Friday, December 26, 2025

Tuesday, December 23, 2025

लघुकथा _घूंघट

 घूंघट 


ग्राम पंचायत द्वारा  आयोजित  " महिला सशक्तिकरण  " कार्यक्रम में ग्रामीण महिलाओं को मंत्री जी  द्वारा सम्मानित किया जा रहा था।  एक फुट का घूंघट डाले महिला को मोमेंटो देते हुए मंत्री जी ने न जाने किस अधिकार से महिला का घूंघट उठाते हुए कहा  , " अरे , इस घूँघट को हटाओ , इसका ज़माना चला गया अब। मर्दों की बराबरी करनी है , उनके कंधे से कन्धा मिला कर समाज में आगे बढ़ना है तो घूंघट हटाना ही होगा।  "

महिला सकुचाते हुए शरमा कर रह गयी क्योंकि समाज में आगे बढ़ने की बात तो वो समझ गयी थी लेकिन यह न समझ पाई कि उसका घूँघट किस्तों में क्यों हटा  और मंत्री जी के हाथ इतने खुरदरे क्यों थे ?


इन्दुकांत आंगिरस 

Threat to Me

 [11:01 AM, 12/24/2025] Sahib Hussain: Aap jaise ghatiya mansikata wale log ki wajah se hi Nafrat fail rahi hai.

[11:42 AM, 12/24/2025] angirasik: https://www.youtube.com/watch?v=1FfaMYS9nFE

[11:43 AM, 12/24/2025] angirasik: Mein to support kar raha hu

[11:47 AM, 12/24/2025] Sahib Hussain: Ha maine bhi dekha tha ye news.

Mera bhi khoon khula tha.

Mai bhi chahta hu usko fansi ki saja ho.

Lekin iske liye sari community ko taunt marna kaha tak jayaj hai.


Aise hi hazaro news dikha dunga jisme koi bap beti ko mar deta hai kisi ladke se bat karne k shaq me.

Ghunghat na karne ki wajah se bhi kitne murder hue hai.

Iska ye Matlab thodi hai na ki sari community ko taunt mara jaye

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Sunday, December 21, 2025

लघुकथा _ बुरका

बुरका 


औरत ने घबराई आवाज़ में दुकानदार से  कहा , " भाईजान , मेरे साइज के 2 बुरके दे  दीजिए। "

-  " अरे , आपाजान आप ! आपने बुरका पहनना कब से शुरू कर दिया ? आप तो पढ़ी - लिखी खुले विचारों वाली पत्रकार है , तो फिर आज ऐसा क्या हो गया कि अचानक बुरका याद आ गया ? " दुकानदार ने हैरानी  से पूछा।  

- " भाईजान , लगता है आपने आज का अख़बार नहीं पढ़ा , हमारे ही मोहल्ले में एक आदमी  ने अपनी बीवी का सिर्फ इसलिए क़त्ल   कर दिया कि वो बिना बुरका पहने अपने मायके चली गयी थी। वैसे मेरे शौहर तो पढ़े - लिखे खुले विचारों के है लेकिन कौन जाने कब किसका दिमाग़  सनक जाये ......बस मुझे आप जल्दी से बुरके दे दीजिए " औरत एक साँस में कह गयी।  

 औरत की आँखों में चमकता ख़ौफ़ देखकर दुकानदार ने  जल्दी से  2 बुरके उसको  दे दिए।  औरत ने वही दुकान पर बुरका ओढ़ा और बुदबुदाते हुए दुकान से निकल गयी , " जान है तो जहान है प्यारे , आख़िर  बुरका ओढ़ने में क्या जाता है। " 


- इन्दुकांत आंगिरस 






Environment Book

 Pavitra Mitra 


[6:31 PM, 12/21/2025] Pavitra Mitra: एकदम सही। पुस्तक का मूल्य मोटा-मोटी बता दें।

[6:33 PM, 12/21/2025] Pavitra Mitra: वैसे ई पुस्तक व प्रमाण पत्र सभी प्रतियोगियों को अवश्य प्रेषित कर दें।हमारे पटल पर डाल दीजिए।

[7:15 PM, 12/21/2025] angirasik: आपका पटल कौन सा है ? आप फॉरवर्ड कर दीजिये।  पुस्तक का दाम अभी बताना संभव नहीं है , हां इतना ज़रूर है कि ५००/ के अंदर ही होगा।  जी , इ - सर्टिफिकेट सभी को दिया जायेगा।

[7:15 PM, 12/21/2025] angirasik: Please send your poem/ stories etc

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Saturday, December 20, 2025

Ravindran

 क़लम 


पकड़ो  जी , क़लम पकड़ों !

बन्दूक नहीं , क़लम पकड़ों !

और देश का दरिद्दर मिटा दो !


लड़ो एक बूँद पानी के लिए 

लड़ो जीवन की रवानी के लिए 

लड़ना है जी लड़ना है 

बिन बन्दूक लड़ना है। 


जिसे धर्म बोला  जा रहा वो अधर्म है 

जिसे न्याय बोला जा रहा वो अन्याय है 

जिसे तुमसे छीन रहे वो तुम्हारा हक़ है 

लड़ो , अपने हक़ के लिए लड़ो। 


पकड़ो क़लम अपने देश के लिए 

पकड़ो क़लम अपने भविष्य के लिए 


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बिटिया  का वरदान 


मैं उस नाव से क्या पूँछू

शायद दरिया पार करा दे 

जीवन आज भी है उसके हाथ  

कब मिलेगा क़िस्मत का साथ 


जन्म लिया जब बिटिया ने 

चेहरा सबका मुरझाया था 

सबने मारे ताने माँ पर , वंश चलाने 

बेटा जो ना आया था 


दर्द सहना हमने बचपन से सीखा  है 

सलूक हमसे किया जानवर जैसा है 

घर के बाहर हर आँख शिकारी है 

हमारे बोझ से घर भी होता भारी है 


हे देव ! तेरे इस संसार में 

मुझे न मिली ख़ुशी कभी भी 

बस पीड़ा ही मिली हर घडी 

मेरा जीना और मरना भी 

चन्द लोगो के हाथों में 


जिन  लोगों के लिए मैंने 

सब कुछ कर दिया बलिदान 

उन्हीं लोगों ने मुझे लूट कर 

ख़ूब करा हैरान 


मैं बढ़ी थी सच की राह 

सोचा था सबका भला  करुँगी 

क्या सोचा था और क्या हुआ 

लोगों ने मेरी सीरत से ज़्यादा 

मेरे तन का नापतोल किया 


मेरी हर आवाज़ को दबाया जाता है 

 पसंदीदा कपड़ें पहनूँ  तो बेशर्म बताया जाता है 

लड़ती हूँ जब भी अपने हक़ के बारे में 

मेरी हर कोशिश को दबाया जाता है 


हे देव ! तेरी माया अपरम्पार  है 

लेकिन हुई तुझसे ग़लती इस बार है 

तेरे भेजे इंसान बन गए जानवर हैं


हे देव ! मैं कहाँ जाऊँ  इस धरती पर ?

जिस धरती पर तूने मुझे जन्म  दिया 

उस  धरती पर रात में निकलना पाप है 

कि वो ज़िंदगी की आख़िरी  रात होगी 

बलात्कारी मर्द फिर बच जायेगा 

और लोग बोलेंगे , " क्या कपडे पहनी थी वो ?

लड़की की ही ग़लती होगी ,

अब कौन शादी करेग उससे 

रात में कहाँ घूम रही थी वो ? "


मुझसे कोई न पूछेगा हाल मेरा 

कर दिया किसने बेहाल मुझको 

कितनी पीड़ा सहनी मुझको ?


हे देव ! तेरे इस लोक में गर सिर्फ मर्द जी सकते हैं 

तो हाथ जोड़ करती हूँ निवेदन इतना 

या तो लड़कियों को इस लोक से निकाल दे 

या नए जग का निर्माण कर , उन्हें सम्मान दे 

या  दुनिया के मर्दों को करदे नेस्तनाबूद 

गर नहीं तो मुझे अगले जन्म में 

लड़का बनने का वरदान दे। 

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Friday, December 19, 2025

लघुकथा _ हिजाब

 हिजाब


घर से  अस्पताल  के लिए निकलती नई नई   डॉ साहिबा को उनके अब्बू ने मशवरा दिया "बेटी  !  अस्पताल  में कई तरह के बीमार आते हैं , उन्हें तरह तरह का इन्फेक्शन होता है , मॉस्क लगाकर ही मरीजों को देखना। "
डॉ साहिबा ने तपाक से जवाब दिया , " अरे  अब्बू    , मुझे मॉस्क की क्या ज़रूरत है ;मेरे पास  तो हिजाब है और फिर नक़ाब भी तो है , यानी डबल सेफ्टी ... "।
अब्बू   ने चैन की साँस ली और डॉ साहिबा हिजाब , नक़ाब और  बुर्क़ा  पहन कर अस्पताल के लिए निकल पड़ी।

Monday, December 15, 2025

Friday, December 12, 2025

Indrani Ittar

 कथायों की भी अपनी कहानी है

यही तो सबको सुनानी है

थम जाएगा वक़्त जब आएगी हक़ीक़त  सामने

रुक जाएगी ये जवानी 

जब बनेगा  जीवन पानी


Image by Manfred Antranias Zimmer from Pixabay

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बेगुनाह होना कोई गुनाह तो नही

