ! मेरी माँ दुनिया की सबसे प्यारी माँ है। इन्होने मेरी ख़ुशी के लिए अपना सब कुछ क़ुर्बान दिया .. आज वो अपशकुनी कैसे...? "
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. बुढ़ापा - नीलम नारंग
रीना अपने नए घर की बॉलकनी पर खड़े होकर इधर -उधर देख रही थी | उसने कुछ दिन पहले ही इस मोहल्ले में नया घर लिया है | उसको वहाँ खड़े देख ऐसा लग रहा था मानो आज ही सबसे जान पहचान कर लेगी | धीरे धीरे यह उसका रोज़ का नियम बन गया । जब भी घर के काम से फ़ुरसत मिलती वह बॉलकनी पर आकर बैठ जाती | उसके सामने वाले घर में एक बुजुर्ग जो कभी -कभी दिखाई देते ,अक्सर इतवार को | रीना यह देखकर बड़ी हैरान होती है कि वह बुजुर्ग हर रविवार को कुछ कबाड़ बाहर निकालते हैं और हर आने -जाने वाले कबाड़ी को रोकते हैं ,कुछ देर मोल भाव करते हैं फिर अंदर चले जाते है | कभी-कभी कुछ कबाड़ बेच भी देते हैं | रीना को आस पड़ोस से पता चला कि वो एक रिटायर्ड अधिकारी हैं जिनके बच्चे विदेश में सेटल्ड हैं | पत्नी का देहांत हुए कई बरस हो गए हैं | इतने बड़े घर में अकेले रह रहे हैं | कोई आने -जाने वाला नहीं है | रीना सोचने लगी कि इतना पैसा होते हुए भी यह बुजुर्ग कितना लालची है | एक रविवार रीना को कबाड़ बेचना था तो उसने कबाड़ी को बुलाया , बातों -बातों में उसने कबाड़ी से बुजुर्ग के लालच की बात बोली तो कबाड़ी ने बताया की वो लालची नहीं, वो तो टाइम पास करता है और तो कोई है नहीं बोलने के लिए इसलिए वह हम जैसों से ही दिल बहला लेता है | कबाड़ी की बात रीना को अंदर तक झकझोर गयी वह बुजुर्गों की दशा के बारे में सोचने पर मजबूर हो गयी |
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पूजाघर - अरविन्द असर
ग्राहक को साथ लेकर कोठे की एक सकरी गैलरी में वो आगे बढ़ रही थी।अगल-बगल केबिन बने हुए थे। जिनसे कुछ कुछ आवाज़े आ रहीं थी, जिससे पता लगता था, कि वे केबिन भरे हुए हैं। एक केबिन जिससे आवाज़ नहीं आ रही थी ,उसने थोड़ा खोलकर देखा लेकिन वो केबिन भी भरा हुआ था।
ग्राहक उतावला हो रहा था, उसे बहुत जल्दी थी। उसकी नज़रें कुछ ज्यादा ही चौकन्नी थी,एक खाली केबिन की ओर उंगली से इशारा करते हुए विजयी भाव से कहा,"ये खाली है।"
- "नहीं,इसमें नहीं ..ये पूजाघर है, भगवान का कमरा है।" वो झट से बोली।
- " ओह , भगवान् का कमरा ...यहाँ भी ..." कुछ झल्लाते हुए ग्राहक बुदबुदाया भर था।
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उसूल - अरविन्द असर
- "यहाँ, कैमरे तो नहीं लगे हैं, मुझे डर लग रहा है।" ग्राहक भयभीत होकर पूछ रहा था।
- "नहीं, यहाँ कैमरे नहीं लगे हैं, तू इत्मीनान रख।"उसने ग्राहक को संयत करने की कोशिश की।
- "फिर भी मुझे डर लग रहा है" वो धीरे से बोला।
जवाब में वो सवाल जड़ते हुए , चिढ़कर थोड़ा तेज़ स्वर में बोली, "अगर इतना ही डर लग रहा है, तो तू यहाँ कोठे पर आया ही क्यों ? "
- "पहली बार आया हूँ , डरना स्वभाविक है, आजकल कार्ल गर्ल्स वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करतीं हैं।" उसने एक साँस में अपनी शंका व्यक्त कर दी।
- "अच्छा ! तो तू इसलिए डर रहा है, तू ठंड रख ,ऐसा कुछ नही होगा यहाँ ,हम वेश्या हैं ,हम ब्लैकमेल नहीं करतीं, हमारे भी कुछ उसूल होते हैं।"
असूल वाला जुमला बोलते हुए उसने अपने सर को एक गर्वीला झटका दिया था।
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