Saturday, February 14, 2026

कब आओगे प्राण प्रिय _Original

 इस मन के सूने आँगन में

कब आओगे प्राण प्रिय 


रीत गयी चंदा की किरणें , बुझने लगे सितारे भी 

दरिया की लहरों से अब , मिलते नहीं किनारे भी 

पतझड़ भी अब रूठ गया , रूठी यहाँ बहारें  भी 


बंजर मन में ख़ुश्बू बन   , कब छाओगे प्राण प्रिय 



दिल की उजड़ी नगरी से ,  रूठी अब तन्हाई भी 

ग़म में डूबे  नग़मों की  ,  रीति अब  शहनाई  भी  

राख़ हुआ चन्दन मन   ,धुआँ  बनी  परछाई भी 


इन दर्दीले गीतों को  , कब  गाओगे प्राण प्रिय 



शाम ढली डूबा सूरज  , नागिन सी डसती  रतियाँ 

पनघट भी अब छूट गया  , छूट गयी सगरी सखियाँ 

गिनते गिनते युग बीते  , बीत गयी कितनी सदियाँ


किरनों का सतरंगी रथ , कब लाओगे प्राण प्रिय 


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