दर्द तो तब होता है जब सज़ा मिलती है

Image by Photostock Editor from Pixabay


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शायरी शायर की जान होती है

सच पूछो तो नादान होती है 

मोहब्बत की नज़रों से देखो तो 

ये गुल और गुलफाम होती है।

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मौजो में   मस्त  रवानी है

यूँ  ही नही  ज़िंदगानी  है

साथ रहेगा जब तक तेरा 

दिल धड़केगा तब तक मेरा 

तेरी रूह से रूह मिलानी है 

इश्क़ है तो ज़िंदगानी  है 

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एक मुद्दत तक मुझे प्यासा रखा

ज़िंदगी  ने तब मुझे दरिया दिया

भीड़ में रहकर भी बेनाम रही 

तुझसे मिलकर मुझे नाम मिला  


Image by Pexels from Pixabay

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हर रोज़  यह कितना सफर तय कर जाता है,

 कांटो में भी फूलों की तरह मुस्कुराता है  ।।

जब ज़िंदादिल वक़्त हमसफ़र बन जाता है 

हँसते हँसते सफर तब यूहीं गुज़र  जाता है


Image by Chris from Pixabay

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न जाने क्यों ये दिल मुस्कुराता है,न जाने कौन याद आता है

मत पूछो., मत पूछो मुझे इश्क़ में , क्या क्या याद आ आता है,

वो  गुज़रे वक़्त का कारवां भी   सफ़र में ठहर ठहर जाता है 

जब मद्धम सुरो में  यार कोई   दास्ताने  मुहब्बत सुनाता है 

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Tuesday, December 9, 2025

New Version

 

Tebenned hittem 

मुझे तुम में यक़ीन था 

मूल लेखक - करासनाहोरकई  लास्लो 
KRASZNAHORKAI LÁSZLÓ

अनुवादक - इन्दुकांत आंगिरस 



दरबान को दोपहर से पहले ही नए कर्मचारी के आने की सूचना मिल चुकी थी । काउंटी में तूफ़ान  आने से बहुत पहले ही नए कर्मचारी उस लड़के ने परिसर के खड़खड़ाते हुए दरवाज़े  को खोला । हिचकचाते हुए गला साफ किया और कंपकपाती आवाज़  में कहा- " शुभ संध्या । " दरबान ने तब भी उस लड़के की ओर नहीं देखा और झुंझलाये अंदाज़  में हाथ हिलाकर कर टालते हुए कहा- " हाँ, हाँ, मुझे पता है । "

लेकिन तभी , बाहर तूफ़ान  बेकाबू हो रहा था, जिसने पिछले कुछ दिनों की  ग्रीष्म  कालीन गर्म हवा को कुछ ही घंटों के भीतर लगभग जमाव बिंदु के करीब  शीतल  कर  अपनी  अपार शक्ति का प्रदर्शन कर दिया था , तूफ़ानी बादलों की वजनी  चादर लम्बे सफ़र  के बाद थके हुए झुंड की तरह, भारी और नीची होकर ग्रामीण इलाकों पर छा गई थी , जिन्हें  डूबते सूरज की अंतिम किरणों ने  धरती पर पसरने से रोक दिया था ,जिसके चलते रौशनी बेबस होकर शून्य में विलीन हो गयी थी । अन्धकार  की दोहरी परत  के बाद वातावरण में भयंकर , गर्जन-भरी आवाज़ों में लिपटा एक डरावना सन्नाटा पसर  गया था । इस सन्नाटे में, तारों रहित आकाश के नीचे, सड़क के दोनों ओर झाड़ियों से आ रही आवाज़ों के बीच दबकर, लड़का कीचड़ भरी कच्ची  सड़क पर बस्ती की ओर बोझिल क़दमों  से चल रहा थ।  इस अजनबी जगह में जल्दबाज़ी भरे, डगमगाते क़दमों  से वह ऐसे चल रहा था  जैसे अपनी टुकड़ी से अलग हुआ कोई सिपाही, बिना नक्शे या कम्पास के भटक गया हो।  अंततः एक ऐसे इलाके में रात गहरा गई थी जहाँ यक़ीनन उसके लिए यह जानना असंभव था कि वह  किन लोगों के बीच था । उसके सिर के ऊपर बिजली चमक रही थी और उस  घोर अँधेरे में हर पल वो  रोशनी की चमक ही उसे रास्ता दिखाती थी, क्योंकि वह कुछ भी नहीं देख पा रहा था, यहाँ तक कि अपने पैरों तले की ज़मीन  भी नहीं। अब पीछे मुड़ने का कोई सवाल ही नहीं था: जिस तीसरे दर्जे की मैकदाम  सड़क पर वह बस से उतरा और यार्ड  की ओर जाने वाले रास्ते पर मुड़ा, वह कम से कम आधे घंटे की पैदल दूरी पर थी, लेकिन जब उसे दो महीने की निष्फल खोज के बाद अंततः काम और रहने की जगह मिल गई थी, तो वह पीछे क्यों मुड़ता: उसे थी एक बिस्तर कि दरकार जहाँ वह अपनी रात की की ड्यूटी के बाद थोड़ा आराम कर सके। पूरी तरह पानी में भीगा हुआ वह  यार्ड में पहुँचा और दरबान  के पीछे बेचैनी से खड़ा हो गय।  उसे दिशा  निर्देश की प्रतीक्षा थी , लेकिन दरबान  उसकी ओर घ्यान न देकर  खिड़की से बाहर गरजती  हुई  बारिश को निरंतर घूर रहा था , जोकि किसी घाव से ख़ून  की तरह बरस रही थी, उबड़ - खाबड़ सड़क पर विशाल गड्ढे बना रही थी, और  अरबों बर्फीली बूँदों  से झकझोरी जा रही थी। 

"आपके सहकर्मी पहले से ही अंदर हैं," दरबान ने हाँफते हुए कहा। "वह आपको बताएँगे  कि आपको कहाँ जाना है।" 

नए लड़के  ने उत्साह से सिर हिलाया और गेट  से बाहर निकलने लगा, लेकिन दरवाज़े का हैंडल पकड़ने से पहले ही दूसरे आदमी ने उसकी ओर देखा और उसे रोक दिया। "तुम इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो?" उसने चिढ़कर कहा। "तुम्हें तो यह भी नहीं पता कि तुम कहाँ जा रहे हो!"

- "सच… वाकई…मुझे नहीं पता " वो  लड़का  अजीब ढंग  से बड़बड़ाया। 

- "तो बस, तुम वहाँ जाओ,"दरबान  ने कहा। उसने डेस्क के दराज में हाथ डाला और एक धब्बेदार नोटबुक निकाली, उसे सम्मानपूर्वक सही पन्ने पर खोला, फिर काग़ज़  को छूने से पहले अपनी बॉलपॉइंट पेन की नोक को अपनी उंगली परआज़माते हुए उससे पूछा 

- "आपका नाम" ? 

- "बोगदानोविच।" , नए लड़के ने जवाब दिया। 

उसके पैर जल रहे थे, उसे ठंड लग रही थी, उसके जूते भीग गए थे, लेकिन वह जानता था कि अगर उसे वो नौकरी करनी है तो उसे ख़ुद को ख़ुशमिजाज़ , निर्णायक और इच्छुक दिखाना होगा। 

" क्या .. ...? "  बोगदानोविच ।"  

दरबान ने उस नए लड़के को ऐसे देखा जैसे वह कोई दुर्लभ जानवर हो। पहले दो अक्षर लिखते हुए गुनगुनाया, दाँत  चटकाए और शरमा गया, फिर सिर एक ओर झुका लिया, और बिना आवाज़ किए अपने मुँह से अक्षरों को  आकार देने लगा। लड़का उसकी मेज़  के नज़दीक आया और दरबान   पे झुकते हुए  नोटबुक में झाँका ,जहाँ साफ-सुथरी, नीचे की ओर ढलती पंक्ति में लिखा था: बोगदा नोविच ,   दूसरे आदमी की खोजती निगाह देख दरबान अजीब तरह से खाँसने लगा और बोला  "ख़ैर,  क्या आप वो  इमारत देख पा  रहे हैं?"

लड़के ने  झुककर खिड़की से बाहर देखा । 

"जी ,देख पा रहा हूँ ।" लड़के ने जवाब दिया। 

"तुम्हे वहाँ जाना होगा वही तुम्हारा जोड़ीदार है । " दरबान ने लड़के से कहा। 

जेल की कोठरी जैसी दिखने वाली उस  कंक्रीट की कोठरी से  वह लड़का  बाहर निकला ओर अपनी जैकेट को सर तक  ओढ़ लिया। वह जैसे ही  दरवाज़ा बंद करने लगा , एक तेज़ हवा के झोके के चलते उसके हाथ से दरवाज़ा छूट गया और तड़ाक की आवाज़ के साथ दीवार से जा टकराया। 

-" क्षमा  कीजिए, लेकिन..." बोगदानोविच   समझाने ही वाला था  कि बूथ के सामने दरबान आ गया और उसने ज़ोर से उसका हाथ पकड़ लिया। । 

- "यहाँ से निकल जाओ तत्काल , मूर्ख !" दरबान चिल्लाया। "क्या तुम एक दरवाज़ा भी बंद नहीं कर सकते?!" 

