Handsome Man - Passionate Poet
बहुत ही ख़ुशगवार मौसिम था। धूप थी लेकिन धूप सी न थी। ढलती हुई गर्मियों की ऐसी ही एक शाम थी जब मैं लक्ष्मीबाई नगर , नई दिल्ली के एक सरकारी क़्वार्टर के दरवाज़े के सामने खड़ा था। शायद ग्राउंड फ्लोर के आँगन को कवर करके स्टडी रूम या यूँ समझिये कि यार - दोस्तों के लिए एक बैठक ख़ाना। मुख्य जाली वाले दरवाज़े से गुज़रती मेरी निगाहों में चंद कुर्सियाँ , किताबों से दबी मेज़ , मेज़ पर इतराता टेबल लैंप , दीवार पर लटका क्लेंडर .... सब कुछ एक साथ उभर गया था। काली -सफ़ेद गोल घंटी बजाते कुछ पल ही गुज़रे थे कि एक महिला दरवाज़े पर आ गयी थी। मैंने दरवाज़े पर टँगी नाम पट्टिका पर लिखे नाम को दोहराते हुए पूछा , "Advocate विनय कुमार सिंघल साहब यही रहते है ? " महिला ने दरवाज़ा खोलते हुए कहा , " जी , आप बैठिये , वो अभी थोड़ी देर में आते हैं। " मैं एक कवि - गोष्ठी में शामिल होने के लिए यहाँ आया था लेकिन यह जान कर सुखद आश्चर्य हुआ कि सिंघल साहिब पेशे से एक वकील थे।
शायद मैं वक़्त से पहले पहुँच गया था क्योंकि अभी तक कोई दूसरा कवि नहीं पहुँचा था। थोड़ी ही देर में सिंघल साहिब आये। मेरी ये उनसे पहली मुलाक़ात थी। गौर वर्ण , दरम्याना क़द , काली - सफ़ेद सलीके से कढ़ी ज़ुल्फ़ , नज़र का चश्मा , तेजवान चेहरा , खिलखिलाती धूप -सी मुस्कराहट यानी एक handsome man। उस दिन जो उनसे बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो आज तक ज़ारी है। जब मुझे बाद में मालूम पड़ा कि उनका जन्म पुरानी दिल्ली का है तो हम अधिक घनिष्ट मित्र बन गए क्योंकि मेरा बचपन भी पुरानी दिल्ली कि गलियों में गुज़रा था। ठीक से याद नहीं लेकिन शायद उन्हें चुन्नी लाल पतंग वाले की दुकान पर कभी ज़रूर देखा होगा।
सिंघल साहब मेरे से उम्र में कुछ वर्ष बड़े हैं और ज्ञान में मुझसे बहुत बड़े हैं। आपने बी.एससी., एलएल.बी. व गणित, विधि, हिन्दी, अँग्रेज़ी में स्नातकोत्तर अध्ययन के अतिरिक्त पत्रकारिता, ज्योतिष, अंक-विद्या, हस्त-रेखा विज्ञान, सामुद्रिक शास्त्र, गायन, पेंटिंग, पोर्ट्रेट्स, समस्त इनडोर व आउटडोर गेम्स, एथलैटिक्स आदि में दक्षता प्राप्त की है । यह मेरा सौभाग्य है कि ऐसी विलक्षण बहुमुखी प्रतिभा का आशीर्वाद मुझे सदैव प्राप्त होता रहा है। हालां कि मेरे पिछले २० वर्षों के बैंगलोर प्रवास के दौरान उनसे उतनी मुलाक़ाते नहीं हो पाई लेकिन जब कभी भी मैंने उनसे अपनी किसी भी परेशानी का ज़िक्र किया तो उन्होंने तत्काल मेरी मदद करी और मुझे प्रेरित किया। उनकी कुछ कविताओं से प्रेरित हो कर मैंने अपने बचपन से जुडी यादों पर कविताएँ लिखी जोकि " फ़्लैश बैक " काव्य संग्रह के रूप में प्रकाशित हुई। मैंने इस पुस्तक की भूमिका में सिंघल साहब का ज़िक्र किया है।
