Wednesday, September 9, 2026

Misha_Typing

 

मुक्ति की छाया -  13

बात उन दिनों की है जब लोग शहरों में हमेशा के लिए रहने नहीं आते थे। उनका मकसद सिर्फ पैसा कमा कर वापस अपने गांव लौट जाने का हुआ करता था ।कुछ ऐसा ही लगाव था चंद्र सिंह को अपने पहाड़ों से ।दिल्ली में रहते हुए भी उनकी पत्नी बसंती के साथ सदैव पहाड़ों की चर्चा करना यह साबित करता था, की पहाड़ी लोगों का अपनी मिट्टी से जुड़ाव कभी खत्म नहीं होता । उन दिनों उन दोनों पति-पत्नी का शहर की  चकाचौंध और पैसे कमाने के बाद, सुकून की तलाश में वापस पहाड़ों की गोद में लौटने का निर्णय एक बहुत बड़ा बदलाव था । उन्होंने उनकी शुरुआती दिनों में दिल्ली की भीड़ भाड़ में अपनी पहचान बनाई और मेहनत से आर्थिक मजबूती हासिल की ।शहर में रहते हुए भी उनके सपनों में वही ठंडी हवा, देवदार के पेड़ और पहाड़ी रास्ते आते थे । घर की पिछली दीवार पर टंगी पहाड़ी तस्वीर उन्हें हमेशा उनकी जड़ों की याद दिलाती थी। कुमाऊं की वादियों में लौटने के बाद, अब उनकी सुबह दिल्ली शहर के शोर के बदले, चिड़ियों की चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से होने लगी।  चंद्र सिंह और बसंती देवी को लगता था कि उन्होंने स्वर्ग पा लिया है। पुरखों की धरती की मिट्टी की खुशबू उन्हें हर दुख भुला देती थी ।

लेकिन वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता है। शहर में कमाया हुआ पैसा पानी की तरह बहने लगा ।पहाड़ों में सुविधाएं जुटाने और पुराने घर की मरम्मत में काफ़ी खर्च हो गया । जब बैंक बैलेंस कम होने लगा तो डर ने दस्तक दी। चंद्र सिंह जो अब तक सुकून में थे , अब चिंतित रहने लगे।  पैसा खत्म होने का डर इंसान को चिड़चिड़ा बना देता है।  छोटी-छोटी बातें अब बड़े-बड़े झगड़ों का रूप लेने लगी । बसंती देवी , जो पहाड़ों में ही अपना जीवन बिताना चाहती थी उन्हें चंद्रसिंह का यह बदला हुआ रूप दुख देने लगा । दोनों के बीच का संवाद , अब तनाव और शिकायतों में बदल गया । जिन पहाड़ों ने सुकून दिया था आज वही पहाड़ों काटने को दौड़ते थे ।खाली जेब ने घर की शांति को झगड़े की आग में झोंक दिया । वादियों में सुकून तो था मगर रोटी की चिंता ने सुकून का अस्तित्व ही मिटा दिया था।  वह घर जो कभी सुकून की तलाश में बनाया गया था अब एक कुरुक्षेत्र बन चुका था। दिल्ली की कमाई खत्म होने के साथ-साथ दोनों का एक दूसरे के प्रति सम्मान भी खत्म हो चुका था। बसंती देवी के लिए कालितजोरी, सिर्फ पैसे की कमी नहीं थी, बल्कि सुरक्षा का हट जाना भी था। बात-बात पर ताने देना अब पुरानी बात हो गई थी। जो हाथ कभी रसोई में पहाड़ी स्वाद बिखेरते थे, अब वो गुस्से और दरिद्रता की वजह से हिंसा पर उतारू हो गए थे। अब बसंती देवी का गुस्सा इतना प्रचंड हो चुका था कि वो चंद्रसिंह पर शारीरिक प्रहार करने लगी थी। चंद्रसिंह, जो कभी दिल्ली में इज्जतदार नौकरी करते थे, अब अपने ही घर में अपमानित और बेबस महसूस कर रहे थे। उनका अस्तित्व धीरे-धीरे अदृश्य हो रहा था। उस दिन सुबह की शुरुआत चिड़ियों की चहचहाहट से नहीं बल्कि पुराने कलेश से हुई। सूरज की पहली किरण के साथ रसोई से बर्तनों की गिरने और चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। चंद्रसिंह ने शायद सिर्फ इतना कहा था कि चाय में चीनी कम डालो, खर्च बचाना है। और बसंती देवी का सब्र टूट गया। पहाड़ों की ठंडी हवा अब उन्हें सुकून नहीं देती थी, बल्कि उनके जख्मों पर नमक छिड़कती थी। खाली पेट ने बसंती के भीतर की ममता को एक शेरनी की हिंसा में बदल दिया था। चंद्रसिंह ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस जीवन संगिनी के साथ वो बुढ़ापे का सुकून ढूंढने आए थे, वही उनके शरीर और आत्मा पर चोट करेगी। चंद्रसिंह ने झगड़े के बाद अपनी गायों के लिए एक डंडा पकड़ा और जंगल की ओर निकल गए। चंद्रसिंह का यह फैसला कि वो गायों के साथ जंगल की ओर निकले उनके भीतर के टूटे हुए स्वाभिमान और गुस्से का प्रतीक था। बसंती देवी का पीछे से चिल्लाना 'घर वापस मत आना, निकल जाओ' चंद्रसेन के दिल पर किसी खंजर की तरह लगा।  वो रिश्ता जो सालों पुराना था, आज एक पल में रेत की तरह बिखर रहा था। रास्ते में जाते समय गांव के लोगों ने टोका, 'सुबह सुबह घर से कुछ खाकर जाओ' ,तो उन्होंने जवाब दिया, 'मुझे मत टोको'। ये उनकी उस मानसिक स्थिति को दर्शाता था कि जब इंसान किसी से कोई रिश्ता या हमदर्दी नहीं चाहता ।