- "क्षमा  कीजिए,"लड़के   ने कहा, "न जाने कैसे ये मेरे हाथ से फिसल गया।" 

तब उस  लड़के ने सड़क पार करी और उस इमारत में घुस गया , लैम्पोस्ट  से खंभे तक लड़खड़ाता हुआ चला। उसका जोड़ीदार एक घरघराते तेल वाले स्टोव के नज़दीक रखी लोहे की एक जर्जर कुर्सी पर बैठा हुआ  था। उसका मुँह खुला था ,  गहरी नींद में खड़खड़ाते   दरवाज़े से बेख़बर सर झुकाये बैठा था । बोगदानोविच  उसके सामने रुका और उसने धीरे से उस प्राणी के  कंधे को हिलाया। 

"शुभ संध्या," मद्धम आवाज़ में  उसका अभिवादन किया तो  वह आदमी घबराहट में ऊपर देखने लगा। "मैं  रात्रि का नया पहरेदार हूँ।"

सहकर्मी  एक पल के लिए उसे घूरता रहा, फिर अपना ऊपरी होंठ पीछे खींचकर दाँतहीन मसूड़े दिखाते हुए मुस्कुराया। "ओह, तो आप  है जनाब ? मुझे लगा कोई निरीक्षण हो रहा है।"

बस्तियाँ दिखाने वाली तस्वीरें  लकड़ी के पीले फ्रेमों में दीवार पर टंगी थीं, जिनमें से कुछ आगे की ओर सरक रही थीं, धुएँ जैसे रंग की गंदगी चमक रही थी, तेलिया फर्श पर यहाँ-वहाँ ब्रेड के टुकड़े और भोजन  के अवशेष बिखरे हुए थे, और छत पर दो नियॉन लाइटें एकरस गुनगुना रही थीं।

-  "तो तुम नए हो," बुजुर्ग  ने लगभग डरावने अंदाज़ में उठते हुए कहा।  उसका गंजा चाँद जैसा सिर ऊँचा और ऊँचा उठता गया और आखिरकार जब वह रुका तो लड़का अपने आप पीछे हट गया, हालाँकि वह लड़का  ख़ुद इतना  छोटा भी नहीं था। 

बुजुर्ग सहकर्मी  विशाल शरीर वाला एक भीमकाय प्राणी था। 

- "केरेकेश" भीमकाय प्राणी ने फावड़े जैसे अपने दाहिने हाथ को बढ़ाते हुए अपना परिचय दिया। 

- "बोगदानोविच," लड़के ने अपनी दबी हुई आवाज़ में कहा। वह उस चेहरे को, जो उसके ऊपर मंडरा रहा था, ध्यानपूर्वक और लगातार घूरता रहा, जैसे सोच रहा हो कि उसने इसे पहले कहाँ देखा था।

 - "मैं गिर गया था ,"भीमकाय प्राणी ने झिझकते हुए  समझाया, अपनी टूटी हुई  नाक की ओर इशारा किया , जहाँ ख़ून सूख चुका था।  "मुझे कुछ याद नहीं, मैंने बस अपनी आँखें खोलीं और ख़ुद को सिलाई मशीन के नीचे पड़ा हुआ देखा।"

उसका भारी शरीर फिर से कुर्सी में धँस गया, उसने मुँह के कोने में एक सिगरेट रखी और उसे जला लिया।

-  "क्या तुमने ज़ख़्म पर   मलहम लगाई ?" लड़के ने  भीमकाय प्राणी से पूछा। उसने   लापरवाही से हाथ हिलाते हुए कहा  , "मैंने एक बूँद  भी नहीं पी, कोई भी  नहीं कह सकता, तुम मुझ पर भरोसा कर सकते हो..."। 

 बोगदानोविच अभी भी उसके सामने खड़ा था, जैसे वह किसी अदालत या परीक्षा बोर्ड के सामने खड़ा हो, हाथ पीठ पर बाँधे, थोड़ा आगे झुका हुआ। 

- "मलहम  से आराम मिला  ना ?" लड़के ने यह सवाल  उस समय पूछा जब वह गहरे पहिये के निशान वाली गाड़ी की पगडंडी पर यार्ड  की ओर बढ़ रहे  भीमकाय प्राणी से बस दो क़दम  दूर थ। उसने  उसकी बात को अनसुना करते हुए उससे  कहा: "तुम्हें बस इतना  जानना है कि  किस तरफ कितने मीटर ! मैं तुम्हें सब कुछ बताऊँगा, बस सुनो, क्योंकि मैं दोबारा नहीं कहूँगा।"

मूसलाधार बारिश हो रही थी, और वे सड़क के दोनों ओर बने  अस्तबलों के पास से गुज़र रहे थे, जिनकी  दरारों से निकलती गर्म जानवरों की भाप से  एक धुंध की परत बन गयी थी। । शांत होने के बजाय तूफ़ान और भी उग्र हो गया था।  हवा दहाड़ रही थी और बारिश उनके चेहरों पर प्रहार कर रही थी। 

- "हम आमतौर पर रात में दो बार बाहर जाते हैं, फिर अस्तबल में जाते हैं, उन्हें नीचे उतारते हैं, और सुबह तक सोने देते हैं।  हम एक बार फिर से बाहर जाते हैं… लेकिन अगर उनकी ज़रूरत हो तो रात में तीन बार भी जाना पड़ता है।  समझे ?" लड़के  ने विनम्रता से सिर हिलाया। "वे यह उम्मीद नहीं कर सकते कि हम हर समय बाहर ही रहेंगे, है ना?, क्योंकि हमारे सोने का कोई तय वक़्त नहीं। "

बोगदानोविच  ने सिर हिलाया और उसकी परछाईं की तरह उसका पीछा किया। अंतिम खलिहान के दरवाज़े से एक गर्भवती गाय उन्हें घूर रही थी। केरेकेश ने लड़के की ओर मुड़कर कहा। "और सुनो ! अगर   वे ऐसे ही खुलकर भाग जाएँ, तो तुम्हें उन्हें बाँधना होगा।  समझे ?" 

- " जी , समझ गया।" लड़के ने जवाब दिया। 

वह सावधानी से उस आवारा जानवर के पास गया, उसकी गर्दन पर हाथ फेरा, फिर उसे धकेलते हुए  और गालियाँ देते हुए  एक खाली पत्थर के बाड़े में  बाकी जानवरों के साथ बाँध दिया। 

-"जब वे तैयार हो जाएँ, तो तुम्हें उन्हें पीटना होगा," उसने अपने पीछे खड़े लड़के से कहा।

- "उन्हें पीटना होगा ?" बोगदानोविच ने हैरानी से  पूछा।  

-" ज़रूर  , क्योंकि अगर तुम ऐसा नहीं करोगे, तो उन्हें कभी पता नहीं चलेगा कि हंगेरियन देवता कौन है। " 

वह लोहे की कुदाल लेने के लिए पीछे हटा।

- "हम इन्हें इसी तरह प्रशिक्षित करते हैं, ताकि ये  भाग न सकें। लेकिन यह बात तुम किसी को मत बताना। समझे ?" कह कर उसने  उसने वार किया।

 अपनी पूरी ताकत से उसके सिर पर वार किया, और अधिक से अधिक निर्दयता से,  बेचारा जानवर बचने की व्यर्थ कोशिश करता लेकिन रस्सा  उसे छूटने नहीं देता  । निरही  जानवर वहीं खड़ा रहा, हर वार से लड़खड़ाता हुआ, सिर पीछे मोड़े हुए और सहन करता हुआ, वार रुकने का इन्तिज़ार  करता रहा। भीमकाय प्राणी  के चेहरे पर न तो कोई उत्साह था, न ही नफ़रत या ग़ुस्सा : वह शांतचित्त होकर, एक-एक करके वार करता गया, और फिर से वार करने के लिए उठ खड़ा हुआ। बोगदानोविच काँपती हथेलियों से एक पानी की नली को ऐसे पकड़े रहा, जैसे उसे किसी सहारे की  ज़रूरत हो ।

 - "ओह," लड़का धीमे से बुदबुदाया , फिर डरते-डरते उसने विशालकाय प्राणी से पूछा, "यह मर तो नहीं जायेगा ? सहकर्मी ने  ने क्रोधित होकर उत्तर दिया, "ये मरेगा ?!" 

पश्चिमी हवाओं का आदी यह इलाका  इस उथल-पुथल से निपटने में कठिनाई महसूस कर रहा था। तूफ़ान  उनके सिरों से पचास मीटर ऊपर गरज रहा था, निर्दयी और बेरहम, बार-बार एक बुरी तरह टूटी हुई जवान घोड़ी की तरह उभरता हुआ।

बोगदानोविच ने भीगे गले के साथ  उत्साही  विजयी भीड़ की ओर देखा, उसकी निगाहें शरण की तलाश में थीं, भीतर एक शोकपूर्ण, मौलिक स्थिरता गूँज रही थी, मानो उसे डर हो कि वह अचानक उस पर उतर आएगी, सब कुछ धूल में पीस  देगी और उन्हें किसी लैम्पोस्ट के खम्बे  से टकरा देगी।एक जल्लाद की तरह, हवा बबूल और पीपल के पेड़ों की कांपती, नव-पल्लवित टहनियों के साथ नाच रही थी, जो उद्देश्यपूर्ण दृढ़ संकल्प के साथ उसकी ओर झुकी हुई थीं, उन्हें वश में किया जा रहा था, फिर भी साथ ही साथ एक गुप्त उत्साह के साथ, जैसे कोई किसी को मूर्खतापूर्ण काम करने के लिए धोखा दे ताकि वे बड़ा  नुक़्सान  न कर सकें । जब वे वापिस आरामगाह में लौटे , एक दोस्ताना गर्माहट ने उनका स्वागत किया : चूल्हा सुकून से गुनगुना रहा था और खिड़कियों के फ्रेम में काँच खड़खड़ा रहा था।

