खोया हुआ पर्स
क़िस्सा बहुत पुराना है लेकिन मेरे ज़ेहन में आज भी ताज़ा। शादी को चार साल हो चुके थे और दो बच्चों का बाप बन चुका था लेकिन फितरत में अभी भी आवारगी थी। नयी नयी जवानी के जोश में लगी - बंधी दूतावास की नौकरी को लात मारकर घर बैठ गया। जब पत्नी को पता चला कि मेरी नौकरी छूट गयी है तो एक पल को उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा गया। वह जहाँ खड़ी थी वही ढेर हो गयी। शायद बेहोश हो गयी थी। मैंने ताज़ा पानी के कुछ छींटे उसके चाँद से मुँह पर मारे , कुछ उसके गाल थपथपाये , प्रेम से उसका नाम लेकर पुकारा तो उसने आँखें खोली।
इससे पहले कि मैं कुछ कह पाता वो बिजली की तरह चमकी और बदरी की तरह दमकी। बेहोशी टूटते ही वो ज़ोर से चीखी , ' हरामजादे , तुझे ज़रा भी अक्ल नहीं । दो बच्चियों का बाप बन गया पर हरकते बच्चों जैसी है। नौकरी नहीं रही तो ये क्वार्टर भी छूटेगा , तब इन बच्चों को लेकर क्या हम सड़क पर सोएँगे ?अभी जाओ , अँगरेज़ साहिब के पास , उनसे मुआफी मांगो , अपने छोटे बच्चों की दुहाई दो और ज़रूरत लगे तो उनके पैर पकड़ो और उन्हें यक़ीन दिलाओ कि आगे से ऐसी ग़लती नहीं होगी। "
पत्नी की ऊँची और सख़्त आवाज़ सुनकर मैं सकते में आ गया और मुझे होनी ग़लती का एहसास हुआ। कितनी मुश्किल से मुझे अँगरेज़ लोगो के दूतावास में काम करने का अवसर मिला था लेकिन मैंने उसकी कद्र ना जानी।
अगर डॉ सरिता ने उसकी सिफारिश न करी होती तो मुझे ये नौकरी कभी ना मिलती ,