Monday, August 24, 2026

ओ कान्छी रे

 [5:18 PM, 8/24/2026] mitrasharma927: तुम थे तो घर भरा था । कहीं से लौटते वक्त यह बात थी कि तुम हो आंगन में, छत में, बगीचे में, बाहर सड़क में तुम मेरा इंतजार करते हुए मैं दूर से समझ जाती थी तुम्हारा खाली पन और तुम्हारा आध्यात्मिकता तरफ की रुझान.. 

कभी कभार मुझे बहुत चिढ़ होती थी कागज में कुछ लिख रहे हो मन में और कुछ। मुझे सिर्फ मेरे लिए किया गया छलावा लगता था। मैं अकेली थी बेहद अकेली।

"मैं हूं न" यह शब्द सुनने को तरस ती रही खैर...

मैं सोचती थी कि सब कुछ ठीक होगा लेकिन वो मेरा वहम ही था।

[5:20 PM, 8/24/2026] mitrasharma927: एक दिन मुझे सांस लेने में तकलीफ हो रही थी डर लग रहा था उठकर पानी पी। टहलने लगी आस थी कि तुम पूछोगे क्या हुआ

[5:22 PM, 8/24/2026] mitrasharma927: बहुत दिनों से नाक बंद हो रही थी रात में सांस लेने में दिक्कत हो रही थी। डॉक्टर के पास जाने से कतरा रही थी मेरे लिए पैसे भी नहीं थे दिखाने के लिए।



ओ  कान्छी रे !


गर्मियों के दिन थे और तपिश भरी राते थीं।  रात गहरा चुकी थी लेकिन कान्छी की  खुली आँखों से नींद कोसो दूर   थी। खुले आकाश में  उस सफ़ेद बिस्तर पर उसका  जिस्म रह रह कर करवट बदल रहा था। आज उसकी ज़िंदगी का हर रंग फीका पड़ चुका था।  उस सफ़ेद  बिस्तर पर सफ़ेद कपड़ो में लिपटा उसका चांदी जैसा बदन किसी कफ़न सा लग रहा था  । अब रंगों से उसका   नाता टूट चका था। ज़िंदगी का हर रंग उसके लिए बेमानी हो गया था।  नीले आसमान  में तारे चमक रहे थे और उन्हीं तारों में एक पुराना जगमगाता तारा  उससे गुफ़्तगू कर रहा था , " 

- " रो मत कान्छी , ये तो जीवन का दस्तूर है , आने वाले को तो जाना ही पड़ता है। और अब तो तू आज़ाद हो गयी है। " 

- " बापू , मैंने तुमसे कितना कहा था कि मेरी शादी अभी मत करो लेकिन तुमने मेरी एक नहीं सुनी और उम्र के 16 वे वसंत में ही तुमने मुझे ब्याह दिया था। बाँध दिया था एक खूटे के साथ , ३० बरस के फौजी खूटे के साथ। "

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