" उसने कहा , भोजन कर लें  ?"  केरेकेश अपनी सीट पर धड़ाम से बैठ गया, अपनी गोद में हल्के भूरे रंग का स्कूल बैग खींचा और उसकी ज़िप खोल दी। नया लड़का , ठंडा और थका हुआ, स्टोव के दूसरी ओर बैठकर ख़ुद  को गर्म करने लगा और उसने भी अपनी रोटी और चर्बी निकाल ली। अभी वह अपने दूसरा निवाला खा ही रहा था कि ग़लती से उसकी निगाह उस भीमकाय प्राणी की  ओर उठ गयी।  उसकी गोद में दो किलो का एक ब्रेड का लोफ़ पड़ा था, जिसे हाथ से आधा फाड़ दिया गया था, और बेकन का एक छोटा टुकड़ा।

-  "क्या हुआ,बालक ?" भीमकाय प्राणी ने  उस लड़के से पूछा जोकि उसे घूर रहा था। 

- "ओह, कुछ नहीं... मुझे लगता है मुझे थोड़ा जुकाम हो गया है..." लड़के ने  जवाब दिया। वे गुनगुनाती नियॉन लाइटों के नीचे चुपचाप खा रहे थे। - - " पहले क्या हुआ था तुम्हें ?" भीमकाय  के ख़ामोशी  तोड़ी।

 "कुछ नहीं , मैं  ...बस यूँ ही। ," बोगदानोविच  ने  झिझकते हुए कहा। 

- "उह-हह," केरेकेश बड़बड़ाते हुए बोला। "तो तुम्हें क्या लगता था कि मैं पहले क्या था?" 

नए लड़के  ने बेबसी से अपने साथी की टूटी हुई नाक को देखा। 

-"खैर... मुझे नहीं पता..." बूढ़े आदमी ने ताला फिर से अपनी जगह पर लगा दिया और बैग को अपने बगल में फ़र्श  पर रख दिया। 

- "शर्त लगाओ कि तुम इसे नहीं ढूंढ पाओगे," उसने शरारती नज़रों  से कहा। "मुझे भी ऐसा ही लगता है..."

-  "पुलिसवाला!" उसने बात काटते हुए कहा , " लगता हूँ न पोलिसवाला ? 

लड़के ने जोर-जोर से सिर हिलाया, बिना रुके चबाते हुए कहा  "बिल्कुल, क्यों नहीं?"

 केरेकेश ने अपनी पीठ दीवार से टिकाई, खिंचाव किया और जोर से हाँफ़  हुए बोला , "ठीक है, तो चलो थोड़ी देर के लिए सो लेते हैं। हमें सोना ही होगा, वरना हम दिन भर टिक नहीं पाएंगे।" कुछ ही पलों बाद वह गहरी नींद में था। मार्च का महीना था, वसंत विषुव से बस कुछ ही दिन बाद। 

बोगदानोविच  , उसे जगाने से बचते हुए, चुपचाप एक मेज़ पर बैठ गया और उसने  अपनी मेज़ पर एक किताब रख दी। जब उसे यक़ीन  हो गया कि उसका साथी गहरी नींद में है, तो वह सावधानी से झाँककर उसे ग़ौर से देखने लगा।  उसने केरेकेश के दो विशाल हाथ देखे, जो कीचड़ और गंदगी से चिपचिपे थे, वे दोनों मुट्ठियाँ उसकी गोद में रखी थीं, जो दो अज्ञात जंगली जानवरों के पंजों की याद दिला रही थीं, लंबी, मोटी, मांसल उंगलियाँ क्रूर कोमलता से एक-दूसरे में गुंथी हुई थीं, और अचानक उसके भीतर का तनाव पहले की ठंड की तरह कम हो गया, और उसकी जगह मिचली की भावना ने ले ली।

फिर धीरे-धीरे, जैसे जैसे धुंध छिटक रही  हो, उसे एहसास हुआ कि वह डर रहा था। मुझे इस आदमी से डरना ही चाहिए,  गो हक़ीक़त में वो उससे नहीं डर रहा था  क्योंकि वह वास्तव में डर महसूस नहीं कर रहा था। उसके भीतर  एक जबरदस्त आतंक घर कर रहा था  जो किसी ज़िद्दी , अविश्वसनीय, अकथनीय आत्मविश्वास से फूट रहा था और तब यह डर सिर्फ उससे नहीं, बल्कि दुनिया में मौजूद हर  शय  में फैल गया था । भीमकाय  प्राणी अचानक फूँक मारकर हँसा, उसने  अपनी बाईं आँख थोड़ी सी खोली और  घबराहट में चारों ओर देखा, फिर अपनी निगाह बोगदानोविच पर टिका दी, जो मेज़ पर रखी किताब पर  झुका हुआ था, उसकी आँखें अक्षर "z" पर अडिग टिकी हुई थीं। 

- "क्या बात है, क्या तुम सो नहीं पा रहे?"  लड़के ने भीमकाय प्राणी से पूछा।   

"कैसे न कैसे, नींद मुझसे दूर भाग जाती है।"भीमकाय  प्राणी ने खोजी नज़रों  से उसे देखा। 

"तो तुम क्या पढ़ रहे हो?" भीमकाय प्राणी ने लड़के से पूछा। 

लड़के ने कवर पीछे मोड़ा और इशारा किया। 

-"एक उपन्यास।" 


- "मैं ऐसी चीज़ को हाथ भी नहीं लगाऊँगा," भीमकाय प्राणी ने  कहा। लड़के ने  अपनी कुर्सी पर पीछे झुकते हुए  कहा  " जी " । 

- "उसका क्या फायदा?" उसके साथी ने तीखेपन से कहा। "यह एक अच्छी आ ...नहीं ?" 

"समझ गया।" लड़के ने जवाब दे कर पन्ना समेटा और फिर से पहले वाक्य से पढ़ना शुरू किया। 

जब वे दूसरी बार अस्तबल की ओर गए, तो सुबह के दो बज चुके थे। बारिश थम गई थी और हवा भी शांत हो गई थी।

 " तुम इस तरफ से जाओ और मैं दूसरी तरफ से आता  हूँ। भीमकाय प्राणी ने लड़के से  कहा, "अब तुम्हें पता है कि तुम्हें क्या करना है, पता है ना?"

 वह कुछ मिनटों तक अस्तबल के दरवाज़े  पर खड़ा रहा, गोबर और गायों की गंध को सूंघता रहा, फिर जानवरों की सफाई करने के लिए अंदर गया।एक एक करके अस्तबलों का काम करने के बाद उसका पसीना टपकने लगा था  लेकिन अंदर, झाड़ीदार सिर वाली सुस्त गायों के बीच उसे इतना सकूं मिला कि वह अपनी थकान  और अधूरी  नींद को भूल गया। उसने  ख़ूबसूरती से सो रहे हरेक जानवर को लंबे समय तक निहारा।  उनसे निकलने वाली कोमलता और शांति की रोशनी में अब उसे कुछ भी मुश्किल नहीं लग रहा था । वह शायद आखिरी अस्तबल के बीच में चल रहा था, जब अचानक दूर से एक मानव आवाज़ उसके कानों तक पहुँची। उसे जानने से ज़्यादा महसूस हुआ कि वह अजीब, कर्कश, ग़ुस्से   भरी चिल्लाहट दूसरी ओर से आ रही थी। कुछ तो गड़बड़ है, उसके दिमाग़  में कौंधा, और वह बाहर भागा। 

जैसे ही वह अस्तबलों की दो कतारों के बीच वाले  रास्ते पर पहुंचा, उसने  लगभग पचास मीटर कि दूरी पर   बिजली की रोशनी की किरणों में केरेकेश को देखा, जो बेचैनी से अपनी बाँहें  हिलाते हुए  किसी पर चिल्ला रहा था। लड़के ने एक गहरी साँस ली और उनके बीच की दूरी पार कर चिल्लाने की कोशिश की,

-"क्या उनमें से कोई एक भाग गया है?" लेकिन उसकी कमजोर, दबी हुई आवाज़ हवा में उड़ गई, ठीक वैसे ही जैसे उसके साथी की बातें, इसलिए उसे केवल कुछ अस्पष्ट अंश ही सुनाई दिए: "… काल  … इसे ले जाओ! ... काल  ... इसे ले जाओ!"