चंद्रसिंह अपनी गाय के झुंड को लेकर ऊंचे पहाड़ की तरफ बढ़ने लगा। उनके हाथ में लकड़ी का डंडा सिर्फ उनका सहारा नहीं था, बल्कि उनके गुस्से का भी सहारा था। जैसे-जैसे वो ऊपर चढ़ते जा रहे थे, नीचे गांव का शोर कम होता गया। सिर्फ गायों के गलों में बंधी घंटियों की टुन-टुन और उनके सांस लेने की आवाज़ सुनाई दे रही थी। उनके दिमाग में दिल्ली की वो नौकरी, वो पैसा, और वो बसंती के साथ बिताए अच्छे दिन किसी चलचित्र की तरह चल रहे थे। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि कब उनका खुशहाल जीवन अदृश्य हो गया और सिर्फ झगड़े बचे। वो रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था, लेकिन चंद्रसिंह की रफ्तार कम नहीं हुई। उन्हें अब घर की छत से ज़्यादा सुकून उन सुनसान पहाड़ी रास्तों में मिल रहा था। उनका मन  घाटियों की गहराई में गिरता जा रहा था।  बसंती की वो अंतिम आवाज़ उनके कानों में तेज़ गूंज रही थी "लौटना मत"। अब चंद्रसिंह पहाड़ों से निकलने वाले झरने के उद्गम स्थल तक पहुँच चुके थे। उन्होंने सोचा कि थोड़ा सुस्ता लूं। पहाड़ों से गिरता हुआ वो बर्फीला पानी और उसकी निरंतर कल-कल की आवाज़ चंद्रसिंह को शांत मन के लिए वो एक लोरी की तरह थी। गायें पीछे छूट गई थीं। शाम होने के साथ गायें अपने घर की ओर लौट चुकी थीं। चंद्रसिंह ने जब उस ठंडे झरने के पास अपनी थकी हुई भूखी प्यासी देह रखी, तो प्रकृति ने उन्हें अपनी गोद में समेट लिया। उन्हें पता ही नहीं चला कि कब उनकी बंद आँखों ने दुनिया के सारे दुखों से नाता तोड़ लिया और वो झरने के आगोश में समा गए।

सूरज ढल चुका था, और पहाड़ों पर अंधेरा किसी गहरी चादर की तरह फैल गया था। घर में बसंती देवी ने दीपक जलाया। उन्होंने मन ही मन सोचा, गुस्से में गए हैं। थोड़ी देर में ठंड लगेगी, तो खुद ही पैर पटकते हुए वापस आ जाएंगे। उन्होंने रोज की तरह रसोई संभाली, लेकिन जैसे-जैसे रात गहराती गई, घर की दीवारों का सन्नाटा उन्हें चूमने लगा। हर बार झगड़े के बाद चंद्रसिंह लौट आते थे, इसलिए बसंती को अभी डर नहीं, बल्कि एक विश्वास था।

लेकिन जब मंदिर की आखिरी घंटी भी बजकर शांत हो गई, तब उनके मन में हल्की घबराहट ने जन्म लिया। पहाड़ी झरने की ठंडक ने चंद्रसिंह के गुस्से को शांत कर दिया था, लेकिन उनके ऐसी नींद में सुला दिया था जहां से वापसी का रास्ता धुंधला था। बसंती ने चौखट पर बैठकर राह देखना शुरू किया। वो गुस्सा जो सुबह ज्वालामुखी बनकर फटा था, अब धीरे-धीरे बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया। चिंता की राख बन रही थी ।बसंती देवी ने अब रात को ही गांव के लोगों को ख़बर दी कि चंद्रसिंह अभी तक नहीं लौटे हैं। तब उनकी आँखों में हमदर्दी तो थी, पर हाथ बंधे हुए थे। पहाड़ों में पुराने बुज़ुर्ग कहते हैं कि रात को पहाड़ जागते हैं और इंसान को घर में होना चाहिए। इसलिए गांव वालों ने कहा कि अब सुबह ही हम लोग ढूंढने जा सकते हैं। सुबह तक का इंतज़ार कर लीजिए। ये वाक्य बसंती के कानों में किसी सजा की तरह गूंजा; वो जानती थी कि उनका पति बिना खाए-पिए सिर्फ गुस्से और दुख की गठरी लेकर गया है। वो रात बसंती के लिए किसी युग से कम नहीं थी। घर की वही दीवारें, जो सुबह तक उन्हें छोटी लग रही थीं, अब विकराल लगने लगीं । उन्हें दिल्ली के वो दिन याद आने लगे, जब चंद्र सिंह थके हारे दफ़्तर से आते थे और वे उनका स्वागत मुस्कुराहट से करती थी। उन्हें एहसास हुआ कि उनके भीतर की ममता और सम्मान का अस्तित्व ही मिट गया था। दीये की लौ धीरे-धीरे कम हो रही थी, बिल्कुल उनकी उम्मीद की तरह। उन्होंने बार-बार अपने उन हाथों को देखा, जिनसे उन्होंने अपने पति पर प्रहार किया था, और वही हाथ आज उन्हें ढूंढने के लिए तड़प रहे थे। पहाड़ों की वो रात इतनी गहरी थी कि बसंती को अपना खुद का गुनाह भी उस अंधेरे में साफ़ दिखाई देने लगा था। सुबह का इंतज़ार किसी मौत के इंतज़ार से कम नहीं था। जब इंसान पास-पास होता है, तो उसकी कीमत अदृश्य रहती है, पर जब वो एक रात के लिए भी खो जाए, तो उसका अस्तित्व पूरे घर को खाली कर देता है। पहाड़ी सुबह की पहली किरण के साथ ही गांव में एक हलचल थी। लाठियां, रस्सी और कुछ खाने का सामान लेकर टोलियां विभिन्न दिशाओं में निकल पड़ी थीं। जो टोली झरने की ओर गई थी, उन्होंने वहां के पत्थरों और ठंडी घास को कुरेद मारा, लेकिन वहां चंद्रसिंह कहीं नहीं मिले। ऐसा लग रहा था मानो पहाड़ निगल गया हो । झरने का कल-कल, अब खौफनाक सन्नाटा बन गया था । जब आखिरी टोली ने आकर कहा कि चंद्रसिंह का पता नहीं चल सका, तो बसंती देवी के पैरों तले ज़मीन निकल गई। गांव वालों ने दिलासा दिया कि रात हो गई है, जंगल खतरनाक है। कल सुबह फिर देखेंगे।