सिंघल साहिब का साहित्यिक फ़लक बहुत बड़ा है। कविता लेखन के अतिरिक्त आपने लेख, कहानियाँ, उपन्यास, निबन्ध भी समय समय पर लिखे हैं । आपने अनेक युवा और गुमनाम कवियों को मंच प्रदान किया , साझा संकलनों को प्रकाशित कर उनकी रचनाओं को हिंदी साहित्यिक संसार तक पहुँचाया। आपने दिल्ली में मृतप्राय पारिवारिक साहित्यिक गोष्ठियों को पुनर्जीवित किया , अनेक मासिक पारिवारिक साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन व मंच संचालन किया। पारिवारिक साहित्यिक गोष्ठियों के अतिरिक्त अनेक मासिक पारिवारिक संगीत गोष्ठियों का आयोजन व संचालन भी किया। अनेक कवि-सम्मेलनों व मुशायरों में भाग लिया व मंच संचालन किया।
डॉ.विनय कुमार सिंघल सिर्फ एक साहित्यकार , कलाकार या संगीतकार नहीं अपितु अपने आप में एक संस्था है। उनके मार्गदर्शन से अनेक कवि , लेखक और कलाकार लाभान्वित हुए हैं। पिछले कई वर्षों से स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों के चलते सिंघल साहिब कही आते - जाते नहीं है लेकिन घर में उनका क़लम हमेशा गतिमान रहता है। उनमे सीखते रहने की एक अनूठी लगन है और जो मनुष्य स्वयं को सदा विद्यार्थी समझे , उसी को ज्ञानी समझिये। डॉ.विनय कुमार सिंघल का उपनाम " निश्छल " इतना निश्छल है कि उनके साथ बैठ कर हमारा मन भी निश्छल हो जाता है। हिन्दी साहित्यिक संसार उनके योगदान को कभी भुला नहीं पायेगा। ईश्वर से यही कामना है कि मेरे बड़े भाई डॉ.विनय कुमार सिंघल " निश्छल " दीर्घायु हो और निरंतर सृजन करते रहें। अनेक शुभकामनाओं के साथ -
सादर -इन्दुकांत आंगिरस
B -4/ 177 , Safdarjung Enclave
New Delhi - 110029
9900297891
डॉ.विनय कुमार सिंघल "निश्छल"
परिचय
॰॰॰॰॰॰॰
मैं,डॉ.विनय कुमार सिंघल "निश्छल", मेरा जन्म (स्व.) लाला प्रेम प्रकाश सिंघल,साड़ी वाले/ बिजली वाले व (स्व.) श्रीमती प्रकाश वती के घर बाजार सीता राम, दिल्ली-११० ००६ में ११-०७-१९४९ (श्रावण मास के प्रथम सोमवार) को हुआ। मैंने बी.एससी., एलएल.बी. व गणित, विधि, हिन्दी, अँग्रेज़ी में स्नातकोत्तर अध्ययन के अतिरिक्त पत्रकारिता, ज्योतिष, अंक-विद्या, हस्त-रेखा विज्ञान, सामुद्रिक शास्त्र, गायन, पेंटिंग, पोर्ट्रेट्स, समस्त इनडोर व आउटडोर गेम्स, एथलैटिक्स आदि में दक्षता प्राप्त की। मैं १९६७ से अनवरत हिन्दी कविताएँ लिख रहा हूँ , मैं १९७१ से अँग्रेज़ी व उर्दू में भी कविताएँ लिख रहा हूंँ। १९६९-७० में आर्य काॉलेज, पानीपत की पत्रिका में पहली बार मेरी हिन्दी कविता प्रकाशित हुई 'बर्फ बस बर्फ'। १९७१-७२ में मेरठ कॉलेज, मेरठ की पत्रिका के रजत जयन्ती वर्ष के विशेषांक में मेरी प्रथम अँग्रेज़ी कविता 'डैथ द वरसेटाइल' प्रकाशित हुई और मुझे पुरस्कार भी मिला। १९७१ में ही मेरठ के एक पाक्षिक समाचार पत्र 'पाक्षिक गुर्जर' में पहली बार मेरी हिन्दी कविता एक समाचार पत्र में मेरे मित्र बिमल कुमार भारती के प्रयासों से प्रकाशित हुई और उसके बाद तो मेरी हिन्दी व अँग्रेज़ी की रचनाएँ कब-कब, किस-किस राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिका में छपीं मुझे स्मरण नहीं। १९८१ से १९९३ तक कतिपय पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया व उनके लिए रचनाएँ भी लिखीं।
कविता लेखन के अतिरिक्त लेख, कहानियाँ, उपन्यास, निबन्ध भी समय समय पर मैंने लिखे हैं, १९७५ में मैंने एक संस्था "यूथ सिम्फनी" स्थापित की जो संगीत को समर्पित थी। उस संस्था का मैं मानद सचिव रहा। उसके अंतर्गत हम संगीत का प्रशिक्षण दिया करते थे।