बोगदानोविच  उसकी ओर दौड़ पड़ा, उस भीमकाय प्राणी   की ओर जो अँधेरे में एक अजीब छाया जैसा दिख रहा था, लेकिन उसके पैर जवाब दे गए और वह हिल ही  नहीं सका।

 "क्या हुआ?" उसने फिर से पूछा। केरेकेश ने शायद कुछ सुन लिया था, क्योंकि वह अचानक मुड़ा और उस पर स्पष्ट आवाज़ में चिल्लाकर बोला: 

" लाइट  ! अरे , ये लोग क्या समझते हैं , क्या कर रहे हैं?! इसे तुरंत बुझा दो!" फिर वह घूम गया और, एक कठपुतली की तरह, अपनी बाँहें लहराते हुए चिल्लाता रहा : " इसे  तुरंत बंद करो! तुरंत लाइट बंद करो! तुरंत लाइट बंद करो! "

लड़के का ख़ून  ठंडा पड़ गया: किस तरह की लाइट? भगवान के लिए, यह किस तरह की लाइट है? उसने अपनी आँखों पर ज़ोर डाला, लेकिन कुछ भी नहीं देख पाया । वहाँ कुछ भी नहीं था! बस  कुछ भी नहीं!  भीमकाय  प्राणी बस अपनी बाँहें  लहराकर ग़ुस्से से गरजा था : "इसे तुरंत बुझा दो! तुरंत!" और उसने घोर अँधेरी रात की ओर इशारा किया। सब कुछ सुनसान, खतरनाक रूप से शांत, अँधेरा और गहरा गया  था। जब वे अपनी बाँहों में सामान दबाए हुए भारी क़दमों  से दरबान  के केबिन की ओर  बढ़ रहे थे, तो लड़का अपने साथी के बगल में चलने की हिम्मत नहीं कर पाया, बल्कि वह ठोकरें खाते, जोर-जोर से हांफते उस भीमकाय  के पाँच क़दम  पीछे-पीछे चल रहा था। 

-"तो क्या काम  खत्म हो गया, क्या यह खत्म हो गया?" दरबान  ने प्रसन्नता से पूछा जब उन्होंने अपने पीछे केबिन का दरवाज़ा बंद किया। वे सभी  मेज़ के चारों ओर बैठ गए। 

-"हाँ  खत्म हो गया, क्योंकि यह खत्म हो गया!" केरेकेश ने रूखे स्वर में कहा।अंदर दम घुटने वाली गर्मी थी, बत्तियाँ बुझी हुई थीं, और रोशनी केवल बाहर लगे लैम्पपोस्टो से आ रही थी। खिड़की के नीचे एक जर्जर, पुराना रेडियो धीमी आवाज़ में बज रहा था। 

- "अब मुझे वह नोटबुक दे दो!" भीमकाय प्राणी  ने ग़ुस्से में दरबान से कहा, फिर लड़के की ओर मुड़कर बोला, "लिखो ! किसका इन्तिज़ार कर रहे हो?" 

बोगदानोविच ने ख़ुशी - ख़ुशी  नोटबुक अपनी ओर खींची और उसके हाथ में थमाए गए बॉलपॉइंट पेन के लिए   विनम्रता से धन्यवाद देते हुए  पूछा "और मुझे क्या लिखना चाहिए?" दरबान उसके पीछे खड़ा था।

-  "वहाँ क्या है," भीमकाय प्राणी ने  पीछे मुड़कर अपनी उंगली से प्रवेशद्वारों की ओर इशारा करते हुए समझाया। "वही बात लिखो ," केरेकेश फिर बड़बड़ाया। 

और बोगदानोवितसेह  ने वही लिखा जो उसने पिछले पन्नों पर देखा था: रात में यार्ड में कुछ भी नहीं हुआ। 

- "इस पर दस्तखत करो," दरबान  ने कहा। बोगदानोविच  ने सिर हिलाया, फिर नोटबुक अपने साथी की ओर सरका दी। 

केरेकेश  चिढ़कर बोला "मेरा भी लिख दो , तुम्हारा हाथ तो नहीं टूटेगा!"

- "ख़ुशी से  ," बोगदानोविच   ने कहा।

-"तो तुम लिखना कब सीखोगे, मिहाय?" दरबान ने मुस्कुराते हुए केरेकेश  से पूछा। 

केरेकेश  ने थके-हारे अंदाज़ में हाथ हिलाया। "किसलिए सीखना है ? अब तक तो सब ठीक ही चल रहा है, अब झंझट क्यों?" उसने जवाब दिया।

 वे अँधेरी कंक्रीट की कोठरी में बैठे थे, उनके चेहरे बाहर के लामपोस्टो से आती रोशनी से मुड़े हुए थे, और वे धीरे-धीरे थमते हुए बारिश की आवाज़ सुन रहे थे।

-  "तुम यहाँ के नहीं हो, है ना?" दरबान  ने चुप्पी तोड़ी।

-  "नहीं," बोगदानोविच   ने जवाब दिया।

 "मैं तुरंत समझ गया था," दूसरे ने सिर हिलाकर कहा। "तो तुम सर्बियाई हो, या ?" 

-"नहीं…"मैं हंगेरियन हूँ।" बोगदानोविच  ने हकलाते हुए कहा। 

दरबान  झेंपते हुए  खिड़की से बाहर झांकते हुए बड़बड़ाया ,"बस इसका  नाम ही इतना अजीब है,"।

 लड़के का  चेहरा फिर से पहले की तरह फीका पड़ गया, और अचानक केरेकेश  के चेहरे पर भी कुछ बदल गया। दोनों चेहरे पत्थर की तरह जमकर डूब गए। और सिर्फ वे दोनों ही नहीं, बल्कि बस्ती भी  डूबती हुई सी लगी ।

 - "अब थम  रहा है," पत्थर-सा चेहरा लिए दरबान  नेकहा। 

- "हाँ ,अब थम रहा है।"पत्थर बने भीमकाय ने कहा। । 

और वो लड़का , पैतर  बोगदानोविच  , भोर होने को आए आकाश के नीचे अपने आवास की ओर जल्दी-जल्दी जाते हुए, व्यर्थ ही अपने सहकर्मी  के चेहरे की बनावट से ख़ुद  को मुक्त करने की कोशिश कर रहा था।  उसकी निगाहें व्यर्थ ही किसी चीज़ से चिपकने की कोशिश कर रही थीं, व्यर्थ ही वह अपना सिर मोड़ने की कोशिश करता रहा, उस भीमकाय प्राणी  का चेहरा सब कुछ भर रहा था, हर पेड़, हर झाड़ी, हर चट्टान से, यह चेहरा उसकी आँखों में जल रहा था, यह चेहरा पूरी दुनिया में व्याप्त था, धरती पर असहनीय गर्मी की तरह — आरंभ से ही।


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Sunday, December 7, 2025

लघुकथा - पंख होते तो उड़ आती रे.....

 पंख होते तो उड़ आती रे.....


इंडिगो एयरलाइनस की सैकड़ों फ्लाइट्स कैंसिल होने पर हज़ारों यात्रियों को मर्मान्तक पीड़ा से गुज़ारना पड़ रहा हैं ।  देश के लगभग सभी हवाईअड्डे  ISBT या रेलवे स्टेशन मैं तब्दील हो चुके हैं।  जब एक नव विवाहित जोड़े को ऑनलाइन रिसेप्शन में   शामिल होना पड़ा तो  हसरत जयपुरी का लिखा नग़मा " पंख होते तो उड़ आती रे , रसिया ओ बालमा ; तुझे दिल के दाग़ दिखलाती रे " ज़ेहन में ताज़ा हो गया। हवाई अड्डे पर अफरा तफरी के माहौल ओर शोर शराबे के बीच भी गीत की  अंतिम पंक्ति ने होंठो पर तबस्सुम की  एक लकीर तो खींच ही दी।
" तू तो अपना वादा भी भूला , इंडिगो , ओ ज़ालिमा !  "
हवाई अड्डों पर फंसे हुए यात्री अपने दिल के दाग़ पूरे संसार को दिखा रहें  हैं  लेकिन  इंडिगो ने अपनी आँखे मूँद  रखी हैं। पब्लिक समझ नहीं पा रही है कि इंडिगो बिल्ली है कि कबूतर ?

Thursday, December 4, 2025

मुझे तुम में यक़ीन था

Tebenned hittem 

मुझे तुम में यक़ीन था 

मूल लेखक - करासनाहोरकई  लास्लो 
KRASZNAHORKAI LÁSZLÓ

अनुवादक - इन्दुकांत आंगिरस 



दरबान   को दोपहर से पहले ही  नए आगंतुक के आगमन की सूचना मिल चुकी थी,  काउंटी में तूफ़ान के आने से बहुत पहले ही ,  जब लड़का परिसर  के खड़खड़ाते लोहे के दरवाज़े से अंदर आया और उसने अपना गला साफ़ कर के हिचकिचाते हुए बूथ का दरवाज़ा पकड़ा, तब भी न तो दरबान  हिला और न ही उसने अपना सर घुमाया , लड़के की कंपकपाती आवाज़ ( कि  , "शुभ संध्या... मैं नया..."), सुन कर भी उसने उसकी ओर नहीं देखा। उसने बस झुंझलाये अंदाज़  में हाथ हिलाकर उसे टाल दिया और कहा, "मुझे पता है।"

लेकिन तभी , बाहर तूफ़ान  बेकाबू हो रहा था, जिसने पिछले कुछ दिनों की  ग्रीष्म  कालीन गर्म हवा को कुछ ही घंटों के भीतर लगभग जमाव बिंदु के करीब  शीतल  कर  अपनी  अपार शक्ति का प्रदर्शन कर दिया था , तूफ़ानी बादलों की वजनी  चादर, जोकि लम्बे सफ़र  के बाद थके हुए झुंड की तरह, भारी और नीची होकर ग्रामीण इलाकों पर छा गई थी , जिन्हें  डूबते सूरज की अंतिम किरणों ने  धरती पर पसरने से रोक दिया था ,जिसके चलते रौशनी बेबस होकर शून्य में विलीन हो गयी। ।अन्धकार  की दोहरी परत  के बाद वातावरण में एक डरावना सन्नाटा पसर  गया, जोकि भयंकर , गर्जन-भरी आवाज़ों में लिपटा हुआ था । इस सन्नाटे में, तारों रहित आकाश के नीचे, सड़क के दोनों ओर झाड़ियों से आ रही आवाज़ों के बीच दबकर, लड़का कीचड़ भरी मिट्टी की सड़क पर बस्ती की ओर बोझिल क़दमों  से चल रहा था, इस अजनबी जगह में जल्दबाज़ी भरे, डगमगाते क़दमों  से, जैसे अपनी टुकड़ी से अलग हुआ कोई सिपाही, बिना नक्शे या कम्पास के, एक ऐसे इलाके में रात गहरा गई थी जहाँ यह निश्चित रूप से जानना असंभव था कि वह  किन लोगों के बीच था । उसके सिर के ऊपर बिजली चमक रही थी और उस  घोर अँधेरे में हर पल वो  रोशनी की चमक ही उसे रास्ता दिखाती थी, क्योंकि वह कुछ भी नहीं देख पा रहा था, यहाँ तक कि अपने पैरों तले की ज़मीन  भी नहीं। अब पीछे मुड़ने का कोई सवाल ही नहीं था: जिस तीसरे दर्जे की मैकदाम  सड़क पर वह बस से उतरा और यार्ड  की ओर जाने वाले रास्ते पर मुड़ा, वह कम से कम आधे घंटे की पैदल दूरी पर थी, लेकिन जब उसे दो महीने की निष्फल खोज के बाद अंततः काम और रहने की जगह मिल गई थी, तो वह पीछे क्यों मुड़ता: एक बिस्तर जहाँ वह अपनी रात की की ड्यूटी के बाद थोड़ा आराम कर सके। पूरी तरह पानी में भीगा हुआ वह  यार्ड में पहुँचा और दरबान  के पीछे बेचैनी से खड़ा हो गया, किसी तरह के निर्देश की प्रतीक्षा में, लेकिन दरबान  ने उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया। खिड़की से बाहर गरजती  हुई  बारिश को घूरते हुए, जो किसी घाव से ख़ून  की तरह बरस रही थी, उबड़ - खाबड़ सड़क पर विशाल गड्ढे बना रही थी, और  अरबों बर्फीली बूँदों  से झकझोरी जा रही थी। 

