मुक्ति की छाया - 13
बात उन दिनों की है जब लोग शहरों में हमेशा के लिए रहने नहीं आते
थे। उनका मकसद सिर्फ पैसा कमा कर वापस अपने गांव लौट जाने का हुआ करता था ।कुछ ऐसा
ही लगाव था चंद्र सिंह को अपने पहाड़ों से ।दिल्ली में रहते हुए भी उनकी पत्नी बसंती
के साथ सदैव पहाड़ों की चर्चा करना यह साबित करता था, की पहाड़ी लोगों का अपनी मिट्टी
से जुड़ाव कभी खत्म नहीं होता । उन दिनों उन दोनों पति-पत्नी का शहर की चकाचौंध और पैसे कमाने के बाद, सुकून की तलाश में
वापस पहाड़ों की गोद में लौटने का निर्णय एक बहुत बड़ा बदलाव था । उन्होंने उनकी शुरुआती
दिनों में दिल्ली की भीड़ भाड़ में अपनी पहचान बनाई और मेहनत से आर्थिक मजबूती हासिल
की ।शहर में रहते हुए भी उनके सपनों में वही ठंडी हवा, देवदार के पेड़ और पहाड़ी रास्ते
आते थे । घर की पिछली दीवार पर टंगी पहाड़ी तस्वीर उन्हें हमेशा उनकी जड़ों की याद
दिलाती थी। कुमाऊं की वादियों में लौटने के बाद, अब उनकी सुबह दिल्ली शहर के शोर के
बदले, चिड़ियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से होने लगी। चंद्र सिंह और बसंती देवी को लगता था कि उन्होंने
स्वर्ग पा लिया है। पुरखों की धरती की मिट्टी की खुशबू उन्हें हर दुख भुला देती थी
।
लेकिन वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता है। शहर में कमाया हुआ पैसा पानी
की तरह बहने लगा ।पहाड़ों में सुविधाएं जुटाने और पुराने घर की मरम्मत में काफ़ी खर्च
हो गया । जब बैंक बैलेंस कम होने लगा तो डर ने दस्तक दी। चंद्र सिंह जो अब तक सुकून
में थे , अब चिंतित रहने लगे। पैसा खत्म होने
का डर इंसान को चिड़चिड़ा बना देता है। छोटी-छोटी
बातें अब बड़े-बड़े झगड़ों का रूप लेने लगी । बसंती देवी , जो पहाड़ों में ही अपना
जीवन बिताना चाहती थी उन्हें चंद्रसिंह का यह बदला हुआ रूप दुख देने लगा । दोनों के
बीच का संवाद , अब तनाव और शिकायतों में बदल गया । जिन पहाड़ों ने सुकून दिया था आज
वही पहाड़ों काटने को दौड़ते थे ।खाली जेब ने घर की शांति को झगड़े की आग में झोंक
दिया । वादियों में सुकून तो था मगर रोटी की चिंता ने सुकून का अस्तित्व ही मिटा दिया
था। वह घर जो कभी सुकून की तलाश में बनाया
गया था अब एक कुरुक्षेत्र बन चुका था। दिल्ली की कमाई खत्म होने के साथ-साथ दोनों का
एक दूसरे के प्रति सम्मान भी खत्म हो चुका था। बसंती देवी के लिए कालितजोरी, सिर्फ
पैसे की कमी नहीं थी, बल्कि सुरक्षा का हट जाना भी था। बात-बात पर ताने देना अब पुरानी
बात हो गई थी। जो हाथ कभी रसोई में पहाड़ी स्वाद बिखेरते थे, अब वो गुस्से और दरिद्रता
की वजह से हिंसा पर उतारू हो गए थे। अब बसंती देवी का गुस्सा इतना प्रचंड हो चुका था
कि वो चंद्रसिंह पर शारीरिक प्रहार करने लगी थी। चंद्रसिंह, जो कभी दिल्ली में इज्जतदार