मैंने हस्त-रेखा विज्ञान पर एक शोधपरक पुस्तक लिखी जिसमें हस्तरेखा विज्ञान के अनेक अज्ञात व अनछुए पक्षों की जानकारी दी गई थी। अनेक सम्मान, पुरस्कार व उपाधियाँ साहित्य-सेवा के लिये मुझे प्राप्त होती रही हैं,जिनमें "विद्या वाचस्पति" (मानद) सम्मान प्रमुख है जो मुझे ११-०७-१९९८ को राष्ट्रीय स्तर के वरिष्ठ साहित्यकार पद्मश्री श्री (अब स्वर्गीय) देवेन्द्र सत्यार्थी जी—संरक्षकः अखिल भारतीय कला-संगम (स्थापना-वर्ष—१९६०) नई दिल्ली, के कर-कमलों द्वारा प्राप्त हुआ था।
मेरे द्वारा दिल्ली में मृतप्राय पारिवारिक साहित्यिक गोष्ठियों को पुनर्जीवित किया गया , अनेक मासिक पारिवारिक साहित्यिक गोष्ठियों का आयोजन व मंच संचालन किया। पारिवारिक साहित्यिक गोष्ठियों के अतिरिक्त अनेक मासिक पारिवारिक संगीत गोष्ठियों का आयोजन व संचालन भी किया। अनेक कवि-सम्मेलनों व मुशायरों में भाग लिया व मंच संचालन किया। श्रीमद्भगवद्गीता का व कतिपय ऋग्वेद के मंत्रों का अँग्रेज़ी व हिन्दी में तुकान्त कविता में काव्यानुवाद किया। रवींद्र नाथ ठाकुर कृत गीतांजलि के कुछ अंशों का हिन्दी व अँँग्रेज़ी में काव्यानुवाद किया। कुछ कवि व कवयित्रियों की कविताओं का अँग्रेज़ी कविता में काव्यानुवाद किया।
१९८४-८५ में हिन्दी की एक साहित्यिक मासिक पत्रिका 'कामदा' का सह-सम्पादन किया। कतिपय अपरिहार्य कारणों से कुछ समय के पश्चात् उस पत्रिका का प्रकाशन बंद करना पड़ा।
१९९०-९१ में एक द्विभाषी (हिन्दी व अँग्रेज़ी की) मासिक पत्रिका 'फॉर्चून कॉलेज टाइम्य' का सह-सम्पादन किया। आर्थिक कारणों से उस पत्रिका का प्रकाशन भी बंद करना पड़ा।
१९९६ से २००३ के मध्य ७ संयुक्त काव्य-संकलनों में भागीदारी की व सम्पादन और प्रकाशन भी किया जिनके शीर्षक इन्द्रधनुष व इन्द्रधनुष के पर्यायवाची शब्द थे। इसकी तुलना डॉ.हरीश नवल, जाने-माने अंतर्राष्ट्रीय व्यंग्यकार/साहित्यकार/ कलाकृतिकार व संगीतकार ने 'तार-सप्तक' से की जो काम हमसे अनायास ही हो गया था और लगभग नए ४० कवि/कवयित्रियों को प्रकाश में लाया गया जिनमें से अधिसंख्य कवि/कवयित्रियाँ आज प्रसिद्धि के शिखर पर हैं। मेरी कविताएँ और लेख अनेक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय-पत्रिकाओं यथा नवनीत, कादम्बिनी, गगनांचल, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, मिरर, इलस्ट्रेटिड वीकली आदि में प्रकाशित होते रहे। अनेक काव्य प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान प्राप्त किया व अन्य अनेक काव्य प्रतियोगिताओं व कला प्रतियोगिताओं में निर्णायक की भूमिका का वहन किया। १९८० से दिल्ली उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में कार्यरत हूँ। अद्यतन दो अँग्रेज़ी के एकल काव्य-संकलन व दो उर्दू के एकल काव्य-संकलन भी प्रकाशित हो चुके हैं।