"आपके सहकर्मी पहले से ही अंदर हैं," दरबान ने हाँफते हुए कहा। "वह आपको बताएगा कि कहाँ जाना है।" नए आगंतुक ने उत्साह से सिर हिलाया और निकलने लगा, लेकिन दरवाज़े का हैंडल पकड़ने से पहले ही दूसरे आदमी ने उसकी ओर देखा और उसे रोक दिया। "तुम इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो?" उसने चिढ़कर कहा। "तुम्हें तो यह भी नहीं पता कि तुम कहाँ जा रहे हो!" "सच… वाकई…" आगंतुक लड़का  अजीब ढंग  से बड़बड़ाया। "तो बस, तुम वहाँ जाओ,"दरबान  ने कहा। उसने डेस्क के दराज में हाथ डाला और एक धब्बेदार नोटबुक निकाली, उसे सम्मानपूर्वक सही पन्ने पर खोला, फिर काग़ज़  को छूने से पहले अपनी बॉलपॉइंट पेन की नोक को अपनी उंगली पर आज़माया । "आपका नाम" ? "बोगदानोविच।" उसके पैर जल रहे थे, उसे ठंड लग रही थी, उसके जूते भीग गए थे, लेकिन वह जानता था कि अगर वह कल बाहर फेंके नहीं जाना चाहता तो उसे ख़ुशमिजाज़ , निर्णायक और इच्छुक दिखना होगा। " क्या ..? "  "बोगदानोवितसेह ।"  दरबान ने आगंतुक लड़के को ऐसे देखा जैसे वह कोई दुर्लभ जानवर हो। पहले दो अक्षर लिखते हुए गुनगुनाया, दाँत  चटकाए और शरमा गया, फिर सिर एक ओर झुका लिया, और बिना आवाज़ किए अपने मुँह से अक्षर आकार देने लगा। आगंतुक लड़कामेज़ के पास आया और दरबान  के पे झुकते हुए  नोटबुक में झाँका (जहाँ साफ-सुथरी, नीचे की ओर ढलती पंक्ति में लिखा था: बोगदा नोविच ),   दूसरे आदमी की खोजती निगाह देख अजीब तरह से खाँसने लगा और बोला  "ख़ैर,  क्या आप वह इमारत देख पा  रहे हैं?"

आगंतुक लड़का झुककर खिड़की से बाहर देखने लगा। "हाँ, ज़रूर।" "तुम्हे वहाँ जाना होगा वही तुम्हारा जोड़ीदार है । "  जेल की कोठरी जैसी दिखने वाली उस  कंक्रीट की कोठरी से  वह बाहर निकला, अपनी जैकेट को सर तक  ओढ़ा , और जैसे ही  दरवाज़ा बंद करने लगा , एक तेज़ हवा के झोके के चलते उसके हाथ से दरवाज़ा छूट गया और तड़ाक की आवाज़ के साथ दीवार से जा टकराया। 

"माफ़ कीजिए, लेकिन..." बोगदानोवितसेह  समझाने ही वाला था , कि बूथ के सामने दरबान आ गया और उसने ज़ोर से उसका हाथ पकड़ लिया। । "यहाँ से निकल जाओ, तुम बेवकूफ़!" दरबान चिल्लाया। "क्या तुम एक दरवाज़ा भी बंद नहीं कर सकते?!" "माफ़ कीजिए,"आगंतुक  ने कहा, "न जाने कैसे ये मेरे हाथ से फिसल गया।" 
आगंतुक लड़के ने सड़क पार करि और उस इमारत में घुस गया फिर दीपक के खंभे से खंभे तक लड़खड़ाता हुआ चला। उसका जोड़ीदार एक घरघराते तेल वाले स्टोव के नज़दीक रखी लोहे की एक जर्जर कुर्सी पर बैठा हुआ  था ,मुँह खुला हुआ, सिर झुका हुआ, गहरी नींद में, खड़खड़ाती दरवाज़े से बेख़बर। बोगदानोवितसेह  उसके सामने रुका और धीरे से उसके कंधे को हिलाया। "शुभ संध्या," मद्धम आवाज़ में  उसका अभिवादन किया तो  वह आदमी घबराहट में ऊपर देखने लगा। "मैं  रात्रि का नया पहरेदार हूँ।" उसका साथी एक पल के लिए उसे घूरता रहा, फिर अपना ऊपरी होंठ पीछे खींचकर दाँतहीन मसूड़े दिखाते हुए मुस्कुराया। "ओह, तो आप  हो? मुझे लगा कोई निरीक्षण हो रहा है।"
 बस्तियाँ दिखाने वाली तस्वीरें  लकड़ी के पीले फ्रेमों में दीवार पर टंगी थीं, जिनमें से कुछ आगे की ओर सरक रही थीं, धुएँ जैसे रंग की गंदगी चमक रही थी, तेलिया फर्श पर यहाँ-वहाँ ब्रेड के टुकड़े और भोजन  के अवशेष बिखरे हुए थे, और छत पर दो नियॉन लाइटें एकरस गुनगुना रही थीं।  "तो तुम नए हो," बूढ़े ने कहा, उठते हुए, लगभग डरावने ढंग से, क्योंकि उसका गंजा चाँद जैसा सिर ऊँचा और ऊँचा उठता गया, और जब वह आखिरकार कहीं ऊपर ठहरा, तो लड़का अपने आप पीछे हट गया, हालाँकि वह ख़ुद इतना  छोटा भी नहीं था। "केरेकेश" उसके साथी ने फावड़े जैसे अपने दाहिने हाथ को बढ़ाते हुए अपना परिचय दिया। "बोगदानोविच," लड़के ने अपनी दबी हुई आवाज़ में कहा। वह उस चेहरे को, जो उसके ऊपर मंडरा रहा था, ध्यानपूर्वक और लगातार घूरता रहा, जैसे सोच रहा हो कि उसने इसे पहले कहाँ देखा था। "मैं गिर गया था ," उसने झिझकते हुए  समझाया, अपनी टूटी हुई  नाक की ओर इशारा करते हुए, जहाँ ख़ून अब सूख चुका था।  "मुझे कुछ याद नहीं, मैंने बस अपनी आँखें खोलीं और ख़ुद को सिलाई मशीन के नीचे पड़ा हुआ देखा।" उसका भारी शरीर फिर से कुर्सी में धँस गया, उसने मुँह के कोने में एक सिगरेट रखी और उसे जला लिया। "क्या तुमने अभी तक मलहम  लगाया है?" आगंतुक लड़के ने पूछा। भीमकाय  ने उपेक्षापूर्वक हाथ हिलाया। "मैंने एकबूँद  भी नहीं पी, कोई  नहीं कह सकता, तुम मुझ पर भरोसा कर सकते हो..." बोगदानोविच अभी भी उसके सामने खड़ा था, जैसे वह किसी अदालत या परीक्षा बोर्ड के सामने खड़ा हो, हाथ पीठ पर बाँधे, थोड़ा आगे झुका हुआ। "मलहम  तुम्हारे लिए फायदेमंद होगा, है ना?"उस ने पूछा जब वह गहरे पहिये के निशान वाली गाड़ी की पगडंडी पर यार्ड  की ओर बढ़ रहे भीमकाय से दो क़दम  दूर था, लेकिन भीमकाय ने उसकी अनदेखी की और कहा: "तुम्हें यह जानना है कि कि किस तरफ कितने मीटर ! मैं तुम्हें सब कुछ बताऊँगा, बस सुनो, क्योंकि मैं दोबारा नहीं कहूँगा।"

मूसलाधार बारिश हो रही थी, और वे सड़क के दोनों ओर बने  अस्तबलों के पास से गुज़र रहे थे, जिनकी  दरारों से निकलती गर्म जानवरों की भाप से  एक धुंध की परत बन गयी थी। । शांत होने के बजाय तूफ़ान और भी उग्र हो गया, हवा दहाड़ रही थी और बारिश उनके चेहरों पर प्रहार कर रही थी।  "हम आमतौर पर रात में दो बार बाहर जाते हैं, फिर अस्तबल में जाते हैं, उन्हें नीचे उतारते हैं, और सुबह तक सोने देते हैं। फिर हम फिर से बाहर जाते हैं… लेकिन अगर उनकी ज़रूरत हो तो रात में तीन बार भी जाना पड़ता है।  समझे ?" नए आदमी ने विनम्रता से सिर हिलाया। "वे यह उम्मीद नहीं कर सकते कि हम हर समय बाहर ही रहेंगे, है ना?"

