Sunday, September 24, 2023

प्रेम - प्रसंग/ 2 -सुर्ख़ गुलाब

 

सुर्ख़  गुलाब 


अपने माथे पर सजा लिया

 तुम ने जब सिन्दूरी सूरज 

और एक सुर्ख़ गुलाब 

अपनी ज़ुल्फ़ों में 

मुहब्बत के कितने लम्हात  

तुम्हारे क़दमों में बिछ गए ,

दीवानो को क्या इस से मतलब ..

के वो सुर्ख़ गुलाब 

तुम्हारे जूड़े में टाँगा हैं किस ने 

उन्हें तो बस 

उसकी खुशबू  में है भीगना ,

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के 

काले साये-सी  लरज़ती बदरी का

मुहब्बत के सहरा  पर बूँद बूँद बरसना  

दरिया का समुन्दर की लहरों से लिपटना ,

सुनो ! मुहब्बत के बाग़ की अप्सरा हो तुम  

सुरा  हो , बला हो , सबा हो तुम 

हरेक  दिल का वलवला हो तुम,

वो सुर्ख़ गुलाब अपनी ज़ुल्फ़ों में सजाए रखना 

मुहब्बत की एक दुनिया बनाए रखना ,  

बारूद के ढेर पर ठहरी इस दुनिया को 

नफ़रत की आग में  जलती इस दुनिया को 

गर कोई बचा सकता है , तो वो है 

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों को सुर्ख़ गुलाब 

तुम्हारी निगाहों में छुपा प्यार का ख़्वाब 

और तुम्हारे होंठों की 

वो मोनालिसा -सी मुस्कुराहट।  



कवि - इन्दुकांत आंगिरस  

Saturday, September 16, 2023

प्रेम - प्रसंग/ 2 - ख़ामोशी

 कविता - ख़ामोशी


सुबह  के तारे के हाथ 

भेजा था तुम्हे सन्देश 

नदी की लहरों पर 

अंकित करी थीं 

अपनी व्यथाएँ 

शाम ढलते ढलते 

तुम बहुत याद आए 

 

सांझ का  तारा भी डूब गया 

नहीं आया तुम्हारा कोई जवाब 

एक मुसलसल ख़ामोशी 

क्या ख़ामोशी में भी 

होती है मुहब्बत 

या तुम 

सिर्फ़ इसलिए ख़ामोश हो 

कि मिटटी का  बदन बोलता है 

तुम्हारी ख़ामोशी के 

सब राज़ खोलता है,  

तुम्हारी ख़ामोशी 

जब पसर जाती है मेरी रूह में 

तो मेरी रूह का सन्नाटा 

टूटने लगता है 

धीरे धीरे .....

जिस तरह कटता है लोहे से लोहा 

जिस तरह निकलता है काँटे से काँटा 

जिस तरह कटती है नज़र  से नज़र 

जिस तरह कटता है ज़हर से ज़हर 

कुछ वैसे ही तुम्हारी ख़ामोशी ने 

मेरी रूह की बर्फ को पिघला दिया 

अब देखना है ,  

ये  कब तक नदी बनती है। 



कवि - इन्दुकांत आंगिरस 

Friday, September 15, 2023

प्रेम - प्रसंग/ 2 - प्रेम -प्रसंग

 कविता - प्रेम -प्रसंग 


जीवन के   कितने प्रेम - प्रसंग 

सुनाऊँ तुम्हें 

इस दिल के कितने दाग़ 

दिखाऊँ तुम्हें 

जिस जिस से भी प्रेम किया 

बीच मँझधार   मुझे छोड़ गया

प्रेम का साहिल मिला ही नहीं कभी 

यूँ कहो तो अच्छा ही हुआ 

प्रेम का साहिल गर मिल जाता 

दोबारा नहीं प्रेम कर पाता

दोबारा ....?

हाँ , दोबारा , एक बार नहीं हज़ार बार 

करना है मुझे प्रेम ज़िंदगी की हर शय से ,

करते हैं जो सिर्फ़ 

किसी एक से ज़िंदगी भर  प्यार 

बहुत ...बहुत ...बहुत उबाऊँ होते हैं मेरे यार।



कवि - इन्दुकांत आंगिरस 

  


Saturday, September 9, 2023

प्रेम - प्रसंग/ 2 - मुहब्बत के झरने

 कविता - मुहब्बत के झरने




अभी अभी तुम्हें सोचा 


और 


सोचते ही तुम्हें 


घुलने लगा मुहब्बत का रंग  


फ़िज़ाओं  में ,


झिलमिलाने लगे तारे 


गुनगुनाने लगी नदी ,


झूमते फूलों ने 


खोल दिए कलियों के घूंघट, 


ओस की बूँदों में भीगते रहे 


तमाम रात  


चाँदनी की चादर पर बिखरे

 