दूसरे दिन भी टोलियां खोजी दस्ते के रूप में चंद्रसिंह को पूरे पहाड़ों में छान मारा, हर झरने से पूछा, हर गुफा में झांका। चंद्रसिंह जैसे हवा में गुल हो गए हैं। उनका अस्तित्व एक ठंडी धूंद में कहीं खो गया था। जिन पैसों के लिए वो लड़ती थी। अब उसकी नजरों में वो पैसा कचरे के समान था। उसे सिर्फ़ अपना वो अदृश्य साथी चाहिए था। चार-पांच दिन बीत चुके थे। चंद्रसिंह का कोई पता नहीं चला।

                 गांव में एक सूरदास रहा करते थे। वे गांव के लोगों को अपनी सेवा देते थे, जैसे चावल कूटना, मलाई मथना, घी के लिए मक्खन निकालना इत्यादि। बदले में गांव के लोग उन्हें पैसा और खाने की वस्तुएं दे देते थे। इससे उनका जीवन आराम से कट रहा था। एक दिन सूरदास किसी घर की छत पर बैठे मलाई से मक्खन निकालने का काम कर रहे थे। सूरदास भले ही दुनिया नहीं देख सकते थे, पर उनकी दूसरी इंद्रियां बहुत विकसित थीं, जैसे कानों से सुनना, हाथों की ताकत इत्यादि। लोग बीच-बीच में उनके काम को देख जाते और बता देते कि और कितनी देर काम करना है। उनके लिए दिन और रात एक समान थे। सूरदास हमेशा की तरह अपने काम में मगन थे। अचानक उनके कानों ने कुछ ऐसा पकड़ा जो साधारण नहीं था। पहले उन्हें लगा कि कोई बंदर पेड़ से कूद रहा था, पर उस धम्म की आवाज़ में एक इंसानी भारीपन था। फिर उन्हें किसी बहुत बड़े पक्षी के पंखों के फड़फड़ाने की आवाज़ सुनाई दी। यह फड़फड़ाहट किसी छोटी चिड़िया की नहीं थी, बल्कि किसी गरुड़ या बाज़ पक्षी की तरह थी। जो व्यक्ति देख नहीं सकता, उसकी सुनने की शक्ति इतनी तीव्र होती है कि वो हवा के रुख और पंखों की फड़फड़ाहट से भी सच का पता लगा लेता है। पत्तों का जोर-जोर से किसी के द्वारा हिलाना यह साबित करता था कि उस पेड़ पर कोई है और कुछ कहना चाहता है। फिर सूरदास को किसी के चिल्लाकर बोलने की आवाज़ सुनाई दी–“जाओ, गांव वालों से कहो, झरने से थोड़ा और आगे बढ़ें, तो एक पेड़ के नीचे वो मिलेगा, जिसे वो 4-5 दिनों से ढूंढ रहे हैं “। यह सुनते ही सूरदास ने उस घर के लोगों को सारी सुनी हुई बातों को बताया। बात गांव में आग की तरह फैल गई, कि सूरदास को दिव्य शक्ति मिली है, जो उसे आवाजें सुनाई दी हैं। जब गांव वाले सूरदास के बताए रास्ते पर झरने से आगे बढ़े तो उनका सामना उस कटु सत्य से हुआ, जिसे कोई देखना नहीं चाहता था। चंद्रसिंह का शरीर कभी दिल्ली की सड़कों पर गर्व से चलता था, और पहाड़ों में सुकून ढूंढने आया था। अब उस ठंडे पानी की वजह से फूल चुका था। प्रकृति ने उन्हें अपनी गोद में तो लिया, पर उनका जीवन अदर्श्य हो गया। जब गांव वालों ने उनके शरीर को उठाया तो वहां की हवा में एक भारीपन था। उनकी अंत्येष्ट सिर्फ एक शरीर का दाह संस्कार नहीं था, बल्कि उन सारे झगड़ों का और उस आर्थिक तंगी का भी अंत था, जिसने उस दुखान्त को जन्म दिया। पहाड़ों की मिट्टी से बना शरीर पहाड़ों की आग में विलीन हो गया। तबी मानो उस बड़ी चिड़िया की फड़फड़ाहट शांत हुई, क्योंकि अब चंद्रसिंह की आत्मा को मुक्ति मिल चुकी थी, लेकिन चंद्रसिंह का स्वाभिमान उस झरने की गहराई में कहीं हमेशा के लिए दफ़न हो गया था। बसंती के लिए अब घर की हर दीवार एक सवाल थी, जिसका जवाब कभी नहीं मिलने वाला था। अंत्येष्ट की लपटों में सिर्फ लकड़ियां नहीं जल रही थीं, बल्कि एक अधूरा सपना और एक कूटा हुआ रिश्ता भी राख हो रहा था। आत्मा को मुक्ति मिल गई, पर पीछे रह गया एक अदृश्य दर्द। चंद्रसिंह की अंत्येष्ट के बाद गांव में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। बसंती देवी वो उस घर में अकेली थी, जिसे उन्होंने अपने और उनके पति ने बड़े अरमानों से बनाया था। वो पैसा जिसकी कमी ने उनके भीतर हिंसा और क्रोध को जन्म दिया था, अब उनकी अलमारी में धूल खा रहा था। उन्हें एहसास हुआ कि –”इंसान का असली अस्तित्व, उसके पास मौजूद धन-दौलत में नहीं, बल्कि उसके अपनों के साथ बुने हुए प्रेम और सम्मान में होता है।”

 

सूरदास की वो बातें उनके कानों में आज भी गुंजती हैं। उन्हें समझ आ गया था कि जब रिश्तों में से मिठास खत्म हो जाती है, तो प्रकृति भी अपना रूप बदल देती है। चंद्रसिंह का शरीर पानी में विलीन हो गया, पर उसका अदृश्य अस्तित्व अब उस झरने की कल-कल और उन हवाओं में हमेशा के लिए बस गया था।

 