 "अच्छा, बेशक।" "क्योंकि तब हम सोते हैं, है ना?" बोगदानोवितसेह  ने सिर हिलाया और उसकी परछाईं की तरह उसका पीछा किया। अंतिम खलिहान के दरवाज़े से एक गर्भवती गाय उन्हें घूर रही थी। केरेकेशने लड़के की ओर मुड़कर कहा। "अच्छा, अगर वे ऐसे ही खुलकर भाग जाएँ, तो तुम्हें उन्हें बाँधना होगा।  समझे ?" " समझ गया।"

 वह सावधानी से उस आवारा जानवर के पास गया, उसकी गर्दन पर हाथ फेरा, फिर धक्का-मुक्की और गालियाँ देते हुए उसे एक खाली पत्थर के बाड़े में धकेलकर बाकी जानवरों के साथ बाँध दिया। "जब वे तैयार हो जाएँ, तो तुम्हें उन्हें पीटना होगा," उसने अपने पीछे खड़े लड़के से कहा। "उन्हें पीटना होगा ?" बोगदानोविच ने पूछा।  

" ज़रूर  , क्योंकि अगर तुम ऐसा नहीं करोगे, तो उन्हें कभी पता नहीं चलेगा कि हंगेरियन देवता कौन है। वह लोहे की कुदाल लेने के लिए पीछे हटा। "इसी तरह हम उन्हें प्रशिक्षित करते हैं, ताकि वे भाग न सकें। लेकिन तुम किसी को मत बताना। समझे ?" और उसने वार किया। उसने अपनी पूरी ताकत से उसके सिर पर वार किया, और अधिक से अधिक निर्दयता से, और बेचारा जानवर बचने की व्यर्थ कोशिश करता रहा, लेकिन रस्सा  उसे जाने नहीं देता  था  । फिर वह वहीं खड़ा रहा, हर वार से लड़खड़ाता हुआ, सिर पीछे मोड़े हुए और सहन करता हुआ, वार रुकने का इंतज़ार करता रहा। गोलियाथ के चेहरे पर न तो कोई उत्साह था, न ही नफ़रत या गुस्सा: वह शांतचित्त होकर, एक-एक करके वार करता गया, और फिर से वार करने के लिए उठ खड़ा हुआ। बोगदानोविच काँपती हथेलियों से एक पानी की नली को ऐसे पकड़े रहा, जैसे सहारे के लिए। "ओह," वह फुसफुसाया, फिर डरते-डरते उस विशालकाय प्राणी से बोला, "यह मर तो नहीं जायेगा ?उसके साथी ने क्रोधित होकर उत्तर दिया, "यह?!" पश्चिमी हवाओं का आदी यह इलाका  इस उथल-पुथल से निपटने में कठिनाई महसूस कर रहा था।। तूफ़ान  उनके सिरों से पचास मीटर ऊपर गरज रहा था, निर्दयी और बेरहम, बार-बार एक बुरी तरह टूटी हुई जवान घोड़ी की तरह उभरता हुआ।

 बोगदानोवितसेह  ने गले में गांठ लिए जयजयकार करते विजयी भीड़ की ओर देखा, उसकी निगाहें शरण की तलाश में थीं, भीतर एक शोकपूर्ण, मौलिक स्थिरता गूँज रही थी, मानो उसे डर हो कि वह अचानक उस पर उतर आएगी, सब कुछ धूल में पीस  देगी और उन्हें किसी दीपक के खंभे से टकरा देगी।एक जल्लाद की तरह, हवा बबूल और पीपल के पेड़ों की कांपती, नव-पल्लवित टहनियों के साथ नाच रही थी, जो उद्देश्यपूर्ण दृढ़ संकल्प के साथ उसकी ओर झुकी हुई थीं, उन्हें वश में किया जा रहा था, फिर भी साथ ही साथ एक गुप्त उत्साह के साथ, जैसे कोई किसी को मूर्खतापूर्ण काम करने के लिए धोखा दे ताकि वे बड़ा  नुक़्सान  न कर सकें । जब वे वापिस आरामगाह में लौटे , एक दोस्ताना गर्माहट ने उनका स्वागत किया : चूल्हा सुकून से गुनगुना रहा था और खिड़कियों के फ्रेम में काँच खड़खड़ा रहा था। 

"" " उसने कहा , क्या हम डिनर कर लें ?"  केरेकेश अपनी सीट पर धड़ाम से बैठ गया, अपनी गोद में हल्के भूरे रंग का स्कूल बैग खींचा और उसकी ज़िप खोल दी। नया आदमी, ठंडा और थका हुआ, स्टोव के दूसरी ओर बैठकर ख़ुद  को गर्म करने लगा और अपनी रोटी और चर्बी निकाल ली। अभी वह अपने दूसरा निवाला खा ही रहा था कि ग़लती से उसकी निगाह उस भीमकाय प्राणी की  ओर उठ गयी।  उसकी गोद में दो किलो का एक ब्रेड का लोफ़ पड़ा था, जिसे हाथ से आधा फाड़ दिया गया था, और बेकन का एक छोटा टुकड़ा। "क्या हुआ,बालक ?" उसने उस लड़के से पूछा जो उसे घूर रहा था। "ओह, कुछ नहीं... मुझे लगता है मुझे थोड़ा जुकाम हो गया है..." उसने जवाब दिया। वे गुनगुनाती नियॉन लाइटों के नीचे चुपचाप खा रहे थे। "तो पहले क्या हुआ था?" भीमकाय  के ख़ामोशी  तोड़ी। "कुछ नहीं , मैं  ...बस यूँ ही। ," बोगदानोवितसेह  ने कहा।

"उह-हह," केरेकेश बड़बड़ाते हुए बोला। "तो तुम्हें क्या लगता था कि मैं पहले क्या था?" नए आदमी ने बेबसी से अपने साथी की टूटी हुई नाक को देखा। "खैर... मुझे नहीं पता..." बूढ़े आदमी ने ताला फिर से अपनी जगह पर लगा दिया और बैग को अपने बगल में फ़र्श  पर रख दिया। "शर्त लगाओ कि तुम इसे नहीं ढूंढ पाओगे," उसने शरारती नज़रों  से कहा। "मुझे भी ऐसा ही लगता है..." "पुलिसवाला!" उसने अचानक बोल दिया। "तो क्या तुम ऐसा नहीं कहोगे?" लड़के ने जोर-जोर से सिर हिलाया, बिना रुके चबाते हुए। "बिल्कुल, क्यों नहीं?" केरेकेश ने अपनी पीठ दीवार से टिकाई, खिंचाव किया और जोर से हाँफ़  उठा। "ठीक है, तो चलो थोड़ी देर के लिए सो लेते हैं। हमें सोना ही होगा, वरना हम दिन भर टिक नहीं पाएंगे।" कुछ ही पलों बाद वह गहरी नींद में था। मार्च का महीना था, वसंत विषुव से बस कुछ ही दिन बाद। 

बोगदानोवितसेह , उसे जगाने से बचते हुए, चुपचाप एक मेज़ पर बैठ गया और उसने  अपनी मेज़ पर एक किताब रख दी। जब उसे यक़ीन  हो गया कि उसका साथी गहरी नींद में है, तो वह सावधानी से झाँककर उसे ग़ौर से देखने लगा।  उसने केरेकेश के दो विशाल हाथ देखे, जो कीचड़ और गंदगी से चिपचिपे थे, वे दोनों मुट्ठियाँ उसकी गोद में रखी थीं, जो दो अज्ञात जंगली जानवरों के पंजों की याद दिला रही थीं, लंबी, मोटी, मांसल उंगलियाँ क्रूर कोमलता से एक-दूसरे में गुंथी हुई थीं, और अचानक उसके भीतर का तनाव पहले की ठंड की तरह कम हो गया, और उसकी जगह मिचली की भावना ने ले ली।फिर धीरे-धीरे, जैसे धुंध से उभर रहा हो, जैसे दूर से खुल रहा हो, उसे एहसास हुआ कि वह डर रहा था। मुझे इस आदमी से डरना ही चाहिए, भले ही मैं वास्तव में उससे नहीं डरता। क्योंकि वह वास्तव में डर महसूस नहीं कर रहा था, बल्कि एक जबरदस्त आतंक जो किसी ज़िद्दी , अविश्वसनीय, अकथनीय आत्मविश्वास से फूट रहा था। और यह डर सिर्फ उससे नहीं, बल्कि उस हर किसी से जोकि इस  उस दुनिया में मौजूद है। भीमकाय  अचानक फूँक मारकर हँसा, अपनी बाईं आँख थोड़ी सी खोलकर घबराहट में चारों ओर देखा, फिर अपनी निगाह बोगदानोविच पर टिका दी, जो मेज़ पर रखी किताब पर अकड़कर झुका हुआ था, उसकी आँखें अक्षर "z" पर अडिग टिकी हुई थीं। "क्या बात है, क्या तुम सो नहीं पा रहे?" "कैसे न कैसे, नींद मुझसे दूर भाग जाती है।"भीमकाय  प्राणी ने खोजी नज़रों  से उसे देखा। 