नौकरी करते थे, अब अपने ही घर में अपमानित और बेबस महसूस कर रहे थे। उनका अस्तित्व
धीरे-धीरे अदृश्य हो रहा था। उस दिन सुबह की शुरुआत चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं बल्कि
पुराने कलेश से हुई। सूरज की पहली किरण के साथ रसोई से बर्तनों की गिरने और चिल्लाने
की आवाजें आने लगीं। चंद्रसिंह ने शायद सिर्फ इतना कहा था कि चाय में चीनी कम डालो,
खर्च बचाना है। और बसंती देवी का सब्र टूट गया। पहाड़ों की ठंडी हवा अब उन्हें सुकून
नहीं देती थी, बल्कि उनके जख्मों पर नमक छिड़कती थी। खाली पेट ने बसंती के भीतर की
ममता को एक शेरनी की हिंसा में बदल दिया था। चंद्रसिंह ने कभी सपने में भी नहीं सोचा
था कि जिस जीवन संगिनी के साथ वो बुढ़ापे का सुकून ढूंढने आए थे, वही उनके शरीर और
आत्मा पर चोट करेगी। चंद्रसिंह ने झगड़े के बाद अपनी गायों के लिए एक डंडा पकड़ा और
जंगल की ओर निकल गए। चंद्रसिंह का यह फैसला कि वो गायों के साथ जंगल की ओर निकले उनके
भीतर के टूटे हुए स्वाभिमान और गुस्से का प्रतीक था। बसंती देवी का पीछे से चिल्लाना
'घर वापस मत आना, निकल जाओ' चंद्रसेन के दिल पर किसी खंजर की तरह लगा। वो रिश्ता जो सालों पुराना था, आज एक पल में रेत
की तरह बिखर रहा था। रास्ते में जाते समय गांव के लोगों ने टोका, 'सुबह सुबह घर से
कुछ खाकर जाओ' ,तो उन्होंने जवाब दिया, 'मुझे मत टोको'। ये उनकी उस मानसिक स्थिति को
दर्शाता था कि जब इंसान किसी से कोई रिश्ता या हमदर्दी नहीं चाहता ।
चंद्रसिंह अपनी गाय के झुंड को लेकर ऊंचे पहाड़ की तरफ बढ़ने लगा।
उनके हाथ में लकड़ी का डंडा सिर्फ उनका सहारा नहीं था, बल्कि उनके गुस्से का भी सहारा
था। जैसे-जैसे वो ऊपर चढ़ते जा रहे थे, नीचे गांव का शोर कम होता गया। सिर्फ गायों
के गलों में बंधी घंटियों की टुन-टुन और उनके सांस लेने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
उनके दिमाग में दिल्ली की वो नौकरी, वो पैसा, और वो बसंती के साथ बिताए अच्छे दिन किसी
चलचित्र की तरह चल रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कब उनका खुशहाल जीवन अदृश्य
हो गया और सिर्फ झगड़े बचे। वो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा
था, लेकिन चंद्रसिंह की रफ्तार कम नहीं हुई। उन्हें अब घर की छत से ज़्यादा सुकून उन
सुनसान पहाड़ी रास्तों में मिल रहा था। उनका मन
घाटियों की गहराई में गिरता जा रहा था।
बसंती की वो अंतिम आवाज़ उनके कानों में तेज़ गूंज रही थी "लौटना मत"।
अब चंद्रसिंह पहाड़ों से निकलने वाले झरने के उद्गम स्थल तक पहुँच चुके थे। उन्होंने
सोचा कि थोड़ा सुस्ता लूं। पहाड़ों से गिरता हुआ वो बर्फीला पानी और उसकी निरंतर कल-कल