बसंती देवी ने अपने जीवन का बचा हुआ हिस्सा गांव की अन्य महिलाओं को धैर्य और प्रेम का महत्व सिखाने में बिताने का संकल्प लिया। उन्होंने जान लिया था कि गुस्से में बोले गए शब्द और उठाया गया हाथ कभी-कभी ऐसी दूरी पैदा कर देता है, जिसे मौत भी नहीं भर पाती।

 

यह कहानी हमें सीख देती है कि आर्थिक तंगी तो वक्त के साथ गुज़र जाती है, लेकिन अपनों की प्रती किया गया अपमान, एक ऐसा ‘अदृश्य ज़ख्म’ बन जाता है, जो आत्मा को मुक्ति मिलने तक दर्द देता रहता है।

Tuesday, September 8, 2026

Kulturan.com

  Text - 48 pages 

  Cover - 4 Pages 

  Size - 

  Inside Pages

1  Title verso Page 

2  Poem 

3 Editorial 

4- 5  World Monument 

6-7  World Writer 

8-9 Music

10- 11 Translation 

12 - 13 - Language 

Mitra_Words

 लहू से लिखा अभिषेक→ 6 जून 2009 को वह वैष्णो देवी की यात्रा यात्रा न केवल एक धार्मिक यात्रा थी बल्कि एक माँ के संकल्प और अपने पुत्र के प्रति बहुत गहरे प्रेम का प्रतीक भी थी। मेरे पुत्र नितिनजी के जन्म के साथ ही गई वह मन्नत और फिर सालों बाद उसे पूरा करने के लिए उस कठिन चढ़ाई को चढ़ना मेरे जीवन के आस्तित्व के संघर्ष और उसकी विजय को दर्शाता था।

पहाड़ों की उन ऊँचाइयों में, सिर्फ रास्ता नहीं था, वहाँ पत्थर माँगी हुई एक दुआ का वास्ता था।

नजदीक का साथ था और मन में माँ का विश्वास, वो मन्नत ही तो थी, जिसके जगाया था नसीब का अहसास।

देवी के दरबार में दर्शन कर मन्नत पूरी हुई, पुरानी चुनौतियों

और बीते हुए कठिन समय अब एक खूबसूरत में बदल गए थे

और माता रानी को माथा टेक धन्यवाद कह रहे थे। राह में एक...दर्शन की तृप्ति के बाद शरीर थक चुका था लेकिन मन शांत था। 6 जून की वह मन्नत पूरी हो चुकी थी और अगला दिन केवल विश्राम के लिए था। कटरा की गलियों में धूप खिल रही थी और हम, नितिनकुमार और रोजी मौसी द्वारा समझा कितने के इशारे से बाहर निकल रहे थे। तभी उस गली में एक टैक्सी वाले की आवाज सुनाई — — — वह पुकार सिर्फ एक सवारी की नहीं थी, ऐसा लगा मानो नियति हमें किसी और द्वार पर बुला रही थी।

टैक्सी वाले की आवाज़  कटरा की हवाओं में गूँज रही थी। शिवखोड़ी — — शिवखोड़ी! दादा के दर्शन के लिए चलिए! कौतूहल वश मैंने वहीं किया, “बताइए, यह शिवखोड़ी में क्या है?” उसने जो बताया, उसने थकान को उत्साह में बदल दिया। उसने कहा — माता जी, यह वही स्थान है जहाँ स्वयं महादेव ने भस्मासुर से बचने के लिए शरण

ली थी। जब नटराज ने शिवजी से वरदान पाकर उन्हीं के पर हाथ रख कर भस्म करने का प्रयास किया तो महादेव माता पार्वती और नंदी के साथ वहाँ से भाग कर इस गुफा में छिप गए थे। माना जाता है कि शिव महादेव मंदिर ने अपने तिलस्म से इस गुफा का (खोड़ी) का निर्माण किया था, जिसे शिवखोड़ी’ (शिव की गुफा) कहा जाता है। उसने

फिर कहा कि मेरी टैक्सी वाली है — चलिए दर्शन कर आइए।

मैंने तुरंत महादेव का बुलावा समझा और तुरंत दर्शन के

लिए जाने को तैयार हो गई।

टैक्सी के पहिए जस - तस  कटरा से दूर जा रहे थे.. रास्ता और भी संकरा और पहाड़ी होता जा रहा था। टैक्सी वाले ने जब बताया कि आगे का रास्ता घोड़ो से तय करना होगा और 14 किलोमीटर की खड़ी घाटी चढ़नी होगी तो एक पल के लिए मन में संशय आया। लेकिन नचिकेता के उत्साह और मन में महादेव के दर्शन की प्यास ने हर डर को पीछे छोड़ दिया। वह 3:30 घंटे का सफर केवल पहाड़ों की यात्रा नहीं थी बल्कि वह स्वयं को तैयार करने का संयम था उसे गुफा के लिए जहां साक्षात शिव ने शरण ली थी।

3:30 घंटे का सफर पूरा होते-होते आसपास का मिजाज पूरी तरह बदल चुका था । वह धूप अभी कुछ देर पहले साथ चल रही थी वह अचानक घने काले बादलों के पीछे छुप गई। जैसे ही टैक्सी स्टैंड पर रुकी आसमान से मूसलधार बारिश की बड़ी-बड़ी बूंदें गिरने लगीं।वह बारिश साधारण नहीं थी ऐसा लग रहा था कि मानों पहाड़ स्वयं हमसे कह रहे हो कि महादेव के द्वारा तक पहुंचने का रास्ता इतना सरल नहीं  होने वाला।

अचानक घने बादलों का खजाना ऐसा लग रहा था कि प्रकृति हमारी श्रद्धा की परीक्षा ले रही है घनघोर बारिश बिजली का रह-रह कर कड़कना उसे यात्रा की गंभीरता को और बढ़ा रही थी।

  टैक्सी रुकी तो थी लेकिन उससे उसे बाहर  के निकलने का साहस किसी में ना था। टैक्सी की छत पर गिरती मूसलधार बारिश ऐसा प्रतीत हो रही थी मानो टूटकर बिखर जाएगी खिड़की के बाहर जो दुनिया अभी कुछ पलों पहले साफ थी अब सफेद धुआं और पानी की चादर में लिपटी थी। जो सामने खड़ी दूसरी टैक्सियां दिख रही थी और ना ही वहां खड़े भक्त। साक्षात शिव की नगरी के द्वार पर प्रकृति ने ऐसा पर्दा गिरा दिया था कि दृश्य भी अदृश्य हो गया था।