"तो तुम क्या पढ़ रहे हो?" लड़के ने कवर पीछे मोड़ा और इशारा किया। 

-"एक उपन्यास।" 

"मैं ऐसी चीज़ को हाथ भी नहीं लगाऊँगा," भीमकायने कहा। नवांतुक  अपनी कुर्सी पर पीछे झुक गया। "हाँ," उसने कहा। "उसका क्या फायदा?" उसके साथी ने तीखेपन से कहा। "यह एक अच्छी आ ...नहीं ?" "समझ गया।" उसने पन्ना समेटा और फिर से पहले वाक्य से पढ़ना शुरू किया। जब वे दूसरी बार अस्तबल की ओर गए, तो सुबह के दो बज चुके थे। बारिश थम गई थी और हवा भी शांत हो गई थी। "तो तुम एक तरफ से जाओ और मैं दूसरी तरफ से जाता हूँ। भीमकाय ने कहा, "अब तुम्हें पता है कि तुम्हें क्या करना है, है ना?" वह कुछ मिनटों तक अस्तबल के दरवाज़े  पर खड़ा रहा, गोबर और गायों की गंध को सूंघता रहा, फिर जानवरों की सफाई करने के लिए अंदर गया। जब उसने एक अस्तबल का काम पूरा किया, तो पानी उससे टपक रहा था। लेकिन अंदर, झाड़ीदार सिर वाली सुस्त गायों के बीच, उस पर इतनी शांति छा गई कि वह अपनी थकान और कष्टदायक नींद को भूल गया। उसने प्रत्येक खूबसूरती से सो रहे जानवर को लंबे समय तक देखा, और उनसे निकलने वाली कोमलता और शांति की रोशनी में, जो कुछ भी अभी उसकी प्रतीक्षा कर रहा था, वह अब उसको  उतना मुश्किल नहीं लगा। वह शायद आखिरी अस्तबल के बीच में चल रहा था, जब अचानक दूर से एक मानव आवाज़ उसके कानों तक पहुँची। उसे जानने से ज़्यादा महसूस हुआ कि वह अजीब, कर्कश, ग़ुस्से   भरी चिल्लाहट दूसरी ओर से आ रही थी। कुछ तो गड़बड़ है, उसके दिमाग़  में कौंधा, और वह बाहर भागा। जैसे ही वह अस्तबलों की दो कतारों के बीच वाले ठेले के रास्ते पर पहुंचा, उसने तुरंत ही लगभग पचास मीटर दूर, दो अस्तबलों के बीच, बिजली की रोशनी की किरणों में, केरेकेश को देखा, जो बेचैनी से अपनी बाँहें  हिलाते हुए  किसी पर चिल्ला रहा था। लड़के ने एक गहरी साँस ली और उनके बीच की दूरी पार कर चिल्लाने की कोशिश की।"क्या उनमें से कोई एक भाग गया है?" लेकिन उसकी कमजोर, दबी हुई आवाज़ हवा में उड़ गई, ठीक वैसे ही जैसे उसके साथी की बातें, इसलिए उसे केवल कुछ अस्पष्ट अंश ही सुनाई दिए: "… काल  … इसे ले जाओ! ... काल  ... इसे ले जाओ!"बोगदानोवितसेह उसकी ओर दौड़ पड़ा, उस विभीमकाय  की ओर जो अँधेरे में एक अजीब छाया जैसा दिख रहा था, लेकिन उसके पैर जवाब दे गए और वह हिल नहीं सका। "क्या हुआ?" उसने फिर से पूछा। केरेकेश ने शायद कुछ सुन लिया था, क्योंकि वह अचानक मुड़ा और उस पर साफ-साफ और चिड़चिड़ाकर चिल्लाया: "बत्ती! हा, ये लोग क्या समझते हैं कि क्या कर रहे हैं?! इसे तुरंत बुझा दो!" फिर वह घूम गया और, एक कठपुतली की तरह, अपनी बाहें लहराता और चिल्लाता रहा: "उसे तुरंत बंद करो! तुरंत लाइट बंद करो! तुरंत लाइट बंद करो!" लड़के का ख़ून  ठंडा पड़ गया: किस तरह की लाइट? भगवान के लिए, यह किस तरह की लाइट है? उसने अपनी आँखों पर ज़ोर डाला, लेकिन कुछ भी नहीं देखा। वहाँ कुछ भी नहीं था! बस  कुछ भी नहीं! और वह विशालकाय प्राणी बस अपनी बाँहें  लहराकर गुस्से से गरजा: "इसे तुरंत बुझा दो! तुरंत!" और उसने घोर अँधेरी रात की ओर इशारा किया। सब कुछ सुनसान, खतरनाक रूप से शांत, अँधेरा और परित्यक्त था। जब वे अपनी बाँहों में सामान दबाए हुए भारी कदमों से द्वारगृह की ओर बढ़ रहे थे, तो नवागंतुक अब अपने साथी के बगल में चलने की हिम्मत नहीं कर पाया, बल्कि वह ठोकरें खाते, जोर-जोर से हांफते उस भीमकाय  के पाँच क़दम  पीछे-पीछे चल रहा था। "तो क्या यह खत्म हो गया, क्या यह खत्म हो गया?" द्वारपाल ने प्रसन्नता से पूछा जब उन्होंने अपने पीछे दरवाज़ा बंद किया और मेज़ के चारों ओर बैठ गए। "यह खत्म हो गया, क्योंकि यह खत्म हो गया!" केरेकेश ने रूखे स्वर में कहा।अंदर दम घुटने वाली गर्मी थी, बत्तियाँ बुझी हुई थीं, और रोशनी केवल बाहर खंभों पर लगे दीयों से आ रही थी। खिड़की के नीचे एक जर्जर, पुराना रेडियो धीमी आवाज़ में बज रहा था। "अब मुझे वह नोटबुक दे दो!" विशालकाय व्यक्ति ने गुस्से में दरबान से कहा, फिर लड़के की ओर मुड़कर बोला, "लिखो, किसका इंतज़ार कर रहे हो?" बोगदानोविच ने ख़ुशी - ख़ुशी  नोटबुक अपनी ओर खींची और उसके हाथ में थमाए गए बॉलपॉइंट पेन के लिए   विनम्रता से धन्यवाद किया। "और मुझे क्या लिखना चाहिए?" दरबान उसके पीछे खड़ा था। "वहाँ क्या है," उसने पीछे मुड़कर अपनी उंगली से प्रवेशद्वारों की ओर इशारा करते हुए समझाया। "वही बात," केरेकेश ने बड़बड़ाया। और बोगदानोवितसेह  ने वही लिखा जो उसने पिछले पन्नों पर देखा था: रात में शिविर में कुछ भी नहीं हुआ। "इस पर दस्तखत करो," दरबान  ने कहा। बोगदानोवितसेह ने सिर हिलाया, फिर नोटबुक अपने साथी की ओर सरका दी। केरेकेश  चिढ़कर मुड़ गया। "मेरा भी लिख लो, तुम्हारा हाथ तो नहीं टूटेगा!" "खुशी से," बोगदानोवितसेह  ने कहा। दरबान  मुस्कुराया। "तो तुम लिखना कब सीखोगे, मिहाय?" केरेकेश  ने थके-हारे अंदाज़ में हाथ हिलाया। "किसलिए? अब तक तो सब ठीक ही चल रहा है, अब झंझट क्यों?" उसने जवाब दिया। वे अँधेरी कंक्रीट की कोठरी में बैठे थे, उनके चेहरे बाहर के दीयों से आती रोशनी से मुड़े हुए थे, और वे धीरे-धीरे थमते हुए बारिश की आवाज़ सुन रहे थे। "तुम यहाँ के नहीं हो, है ना?"दरबान  ने चुप्पी तोड़ी। "नहीं," बोगदानोवितसेह  ने जवाब दिया। "मैं तुरंत समझ गया था," दूसरे ने सिर हिलाकर कहा। "तो तुम सर्बियाई हो, या क्या?" "नहीं…" बोगदानोवितसेह  ने हकलाते हुए कहा। "मैं हंगेरियन हूँ।"दरबान  असंतुष्ट होकर खिड़की से बाहर ताकता रहा। "बस इसका  नाम ही इतना अजीब है," उसने बड़बड़ाया। उसका चेहरा फिर से पहले की तरह फीका पड़ गया, और अचानक केरेकेश  के चेहरे पर भी कुछ बदल गया। दोनों चेहरे पत्थर की तरह जमकर डूब गए। और सिर्फ वे दोनों ही नहीं, बल्कि डूबती हुई सी लगी । "शांत हो रहा है," पत्थर-सा चेहरा लिए दरबान  नेकहा। "हाँ ,शांत हो रहा है।"पत्थर बने भीमकाय ने कहा। । और नया आदमी, पैतर  बोगदानोवितसेह , भोर होने को आए आकाश के नीचे अपने आवास की ओर जल्दी-जल्दी जाते हुए, व्यर्थ ही अपने साथी के चेहरे की बनावट से ख़ुद  को मुक्त करने की कोशिश कर रहा था, उसकी निगाहें व्यर्थ ही किसी चीज़ से चिपकने की कोशिश कर रही थीं, व्यर्थ ही वह अपना सिर मोड़ने की कोशिश करता रहा, उस भीमकाय  का चेहरा सब कुछ भर रहा था, हर पेड़, हर झाड़ी, हर चट्टान से, यह चेहरा उसकी आँखों में जल रहा था, यह चेहरा पूरी दुनिया में व्याप्त था, धरती पर असहनीय गर्मी की तरह — आरंभ से ही।