इस मन के सूने आँगन में
कब आओगे प्राण प्रिय
रीत गयी चंदा की किरणें , बुझने लगे सितारे भी
दरिया की लहरों से अब , मिलते नहीं किनारे भी
पतझड़ भी अब रूठ गया , रूठी यहाँ बहारें भी
बंजर मन में ख़ुश्बू बन , कब छाओगे प्राण प्रिय
दिल की उजड़ी नगरी से , रूठी अब तन्हाई भी
ग़म में डूबे नग़मों की , रीति अब शहनाई भी
राख़ हुआ चन्दन मन ,धुआँ बनी परछाई भी
इन दर्दीले गीतों को , कब गाओगे प्राण प्रिय
शाम ढली डूबा सूरज , नागिन सी डसती रतियाँ
पनघट भी अब छूट गया , छूट गयी सगरी सखियाँ
गिनते गिनते युग बीते , बीत गयी कितनी सदियाँ
किरनों का सतरंगी रथ , कब लाओगे प्राण प्रिय
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