वहां पहुंचे हुए अन्य भक्त अपनी अपनी टैक्सी से वापस कटरा लौटने लगे क्योंकि अब ऊपर गुफा तक की 14 किलोमीटर की यात्रा जो घुमावदार घाटियों में घोड़े से तय करना था इतनी घनी बारिश में करना असंभव  जान पड़ता था। मेरी टैक्सी के ड्राइवर ने भी वापस कटरा लौट जाने का सलाह दिया।

मैंने कहा कि अगर महादेव ने यहां तक बुलाया तो आगे का रास्ता भी वही दिखाएंगे मैंने टैक्सी वाले से कह दिया साफ कह दिया __बिना दर्शन किए हम वापस नहीं जाएंगे उसे समय मेरा संकल्प और दृढ़ निश्चय अटल था जो टैक्सी वाले के लिए अद्भुत मिसाल था। "मैंने पूछा कि हमें  तीन घोड़े चाहिए घोड़े वाले को बुलाइए घोड़े वाले की आंखों में खौफ था । उसने हाथ जोड़कर कहा " माता जी यह पहाड़ है पानी की रफ्तार मेरे घोड़े के पैर को सड़क से ऊपर कर उसे सवार सवार समेत तीनके की तरह बहा ले जाएगी अगर पैर फिसला तो मेरा घोड़ा सीधे खाई में गिर जाएगा।। रास्ता 14 किलोमीटर लंबा है जान है तो जहान है मैं नहीं जा सकता ।"

      मैंने घोड़े वाले की ओर देखा और फिर उस धुंधले ले पहाड़ की ओर। 9 वर्षीय नचिकेता और 65 वर्षीय रोजी मौसी दोनों का चेहरा मेरी आंखों पर सामने था मैंने दृढ़ शोर में कहा "भाई पैसे की चिंता मत करो तुम जो मांगोगे मैं दूंगी डबल ट्रिपल जो चाहिए ले लो ।

पर मुझे महादेव के पास जाना है..जिस विधाता ने यहां तक बुलाया है क्या हमें खाई में गिरने देगा ?" 

  मेरी अटूट आस्था श्रद्धा भक्ति दृढ़ विश्वास और संकल्प देखकर घोड़े वाला नि: शब्द रह गया आगे सुनकर कहा "माताजी आपकी श्रद्धा और विश्वास के आगे मैं हार गया आज पैसे नहीं आपकी आस्था और भक्ति पहाड़ चढ़ाएगी।"  उसने तीन बरसातियां  निकाले पहनने को कहा और तीन घोड़े लेकर आया जैसे ही हम घोड़े पर सवार हुए घोड़े के पैरों के नीचे सड़क नहीं बल्कि पानी का एक उफनता हुआ रेला था । डर का साया हर तरफ था पर मेरे मन में महादेव की छवि थी । मैंने रोजी मौसी और नचिकेता की और देखा और चिल्ला कर कहा"डरना नहीं ! जयकारा लगाओ "और फिर उन वीरान पहाड़ों और मूसलधार बारिश के शोर को चीरती हुई सिर्फ तीन भक्तों की आवाज घाटी में गूंजने लगी "बोल बम !बोल बम !! हर हर महादेव !!!

यहां केवल जयकारा नहीं था महादेव के नाम जाप से महामृत्युंजय मंत्र का प्राकट्य हो रहा था। डर पर विजय पाने का महामंत्र था । मेरा प्रतिबद्धता ने कठिन परिस्थिति को भी अवसर में बदल दिया था।  9 वर्ष के नचिकेता के छोटे-छोटे हाथों ने जब घोड़े की लगाम थामी और बोल बम का जयकारा लगाना आरंभ किया तो वह दृश्य एक मां के लिए अत्यंत गौरवपूर्ण था । बेटा मेरा और मौसी का जयकारा लगाना यह साबित  करता था कि विश्वास मन को निर्भय बना देते हैं।

    उसे दिन पहाड़ों पर प्रकृति ने एक मौन धारण कर लिया था ना कोई परिंदा पर मार रहा था ना किसी और इंसान की आहट थी। निर्जन पहाड़ के उसे अनंत विस्तार में केवल छह लोग थे। तीन सवार तीन घोड़े वाले और तीन बेजुबान जानवर जो पानी को वेग को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे । वह दृश्य अद्भुत था ऐसा लग रहा था जैसे हम भी इस भौतिक संसार से कटकर किसी शिवलोक में प्रवेश कर चुके थे।

    पाठक इस घटना को पागलपन कह सकते हैं शायद वह था भी। मन में एक ही धुन थी ' महादेव 'ऐसा महसूस हो रहा था मानो भोलेनाथ स्वयं अपनी गुफ़ा  में बैठकर मुस्कुरा रहे हैं और देख रहे होंगे कि इस प्रलयकारी बारिश के बीच कौन है जो सिर्फ उनके दर्शन की प्यास लेकर चला आ रहा है। यह प्रकृति की परीक्षा ही तो थी जिसने एक छलनी की तरह कमजोर इरादे वालों को वापस भेज दिया और केवल सच्ची भक्ति को आगे जाने दिया। 

2 घंटे के उस अनवरत संघर्ष के बाद जहाँ  समय और स्थान के बीच का अंतर मिट चुका था हम तीनों शिवखोड़ी के उसे पावन द्वारा पर थे । घोड़े से उतरते ही ऐसा लगा मानो गुरुत्वाकर्षण का नियम बदल गया हो , शरीर हल्का था पर मन श्रद्धा के बोझ से झुका हुआ।घोड़े वालों ने घोड़े की लगाम थामते हुए आश्वस्त किया " माता जी मैं यहीं मिलूँगा  आप महादेव के दर्शन कर आइए।"

Greek_Daily _Phrases

 Καλημέρα - Good morning 

Καλησπέρα - Good evening 

Καλώς ήρθες - Welcome 

Για σου - Hi 

Τι κάνεις ; How are you doing 

Είμαι καλά ευχαριστώ - I am fine  

Ευχαριστώ - Thank You 

Παρακαλώ - Please / welcome 

Συγγνώμη - Sorry 

Δεν καταλαβαίνω - I don't understand 

πού είναι ; What is it ?

