पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या , हाथ कंगन को आरसी क्या
पढ़े फ़ारसी , बेचे तेल , ये देखो कुदरत के खेल
हिसाब जौ जौ , बख़्शीश सौ सौ
मुर्गा वो जो मुर्गियों में खेले , न कि मुर्गों में जा कर दण्ड पेले ( मुश्ताक़ अहमद युसूफी )
हर ख़मो-पेचे कि शुद अज़ तारे-ज़ुल्फ़े-यार शुद
दाम शुद, ज़ंजीर शुद, तस्बीह शुद, ज़ुन्नार शुद
~शाहज़ादा दाराशिकोह क़ादरी (1615-1659 ई॰, बादशाह शाहजहाँ का ज्येष्ठ पुत्र)
हर ख़मो-पेच जो कि है वह तारे-ज़ुल्फ़े-यार ही से है, चाहे दाम हो, ज़ंजीर हो, तस्बीह हो कि ज़ुन्नार हो।
शब्दार्थ
ख़मो-पेच = twist and turn.
तार = srand. ज़ुल्फ़े-यार = flowing hair of the beloved.
दाम = trap. ज़ंजीर =chain; shackles. तस्बीह = rosary. ज़ुन्नार = sacred thread worn by Hindus.
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अज़ दिल ख़ेज़द, बर दिल रेज़द - जो बात दिल से निकलती है वही बात दिल पर असर करती है
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