की आवाज़ चंद्रसिंह को शांत मन के लिए वो एक लोरी की तरह थी। गायें पीछे छूट गई थीं।
शाम होने के साथ गायें अपने घर की ओर लौट चुकी थीं। चंद्रसिंह ने जब उस ठंडे झरने के
पास अपनी थकी हुई भूखी प्यासी देह रखी, तो प्रकृति ने उन्हें अपनी गोद में समेट लिया।
उन्हें पता ही नहीं चला कि कब उनकी बंद आँखों ने दुनिया के सारे दुखों से नाता तोड़
लिया और वो झरने के आगोश में समा गए।
सूरज ढल चुका था, और पहाड़ों पर अंधेरा किसी गहरी चादर की तरह फैल
गया था। घर में बसंती देवी ने दीपक जलाया। उन्होंने मन ही मन सोचा, गुस्से में गए हैं।
थोड़ी देर में ठंड लगेगी, तो खुद ही पैर पटकते हुए वापस आ जाएंगे। उन्होंने रोज की
तरह रसोई संभाली, लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती गई, घर की दीवारों का सन्नाटा उन्हें
चूमने लगा। हर बार झगड़े के बाद चंद्रसिंह लौट आते थे, इसलिए बसंती को अभी डर नहीं,
बल्कि एक विश्वास था।
लेकिन जब मंदिर की आखिरी घंटी भी बजकर शांत हो गई, तब उनके मन में
हल्की घबराहट ने जन्म लिया। पहाड़ी झरने की ठंडक ने चंद्रसिंह के गुस्से को शांत कर
दिया था, लेकिन उनके ऐसी नींद में सुला दिया था जहां से वापसी का रास्ता धुंधला था।
बसंती ने चौखट पर बैठकर राह देखना शुरू किया। वो गुस्सा जो सुबह ज्वालामुखी बनकर फटा
था, अब धीरे-धीरे बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया। चिंता की राख बन रही थी ।बसंती देवी ने
अब रात को ही गांव के लोगों को ख़बर दी कि चंद्रसिंह अभी तक नहीं लौटे हैं। तब उनकी
आँखों में हमदर्दी तो थी, पर हाथ बंधे हुए थे। पहाड़ों में पुराने बुज़ुर्ग कहते हैं
कि रात को पहाड़ जागते हैं और इंसान को घर में होना चाहिए। इसलिए गांव वालों ने कहा
कि अब सुबह ही हम लोग ढूंढने जा सकते हैं। सुबह तक का इंतज़ार कर लीजिए। ये वाक्य बसंती
के कानों में किसी सजा की तरह गूंजा; वो जानती थी कि उनका पति बिना खाए-पिए सिर्फ गुस्से
और दुख की गठरी लेकर गया है। वो रात बसंती के लिए किसी युग से कम नहीं थी। घर की वही
दीवारें, जो सुबह तक उन्हें छोटी लग रही थीं, अब विकराल लगने लगीं । उन्हें दिल्ली
के वो दिन याद आने लगे, जब चंद्र सिंह थके हारे दफ़्तर से आते थे और वे उनका स्वागत
मुस्कुराहट से करती थी। उन्हें एहसास हुआ कि उनके भीतर की ममता और सम्मान का अस्तित्व
ही मिट गया था। दीये की लौ धीरे-धीरे कम हो रही थी, बिल्कुल उनकी उम्मीद की तरह। उन्होंने
बार-बार अपने उन हाथों को देखा, जिनसे उन्होंने अपने पति पर प्रहार किया था, और वही
हाथ आज उन्हें ढूंढने के लिए तड़प रहे थे। पहाड़ों की वो रात इतनी गहरी थी कि बसंती
को अपना खुद का गुनाह भी उस अंधेरे में साफ़ दिखाई देने लगा था। सुबह का इंतज़ार किसी
मौत के इंतज़ार से कम नहीं था। जब इंसान पास-पास होता है, तो उसकी कीमत अदृश्य रहती