πόσο κανει ; How much is it ?

Μπορώ να ; Can I 

Τα λέμε - See you later 

Goran_Canada

Kedves Indu Kant Angiras! 
Nagyon örülök a mai csodálatos beszélgetésünknek, valódi spirituális élmény és "időutazás" volt számomra! Különösen izgalmas látni a szálak összeérését Prof. Köves Margit munkásságán, Indián és a szent életű Delphin keresztül. Megtisztelő egy olyan hindi költőt megismerni, aki ennyire mélyen tiszteli a nyelveket és a hősök kultúráját.
A mai ígéretemhez híven, nagy szeretettel küldöm el Önnek e-mailben a "Jurisics Miklós / Eposz (A kőszegi hős)" című nagyszabású történelmi művem Bevezetőjét. Mivel említette, hogy jelenleg horvátul tanul, és Jurisics Miklós egyaránt volt büszke horvát nemes és hősies magyar hadvezér, bízom benne, hogy ez a vitézi ének egy szép kulturális hivatkozási alapot nyújt majd Önnek.
Ahogy megbeszéltük, a művet részletekben, lépésről lépésre szeretném megosztani Önnel, hogy legyen időnk átélni a sorokat. Fogadja szeretettel az eposz indítását:

Szeretettel köszönöm. Mindenféleképpen. Ez a pár versszak a Jurisics eposz bevezetője. Amint hazaértem küldöm a kezdődő fejezetet. Tisztelettel köszönöm a hanganyagot majd. Egy kérdés elkezdjem e könyvbe szerkeszteni... vagy ezt te teszed meg. Nálam az amerikan standard méret az adott ezzel fogadja el sok online kiadó... pl az Amazon... Ebay... vagy Lulu..

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Legyen szép napod és a messengeren tudunk.beszélni is.





BEVEZETŐ
Gondolatom elszáll egy régi időbe,
Ahol hősök jártak igazságot védve.
Olyan tájon élve, ahol voltak vadak,
Kardot is rántottak nem kellettek szavak.
Miközben leírom halkan soraimat,
Erősödik bennem jóságos akarat.
ÍIgy hát adom nektek Miklós történetét,
Kinek a lelkét már befogadta az ég.
Emlékezzünk, olvasva a szavaimat,
Álmokból vettem át róla álmaimat,
De le is jegyezte őt a történelem.
Így hát néhány napra övé lesz életem,
Az időnek homályából felidézem.
Régi történetből ma is itt él bennem.
Ő az, ki bátran állt az égő várfalon,
Kardját emelte, a hitbeli harcokon.
Álljatok meg és hajtsatok fejet,
Kiről szólok annak jó tette integet.
Lélekben és testben a megvédő erény,
Őbenne bízni az örök erős remény.
Példáját mutatja a keresztényeknek,
Örök vezetője a harcos szíveknek.
Hadd szóljanak e szavak tisztelettel,
Érdemei örökre az emlékezettel.
A bátorságával szembe szállt sorsával,
Kiállt, ha kellett egy hatalmas hordával.
Ki karddal megvédte ami veszni látszott.
Buzdított és hősként vezette a harcot.
Emlékének a fénye ma is tündököl,
Remélem lelkéből sok ember örököl.
Ő Jurisics Miklós hajdanán kapitány,
Élete álma e történetnek nyitány.
Mesélek róla, hogy kísérték égiek,
Ki akaratában törhetetlen lélek.
Földön és időben áll a története,
Míg nekünk, a jó példa dicső élete.
Olvassátok szavaimat, barátaim,
Élet ajándékával áldott véreim.
Szívekben hit lobogjon tiszta őszinte,
Történetembe mesélve az élete.

Egy kis poétikai iránymutató a fordításhoz és az értelmezéshez:
A mű belső zeneiségében a klasszikus magyar ütemhangsúlyos verselést, az Arany János-féle hagyományos "felező tizenkettes" ritmust igyekeztem követni (6 // 6 szótag, középen egy kis ritmikai szünettel), szigorú AABB páros rímekkel. Amikor hindi vagy angol nyelvre ülteti át, nem szükséges ehhez a merev szótagszámhoz ragaszkodni, de érdemes egyfajta ritmikus, hömpölygő balladisztikus, krónikás éneki fonalat adni a szövegnek a modern szabadversek helyett.
Kívánom, hogy Delphi ősi, tiszta csendje hozzon Önnek további csodás ihletet az íráshoz és a tanításhoz! Örömmel várom a gondolatait, és bízom benne, hogy a jövőben is megosztjuk egymással az alkotói magányunk gyümölcseit.
Minden jót, jó egészséget és áldást kívánok!
Baráti üdvözlettel,

Goran Episcopus
Író, költő, lelkipásztor
Toronto, Canada

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आमुख 

अतीत के एक युग में विचरने लगते विचारे मेरे 
जहाँ सच्चाई के लिए मर मिटते थे योद्धा हमारे 
रहते  ऐसी ज़मीन पे जहाँ जंगली जानवर बसते थे
अलफ़ाज़ की दरकार नहीं तलवार खींच लेते थे  

ख़ामोशी में जैसे  ही  ये पंक्तियाँ लिख डाली इधर ,
 एक जोशीला संकल्प तब जाग उठता मेरे भीतर  ।
इसलिए सुनाता हूँ आपको  मिक्लोश  की कहानी,
जिसकी रूह को मिली थी  , जन्नत में  निगेहबानी  ।

याद रखना हैं हमे शब्दों को मेरे पढ़ते हुए 
उनके सपनों से मैंने अपने सब स्वप्न लिए 
लेकिन इतिहास में अब वो सब रकम होगा 
इसीलिए जीवन मेरा कुछ दिन को उनका होगा 

सब याद है यादें मुझे धुंधली धुंधली  ।
उस   पुरानी कहानी की , ज़िंदा जो  मुझमें अब भी  ।
 किले की प्राचीरों पर बहादुरी से था वो खड़ा ,
आस्था के उन  युद्धों में अपनी तलवार उठा ।

