Monday, April 20, 2026

Kavi Haazir Hai

 हम फ़क़ीरी में दिल लुटाने को 

ग़म की दौलत चले कमाने को 


संगबारी है    और हम   तन्हा 

क्या ख़बर  हो गयी ज़माने को 


झील ने आँख मूँद ली है अभी 

चाँद निकलेगा क्या नहाने को 


बुझते शोलों को तुम हवा न  दो 

राख काफी है दिल जलाने को 


बेसबब दिल में आ के वो बैठा 

उम्र गुज़री    जिसे भुलाने को 


फूल सूखे हुए ही चंद आँसू  

बस यही रह गए बिछाने को 


 रंग पर आ गयी ' रसिक ' महफ़िल 

हम जो  आये   ग़ज़ल सुनाने  को 

----------------------------------------------------------------------------------------


इस बज़ाहिर तीरगी से दोस्त घबराना नहीं 

इस के पीछे रौशनी है तुम ने पहचाना नहीं 

 

अजनबी   हूँ दो घडी   रहने दो अपने शहर में 

जानता हूँ इस तरफ़ फिर लौट कर आना नहीं 


तश्नगी होटों पे ले कर घूमता हूँ दर - ब - दर 

और मीलों तक नज़र में कोई मयख़ाना नहीं 


हर किसी के साथ हो लेता हूँ अपना जान कर 

और जो कह लो मुझे लेकिन मैं दीवाना नहीं 


ज़िंदगी के साये में पलता रहा फिर भी ' रसिक '

ज़िंदगी   भर ज़िंदगी  को मैंने पहचाना नहीं 

--------------------------------------------------------------------------------------------


इक किरन चलती है जैसे रौशनी के साथ साथ 

आप भी चल कर तो देखो ज़िंदगी के साथ साथ 


ठीक ही कहते थे सारे लोग मुझको नासमझ 

दोस्ती मैंने   निभाई दुश्मनी   के साथ साथ 


इश्क़ तो करने चले  हो ये भी  सुन लो ऐ मियाँ

 दर्द भी दिल को मिलेगा दिल लगी के साथ साथ 


क्या ख़बर क्या हादसा गुज़रा फ़लक पर दोस्तों 

रात भर जागे   सितारे   चाँदनी    के साथ साथ 


दिल हमारा है अजब   शय टूटने   के बावजूद 

रात दिन महवे सफ़र है बेदिली के साथ साथ 


यूँ तो दुश्मन आदमी है आदमी का ऐ ' रसिक  '

आदमी रहता है फिर भी आदमी के साथ साथ 

--------------------------------------------------------------------------------------------


डूबती इक सुबह का   मंज़र हूँ मैं

वक़्त का चलता हुआ चक्कर हूँ मैं 


कोई दरवाज़ा न कोई रौशनी 

तीरगी का एक सूना घर हूँ मैं 


दाग़ सीने में लिए फिरता रहा 

देखिये फूलों की एक चादर हूँ मैं 


दिल में रखी है किसी की मूर्ति

एक छोटा प्यार का मंदर हूँ मैं


आप भी चाहे तो ठोकर मार लें 

बारहा   तोडा गया   पत्थर हूँ मैं


लूटने का कब मुझे आया हुनर 

एक खस्ताहाल सौदागर  हूँ मैं 


हर कोई हैं मेरे साये में ' रसिक  '

हर तरफ फैला हुआ अम्बर हूँ मैं


---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

No comments:

Post a Comment