है, पर जब वो एक रात के लिए भी खो जाए, तो उसका अस्तित्व पूरे घर को खाली कर देता है।
पहाड़ी सुबह की पहली किरण के साथ ही गांव में एक हलचल थी। लाठियां, रस्सी और कुछ खाने
का सामान लेकर टोलियां विभिन्न दिशाओं में निकल पड़ी थीं। जो टोली झरने की ओर गई थी,
उन्होंने वहां के पत्थरों और ठंडी घास को कुरेद मारा, लेकिन वहां चंद्रसिंह कहीं नहीं
मिले। ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ निगल गया हो । झरने का कल-कल, अब खौफनाक सन्नाटा बन
गया था । जब आखिरी टोली ने आकर कहा कि चंद्रसिंह का पता नहीं चल सका, तो बसंती देवी
के पैरों तले ज़मीन निकल गई। गांव वालों ने दिलासा दिया कि रात हो गई है, जंगल खतरनाक
है। कल सुबह फिर देखेंगे।
दूसरे दिन भी टोलियां खोजी दस्ते के रूप में चंद्रसिंह को पूरे
पहाड़ों में छान मारा, हर झरने से पूछा, हर गुफा में झांका। चंद्रसिंह जैसे हवा में
गुल हो गए हैं। उनका अस्तित्व एक ठंडी धूंद में कहीं खो गया था। जिन पैसों के लिए वो
लड़ती थी। अब उसकी नजरों में वो पैसा कचरे के समान था। उसे सिर्फ़ अपना वो अदृश्य साथी
चाहिए था। चार-पांच दिन बीत चुके थे। चंद्रसिंह का कोई पता नहीं चला।
गांव में
एक सूरदास रहा करते थे। वे गांव के लोगों को अपनी सेवा देते थे, जैसे चावल कूटना, मलाई
मथना, घी के लिए मक्खन निकालना इत्यादि। बदले में गांव के लोग उन्हें पैसा और खाने
की वस्तुएं दे देते थे। इससे उनका जीवन आराम से कट रहा था। एक दिन सूरदास किसी घर की
छत पर बैठे मलाई से मक्खन निकालने का काम कर रहे थे। सूरदास भले ही दुनिया नहीं देख
सकते थे, पर उनकी दूसरी इंद्रियां बहुत विकसित थीं, जैसे कानों से सुनना, हाथों की
ताकत इत्यादि। लोग बीच-बीच में उनके काम को देख जाते और बता देते कि और कितनी देर काम
करना है। उनके लिए दिन और रात एक समान थे। सूरदास हमेशा की तरह अपने काम में मगन थे।
अचानक उनके कानों ने कुछ ऐसा पकड़ा जो साधारण नहीं था। पहले उन्हें लगा कि कोई बंदर
पेड़ से कूद रहा था, पर उस धम्म की आवाज़ में एक इंसानी भारीपन था। फिर उन्हें किसी
बहुत बड़े पक्षी के पंखों के फड़फड़ाने की आवाज़ सुनाई दी। यह फड़फड़ाहट किसी छोटी
चिड़िया की नहीं थी, बल्कि किसी गरुड़ या बाज़ पक्षी की तरह थी। जो व्यक्ति देख नहीं
सकता, उसकी सुनने की शक्ति इतनी तीव्र होती है कि वो हवा के रुख और पंखों की फड़फड़ाहट
से भी सच का पता लगा लेता है। पत्तों का जोर-जोर से किसी के द्वारा हिलाना यह साबित
करता था कि उस पेड़ पर कोई है और कुछ कहना चाहता है। फिर सूरदास को किसी के चिल्लाकर
बोलने की आवाज़ सुनाई दी–“जाओ, गांव वालों से कहो, झरने से थोड़ा और आगे बढ़ें, तो
एक पेड़ के नीचे वो मिलेगा, जिसे वो 4-5 दिनों से ढूंढ रहे हैं “। यह सुनते ही सूरदास