 ठहर जाओ और अपने शीश  झुकाओ तुम ,
करता हूँ बात जिसकी , वह पुण्य है अप्रतिम ।
गुण जो आत्मा और शरीर  की करता रक्षा  ,
उस पर भरोसा करना  शाश्वत,अटूट आशा ।

ईसाइयों के लिए इक आदर्श हैं वो ,
बहादुर हृदयों के शाश्वत नेता वो ।
ये शब्द आदर पूर्वक बोले जाएँ,
उनके पुण्य सदैव याद किए जाएँ।

 उसने अपनी तक़दीर को चुनौती दी,अपनी बहादुरी से 
ज़रूरत पड़ने पर डटा रहा शक्तिशाली सेना के सामने ।
अपनी तलवार से बचाया  वो सब जो नष्ट होने वाला था ।
अपने सैनिकों को इकठ्ठा कर एक योद्धा बन युद्ध किया। 

आज भी उनकी स्मृति की   चमकती है रौशनी ,
उम्मीद है सीखेंगे कुछ , लोग उनसे हर घडी ।
ये  हैं मिक्लोश युरिशिच , कप्तान बीते ज़माने कू  ,
जिनके सपनों की कहानी आए हम सुनाने कू ।

बताऊँगा उसके बारे में जिसे फरिश्तों ने चाहा 
एक अडिग इच्छा वाली थी वो आत्मा  
धरती और समय पर दृढ़ता से खड़ी उसकी कहानी
गौरवशाली गाथा उसकी  ,मिसाल हम  सबने जानी  

शब्दों को मेरे , पढ़ो मेरे मित्रो !
मेरे हमजोली, लो जीवन का वरदान गुनो ।
तुम्हारे हृदयों में विश्वास सच्चा रहे दमकता ,
मेरी कहानी सुनाये जीवन की गाथा ।
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Tenger Fia - Első Ének


Tenger hulláma zúgott Zengg város partján,

Hol egy nemes fia született hajdanán.

Miklós lett ő, kinek sorsát a szél írta,

Adria habjának fénye is csillogta.

Apja, nemes úr, kardját megmarkolta,

Fiának suttogta vitéz élet várja.

E föld és a tenger, Isten ajándéka,

Ki ezt védi, az égben örök jutalma.


Zengg városában, hol a tenger simogat,

Cseperedett, kiben a szikra lobbanhat.

Jurisics büszke család, sorsukban a fény,

Gyermeki jóban nőve, jövője remény.

Utcákon futkározva tenger zúgásban,

De otthon is jeleskedve tanulásban.

A könyvek e korban nagyon drága kincsek,

De hozzájutottak a nemes gyerekek.



Betűk között járt, s tágult elméje kora,

Tudás lelkében, fényként lobogva ra.

Mesét hallgatott királyról és csatákról,

Naponta változó égről, csillagokról.

De nem csupán a könyvolvasás mestere,

Várta Zengg városnak a kiképzőtere.

A nap alatt forgatta a kardját szeretve,

Tanították vágásra, védekezésre.



A kard nem csak fegyver, mert a lélek része,”

Mondta mestere, ki harcban jól ismerte.

Tanulj, Miklós, hogy ügyességed pallérozd,

De szívedet őrizd, a lelked aranyozd!”

Így napjai néha könyvek között teltek,

Harcmező árnyában sok tudást idéztek.

A zenggi templomban hűen imádkozva,

Keresztény hitben keresztelve, áldozva.



A tenger szele sok történetet mondott,

Harcokról, világról, szálló gondolatot.

S mikor éjjel lett, s a hold világított fenn,

Gyermekként álmodott, örök érzelemben.

Zengg városának csendjében harang szólalt,

Templom tornya, mint őr, hordozta a sóhajt.

Fiatal Miklóst a szentély mélye várta,

Hittel szavai, s a hősők nyomát járta.




Írás mestere szólt. Latin szavak tudója,

Tanulj meg nyelveket, Istent is akarva.”

A pergamenen szent szövegeknek sora,

Szívébe égve Jézus felmagasztalása.

Pap, ki tanította, nem csak könyvet nyitott,

Az eget mutatta és mindent mit tudott.

Légy igazságos és hű védelmező, jó,

Áldott harcaidban hittel szolgálható.”



Harctanulás közben kereszt jelét látta,

Mesterei hitték, majd sok csata várja.

A kard nem csak fegyver, hanem Isten keze,

Erősen tartja az élet szeretete.”

Templom homályában áhítattal térdelt,

Hideg padozat kövén szép jövőt képzelt.

Kérte az Urat, adjon neki jó szívet,

Hitet támogatva helyes ítéletet.





A harc órái is életre nevelték,

Miklósnak lelkében rögzítve ereklyék.

Erős, de hajlik, míg sok próbát ki nem áll,

Igazság vezeti szívét, hite helytáll.

Lehet belőle nem csak vitéz, de példa,

A tudását, az élet tovább tanítja.

S Zengg városa, és a tenger szele, szava,

Hordozza nevét időnek a sodrába.




Ifjú Miklós a part szikláin ugrálva,

Sokszor kitekintve tenger hajóira.

Szíve álmodozón lüktetett a fénnyel.

De a kis kardját is forgattal reménnyel.

Egy napon kalózok törtek rájuk vadul,

Zengg városa még sosem maradt alul.

Gyermekhősünk apjával vállvetve kiállt,

Kardjuk zengve állta a harcok folyamát.





A napnak végére a parton csak csend ül,

Fosztogatók verve, harang kongva csendül.

Mindenki Miklósról suttogott csodálva,

Ifjúi bátorságát felmagasztalva.

De Miklós érezte, hogy e harc csak kezdet,

Tengerhez kötött sorsa hegyekre vezet.

Kardját megélezte, s a tudást gyűjtötte,

Majd egy örök napon harcra álljon keze.




Az évek múltával pehely szakálla ,

Tudásával harcba ment, hol baj jött elő.

Adria hulláma még a nevét zúgja,

Miklós, aki gyermek és ország támasza.

Majd a Dráva mentén, zöldes lombok alatt,

Miklós vitéz lován az idővel haladt.

