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Saturday, June 5, 2021

लघु कथा - दो प्रेमियों की गुफ़्तगू

 


साक्षी 


- यह पेड़ हमारे प्रेम का साक्षी है। 


- हाँ , यह तो तुमने ठीक कहा। 


- हम इस पर अपने नाम खोद देते हैं । 


- उससे क्या होगा ?


- अगर पेड़ खो गया तो हम उसे आसानी से ढूँढ लेंगे। 


- पेड़ कहाँ खोयेगा , पेड़ ने तो यही रहना है। 


- फ़िर भी , अगर खो  गया तो।


- और अगर हम खो गए तो ......


बग़ीचों के पेड़ आज भी वहीं खड़े हैं और  कर रहे हैं प्रतीक्षा , उन बिछड़े हुए प्रेमियों की। 



लेखक - इन्दुकांत आंगिरस 


लघु कथा - दो गज़ की दूरी

 

दो गज़ की दूरी



- ज़रा दो गज़ की दूरी रखिये 


- मुर्दा ही तो दफ़्ना रहे है , अब जगह कम है तो क्या करे। 


- मुर्दा कोरोना नेगेटिव है या पॉजिटिव ?


- क्या  फ़र्क  पड़ता है , अब तो मुर्दा है। 


- फिर भी ?


- पॉजिटिव है। 


- पॉजिटिव है  तो दो गज़ की दूरी पर ही दफ़नाए। 


- क्यों ?


- यहाँ ज़िंदा लोगो का ही इलाज नहीं हो रहा है तो मुर्दों का इलाज करने कौन आएगा । 


- मुर्दो को इलाज की क्या ज़रूरत है ?


- इलाज की तो ज़रूरत नहीं लेकिन कौन जाने पॉजिटिव मुर्दों को जन्नत नसीब होगी कि नहीं ?



लेखक - इन्दुकांत आंगिरस 


Friday, June 4, 2021

लघु कथा - एक जून की रोटी

 

एक जून की रोटी


सुबह ,दोपहर , शाम जब कभी भी उधर से गुज़रता ,वह भीख माँगती ही मिलती और उसके दो मासूम बच्चें फ़ुटपाथ पर बिछी फटी चादर पर सोये मिलते। यूँ हमेशा ही बच्चों का सोये रहना मुझे खटक गया और मैं हिचकिचाते हुए उनकी माँ से पूछ ही बैठा,

-बच्चें बीमार है क्या ,हमेशा सोये रहते हैं ?

-न बाबू जी , बीमार तो नहीं हैं। मैं इन्हें सुबह ही थोड़ी-सी अफ़ीम चटा देती हूँ।

-अफ़ीम , क्यों , ऐसा क्यों करती हो - मैंने लगभग चौंककर पूछा था।

- धंधा नहीं करने देते बाबू , जो जागते रहेंगे तो इधर-उधर भागेंगे। अब मैं इन्हें सम्भालूँ या एक जून की रोटी का इंतिज़ाम करूँ?


उसका जवाब सुनकर मैं गूँगा ही नहीं बहरा भी हो गया।





लेखक - इन्दुकांत आंगिरस