जागती आँखों से देखी थी किसी ख़्वाब की धुन
दिल की धक् धक् पे छिड़ी इश्क़ के मिज़राब की धुन
नाव तो नाव वहां जान के लाले पड़ गए
शौक़ उठ्ठा था चलो सुनते हैँ गिरदाब की धुन
रात के वक़्त मेरे साथ तुम्हारी यादें
और दरीचे से चमकती हुई महताब की धुन
हाय वो फूल से चेहरे कि लरज़ उठता है दिल
कुछ दरिंदो ने जहाँ लिख दी है तेज़ाब की धुन
आज के दौर मे खूशबु से भरा ये लहजा
जैसे पतझड़ मे महकती गुले शादाब की धुन
रोज़े अव्वल से नहीं मिलते किसी से भी ख़याल
मुख्तलिफ रहती है मुझ से मेरे अहबाब की धुन
रक़्स करती हैँ मेरे साथ पुरानी यादें
रोज़ सुनती हूं मैं तेरे दिले बेताब की धुन
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ज़हन ओ दिल पर एक उदासी छाई है, तन्हाई है
बीनाई हर मंज़र से उकताई है, तन्हाई है
जाने क्या था जिसकी ख़ातिर मैंने सब मंज़ूर किया
वरना, इश्क़ में ज़िल्लत है, रुसवाई है, तन्हाई है
बाद तुम्हारे ऊब गया है दिल, दुनिया की रौनक से
मेरे ख़ालीपन की जो भरपाई है तन्हाई है
दीवारों से लिपटी बेलें कब से देख रही हूँ मैं
शाम ढले जब याद तुम्हारी आई है, तन्हाई है
खुली किताबें भीगा तकिया सिमटी चादर बिखरी मैं
और वीरानी मुझ पर हँसने आई है, तन्हाई है
अपने मुँह मोड़ गए हैं रिश्ते सारे तोड़ गए हैं
रुख़सत का पैगाम क़ज़ा जब लाई है, तन्हाई है
यूँ तो मेरी वहशत से ये दुनिया भी घबराती है
पर मेरी वहशत जिससे घबराई है, तन्हाई है
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दर्द का इख़्तिताम चाहता है
हिज्र भी अब विराम चाहता है
ख़ाली बैठे हैं इश्क़ ही कर लें
दिल भी कुछ कामधाम चाहता है
ये नए दौर का है इश्क़ मियां
ये बहुत ताम झाम चाहता है
हाल तेरा भी हो मेरे जैसा
दिल यही इंतिक़ाम चाहता है
जुरअतें देखिए दिवाने की
इश्क़ में एहतराम चाहता है
उसका भी आज फोन आ ही गया
किस्से सारे तमाम चाहता है
ऐश ओ इशरत में मुब्तिला है दिल
नित नया इक ग़ुलाम चाहता है
जानता है हुनर तिजारत का
सो वफ़ाओं का दाम चाहता है
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ज़हनी बीमारियों ने काट दिया
फूल को आरियों ने काट दिया
जाने कितनी ज़रूरतों का गला
मेरी खुद्दारियों ने काट दिया
आज फिर उसकी याद का सब वक़्त
घर की अलमारियों ने काट दिया
ज़िन्दगी नाम का हसीन दरख़्त
घर की दुशवारियों ने काट दिया
वो मेरे इश्क़ का सुहाना भरम
उसकी मक्कारियों ने काट दिया
पक्की कॉलोनीयों से कच्चा घर
मिलके पटवारियों ने काट दिया
इक हकीकत भरी कहानी को
कुछ अदाकारियों ने काट दिया
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