Szíve már ifjúkorban megtöltve hittel,

Igazságot hozott, lelki erejével.





Várak hőse lesz ő, vitéz nemes fia,

Szívében az erő, bölcsessége tiszta.

Régi hősi mesékben emberré nőve,

Törökkel a véres harcokat követve.

Országot sötét árny borítja fátyollal,

Rablók törtek rájuk, lángoló kardokkal.

Az ifjú Miklós nézte az égő tájat,

Szívében esküt tett: megvédi a jókat.




Rablók csizmájának közel dobogása,

Miklós bátran rájuk ment. kardját ragadva:

Ez a föld mienk, nem viszitek bűntelen!”

Kiáltotta szívének tüzével telten.

Hősiesen harcolt, karja kardja gyorsan,

Erővel hadnaggyá lépett hamarosan.

Rablók meghátráltak bátor ifjú vértől,

Hívták megmentőnek ettől az időtől.





Miklós nevét zengik környező földeken,

Bátorság kíséri hegyeken, völgyeken.

Idős lovag figyelte tettét távolról,

Kitől kitartást tanult minden csatából.

Lovaggá ütötték, maga szabta útját,

Kardja élesedett, tanulva stratégiát.

Emlékében mindig ott a tenger íze,

Végtelen hittel védett hazája, népe.





















Tanult nemesi ifjoncunk az élettől,

Tudva jól, hogy a tétlenség gyorsan megöl.

Könyvekből, harcokból meg lett a tudása,

Hitével jövője, ereje és kardja.

Mondta is Miklós, " csillagokban a sorsunk,

Álmunkat nem adjuk, keresztet hordozzuk.

Ha jogokat nem lelőnk, Erővel elvesszük.

Török mezsgyéken harcban az életünk."





Az évek múltak, a fiúból férfi lett,

Hegyeken, völgyeken szél viszi a nevet.

Suttogják Jurisics! A mi hősünk. A bátor!

Szíve izzó tüze erőben bármikor.

Esküje kötelezi már a király mellett,

Népének ekkor a vezércsillaga lett.

Hordozta zászlaját nemesi csapatnak,

Hogyha jön a török közéjük csapatnak.





...

समुद्र का पुत्र - प्रथम सर्ग 

ज़ेन्ग नगर के तटों पर गरजी थीं  , समुद्री  लहरें, 
जहाँ जन्मा था एक  कुलीन पुत्र बहुत पहले ।  
नाम था मिक्लोश , क़िस्मत जिसकी हवा ने लिखी,
आदरिअ के फेन की रौशनी  भी थी  चमकी ।  
पिता उनके कुलीन स्वामी , कसली थी अपनी तलवार, 
फुसफुसा कर कहा  पुत्र से , वीर जीवन करता इन्तिज़ार। 
ये धरती और समुद्र , हैं ईश्वर के ये वरदान ,
करे जो इनकी रक्षा , मिले स्वर्ग में उसको मान।  


उस ज़ेन्ग शहर में, जहाँ समुद्र तट को सहलाता ,
चिंगारी लिए अपने सीने में युवा एक बढ़ता जाता। 
गर्वित युरिशिच परिवार, जिसकी नियति में है रौशनी ,
उमीदों से भरा भविष्य ,खिलती बचपन की हर ख़ुशी।
गलियों में दौड़ते हुए समुद्री लहरों सा दहाड़ना ,
लेकिन घर पर रहते पढ़ाई में भी अव्वल बनना। 
क़ीमती ख़ज़ाना होती थीं किताबें उन दिनों 
जिन्हें पा सकते थे कुलीन बच्चें उन दिनों। 


अक्षर पढ़ते पढ़ते हुआ  विकसित उसका मन भी, 
ज्ञान , भलाई की रौशनी उसकी आत्मा में चमकी ।
उसने राजाओं और युद्धों की कहानियाँ सुनी , 
रोज़ बदलते आसमान और तारों की भी ।
लेकिन वो  केवल पढ़ने में ही उस्ताद नहीं था ,
ज़ेन्ग शहर का प्रशिक्षण मैदान उसका इन्तिज़ार  कर रहा था।
शौक़ से  करता था अभ्यास  धूप में तलवार चलाने का ,
सीखा  उसने हमला करना और हुनर ख़ुद को बचाने का 



तलवार सिर्फ हथियार नहीं , ये रूह का हिस्सा है 
जिसे जानते थे युद्ध में , उनके गुरु का क़िस्सा है 
' सीखो मिक्लोश तुम  अपनी कला को निखारना 
हृदय की करो रक्षा , अपनी रूह पे सोना चढ़ाना 
यूँ उसके दिन  कभी किताबो में बीत जाते थे ,
युद्ध के मैदान  में उसे इल्म सिखा जाते थे। 
ज़ेंग के चर्च में भक्तिपूर्वक प्रार्थना करता ,
बपतिस्मा ग्रहण कर वो  पवित्र प्रसाद पाता। 



समुद्र की लहरों ने तब सुनाईं कई कहानियाँ ,
युद्ध की , विश्व की , क्षणिक विचारों की कहानियाँ 
रात जब गहराई और चाँद ऊँचा चमका,
शाश्वत भावना में, इक  बच्चे-सा सपना देखा।
गूँजी एक घंटी ज़ेन्ग शहर  की ख़ामोशी  में
चर्च की मीनार इक  पहरेदार सी आह भरे 
मठ की गहराइयाँ मिक्लोश की करती  प्रतीक्षा 
श्रद्धा भरे शब्दों से नायकों के पदचिन्हों पे चला 



क़लम  के उस्ताद ने कहा लैटिन भाषा पढ़ने को 
ज़बानें सीख कर ही ईश्वर को जानोगे 
चर्म पत्रों पर   पवित्र ग्रंथों की एक श्रृंखला,
यीशु का महिमामंडन, उसके हृदय पर उकेरा ।
केवल किताब नहीं खोली,पादरी ने बहुत कुछ सिखाया 
अपना सारा ज्ञान , स्वर्ग की ओर इशारा कर दिखाया  
' न्यायप्रिय और वफ़ादार  रक्षक , बनो अच्छा इंसान,
अपने पवित्र संघर्षों में रखो अपने विशवास का मान ।'