१९९८ में एक साहित्य व कला को समर्पित संस्था "वाङ्गमय कला संगम" स्थापित की जिसका मैं संस्थापक/अध्यक्ष हूँ। उस संस्था द्वारा हम अनेक व्यक्तियों/कलाकारों/संगीतकारों/समाजसेवियों/साहित्यकारों को सम्मानित करते आ रहे हैं। मेरे एकल व संयुक्त अनेक काव्य-संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। मैं हिन्दी साहित्य में कुछ विश्व कीर्तिमान भी स्थापित कर चुका हूँ यथाः
१.'राम का अंतर्द्वंद्व' लघु खंड-काव्य (५१ मुक्त छंद)
यह कृति विषयवस्तु के दृष्टिकोण से एक अनूठी रचना है जो संचारी भावों पर आश्रित है,जिसे 'इंडियन बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' ने वर्ष २०२३ की सर्वश्रेष्ठ पुस्तक व मूझे वर्ष २०२३ का सर्वश्रेष्ठ लेखक घोषित किया। तीन व्यावसायिक गायकों ने इसे स्वरबद्ध किया है। कुछ भक्तों ने अपने पूजा-गृह में इसे स्थान दिया है और इसका नित्य पाठ करते हैं। भगवान राम पर आजतक ऐसी कृति किसी ने नहीं लिखी,
२.श्रीमद्भगवद्गीता जी का अँग्रेज़ी व हिन्दी में तुकान्त काव्यानुवाद किया जो दोहरा काम किसी एक व्यक्ति ने आज तक नहीं किया,
३.वर्ष २०२३ में २४४० कविताओं का सृजन किया,
४.३०-१२-२०२३ को ४६ कविताएँ लिखीं,
५.हिन्दी काव्य-लेखन में मैंने, डॉ.वीणा शंकर शर्मा 'चित्रलेखा' व अंजू कालरा दासन 'नलिनी' के साथ संयुक्त रूप में त्रयी काव्य-संकलनों के रूप में एक नये वाद "त्रयीवाद" को जन्म दिया जो अपने आप में एक अनूठा प्रयोग था, इस त्रयीवाद पर हम ३३ कड़ियाँ प्रकाशित करवा चुके हैं,
६.'राम का अंतर्द्वंद्व' पर हमें १ आलोचना व ११४ समीक्षाएँ प्राप्त हुईं, इतनी समीक्षाएँ किसी एक पुस्तक पर कभी प्राप्त नहीं हुईं,
७.उनका संकलन 'समीक्षाएं नाम से प्रकाशित हुआ,
८.गिनैस बुक आफ रिकाॉर्ड्स में यह संकलन एक विशेष श्रेणी बना कर सम्मिलित करने हेतु स्वीकृत किया गया है,
९.०४-१०-२०२५ को ६१ दोहे रचे,
१०.अभी तक २९,७००से अधिक कविताएँ हो चुकी हैं,
११. गत ५ वर्ष में १०,००० कविताएँ लिखी हैं,
१२. एक दिन में, एक ही समय,एक ही स्थान पर मेरे ३२ तथा २ अन्य (कुल ३४) काव्य-संकलनों का लोकार्पण हुआ
१३. दोहा सप्तशती-१ प्रकाशित जिसमें ७०९ दोहे संकलित व २६-१०-२०२५ को लोकार्पित
१४. दोहा सप्तशती-२ (७०० दोहे) प्रकाशन हेतु तैयार(५४ दिन में ७०० दोहों का सृजन १३-१०-२०२५ से ०५-१२-२०२५ के मध्य)
अभी तक उक्त अधिसंख्य कीर्तिमान अभंग विश्व कीर्तिमान हैं।
अद्यतन २१४ काव्य-संकलन प्रकाशित, २९९४४ कविताएँ हो चुकी हैं और
लेखन सतत
गतिमान है।
पुनश्चः १९७३ से १९९२ (१९वर्ष) के मध्य बी.एससी. तक के अनेक विद्यार्थियों को निःशुल्क पढ़ाया। मेरे सहपाठी व गुरुजन मुझे चलता-फिरता विश्वकोश कहते थे और अपनी उस छवि को अक्षुण्ण रखने के लिए मुझे अथक स्वाध्याय करते रहना पड़ता था। देखा जाए तो मैं जन्मजात शिक्षार्थी भी हूँ, शिक्षक भी हूँ, निश्छल मानव भी हूँ। मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे महाप्रस्थान के पश्चात् सभी जन मेरे बारे में एक मत से यही सोचें— ...उसे अन्तिम श्वास तक सीखने की ललक थी...।
हस्ताक्षर
डॉ.विनय कुमार सिंघल "निश्छल"
व्यवहारज्ञ/अधिवक्ता/कवि/लेखक/साहित्यकार
चल भाषः९८९१४ ३५१४५
निवासः 'कीर्ति निकेतन'
एच-४११,
पालम विहार,
गुरुग्राम -१२२ ०१७
(हरियाणा)
No comments:
Post a Comment