रात रानी और चमेली के फूल


उन फूलों पर कुनमुनाता 


तुम्हारा तांबई रूप 


किसी शाइर की नज़्म में 


निखर  गया जब 


रोक नहीं पाई तुम अपनी हँसी, ,


तुम्हारी खनखनाती हँसी से 


जाग उठे सदियों से सोये पत्थर 


और उन पत्थरों से फूट पड़े 


मुहब्बत के झरने 


जिनके  पानी में नहाने को 


देखो प्रिय !


कितना आकुल है 


हमारा प्रेम। 






कवि - इन्दुकांत आंगिरस

Wednesday, September 6, 2023

प्रेम - प्रसंग/ 2 - लफ़्ज़े मुहब्बत

 

 लफ़्ज़े मुहब्बत 



एक एक लम्हा गुज़रता गया 

एक एक पहर गुज़रता गया 

देखते देखते माह - साल गुज़र गए 

न कोई ख़त तुम्हें लिखा 

न तुम्हें फ़ोन ही किया 

न तुम्हारी आवाज़ सुनी 

न बढ़ कर तुम्हें पुकारा 

न तुम्हारा ख़त आया 

न तुमने फ़ोन किया 

न तुम ने मुझे पुकारा  

लेकिन  मेरी रूह पर

तुम्हारा जादू तारी रहा 

वो अधखुली आँखों  का जादू 

वो घनेरी ज़ुल्फ़ों का जादू 

वो चाँद से मुखड़े का जादू 

वो सांझ के तारे का जादू 

वो  गुदाज बाँहों  का जादू 

वो  सर्द आहों का जादू 

वो झुकी निगाहों का जादू 

हाँ , मेरी रूह पर 

तुम्हारा जादू तारी रहा 


मैं इधर सन्नाटे में लिपटता  हूँ तन्हाई से 

तुम उधर लिपटती हो मेरी यादों  से 

दूर रह कर भी बहुत पास हैं हम 

यक़ीन है मुझे 

तुम्हारा यक़ीन मुझसे मिलता जुलता होगा 

अगर तुम कहो ये मुहब्बत नहीं 

मुहब्बत का कुछ गुमां होगा 

एक लफ़्ज़े मुहब्बत 

हमारी रूह पर खुदा होगा। 




कवि - इन्दुकांत आंगिरस 

Thursday, August 31, 2023

प्रेम - प्रसंग/ 2 - वो शाम अब तक है याद मुझे


 वो शाम...


 वो शाम अब तक है याद मुझे 

वो लम्हें अब तक हैं याद मुझे 

गुज़ारे थे जो तुम्हारे  साथ ,

नहीं था तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ 

न ही तुम्हारी बाँहें थी मेरे गले में 

लेकिन प्रेम भरी साँसें  

घुल गयी थी फ़िज़ा में  

हर सम्त बिखरी थी तुम्हारी खुश्बू

उस खुशबू में डूब गया था 

हमारा चंद लम्हों का सफ़र

काश , हाँ काश 

कभी ख़त्म न होता ये सफ़र ,

मुझे यक़ीन नहीं होता 

शायद तुम्हें भी न हो 

हम बिछड़ कर भी बिछड़े नहीं 

और मेरी रूह अभी तक 

उस सफ़र में है,

क्या इस सफ़र में तुम  

अभी तक मेरे साथ हो ?  



कवि - इन्दुकांत आंगिरस 

   

गीत - सावन की रतियों में , मत जा रे बलम छोड़ के

 सावन की रतियों में , मत जा रे बलम छोड़ के 


तोरण से मैं द्वार सजाऊँ 

चन्दन बंदन हार बनाऊँ

बिरहन सी सूनी आँखों में

तारों के मैं दीप जलाऊँ


सावन की रतियों में , मत जा रे नयन मोड़ के 


तोड़ के सारे बंधन आ जा 

प्रेम को भी चन्दन कर जा 

सूने प्राणों में रंग भर कर 

मुझको फाल्गुन कर जा  


सावन की रतियों में , मत जा रे क़सम  तोड़ के 


बैरन रतिया मोह तड़पाए 

आहट पे हर दिल घबराए

साथ हमारा जन्मों का यूँ 

कान्हा के सँग राधा गाए 


सावन की रतियों में , मत जा रे भरम तोड़ के 



कवि - इन्दुकांत आंगिरस