ने उस घर के लोगों को सारी सुनी हुई बातों को बताया। बात गांव में आग की तरह फैल गई,
कि सूरदास को दिव्य शक्ति मिली है, जो उसे आवाजें सुनाई दी हैं। जब गांव वाले सूरदास
के बताए रास्ते पर झरने से आगे बढ़े तो उनका सामना उस कटु सत्य से हुआ, जिसे कोई देखना
नहीं चाहता था। चंद्रसिंह का शरीर कभी दिल्ली की सड़कों पर गर्व से चलता था, और पहाड़ों
में सुकून ढूंढने आया था। अब उस ठंडे पानी की वजह से फूल चुका था। प्रकृति ने उन्हें
अपनी गोद में तो लिया, पर उनका जीवन अदर्श्य हो गया। जब गांव वालों ने उनके शरीर को
उठाया तो वहां की हवा में एक भारीपन था। उनकी अंत्येष्ट सिर्फ एक शरीर का दाह संस्कार
नहीं था, बल्कि उन सारे झगड़ों का और उस आर्थिक तंगी का भी अंत था, जिसने उस दुखान्त
को जन्म दिया। पहाड़ों की मिट्टी से बना शरीर पहाड़ों की आग में विलीन हो गया। तबी
मानो उस बड़ी चिड़िया की फड़फड़ाहट शांत हुई, क्योंकि अब चंद्रसिंह की आत्मा को मुक्ति
मिल चुकी थी, लेकिन चंद्रसिंह का स्वाभिमान उस झरने की गहराई में कहीं हमेशा के लिए
दफ़न हो गया था। बसंती के लिए अब घर की हर दीवार एक सवाल थी, जिसका जवाब कभी नहीं मिलने
वाला था। अंत्येष्ट की लपटों में सिर्फ लकड़ियां नहीं जल रही थीं, बल्कि एक अधूरा सपना
और एक कूटा हुआ रिश्ता भी राख हो रहा था। आत्मा को मुक्ति मिल गई, पर पीछे रह गया एक
अदृश्य दर्द। चंद्रसिंह की अंत्येष्ट के बाद गांव में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। बसंती
देवी वो उस घर में अकेली थी, जिसे उन्होंने अपने और उनके पति ने बड़े अरमानों से बनाया
था। वो पैसा जिसकी कमी ने उनके भीतर हिंसा और क्रोध को जन्म दिया था, अब उनकी अलमारी
में धूल खा रहा था। उन्हें एहसास हुआ कि –”इंसान का असली अस्तित्व, उसके पास मौजूद
धन-दौलत में नहीं, बल्कि उसके अपनों के साथ बुने हुए प्रेम और सम्मान में होता है।”
सूरदास की वो बातें उनके कानों में आज भी गुंजती हैं। उन्हें समझ
आ गया था कि जब रिश्तों में से मिठास खत्म हो जाती है, तो प्रकृति भी अपना रूप बदल
देती है। चंद्रसिंह का शरीर पानी में विलीन हो गया, पर उसका अदृश्य अस्तित्व अब उस
झरने की कल-कल और उन हवाओं में हमेशा के लिए बस गया था।
बसंती देवी ने अपने जीवन का बचा हुआ हिस्सा गांव की अन्य महिलाओं
को धैर्य और प्रेम का महत्व सिखाने में बिताने का संकल्प लिया। उन्होंने जान लिया था
कि गुस्से में बोले गए शब्द और उठाया गया हाथ कभी-कभी ऐसी दूरी पैदा कर देता है, जिसे
मौत भी नहीं भर पाती।
यह कहानी हमें सीख देती है कि आर्थिक तंगी तो वक्त के साथ गुज़र
जाती है, लेकिन अपनों की प्रती किया गया अपमान, एक ऐसा ‘अदृश्य ज़ख्म’ बन जाता है,
जो आत्मा को मुक्ति मिलने तक दर्द देता रहता है।